17 May 2020

पालघर लींचिंग : बारूद की ढेरी बनता हमारा समाज


✍️ राघवेंद्र तिवारी

आज कल पालघर एक जघन्य घटना से चर्चा में बना हुआ है।  मुम्बई से लगभग 120 किलोमीटर दूर स्थित पालघर नगरपालिका में आने वाले गढ़चिंचले गाँव में 16 अप्रैल को एक उन्मादी भीड़ ने तीन संतो को पीट-पीट कर मार दिया। जिन तीन संतो को पीट-पीट कर मार दिया गया उनकी पहचान कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी और नीलेश के रूप में हुई। ये तीनों संत मुम्बई से सूरत अपने किसी परिचित के अंतिम संस्कार के शामिल होने जा रहे थे। ये लोग मुम्बई से सूरत मेन हाइवे से जाने को थे लेकिन बार्डर पूरी तरह से सील होने के कारण पुलिस ने इन्हें जाने से रोक दिया। संतो ने मुम्बई से सूरत जाने के लिए गाँवो से होकर जाने वाले रास्ते का सहारा लिया। गाँव के रास्ते से होकर जा रहे संत जब पालघर जिले की कासा पुलिस थाने के गढ़चिंचले गाँव के पास वन विभाग के नाके पर पहुँचे तो वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा इन्हें रोका गया। नाके पर पूछ ताछ के दौरान वहाँ ग्रामीण भी इकट्ठा होने लगे। ग्रामीणों और संतो में कुछ तूतू-मैं मैं हुई और  ग्रामीणों की उस भीड़ ने संतो पर हमला कर दिया। ग्रामीणों को संदेह हुआ कि ये लोग बच्चा चोर गिरोह से हैं। इसके बाद भीड़ उन तीनों लोगों पर टूट पड़ी। लोग लात-घूसों, लाठी, डंडों से लगातार प्रहार करने लगे। इस घटना के दौरान वहाँ पुलिस भी पहुँची पर लोगों ने पुलिस पर भी हमला कर दिया तथा पुलिस की गाड़ी पलट दी। फिर पुलिस ने भी उनको बचाने की कोशिश लगभग छोड़ ही दी। नतीजतन पुलिस के सामने ही तीनों को भीड़ मारती रही और तीनों की मौत हो गयी। इस भीड़ द्वारा की गई मॉब लिंचिंग का वीडियो वायरल हो गया। वह वीडियो आपको विचलित कर सकती है कि जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ कैसे लोग हैं। इंसानियत को शर्मसार करती इस घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया। पालघर में जो भी हुआ वो एक समाज में बढ़ रही हत्यारी भीड़ की मानसिकता  दिखाने के लिए पर्याप्त है।

