31 October 2019

सावरकर: क्रांतिवीर या माफीवीर?


✍🏼 नितेश शुक्ला

विनायक दामोदर सावरकर को भारतरत्न देने की बीजेपी की सिफारिश के बाद आजकल एक बहस चल पड़ी है कि सावरकर एक स्वतंत्रता वीर थे या अंग्रेजों से माफी मांगने वाले कायर। महाराष्ट्र चुनाव के पहले बीजेपी के लिए यह बहस काफी फायदेमंद भी साबित हुई है। सावरकर आरएसएस-बीजेपी की हिंदुत्व की विचारधारा को सैद्धांतिक आधार देने वाले व्यक्ति थे इसीलिए आरएसएस और बीजेपी लगातार उनको स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्य नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते रहते हैं। इसका कारण ये भी है कि 1925 में बने और अपने को देशभक्त और राष्ट्रवादी कहने वाले आरएसएस के पास एक भी स्वतंत्रता सेनानी नहीं है जिसे ये अपना कह सकें। इसलिए हिन्दू महासभा के नेता सावरकर को ही स्वतंत्रता आंदोलन के एक मुख्य चेहरे के रूप में दिखाने की कोशिश लगातार की जाती रही है। कुछ समय पहले जब राजस्थान में बीजेपी की सरकार थी तब इतिहास की किताबों में बदलाव करके सावरकर को ही आज़ादी की लड़ाई का मुख्य नेता दिखाने की कोशिश की गई थी। हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने रातों रात भगतसिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ सावरकर की त्रिमूर्ति लगा दी। काफी विरोध के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेश पर वो मूर्तियां हटा दी गईं। वास्तव में यह बस अभी शुरुआत है, आरएसएस आगे काफी ज़ोर-शोर से अपने नेताओं को भारतीय जनमानस और इतिहास में स्थापित करने की कोशिश करने वाला है। फिलहाल हम तथ्यों की पड़ताल करते हुए यह जानने की कोशिश करते हैं कि सावरकर का आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान था या नहीं।
सावरकर की राजनीति को ठीक से समझने के लिए उनके जीवन को दो हिस्सों में देखने की जरूरत है। पहला, 1911 में कालापानी जेल जाने से पहले के सावरकर और दूसरा, 1911 में जेल से अंग्रेजों को पहला माफीनामा लिखने के बाद वाले सावरकर। इन दोनों हिस्सों पर प्रकाश डालते हुए हम कुछ तथ्य रखेंगे जिससे पाठक यह खुद तय कर पाएंगे कि सावरकर का आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान था।

1911 के पहले के सावरकर
सावरकर का जन्म 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ। उन्होंने पहले फर्गुसन कॉलेज पुणे और आगे लंदन के ग्रे इन लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। राजनीतिक जीवन की शुरुआत स्कूली जीवन से ही हो गयी थी। पुणे में रहने के दौरान अपने भाई के साथ अभिनव भारत की स्थापना की। अभिनव भारत सोसाइटी भारत में सशस्त्र क्रांति करके इसे आज़ाद कराना चाहती थी। लंदन में रहते हुए 1909 में उन्होंने 1857 के विद्रोह पर एक किताब "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" लिखी जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले कई लोगों को प्रभावित किया। इस किताब में उन्होंने एक ऐसे भारत की ही कल्पना की थी जिसमें हर जाति-धर्म के लोग बराबरी और चैन से रह सकें। अंग्रेजों ने इस किताब को बैन कर दिया। सन् 1909 में इंग्लैंड में सावरकर के एक अनुयायी और मित्र मदन लाल ढींगरा ने एक जनसभा के दौरान एक ब्रिटिश अधिकारी विलियम हट कर्जन विली की हत्या कर दी। सावरकर ने इसका समर्थन किया व ढींगरा के समर्थन में लेख लिखा। लंदन में रहने के दौरान ही 1910 में क्रांतिकारी समूह 'इंडिया हाउस' की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल रहने के लिए उनको गिरफ्तार किया गया और भारत भेजा गया। भारत आते समय उन्होंने जहाज से भागकर फ़्रांस में शरण लेने का प्रयास भी किया पर फ्रांसीसी अधिकारियों ने उन्हें पकड़कर ब्रिटिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। आगे चलकर उनपर दो मामलों में सुनवाई चली, पहला नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए उकसाने और दूसरा राज्य के खिलाफ साजिश रचने की। दोनों मामलों में कोर्ट ने सज़ा सुनाते हुए उनको दोहरे उम्रकैद यानी 50 साल के कैद की सज़ा दी।


