15 August 2020

स्वतंत्रता दिवस : यह ठहरने का नहीं संघर्ष करने का वक़्त है।

 


✍️ टीम इंक़लाब 

आज से 73 साल पहले भारत को अंग्रेजी गुलामी से आज के दिन ही आज़ादी मिली थी। अंग्रेजी दासता के खिलाफ लड़ने वाले लाखों लोगों ने जेल की सजाएँ काटी, कालापानी की अमानवीय यातनाएँ झेलीं और कितने माताओं के बेटों ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को चूम लिया। महात्मा गाँधी के समझौता-दबाव और अहिंसा के आंदोलनों ने बड़े पैमाने पर लोगों को जागृत और एकताबद्ध जरूर किया पर केवल उसके कारण अंग्रेजी हुक़ूमत कभी भारत नहीं छोड़ती।  1857 के विद्रोह की पहली चिंगारी फूटने के बाद भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ कई विद्रोह हुए। चटगाँव विद्रोह, गदरी आंदोलन, भगतसिंह और उनके साथियों का विद्रोह, नौसेना विद्रोह, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज की कार्यवाही, सीपीआई की मज़दूर यूनियनों के नेतृत्व में देशव्यापी आम हड़तालें, तालाबंदी आदि तमाम संघर्षों की बदौलत अंग्रेजों को लग गया कि उनका भारत में टिके रहना मुश्किल है। इस अंदेशे से उन्होंने किसी बड़े विद्रोह के द्वारा उखाड़ फेके जाने की बजाय समझौतापूर्वक भारत के जमींदारों, पूंजीपतियों और उनकी नुमाइंदगी करने वाली कांग्रेस को सत्ता सौपकर जाना बेहतर समझा। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज तो चले गए पर हम पूरी तरीके से आज़ाद नहीं हो पाए। भगतसिंह ने 1930 में ही कहा था कि गाँधी और कांग्रेस के रास्ते जो आज़ादी आएगी उसमें बस इतना होगा कि सत्ता गोरे अंग्रेजों के हाथ से निकलकर भूरे अंग्रेजों के हाथ में आ जायेगी। आज़ादी का फल मुठ्ठीभर ताकतवर और अमीर हिंदुस्तानियों की तिजोरी में समाकर रह जायेगा। साथ ही आने वाले समय में जाति-धर्म के झगड़ों की भीषण आग में देश झुलसता रहेगा। 

   भगतसिंह की कही बात आज पूरी तरह से खरी साबित हुई है। पिछले 73 सालों में कांग्रेस, जनता पार्टी, बीजेपी और तमाम क्षेत्रीय दलों की सरकारें बनी और सबने देश की आम जनता के साथ धोखा ही किया। सबने मुठ्ठीभर अमीर और ताकतवर पूंजीपतियों की ही सेवा की। जनता के टैक्स के पैसों से इन पूंजीपतियों की जेबें भरी गयीं। कर्ज़ लेकर डुबोने वाले, कर्ज़ लेकर भागने वाले धन्नासेठों के कर्ज माफ किये गए। जनता के खून-पसीने से खड़े किए गए राजकीय उद्योग औने पौने दाम पर पूंजीपतियों को बेच दिए गए। नए-नए करों का बोझ जनता पे लादा जाता रहा। दूसरी तरफ अंग्रेजों की बांटों और राज करो कि नीति का अनुसरण करते हुए लोगों को जाति-धर्म के नाम पर लड़ाया भी गया। आज हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि अर्थव्यवस्था डूबने के कगार पर है, बेरोजगारी चरम पर पहुँच चुकी है, महंगाई आसमान छू रही है। जबकि साम्प्रदायिकता का उन्माद अपने चरम पर है। वर्तमान बीजेपी सरकार भी पिछली सरकारों की तरह ही अम्बानी, अडानी, मित्तल, बिरला जैसे पूंजीपतियों की सेव्ष्टआ में लगी हुई है। BPCL, एयर इंडिया, LIC, शिपिंग कारपोरेशन आदि सरकारी उद्यम या तो बिक चुके हैं या बिकने के कगार पर हैं। हाल ही में 23 पीएसयू बिकने की खबर आई। रेलवे के स्टेशन और रूट तो बेचने शुरू हो चुके हैं। कोरोना से पूरे देश की हालत खराब है, 47 हज़ार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं तो दूसरी तरफ चीन, पाकिस्तान और राम मंदिर को मुख्य मुद्दा बनाकर जनता को भटकाने की कोशिशें जारी हैं। स्पष्ट है कि ऐसा भारत बनाने के लिए हमारे शहीदों ने अपनी जानें नहीं दी थीं। यह जिम्मेदारी अब हम नौजवानों को अपने कंधों पर उठानी होगी। भारत में पूंजीपतियों की सेवा करने वाली सभी राजनीतिक पार्टियों को सत्ता से बेदखल करके न्याय और समानता पर आधारित एक नयी व्यवस्था का निर्माण ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। इसके लिए देश के कोने-कोने में लोगों को इस क्रांतिकारी बदलाव के लिए जागृत और संगठित करना ही आज का सबसे प्रमुख कार्यभार है। अगर हम एक बेहतर भारत और बेहतर विश्व का निर्माण कर पाए तो यही उन शहीदों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


इंक़लाब

ज़िंदाबाद

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