आखिर यह घटना कैसे हुई?
पालघर जिले के गढ़चिंचले गांव में और उसके आसपास के गाँवो में पिछले कई दिनों से बच्चा चोरी की अफवाह फैली हुई थी इसके बाद गांव के लोग आपसी समूह बनाकर गांव की निगरानी करना शुरू कर दिए थे। गांव के लोग बच्चा चोरी गिरोह के फैले अफवाह से डरे हुए थे। इस घटना से पहले पास के गांव में आदिवासियों की मदद करने जा रहे एक डॉक्टर के ऊपर भी हमला हुआ था यह हमला भी बच्चा चोरी गिरोह की निगरानी करने वाले समूह ने किया था। डॉक्टर को बचाने गई पुलिस पर भी इस समूह ने हमला कर दिया था, जिसमें पुलिस वाले भी जख्मी हो गए थे। 16 अप्रैल के इस घटना की मुख्य वजह बच्चा चोरी गिरोह की फैली अफवाह ही थी।  बच्चा चोर गिरोह की झूठी अफवाह कई सालों से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई है। झूठी अफवाह से ना जाने कितनों को पीट-पीटकर मार दिया गया जो खबर भी नहीं बन पाईं। पालघर घटना को ही देख लीजिए, 16 अप्रैल की घटना 19,20 अप्रैल तक मुख्य मीडिया में नहीं आई। अगर अखाड़ों और संत समाज का दबाव और सत्ता पक्ष की राजनीतिक दिलचस्पी ना होती तो यह घटना अन्य तमाम मॉब लीनचिंग की तरह एक आँकड़ा बनकर रह जाती। यदि संतो की जगह कोई और आम नागरिक होता तो शायद इस घटना पर मीडिया और सत्ताधारी पार्टी को इतना मसाला नहीं मिलता।
   संतो के साथ जो हुआ वो बेहद शर्मनाक है लेकिन इस तरह के अफ़वाहों को समाज मे जगह कैसे मिलती है ये भी सोचना होगा। यूपी के पूर्वांचल में अभी कुछ महीनों पहले इसी अफवाह के चलते कितने राह चलते लोगों पर हमले हुए। एक घटना तो मुझे भी याद है जब एक व्यक्ति अपने ही लड़के को लेकर जा रहा था और लड़का किसी कारणवश रोने लगा बच्चे की आवाज सुनते ही वहाँ कुछ लोग आ गए और उस व्यक्ति पर हाथ उठा दिए। बहुत मुश्किल से वह व्यक्ति उस भीड़ को यह समझा पाया कि यह दो साल का बच्चा उसका खुद का ही बच्चा है। उस दिन वह व्यक्ति इस तरह की बच्चा चोरी की फैली अफवाह का शिकार होने से बाल-बाल बच गया। लेकिन अक्सर देखा गया है कि झूठी अफवाहें समाज मे बहुत तेजी से पैर पसारती हैं और इस तरह की अफवाहें एक जगह से दूसरी जगह पहुँचते-पहुँचते बढ़ती जाती हैं लोगों को सच सी लगने लगती हैं। ग्रामीण क्षेत्रो में लोग डर और खौफ में जीने लगते हैं। सवाल यह है कि जब इस तरह की अफवाहें समाज में फैलती हैं तो प्रशासन इस पर क्या करती है? क्या इस तरह की अफवाहों की जानकारी पुलिस प्रशासन को नहीं होती? प्रशासन समाज मे फैली झूठी अफवाहों को सार्वजनिक रूप से खंडित क्यों नहीं करते?  सरकारें जनता के बीच सुरक्षा की भावना स्थापित क्यों नहीं कर पाती? आम नागरिक इन अफवाहों को बिना सत्यापित किये सच क्यों मान लेते हैं? अगर किसी को ऐसी किसी भी घटना के बारे में जानकारी मिलती है तो वो पुलिस से सम्पर्क क्यों नहीं करता? अगर किसी को संदेह मात्र होने पर पकड़ भी लिया तो पुलिस के हवाले करने के बजाय खुद फैसला कैसे ले लेते हैं?  अगर सामने वाला गुनहगार भी हो तो इसका फैसला कोर्ट करेगी या एक उन्मादी और हताश भीड़? इस तरह की भीड़ आज कैसे तैयार हो रही है जो कभी गाय काटने की अफवाह तो कभी बच्चा चोरी की अफवाह के नाम पर लोगों की हत्या कर देती है? ऐसे बहुत से सवाल एक न्यायप्रिय इंसान के जेहन में आयेंगे।
इस भीड़ ने ना जाने कितनों का जीवन निगल लिया, कितने बेगुनाहों को उनके अपनों से हमेशा के लिए दूर कर दिया। समाज मे भीड़ के न्याय को जायज ठहराने वाले भी उतने ही गुनहगार होते हैं जितना कि करने वाले। मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर समाज मुख्य तीन धाराओ में बंटा दिखता हैं।
1. पहले वह लोग जो किसी भी घटना पर सवाल उठाते हैं और उस घटना के जांच की मांग करते हैं। दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हैं, गुनाहगार चाहे किसी भी धर्म-जाति से का हो।
2. दूसरे वह लोग होते हैं जो इन सभी घटनाओं पर कुछ भी नहीं बोलते और कहीं ना कहीं अपनी चुप्पी से गुनहगारों के पक्ष में ही हो जाते हैं, क्योंकि गलत के खिलाफ ना बोलना भी गुनाह को बढ़ावा देना होता है।
3. तीसरे वह लोग होते हैं जो किसी भी घटना को अपने राजनीतिक फायदे और नुकसान को देखकर उठाते हैं।  किसी भी घटना को सांप्रदायिक बनाने का खेल यहीं से शुरू होता है पालघर घटना को भी सांप्रदायिक बनाने का भरपूर प्रयास किया गया। बड़े-बड़े न्यूज़ एंकर और हिंदुत्ववादियो ने उस घटना का कुछ सेकंड का वीडियो वायरल करके मुस्लिम समुदाय को टारगेट किया। उस कुछ सेकंड के वीडियो में दावा किया गया कि हमला कर रहे लोगों में से कोई व्यक्ति यह कह रहा है कि "मार शोएब मार" इस वीडियो के साथ यही मैसेज दो-तीन दिनों में पूरे भारत में फैल गया। सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया के कुछ एंकरों ने भी यही दावा कर दिया कि वीडियो में कोई "मार  शोएब मार" कह रहा है। इस घटना से पूरे देश का माहौल खराब किया जा रहा था और मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत भरा जा रहा था। इसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता था लेकिन आल्ट न्यूज़ (altnews.in) ने अपनी पड़ताल के बाद साफ कर दिया कि लोग "बस ओये बस" चिल्ला रहे थे। पिछले कुछ सालों से मुस्लिमों के खिलाफ मीडिया ने एक ऐसा नैरेटिव बना दिया गया है कि किसी भी घटना में हिंदू मुस्लिम ढूंढ लेते हैं। वर्तमान सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग इस प्रयास में लगे हुए हैं कि देश का बहुसंख्यक मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हो जाये। इसके लिए उनसे बताया जाता है कि मुस्लिमों से हिन्दू अस्मिता को खतरा है। इस खतरे के डर  के आगे उसे बेरोजगारी, भुखमरी, महंगाई और भ्रष्टाचार कुछ भी नहीं दिखता। बहुसंख्यक आबादी का बड़ा हिस्सा सत्ता के साथ इस तरह के मुस्लिम विरोध में शामिल है।