1911 के बाद के सावरकर
यह स्पष्ट है कि सावरकर कालापानी की सज़ा के पहले तक स्वतंत्रता के लिए एक क्रांतिकारी के रूप में काम कर रहे थे पर 1911 में कालापानी सेलुलर जेल जाने के बाद और वहां की  अमानवीय प्रताड़ना के बाद उनमें काफी बदलाव आया। जेल में जाने के डेढ़ महीने बाद ही अगस्त 1911 में अपना पहला माफीनामा लिखा। इसके बाद उनके माफिनामों का सिलसिला शुरू हुआ। सावरकर सज़ा से बचने के लिए अंग्रेजों को माफीनामे पर माफीनामे लिखते रहे। अपने माफिनामों मे एक जगह वो लिखते हैं-
"भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है। अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था।
इसलिए अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है।
....अगर हमें रिहा कर दिया जाता है, तो लोग ख़ुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में, जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे।
इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे। मैं भारत सरकार जैसा चाहे, उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं,.... मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फ़ायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले होने वाले फ़ायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है।
जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है। आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे।"

मई 1921 में सावरकर का माफीनामा अंग्रेज सरकार ने स्वीकार कर लिया और उन्हें रत्नागिरी जेल में भेज दिया गया। अन्ततः जनवरी 1924 में सावरकर को जेल से इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वो अगले पांच साल रत्नागिरी जिले से बाहर नहीं जाएंगे और किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे। हालांकि ये प्रतिबंध 1937 में ही हटाया गया।
      कुछ लोग कहते हैं कि माफीनामा लिखना जिंदा रहने और देश सेवा करने की एक रणनीति थी, पर सावरकर ने 2 मई 1921 में अंडमान जेल से आने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया, उनकी राजनीति हिंदूवादी हो चुकी थी। अमरावती जेल में रहते हुए ही उन्होंने हिंदुत्ववादी राजनीति को वैचारिक आधार देने वाली किताब 'हिंदुत्व' लिखी। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब वॉयसराय ने भारत को भी युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी तब इसके विरोध में कांग्रेस के नेताओं ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया उस समय सावरकर की अध्यक्षता में हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाई। साथ ही उन्होंने अंग्रेजों की सेना में हिंदुओं की भर्ती के लिए खुद कैम्प लगवाए, नारा दिया गया- "राजनीति का ही हिन्दुकरण करो और हिंदुओं का सशस्त्रिकरण करो"। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध भी सावरकर और हिन्दू महासभा द्वारा किया गया। इस प्रकार देखा जा सकता है कि रिहाई के बाद एक शब्द या एक कार्य से भी सावरकर अंग्रेजों के खिलाफ नहीं गए। अपने माफीनामे के मुताबिक ब्रिटिश सरकार के सेवक बने रहे और आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर करते रहे।


देश के बँटवारे की सबसे पहली परिकल्पना सावरकर ने दी थी
सावरकर खुद एक नास्तिक व्यक्ति थे, वे हिन्दू को एक धर्म की बजाय एक संस्कृति की तरह देखते थे। अपनी किताब "हिंदुत्व" में उन्होंने हिंदुत्व शब्द को गढ़ा और परिभाषित किया है। उनके अनुसार हिंदुत्व तीन बातों से तय होता है-
1.) इस भारतीय भूभाग (सिन्धुस्थान या हिंदुस्थान) से खून का रिश्ता होना। इस देश के पूर्वजों का रक्त उनमें बह रहा हो यानि वो एक ही जाति के हों।
2.) वे भारत को अपनी पितृभूमि के रूप में मान्यता देते हों।
3.) वो भारत की संस्कृति जो कि हिंदुत्व है उसको अपनी संस्कृति मानते हों।
दूसरे शब्दों में "एक राष्ट्र, एक जाति, एक संस्कृति।"
हिंदुत्व की संस्कृति के लक्षण सावरकर बताते हैं- "वही व्यक्ति हिन्दू है जो सिन्धुस्थान (हिन्दुस्थान) को केवल पितृभूमि ही नहीं पुण्यभूमि भी मानता हो।" इस लक्षण के आधार पर सावरकर कहते हैं कि मुस्लिम कभी भी हिंदुत्व के दायरे में नहीं आ सकते, क्योंकि उनकी पुण्यभूमि हिंदुस्थान में न होकर मक्का में है। इसके अतिरिक्त बाकी जितने भी समुदायों के लोग हैं चाहें वो वैदिक, आस्तिक, नास्तिक, एकेश्वरवादी (सिक्ख, जैन, बौद्ध इत्यादि) हों चूंकि उनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही सिन्धुस्थान है इसलिए वो हिन्दू हैं। इसप्रकार सावरकर मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत जैसे ही एक सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं।
सावरकर की इस किताब में हिन्दू धर्म का काफी महिमामंडन देखने को मिलता है। सावरकर ज्यादातर पुराणों, वेदों और मध्यकालीन काव्य रचनाओं को इतिहास के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तथ्यपूर्ण व यथार्थवादी ऐतिहासिक संदर्भो का लगभग अभाव ही है। बीच-बीच में कपोल कल्पनाओं का काफी सहारा लिया गया है।

