20 August 2019

मुंबई में सफाई के लिए क्लीन-अप मार्शल या "लूट-अप मार्शल"?

(इन मार्शलों की करतुतें सिर्फ यही तक सीमित नहीं हैं; ये अक्सर नशे में धुत रहते हैं। कई बार लोगों को लूटने की या मनमानी पैसा वसूलने की शिकायतें भी आई हैं। जिन्होंने इनपर गौर किया होगा उसने तो इनके धर पकड़ का एक सेट पैटर्न भी देखा होगा; ज्यादातर शिकार जो इनकी रंगदारियों के शिकंजे में आसानी से आ जाता है वह है गरीब, मजदूर , खासतौर पर प्रवासी मजदूर और निम्न मध्यवर्गीय आबादी। कई जगहों पर तो जहाँ वसूली हो रही होती है वहाँ कूड़ेदान ही नहीं होते पर इससे फायदा ही होता है, वसूली ज्यादा होती है। इस तस्वीर में भी साफ है जहाँ एक तरफ आदमी से पैसे लिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ उसी के आस पास कूड़ा पड़ा हुआ है। अक्सर ये सिगरेट पी रहे लोगों या गुटका, चॉकलेट खा रहे लोगों को देखकर घात लगाकर यह इंतज़ार करते रहते हैं कि कब ये व्यक्ति उसका पैकेट फेंके या फिर थूके, इसके बाद तुरंत गैंग के सदस्य संबंधित व्यक्ति को पकड़कर उसे धमकाने लगते हैं और पैसा लेकर ही छोड़ते हैं।)




