30 August 2019

भारत अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी की चपेट में


✍️ विकास गुप्ता

भारत की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से मंदी की ओर अग्रसर है। कई सेक्टरों में हालात खराब से खराब होते जा रहे हैं।  दुनिया में भारत की अर्थव्यवस्था अबतक 5वें स्थान पर थी जो कि अब 7वें पर पहुँच चुकी है। अप्रैल 2019 से ऑटोमोबाइल सेक्टर में वाहनों की बिक्री में लगातार गिरावट हो रही है; कर्मचारियों की छंटनी जारी है। दूसरी तरफ सरकार अभी तक खुलकर ये मानने को तैयार ही नहीं है कि अर्थव्यवस्था इस समय सुस्त है। आपको याद होगा कि लोकसभा चुनाव के पहले NSSO के बेरोजगारी के आंकड़ों को सरकार जारी नही करना चाह रही थी, लेकिन किसी तरह वो डेटा लीक हो गया। उस रिपोर्ट में यह बताया गया था कि भारत में बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है। इसके पहले CMIE की रिपोर्ट आयी थी जिसके अनुसार नोटबन्दी और GST के बाद अब तक करीब 1.1 करोड़ लोग अपनी नौकरियां गवां चुके हैं तथा हजारों की संख्या में छोटे-मझोले उद्योग तबाह हो गए हैं। पर सरकार इन आंकड़ों को तब तक गलत कहती रही जबतक चुनाव नहीं बीत गए। मौजूदा सरकार अपनी राजनीति चमकाने के लिए झूठें आंकड़े पेश करने में भी पीछे नहीं रही है। इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस साल विमुद्रिकरण (Demonetisation) हुआ था उस साल भारतीय अर्थव्यवस्था का ग्रोथ रेट 7.1 प्रतिशत दिखाया गया था  जिसपर बीजेपी के अपने सांसद सुब्रमण्यम स्वामी व मोदी सरकार के ही पूर्व वित्तीय सलाहकार ने कहा कि जीडीपी का यह ग्रोथ रेट बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जा रहा है जबकि वास्तव में यह दिखाए गए आंकड़े से करीब 2.5 प्रतिशत कम है। 

सत्तर सालों में पहली बार
एक तरफ तो सरकार आंकड़ों की बाजीगरी करती आ रही है, आंकड़ों को छुपाती रही है तो दूसरी तरफ जनता का ध्यान ही ऐसे मुद्दों पर न जाये इसके लिए भी इंतजाम कर रही है। इस काम के लिए मीडिया और सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है। जनता के बीच अंधराष्ट्रवाद, युद्धोन्माद और साम्प्रदायिक मुद्दें लगातार परोसे जा रहे हैं। सत्ता की चाटुकार मीडिया के प्राइम टाइम में हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, कश्मीर, पाकिस्तान आदि मुद्दों पर ही बहस चलाई जा रही है। मीडिया के लिए अब रोजगार, अर्थव्यवस्था, मंदी या जनता के जरूरी मुद्दें बेकार की बातें हो गयी हैं। जब मंदी का असर पूरे अर्थव्यवस्था पर बहुत खतरनाक रूप में दिखने लगा है तब टीवी मीडिया में हेड लाइन ये है- "मंदी को नही मोदी को देखो"। वास्तव में यही हो रहा है, मीडिया मंदी की भयानकता को छिपाने की कोशिशों में पूरे जान से लगा हुआ है लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था किस तरह से मंदी की चपेट में आ चुकी है इस बात का अंदाज़ा नीति आयोग के वाईस चैयरमैन राजीव कुमार के इस बयान से लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि "ऐसा पिछले 70 सालों में आजतक देखने को नहीं मिला है, पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था ही खतरे में है"। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य रथिन रॉय ने भी कहा है कि भारत आर्थिक मंदी में उलझ गया है और यह मंदी पूरे सिस्टम में है न कि किसी एक सेक्टर में। इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास भी अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं। आर्थिक तंगी से निबटने के लिए चुनाव के पहले से ही सरकार आरबीआई के रिजर्व पर निगाह लगाए बैठी थी। पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल, डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य इसके खतरे को समझते हुए इसके लिए राजी नहीं हुए और उनको इस्तीफा देना पड़ा। इन बातों को मीडिया में कितना स्पेस मिला है ये सबको पता है। सत्ताधारी पार्टी का आईटी सेल सरकार के आर्थिक नीतियों की असफलता को ढकने के लिए रोज नए-नए किस्से गढ़ कर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में फॉरवर्ड कर रहा है जिसे पढ़ कर आम आदमी के मन में यह बना रहे कि सरकार बहुत काम कर रही है सबकुछ ठीक है। 