इसप्रकार देखा जा सकता है कि सावरकर के जीवन के दो हिस्से रहे हैं एक में वो क्रांतिकारी की भूमिका में दिखते हैं तो दूसरे में इसके उलट अंग्रेजों के सामने शीश नवाते हिंदूवादी नेता की भूमिका में। उल्लेखनीय है कि सावरकर के समय गदर आंदोलन के कितने नेता कालापानी की सजा काट रहे थे, वो वहीं मर-खप गए पर माफी नहीं माँगी। एक तरफ भगतसिंह ये कह रहे थे कि "यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। मेरी कुर्बानी सैकड़ों नौजवानों को देश पर मर मिटने के लिए प्रेरित करेगी।"  दूसरी तरफ सावरकर अपने माफीनामे में कह रहे थे-"मेरी रिहाई मेरे अनुयायियों को खुशी से भर देगी और वे ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादार बनेंगे।" भगतसिंह को भी अंग्रेज सरकार कालापानी की सज़ा दे सकते थे और इसके पर्याप्त कारण भी थे, पूरे देश में भगतसिंह की फाँसी के खिलाफ गुस्सा था, जनता की तरफ से कांग्रेस पर भी यह दबाव था कि गाँधीजी लार्ड इरविन पैक्ट पर तबतक हस्ताक्षर न करें जबतक भगतसिंह की फाँसी की सज़ा को उम्रकैद में न बदल दिया जाय। पर अंग्रेजी हुकूमत इस बात को अच्छी तरह समझती थी कि उनके लिए भगतसिंह का ज़िन्दा रहना कितना घातक हो सकता था। कांग्रेस जैसी समझौता-दबाव वाली रणनीति अपनाने वाली धारा की जगह अगर अंग्रेजों की सत्ता का समूल उखाड़ फेंकने की बात करने वाली क्रांतिकारी धारा अगर जीवित रह जाती है तो यह उनके लिए कितनी ख़तरनाक हो सकती है। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने सावरकर, जो खुद को बचाने के लिए माफिनामों की फेहरिस्त जारी कर रहे थे, उनके माफीनामे स्वीकार कर अंग्रेजी सरकार ने उनको छोड़ दिया। उनको बाद में अंग्रेजों की तरफ से पेंशन भी दिया गया। यह सच भी है सावरकर ने अपने माफिनामों में अंग्रेजी सरकार से किया गया अपना वादा निभाया। बाहर आने के बाद 1947 तक अंग्रेजों के खिलाफ कभी किसी आंदोलन स्तर पर या लेखन स्तर पर वो शामिल रहे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती। उनके लिए अब अंग्रेजी गुलामी समस्या रह ही नहीं गयी थी, वो अब हिंदुत्व की राजनीति की राह पर निकल पड़े थे। इसीलिए आगे न तो अंग्रेजों ने कभी उनको गिरफ्तार किया ना कोई वार्निंग तक दी। एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अंग्रेजों ने सावरकर की पहली किताब "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" पर पाबंदी लगा दी थी, पर उनको जेल के अंदर "हिंदुत्व" किताब लिखने दिया गया और उसपर पाबंदी भी नहीं लगाई गई। ऐसा क्यों? ब्रिटिश सरकार यह समझती थी कि आजादी के लिए उभरते संघर्ष के बीच हिन्दू-राष्ट्र का नारा एक वरदान साबित होने वाला था। एक प्रकार से सावरकर उनकी टीम से ही खेल रहे थे। अंग्रेजों की बांटों और राज करो की रणनीति अब सावरकर खुद ही चला रहे थे। यही कारण था कि अंग्रेज आगे उनपर लगे सारे प्रतिबंध हटाते गए।
महात्मा गाँधी की हत्या के बाद एक अभियुक्त की गवाही के बावजूद सावरकर को स्वतंत्र गवाह या सबूत न होने के कारण छोड़ दिया गया, पर आगे जस्टिस कपूर आयोग ने अपनी जाँच में सावरकर को भी गाँधीजी की हत्या में दोषी माना था।
एक सेनानी का जीवन कीमती होता है जैसे भगतसिंह का था जिसको बचाने के लिए पूरे देश की जनता सड़कों पर उतर रही थी। पर अगर सेनानी खुद ही अपनी जान बचाने के लिए शत्रु से दया की याचना करने लगे तो उसे अवसरवादी कहा जा सकता है पर वीर नहीं। सोचिए अगर सारे क्रांतिकारी बलिदान देने की बजाय जिंदा रहने और देश सेवा करने की सोचते तो भारत कभी आज़ाद हो पाता? युध्द में हर सैनिक सोचने लगे कि अभी भागकर कहीं छुप जाता हूँ, ज़िन्दा रहूँगा तभी तो देश सेवा करूंगा तो क्या हम कभी कोई युध्द जीत पाएंगे??
इसीलिए आज हमारे आदर्श भगतसिंह जैसे बहादुर हो सकते हैं सावरकर जैसे अवसरवादी सेवक नहीं।

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