31 October 2019

पाठक मंच: स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार, नहीं हमें इनकी दरकार



✍️हरिओम शुक्ला   

एक सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वो अपनी जनता को यथासंभव, स्वास्थ्य, शिक्षा, और रोजगार की व्यवस्था उपलब्ध करा सके। इस काम को करने के लिए सरकार जनता के ऊपर टैक्स लगाती और वसूलती है। किन्तु वर्तमान समय में सरकार इन सबसे किनारा करते हुए युवा वर्ग को सम्प्रदायिकता , जातिवाद, हिन्दू-मुस्लिम एवं मंदिर-मस्जिद में उलझाकर दिग्भ्रमित करने का काम कर रही है। आज की युवा पीढ़ी भी धुंआधार प्रचार के इस जलसे में इस कदर मशगूल है की उसे कुछ भी यथार्थ दिखाई ही नहीं दे रहा है। धर्म एवं संप्रदाय का नशा उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो चुका है जिसका लाभ नेता एवं वर्तमान राजनीतिक पार्टियां बखूबी उठा रही हैं।
      क्या हम कभी सोचते हैं या यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे और आपके चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने हमारे लिए कितने स्कूल-कालेज और कितने अस्पताल-चिकित्सालय खोले हैं? ज्यादातर आपको उतर मिलेगा- कभी नहीं। आपका अगला सवाल होगा- आखिर क्यों? सीधा सा उतर है कि यदि सरकारी कालेज और अस्पताल खुलेगा और इनमें शिक्षा और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था भी हो जाए तो जनता का तो भला होगा पर आपके नेता या विधायक जी का कल्याण होगा  क्या? जब उन्हें जाति-धर्म की आग लगाकर, जय श्री राम का नारा लगाकर ही वोट मिल जा रहे हैं तो फिर वो इन मुद्दों पर क्यों सोचेंगे? 
      आपके सांसद या विधायक जी यह सब सुविधाएं आपको देना भी नहीं चाहेंगे, उनके स्वयं के निजी कालेज और चिकित्सालय चल रहे हैं जिनमें आपके नेता जी स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर आपको खूब लूट रहे हैं। आपके नेताजी धीरे-धीरे स्वयं लखपति से करोड़पति और करोड़पति से अरबपति बनते जाएंगे। उनका तो एक ही नारा है- हम राज करें तुम राम भजो। वैसे भी आजकल आप प्राइवेट स्कूल कालेज और अस्पताल की स्थिति देख ही रहे हैं अगर इन्हे पूरी छूट मिल जाए तो यह स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर आपके शरीर से रक्त की एक-एक बूंद तक निचोड़ लेंगे।
     रही बात रोजगार की तो जिस तरह हर एक सरकारी विभागों का निजीकरण किया जा रहा है तो सरकारी नौकरी की उम्मीद तो युवाओं को त्याग ही देना चाहिए।
        वैसे भी सम्प्रदायिक आग लगने वाले और स्कूल-अस्पताल की जगह मंदिर-मस्जिद बनाने वाले नेता जी के साथ सुकून के दो पल वाली सेल्फी लेता युवा आज का पोस्टर बॉय है। ऐसे बेरोजगार युवाओं के लिए सरकार ने पकौड़ा रोजगार की समुचित व्यवस्था कर ही दी है, उन्हें रोजगार की अब आवश्यकता ही कहां है। मीडिया ने आज लोगों को अंधा बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया है। पर एकबार अगर हम अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी पर एक निगाह डालें और खुद से पूछें कि क्या सबकुछ ठीक चल रहा है? आज ज्यादातर आबादी अपनी जिंदगी की समस्याओं से जूझ रही है। किसी को रोजगार नहीं मिल रहा, किसी के घर कोई बीमार है पर इलाज कराने के पैसे नहीं हैं, किसी के घर ऋण चुकाने के पैसे नहीं हैं, किसी के घर अच्छा खाना तक नसीब नहीं हो रहा है, किसी को सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करने के बाद भी गुजारा करने भर का पैसा नहीं मिलता तो किसी की नौकरी छूट गयी है। क्या इन समस्याओं का सरकार से कोई संबंध है? जी हाँ, इसका सीधा संबंध सरकार की नीतियों से है। देश में लोगों को अच्छी शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराना, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, सड़क-बिजली-पानी का समुचित इंतज़ाम करना हर सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होता है। आज़ादी के बाद हर सरकारों ने हमारे देश की आम जनता के साथ दगाबाजी ही कि है, पर अगर हम खुद अपने मूलभूत मुद्दों को भूलकर धार्मिक उन्माद पागल हो जायेंगे तो आखिर कौन हमारे लिए संघर्ष करेगा? आज भारत के युवा वर्ग के सामने यह प्रश्न बार बार टिक-टिक कर रहा है, चेतावनी दे रहा है। अगर हमारी राष्ट्र की परिभाषा में राष्ट्र में रहने वाली जनता का दुख-दर्द नहीं है तो ऐसा राष्ट्रवाद निश्चित रूप से देश को गड्ढे में लेकर जाएगा। 
 अभी भी समय है, देश के भावी भविष्य! तुम अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाओ, अपनी जीवन को और समाज को बेहतर बनाने की लड़ाई लड़ो। अन्यथा भविष्य में शायद युवा कहने लगे कि-  
स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार नहीं हमें इनकी दरकार,
हमें तो चाहिए मंदिर-मस्जिद और दे दो एक तलवार। 

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