फिलहाल उर्जित पटेल के बाद आये गवर्नर शक्तिकांत दास ने हाल ही में आरबीआई के रिजर्व से 1.76 लाख करोड़ रुपये सरकार को देने की बात मंजूर कर ली है। ये भी 70 सालों में पहली बार ही हुआ है। इसके साथ ही नकदी की कमी को ठीक करने के लिए आरबीआई बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाएगा व रेपो रेट कम करेगा। सारे सरकारी विभाग नई गाड़ियां खरीदेंगे। इससे मंदी से कितनी राहत मिलेगी और आरबीआई की साख पर इसका क्या असर पड़ेगा यह तो आने वाले समय में सामने आ जायेगा। अगर आर्थिक आंकड़े देखें तो अर्थव्यवस्था की बहुत भयानक कहानी बयां करते नज़र आएंगे। सरकारी उपक्रमों के साथ-साथ निजी उपक्रम भी कर्ज़ और घाटे में डूब रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2019 में भारतीय डाक 15000 करोड़ रुपये के घाटे का साथ सार्वजनिक उपक्रम (PSUs) में सबसे अधिक घाटा वाला सार्वजनिक उपक्रम हो चुका है, इसके साथ ही BSNL वित्तीय बर्ष 2018 में 7992 करोड़ रुपये घाटे का साथ दूसरे और एयर इंडिया 5337 करोड़ रुपये घाटे का साथ तीसरे स्थान पर है। मौजूदा समय में देश के अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) की दशा ख़राब ही है। CAG के रिपोर्ट के अनुसार 157 सरकारी कंपनियां 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक घाटे में चल रही हैं। 31 मई 2019 को द वायर में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार- नीति आयोग 42 सरकारी कंपनियों को बंद करने या निजीकरण करने का रिपोर्ट तैयार कर रहा है। वही 7 जून को अमर उजाला में एक न्यूज के अनुसार 50 सरकारी कंपनियों के संपत्ति को सरकार बेचने का प्लान कर रही है। दूसरी तरफ पारले बिसकिट्स कंपनी, बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां, टेक्सटाइल उद्योग बिक्री में भारी गिरावट का शिकार है। जेट एयरवेज कर्ज़ में डूब कर बंद हो गया और 20 हज़ार कर्मचारी सड़क पर आ गए। हाल ही में कैफ़े कॉफी डे के फाउंडर वी जी सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली जिनके ऊपर करीब 11 हजार करोड़ का कर्ज हो चुका था। बैंकिंग सेक्टर की हालत भी खस्ता है, NPA बढ़ने की वजह से कई बैंक कंगाली कि तरफ बढ़ रहे हैं। बैड लोन कम करने के लिए सरकार आम जनता से जुटाए गए पैसे को लूटा रही है। इकोनॉमी टाइम्स की एक खबर के मुताबिक अकेले 2019 में ही रिकार्ड 2.54 लाख करोड़ का बैड लोन माफ (write-off) कर दिया गया। इसके बावजूद अभी बैंकों का 9.34 लाख करोड़ रुपये बैड लोन डूबने के कगार पर है। ये भी 70 सालों में पहली बार ही देखने को मिल रहा है। 

देश में 70 सालों में ये भी पहली बार ही हुआ होगा जब कोई सेक्टर मीडिया में खुद विज्ञापन देकर बताए कि हमारा सेक्टर मंदी की मार झेल रहा है, इसी संदर्भ में 20 अगस्त 2019 को इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़ पेपर के तीसरे पेज पर एक बड़ा विज्ञापन आया था जिसमें ये बताया गया था कि भारतीय स्पीनिंग उद्योग सबसे बड़े आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। विज्ञापन में ये भी बताया गया था कि एक तिहाई धागा मिलें बंद हो चुकी हैं, जो घाटे में चल रही थी। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा  "फ़रीदाबाद के टेक्सटाइल एसोसिएशन अनिल जैन ने बताया है कि मंदी की वज़ह से पिछले एक साल में टेक्सटाइल सेक्टर में 25 से 35 लाख के आसपास नौकरियां ख़त्म हो गयी हैं।" कृषि के बाद भारत में सबसे ज्यादा रोज़गार टेक्सटाइल सेक्टर ही देता है। फाइनेंसियल एक्सप्रेस की एक ख़बर है, जिसमें बताया गया है कि अप्रैल 2019 से जून 2019 की पहली तिमाही में मांग में बहुत कमी के कारण कुल 2197 कंपनियों के मुनाफे में 11.97 प्रतिशत की गिरावट देखी गयी। टेक्सटाइल सेक्टर के लिए जून 2016 में मोदी सरकार ने 6000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। इस पैकेज का ऐलान करते समय ये भी बताया गया था कि तीन साल बाद यानी 2019 तक टेक्सटाइल सेक्टर में 1 करोड़ रोजगार पैदा किये जायेंगे और 75000 करोड़ का निवेश होगा। अब 2019 में हालात ये हैं कि टेक्सटाइल सेक्टर को विज्ञापन देकर अपने आर्थिक संकट को बताना पड़ रहा है। इंडियन टी एसोसिएशन ने भी टेलीग्राफ में विज्ञापन दिया था कि चाय उद्योग की हालत काफी खराब है और सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।

देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी का असर ज्यादा भयावह है जो पिछले 18 सालों का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है। पिछले तीन महीनों में ही ऑटोमोबाइल सेक्टर में 10 से 15 प्रतिशत तक बिक्री में कमी आयी है जबकि पिछले साल के मुकाबले इस साल 30% की गिरावट आई है। फेडेरेशन ऑफ ऑटो डीलर्स एसोसिएशन का कहना है कि मंदी की वजह से पिछले तीन महीने में 2 लाख से ज़्यादा लोगों की नौकरी जा चुकी है। ऑटोमोबाइल सेक्टर देश के जीडीपी में करीब 7% तक योगदान देता है तथा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 25 लाख लोगों को रोजगार देता है। देश मे करीब 26000 से ज़्यादा शोरूम हैं, जिनमें से 271 से ज़्यादा शोरूम बिक्री में कमी के वजह से बंद हो चुके हैं जिससे करीब 32000 लोग बेरोजगार हो चुके हैं। सबसे ज्यादा असर पैसेंजर गाड़ियों के बिक्री पर पड़ा है, जुलाई 2019 में बिक्री, जुलाई 2018 की बिक्री के तुलना में लगभग 31 प्रतिशत की कमी देखी गयी है। गाड़ियों के बिक्री में कमी के वजह से बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपना उत्पादन बंद कर दिया है, इसका प्रभाव गुरुग्राम के आस पास बड़े बड़े कंपनियों में काम करने वाले अस्थायी मजदूरों के ऊपर पड़ा है, उन्हें कंपनी के तरफ से निर्देश दिया गया है कि जब तक हालात ठीक नही हो जाते तब तक वो छुट्टी पर रहें।
मंदी का असर सिर्फ़ बड़े सेक्टर में ही नही है जबकि इसका असर बिस्कुट उद्योग में भी देखने को मिल रहा है ब्रिटानिया का चैयरमैन ने कहा है कि लोग 5 रुपये के बिस्कुट खरीदने में भी संकोच कर रहे हैं, अभी कुछ दिन पहले पारले बिस्कुट के आधिकारिक तौर पर नियुक्त मयंक शाह ने मीडिया को बताया था कि कंपनी बहुत घाटे में चल रही है जिससे करीब 8000-10000 लोगों की नौकरियां जाने की संभावना है। देश का हर छोटा उद्योग भी इस समय मंदी के चपेट में है जिससे बाजार में सुस्ती है। वैश्विक स्तर पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन खराब ही है, 23 अगस्त को डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 72 रुपये से भी नीचे गिर गया था। सरकार चाहे इसे माने या ना माने पर आम लोगों को यह जान लेना चाहिए कि भारत की अर्थव्यवस्था इस समय मंदी के भँवर में फँस चुकी है।