भीड़ द्वारा लिंचिंग की कुछ घटनाएं-
1. जुलाई 2018 में रकबर खान को गाय तस्करी करने के शक में गौरक्षकों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। राजस्थान के अलवर का रहने वाला रकबर खान अपने एक मित्र के साथ एक रात को पालने के लिए जब गाय लेकर जा रहा था तब एक भीड़ ने उसपर हमला कर दिया और उसे मार दिया। हमले के तार विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता से भी जुड़े लेकिन पुलिस ने उसे आरोपी बनाया ही नहीं।

2. पहलू खान दूध का व्यापार करता था। अप्रैल 2017 में उसे गौकशी के शक में लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला। उसकी हत्या के लिए जिन 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया और केस चला उनमें 6 को क्लीन चिट मिल चुकी है व बाकी 3 नाबालिक हैं यानी किसी को भी सज़ा नहीं मिली। उसके घर वालों के लिए यह भुला पाना आज तक सम्भव ना हो सका।
3. अखलाक को भी उसके ही गांव के लोगों ने उसपर बीफ रखने का आरोप लगाते हुए पीट-पीटकर मार डाला। गाँव के कुछ लोगों ने वाट्सएप्प ग्रुप बनाया था जिसमें यह चर्चा थी कि मुस्लिम बीफ खा रहे हैं। अखलाक का परिवार उस गांव में अकेला मुस्लिम परिवार था। अखलाक की मौत के बाद पूरा परिवार आज तक डरा हुआ है।
4. इंस्पेक्टर सुबोध को कौन भूल सकता है जिसने गौ हत्या के शक में बुलंदशहर में हुए हिंसक प्रदर्शन को रोकने के लिए अपनी जान गवाई। इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या का मुख्य आरोपी बजरंग दल का कार्यकर्ता बताया गया था।
5. झारखंड में 6 लोगों को भीड़ ने बच्चा चोरी की अफवाह में पीट पीटकर मार दिया। पुलिस ने जाँच में पाया कि कुछ समय से वाट्सएप्प ग्रुप बनाकर आसपास के गाँवों में बच्चा चोर गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह फैलाई जा रही थी।