✍️ राखी नारायण

मुम्बई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) दो चीजों के लिए जानी जाती है; एक जो सबसे प्रचलित है वह यह कि मुम्बई की बारिश में हर साल बीएमसी की पोल खुल जाती है और इनकी बदइंतजामियों की वजह से मुम्बईकर बेहाल ओर परेशान हो जाते हैं। अभी हाल ही में गोरेगाँव स्थित एक खुले नाले में गिरकर एक 3 साल के बच्चे की मौत हो गयी व काफी मशक्कत करने के बाद भी उस बच्चे का शव भी न मिल पाया। यह बदइन्तजामी ही है जिसकी वजह से हर साल मुम्बई की बारिश में नालो में गिरने की वजह से कई लोगो की मौतें खबरों में रहती हैं। दूसरी बात जो सब जानते हैं वह है बीएमसी का बजट। मुम्बई की महानगर पालिका देश की सबसे अमीर नगरपालिका है जिसका इस बार का बजट 30,622 करोड़ था जो कि न सिर्फ सभी महानगरपालिकाओं में सबसे ज्यादा है अपितु यह भारत के कई छोटे राज्यों के बजट से भी ज्यादा है।
ऐस में इतने बड़े बजट के बावजूद हर साल मुम्बई की बारिश मे इसी बीएमसी की पोल खुल जाती है तो यह सवाल उठता है कि इतने सारे पैसों का इस्तेमाल कहा किया जाता है?
आज एक चीज और है जिसके बारे में पता होना चाहिए वह है बीएमसी द्वारा साफ-सफाई के नाम पर "क्लीन-अप मुम्बई" अभियान के तहत खड़ी की गई "क्लीन-अप मार्शल" की टीम जिसके बारे लगभग हर मुम्बईकर भली-भांति जानता है। क्लीन-अप मार्शल नाम कितना अच्छा है और इसे सुनकर ये तस्वीर जेहन में आती है कि एक ऐसी त्वरित टीम होगी जो जहाँ भी गंदगी फैलती होगी तुरंत उसको तत्परता से साफ कर देती होगी। पर ठहरिए, सच्चाई थोड़ी नहीं काफी अलग है।
यह तस्वीर मुम्बई के सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक दादर की है। मुम्बई के हर स्टेशनों की तरह यहां भी क्लीन-अप मार्शल अपनी "रंगदारी" वसूलते हुए मिलते हैं जैसा कि इस तस्वीर में देखा जा सकता है। तस्वीर में दिख रहे लोग गुटका खाकर उसका पैकेट नीचे गिरा देने के लिए एक व्यक्ति से पैसे वसूल रहे हैं। ये लोग कोई सरकारी आदमी नहीं हैं बल्कि किसी निजी कंपनी द्वारा ठेके पर रखे गए लोग हैं जिनको बीएमसी ने "क्लीन-अप मार्शल" के नाम पर लोगों से पैसा वसूलने के अधिकार दिया है। कुछ लोग कह सकते हैं कि वे तो साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं लोगों की बुरी आदत पेनाल्टी लगाने से ही दूर होगी फिर इतने अच्छे काम को हम "रंगदारी" क्यों कह रहे हैं। पर ऐसा वही लोग कह सकते है जो मुम्बई के बाहर के हैं या फिर मुम्बई में नए हों। यहां की आम जनता इनकी सच्चाई को भली-भांति जानती है। इसके बावजूद स्थानीय सरकार निजी कंपनीयों के मिलीभगत के साथ साफ-सफाई के नाम पर सालों से गरीबों से पैसे हथियाने का खेल चला रही है। इसपर कोई विरोध नहीं कर पाता क्योंकि ऐसे अभियानों को सरकार का न सिर्फ समर्थन है बल्की उस कमाई में उसका निजी कंपनी के साथ बराबरी का हिस्सा है।
साल 2007 में पहली बार मुम्बई की महानगर पालिका ने इस चीज की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य यह था कि किसी भी सार्वजनिक जगह पर कूड़ा-कचरा फैलाने से लोगों को रोका जाय, उन्हें अनुशासित और शिक्षित किया जाय। बताया गया कि इससे सार्वजनिक जगहों पर साफ सफाई बढ़ेगी। इस उद्देश्य से बीएमसी ने कुछ निजी ठेकेदारों के साथ गठजोड़ किया और इस अभियान के तहत क्लीन उप मार्शल रखे गये जो होने तो हर सार्वजनिक जगहों पर चाहिए पर उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र सिर्फ लोकल स्टेशनों ओर कुछ कपल-स्पॉट्स जहाँ लोग अक्सर घूमने जाते हैं को बनाया।
यह अभियान की पोल इसके गठन 2007 से ही खुलने लगी थी। मार्शलों की रंगदारियो के लिए, दुर्व्यवहार के लिए ,गरीबो को परेशान कर उनसे  छोटी मोटी गलतियों के लिए जबरन पैसे वसलूने जैसी शिकायतें अक्सर सामने आती रही हैं। 2007 से ही विवादों में रहने की वजह से 2011 में इसे बीएमसी को बंद करना पड़ा परन्तु इसमें जरूरी कानूनों की तब्दीली का दावा कर 2016 में इसे फिर शुरू किया गया।  2017 में कॉन्ट्रैक्ट रिन्यूअल के वक़्त बीएमसी के कई कॉर्पोर्टर्स ने इसका विरोध किया। शिवसेना के आशीष चेम्बूरकर ने इस "बीएमसी द्वारा नियुक्त वसूली गैंग" कहा तो दूसरे लोगों ने उन्हें "लोगों को धमकाने वाले माफिया" कहा। मांग यह की गयी कि इनके ठेके का पुनर्नवीनीकरण न किया जाय पर अडिशनल म्युनिसिपल कमिश्नर विजय सिंघल ने यह कह कर इसका समर्थन किया कि इससे 9 करोड़ की वसूली हुई है जिसमें 50-50 के कॉन्ट्रैक्ट के तहत 4.5 करोड़ बीएमसी को मिले हैं। इसकी दिक्कतों को सुधारा जाएगा इसमें सुधार की गुंजाइश है। इसके बाद भी सच्चाई यह है कि क्लीन-अप गैंग की लूट पहले से भी बढ़िया चल रही है। 
 
यह सफाई अभियान कितना सफल हुआ है यह हर मुम्बईकर भलीभाँति जानता है पर इसका अंदाजा आप इस तस्वीर से भी लगा सकते हैं जहाँ यह साफ नजर आ रहा है कि स्टेशन के पास कितनी गंदगी पड़ी है पर अगर किसी मज़दूर से जाने-अनजाने में भी कोई चीज नीचे गिर जाए तो यह उन्हें तुरंत धर लेते हैं और उनसे मनमानी तरीके से ठगी करते हैं। पैसा वसूली 100-500 रुपये या उससे ज्यादा हो सकती है। इसके अलावा अगर वह व्यक्ति प्रवासी मजदूर हो तो क्लीन-अप मार्शल उसके साथ गालीगलौज भी करते हैं।