आखिर मंदी आती क्यों है?
यहां यह सवाल बनता है कि आखिर इस तरह की स्थिति क्यों आती है? इसके लिए हमें इस व्यवस्था की कार्यप्रणाली को समझना होगा। आज समाज का आर्थिक ढाँचा इस तरह का है कि मुट्ठीभर लोगों के हाथ में सारे संसाधन हैं, उत्पादन के साधन, फैक्टरियां, मिलें और खदानें हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। इसके लिए पूंजीपतियों का यह वर्ग अपने यहाँ काम करने वाले लोगों का शोषण करते हैं, हाड़तोड़ मेहनत कराने के बाद भी उन्हें उचित मज़दूरी नहीं देते, कोई सुविधाएं नहीं देते। इससे उनका मुनाफा बढ़ता जाता है और वे और अमीर से अमीर होते जाते हैं, जबकि दूसरी तरफ 90% आबादी जो सुई से जहाज तक का उत्पादन करती है वो गरीबी के अंधेरे में धकेल दी जाती है।
पर इसमें एक दिक्कत है, वो यह कि मालिक वर्ग अपना उत्पादन किया हुआ सारा सामान खुद ही नही खरीद सकता; इसलिए उसको बेचने के लिए बाजार जाना होगा। बाजार में वही लोग उसके ग्राहक हैं जिनका मालिक वर्ग ने शोषण करके उनकी क्रयशक्ति ही खत्म कर दी है। और यह बात हम जानते हैं कि बाजार में किसी चीज का मांग में कमी या बृद्धि इस बात पर निर्भर करता है कि उस वस्तु को क्रय करने की क्षमता लोगों के अंदर है या नही। क्रय शक्ति का निर्धारण लोगो के पास कितना पैसा है इस बात से होता है। ऐसे में मालिक का सामान बिकना बंद हो जाता है। जब यह मंदी बड़े पैमाने पर कई क्षेत्रों में फैल जाती है तो इसको आर्थिक मंदी कहा जाता है।
इसप्रकार हम देख सकते हैं कि मंदी का असली कारण पूंजीवादी लूट है। मज़दूर को जब उसकी मेहनत का पूरा दाम नहीं दिया जाएगा तो उसके पास उन सामानों को खरीदने के लिए क्रयशक्ति ही नहीं बचेगी।  पूंजी अगर मुठ्ठीभर लोगों के हाथों मे संकेंद्रित होने लगे तो दूसरी तरफ मंदी अपने आप आती है। आज भारत की 1% अमीर आबादी के पास देश की 58% संपदा आ चुकी है जबकि 2015 में इनके पास 53% संपत्ति का मालिकाना था और 2005 में 39% संपत्ति का मालिकाना इनके हाथ में था (ऑक्सफैम रिपोर्ट)। दूसरी तरफ भारत की 80% आबादी के पास मात्र 10% सम्पत्ति का मालिकाना है। गरीबी अमीरी की यह खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। भारत में 2017 में किसकी संपत्ति कितनी बढ़ी उसका विवरण निम्न है-
आचार्य बालकृष्ण (पतंजलि) - 173%
गौतम अडानी - 125%
राधाकिशन दमानी - 320%
मुकेश अम्बानी - 78%
कुमार बिरला - 50%
अज़ीम प्रेमजी - 47%
उदय कोटक - 45%
(SOURCE: Hurun India rich list 2017 and Bloomberg-Higher one is taken)
2016 में जय शाह (अमितशाह के पुत्र) की संपत्ति में बढ़ोतरी- 1600000%

ऐसे में मंदी का आना अपरिहार्य है और सरकार द्वारा उठाये गए छोटे-मोटे कदमों से इसपर कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। इसका असली समाधान मुनाफा व अमीरी गरीबी की खाई पर आधारित इस पूंजीवादी व्यवस्था को तोड़कर मानवकेन्द्रित व समानता आधारित व्यवस्था के निर्माण से ही हो सकता है। 

वर्तमान सरकार आर्थिक मोर्चे पर लगातार फ्लॉप रही है। इस कमजोरी को छिपाने के लिए लगातार सरकार की तरफ से ऐसे मुद्दे उछाले जाते रहे हैं जिससे जनता का ध्यान असली मुद्दों पर न जाये। कभी धर्मरक्षा के नाम पर बहस होती है तो कभी गोत्र के नाम पर बहस होती है तो कभी मंदिर का मुद्दा उछाला जाता है। कश्मीर मुद्दे को आज मीडिया में इतना ज़ोर शोर से क्यों चलाया जा रहा। थोक के भाव कश्मीर के बारे में झूठी खबरें परोस कर लोगों को उनकी आर्थिक तबाही और कश्मीर की वास्तविक स्थिति दोनो से ध्यान भटकाया जा रहा है। यही बहसें आज के कॉर्पोरेट संचालित मीडिया का प्राइम कंटेंट (मुख्य विषयवस्तु) बन चुका है जो लगातार युवाओं को एक असली मुद्दों से भटकाकर एक भीड़ के रूप में तब्दील कर रहा है। एक सच्चे देश प्रेमी होने के नाते सभी जिम्मेदार नागरिको का कर्तव्य है कि अपने बुनियादी मुद्दों को लेकर सजग रहेें और इसके लिए लगातार जो भी सत्ता में हो उससे प्रश्न करते रहे और अपने हक के लिए संघर्ष करते रहे।

No comments:

Post a Comment