6. झारखंड के तबरेज अंसारी को जून 2019 में एक भीड़ ने पोल से बांधकर पीट पीटकर मार दिया। दिसंबर 2019 में कोर्ट ने 13 में से 6 आरोपियों को इसलिए जमानत दे दिया क्योंकि वीडियो से यह पता नहीं चल रहा था कि आखिर किसके वार से तबरेज की मौत हुई है।
हमारे देश मे ऐसी बहुत सी घटनाएं हुई जो 21वीं शताब्दी में हमारे समाज में बढ़ रही बर्बरता की प्रतिनिधि उदाहरण थीं। ज्यादातर घटनाओं में यह देखने में आया कि इनके पीछे सोशल मीडिया  पर अफवाह फैलाकर लोगों के रक्षा दल बनाना, निगरानी करना और संदिग्ध व्यक्तियों पर हमले करना था। के जगह ऐसे लोग पुलिस के साथ भी कोआर्डिनेट करते थे व ऐसे लोगों को राजनीतिक समर्थन भी हासिल था।  पूर्व में हुई घटनाओं पर अगर  निष्पक्ष जांच हुई होती तो पालघर जैसी घटनाएं नहीं होती।

पालघर मॉब लिंचिंग सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों के दोगलेपन की एक झलक है। पिछले 6 सालों में जितनी लिंचिंग हुई उन पर हत्यारों के मजहबी नारे ने न्याय, मानवता, कानून, संविधान सब को ताक पर रख दिया। सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर किसी धर्म विशेष के लोगों के साथ हुई घटनाओं पर राजनेताओं का हत्यारों के पक्ष में बोलना, उनके जेल से निकलने पर स्वागत करना, उनके लिए तिरंगा यात्रा निकालना, भारत माता और वंदे भारत के उद्घोष  के साथ हत्यारों को हीरो बनाकर पेश करना आज की होने वाली मॉब लिंचिंग का आधार है! आज जब पालघर जैसी घटनाएं हमारे सामने हो रही हैं तो एक बार पीछे मुड़कर उन घटनाओं पर भी नजर डालना चाहिए जो पिछले कुछ सालों से हो रही हैं। उन घटनाओं पर अगर पहल किया गया होता तो आज जगह-जगह ऐसी घटना सुनने और देखने को नहीं मिलती जिनसे इंसानियत भी शर्मसार हो जाए। जरा सोचिए गौरी लंकेश की हत्या पर उसे कुत्तिया किसने बोला और उसका बचाव किसने किया? तबरेज अंसारी को जिसने मारा उसके साथ सत्ता पक्ष के केंद्रीय मंत्री फोटो खिंचा रहे थे! अफराजुल को मारकर पेट्रोल छिड़ककर जला दिया गया और उसके हत्यारों के पक्ष में हजारों लोगों द्वारा उच्च न्यायालय के छत पर भगवा झंडा लगा दिया गया।
आज सोशल मीडिया और मुख्य धारा मीडिया जिस तरीके से लोगों में नफरत भर रहे हैं यह नफ़रत जो लोगों के मन में एक ज़हर की तरह एकत्रित हो रही है वो भीड़ के रूप में इसी तरह सड़कों पर अपना रूप दिखाएगी। मीडिया और सत्ताधारी पार्टी की साम्प्रदायिक प्रचार मशीनरी ने समाज को एक बारूद की ढेरी में तब्दील कर दिया है जिसमें अफवाह की एक छोटी चिंगारी विध्वंसक परिणाम देती है।

कलबुर्गी, पानसरे, दाभोलकर व अन्य ऐसे कितने नाम है जो इसी सभ्य समाज की बेहतरी के लिए काम करते-करते मारे गए। इन सभी घटनाओं पर हमारी चुप्पी का परिणाम आज हमारे सामने हैं।

हरिशंकर परसाई के शब्दों में अगर कहा जाय तो दिशाहीन बेकार हताश व विध्वंसकारी युवाओं की भीड़ सत्ता ने खड़ी कर रखी है। इसका प्रयोग जरूरत अनुसार सत्ता धारी करते रहते हैं। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन या सत्ता के साथ चल देती है जो धार्मिक उन्माद या तनाव पैदा कर सकते हैं। यही भीड़ फासिस्टों का हथियार होती है। भारत में यह भीड़ बढ़ रही है और यह भीड़ हमारे आपके घरों तक भी पहुँचे इससे पहले हमें जागना पड़ेगा।

1 comment:

  1. शानदार, लिंचिंग की घटनाओं पर सरकार की चुप्पी और गुनाहगारो के पक्ष में मजहवी नारो का परिणाम है ये सब

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