इन मार्शलों की करतुतें सिर्फ यही तक सीमित नहीं हैं; ये अक्सर नशे में धुत रहते हैं। कई बार लोगों को लूटने की या मनमानी पैसा वसूलने की शिकायतें भी आई हैं। जिन्होंने इनपर गौर किया होगा उसने तो इनके धर पकड़ का एक सेट पैटर्न भी देखा होगा; ज्यादातर शिकार जो इनकी रंगदारियों के शिकंजे में आसानी से आ जाता है वह है गरीब, मजदूर , खासतौर पर प्रवासी मजदूर और निम्न मध्यवर्गीय आबादी। इनके अलावा यह जल्दी किसी को हाथ नहीं लगाते क्योंकि उनसे पैसे ऐठना आसान नही होता। कई जगहों पर तो जहाँ वसूली हो रही होती है वहाँ कूड़ेदान ही नहीं होते पर इससे फायदा ही होता है, वसूली ज्यादा होती है। इस तस्वीर में भी साफ है जहाँ एक तरफ आदमी से पैसे लिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ उसी के आस पास कूड़ा पड़ा हुआ है। अक्सर ये सिगरेट पी रहे लोगों या गुटका, चॉकलेट खा रहे लोगों को देखकर घात लगाकर यह इंतज़ार करते रहते हैं कि कब ये व्यक्ति उसका पैकेट फेंके या फिर थूके, इसके बाद तुरंत गैंग के सदस्य संबंधित व्यक्ति को पकड़कर उसे धमकाने लगते हैं और पैसा लेकर ही छोड़ते हैं। जिस बदतमीजी के साथ ये लोगों से बात करते हैं, उनको धमकाते-डराते हैं यह सब देखने पर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को इस तरह के सफाई अभियान पर ग़ुस्सा ही आ सकता है जिसका उद्देश्य 2007 से लेकर आजतक सिर्फ साफ-सफाई का दिखावा करना और ठेकेदारों के साथ मिलकर पैसे वसूलना रहा है। बाकी मुम्बई कितनी साफ हुई है यह बताने की जरूरत नहीं है। अब सवाल उठता है कि ऐसा अभियान जो हर बार अपने गलत कारणों से चर्चे में रहा है, जिसने अपने उद्देश्य को रत्ती भर भी पूरा नही किया हो और कमाई के हिसाब से इसने सारे सार्वजनिक जगहों को छोड़कर अब सिर्फ लोकल स्टेशनों के आसपास ही अपने को समेट लिया, जो बन्द होने के बाद पुनः नए वादों के साथ आता है और पुनः रंगदारी ही करता नजर आता है, जिसके बारे में हर मुम्बईकर जानता है फिर भी कानून के दायरे में लूट कैसे चलती आ रही है?
इनसब का बस एक जवाब है वह है- मुनाफ़ा। वसूली का बँटवारा बीएमसी और ठेकेदार के बीच 50-50 का होता है।  साल 2019 में इन ठेकेदारों की संख्या 22 है। अगर हम इनको हो रहे मुनाफे की ही बात करे तो यह तकरीबन 9 करोड़ सालाना है जिसका आधा हिस्सा कॉन्ट्रक्टर्स रखते है और आधा बीएमसी। यह महज एक ऑफिसियल आंकड़ा है, वसूली का असली आंकड़ा इसके दोगुना से चार गुना तक हो सकता है। यही कारण है कि इतने विवादों में होने के बावजूद यह अभियान चलता चला आ रहा है।
क्या ऐसे किसी अभियान को बने रहना चाहिए जो सफाई का ध्यान तो कतई नही रख पाता; जिसने साफ सफाई के लिए नई तकनीके नही लायी; नए तरीके नए कूड़े दान तक नही बनवाये ऐसे में जुर्माना लगाने का गरीबों को परेशान करने का कोई तुक नही बनता। यह भी सोचने वाली बात है कि जो मुम्बईकर बीएमसी को 30 हज़ार करोड़ का बड़ा बजट बनाने भर का टैक्स देते हैं उनसे साफ-सफाई के नाम पर यह 4-5 करोड़ की वसूली क्यों कि जा रही है? सफाई के नाम पर ठेकेदारों को करोड़ो का फायदा करवाने का मकसद क्या है? यह ऐसे सवाल हैं जो मुम्बईकर स्थानीय सरकार से पूछना चाहते हैं और यह भी की सफाई के नाम पर चल रही यह लूट कब बंद होगी?

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