25 July 2019

नहीं, हम बंदर की संतान नहीं हैं!


 (क्रमिक विकास और उससे जुड़ी आम धारणाओं पर कुछ विज्ञान और कुछ फलसफे की बातें)

✍️ श्रवण यादव 

आम धारणा है कि बंदर हमारे पूर्वज थे, जबकि ऐसा नहीं है। हमारे और बंदरों के पूर्वज किसी समय में एक ज़रूर थे, लेकिन इंसान और बंदर का विकास अलग अलग रास्ते पर हुआ, इसीलिए हम इंसान बने और वे बंदर। इस नाते बंदर रिश्ते में हमारे पूर्वज नहीं, बल्कि हमारे चचेरे भाई (cousin) हुए। इसे समझने के लिए क्रमिक विकास (evolution) पर कुछ बुनियादी बातें जानना ज़रूरी है। 
क्रमिक विकास जीव जंतुओं और वनस्पतियों में पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले अनुवांशिक लक्षणों में होने वाले दीर्घकालिक परिवर्तनों को कहते हैं। यह प्रक्रिया जैविक संगठन (Biological construct) के अलग-अलग स्तरों (प्रजाति, जीव विशेष या कोशिका) पर बढ़ती विविधता (Diversity) के लिए ज़िम्मेदार है। विकासवाद की अवधारणा के अनुसार समय के साथ जीवों में क्रमिक-परिवर्तन होते हैं। इस सिद्धान्त के विकास का भी एक लम्बा इतिहास है। 18वीं सदी तक सामान्य ज्ञान यही था कि सभी प्राणियों को ईश्वर ने इसी रूप में बनाया है जिस रूप आज वो विद्यमान हैं। यहाँ तक कि पश्चिमी जीवविज्ञानी चिन्तन में भी यह विश्वास जड़ जमाये था कि प्रत्येक जीव में कुछ ऐसे विलक्षण गुण (supernatural characteristic) होते हैं जो बदले नहीं जा सकते। इस वैचारिक धारा को मूलतत्ववाद/सारतत्ववाद (essentialism) कहा जाता है। पुनर्जागरण काल में यह धारणा बदलने लगी। 
19वीं सदी की शुरुआत में फ्रांसीसी जीवविज्ञानी ज्याँ बैप्टिस्ट लैमार्क ने अपना विकासवाद का सिद्धान्त दिया। लैमार्क का सिद्धांत क्रम-विकास (evolution) से सम्बन्धित प्रथम पूर्णत: निर्मित वैज्ञानिक सिद्धान्त था। लैमार्क का सिद्धांत था कि वातावरण के परिवर्तन के कारण ही जीव की उत्पत्ति, अंगों का व्यवहार या अव्यवहार व जीवनकाल में अर्जित गुणों का जीवों द्वारा अपनी अगली पीढ़ी में हस्तांतरण होता है। लैमार्क ने इसके उदाहरण के रूप में जिराफ़ का जिक्र किया, और कहा कि जिराफ़ कभी छोटी गर्दन वाला गधा-नुमा जीव रहा होगा, जिसके आसपास की घास खतम हो जाने की वजह से उसे ऊँचे पेड़ों की पत्तियाँ खाने हेतु गर्दन ऊँची करनी पड़ी होगी, और इसी निरंतर प्रयास की प्रक्रिया में कई पीढ़ियों के विकास के बाद वह जिराफ़ बन गया। हालाँकि बाद में लैमार्क का यह सिद्धांत गलत सिद्ध हुआ, लेकिन उस दौर में यह सिद्धांत भी एक मील का पत्थर साबित हुआ था, जिसने जीव विज्ञान के इतिहास में पुरातन वैचारिक धारा पर व मूलतत्ववाद (essentialism) की जड़ पर पहली बार गहरी चोट की थी।
इसके बाद आए डार्विन, जिन्होंने प्रसिद्ध जहाज़ "एच एम एस बीगल" पर यात्रा करते हुए, प्रशांत महासागर में भूमध्य रेखा (Equator) पर स्थित गैलापागोस द्वीपसमूह पर जीव जंतुओं, पक्षियों, उनकी चोंच के प्रकार, पंजे के प्रकार आदि का लंबा और गहन अध्ययन करते हुए अपने अवलोकनों (observations) के आधार पर कुछ ऐसी प्रस्थापनाएँ दी जिसने क्रमिक विकास विज्ञान की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया। वह था प्राकृतिक चयन (Natural Selection) का सिद्धांत।  इस प्रक्रिया में एक ही तरह की प्रजाति के जीवों में बदलते परिवेश के अनुसार खुद को उसके अनुरूप ढालने की अलग अलग क्षमता के कारण कुछ जीवधारियों का अपनी संख्या बढ़ाना तथा कुछ का विलुप्त हो जाना 'प्राकृतिक चयन' कहलाता है। यह एक धीमी गति से क्रमशः होने वाली व्यवस्थित (non random) प्रक्रिया है। प्राकृतिक चयन ही क्रमिक-विकास की प्रमुख कार्यविधि है। डार्विन ने प्राकृतिक चयन द्वारा क्रमिक-विकास के सिद्धांत को अपनी किताब "जीवजाति का उद्भव" (Origin of Species) में 1859 में प्रकाशित किया। दिलचस्प बात ये है कि जीवों के क्रमिक विकास के बारे में जो निष्कर्ष डार्विन ने निकाले थे उन्हीं निष्कर्षों पर इंग्लैंड के दो और जीवविज्ञानी अल्फ़्रेड वॉलेस और विलियम बेटसन भी पहुंचे थे। अल्फ़्रेड वॉलेस एशिया के अलग-अलग द्वीपों के जीवों का अध्ययन कर रहे थे तथा विलियम बेटसन दक्षिणी अमेरिका के  विभिन्न जीवों का अध्ययन कर रहे थे। प्राकृतिक चयन द्वारा क्रमिक विकास की प्रक्रिया को निम्नलिखित अवलोकनों से द्वारा साबित किया जा सकता है:
1. जितनी संतानें संभवतः जीवित रह सकती हैं, उस से अधिक पैदा होती हैं
2. आबादी में रूपात्मक, शारीरिक व व्यवहारिक लक्षणों में विविधता होती है
3. विभिन्न लक्षण उत्तरजीविता (survival) और प्रजनन (reproduction) की अलग अलग संभावना प्रदान करते हैं
4. इन लक्षणों का पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता है।
प्राकृतिक चयन का अर्थ उन गुणों से है जो किसी प्रजाति को बचे रहने और प्रजनन करने में सहायता करते हैं और इसकी आवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती रहती है। यह इस तथ्य को और तर्कसंगत बनाता है कि इन लक्षणों के धारकों की सन्ताने अधिक होती हैं और वे यह गुण वंशानुगत (hereditary) रूप से ले भी सकती हैं।
डार्विन ने यह सिद्धांत तब प्रस्थापित किये जब जेनेटिक्स (Genetics) के अध्ययन के लिए न तो कोई तकनीक उपलब्ध थी, न ही डीएनए (DNA) की खोज हुई थी, न ही सूक्ष्मजीवियों (microbes) के विषय में जानने के लिए उस दौर में पर्याप्त यंत्र उपलब्ध थे। इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी (Electron microscope) के आविष्कार, डीएनए व जेनेटिक कोड (code) की खोज, व आणविक अनुवांशिकी (Molecular Genetics) के विकास ने डार्विन के सिध्दांतों की नींव पर ही क्रमिक विकास के विषय में हमारे ज्ञान का कई गुना विस्तार किया। जेनेटिक्स के विकास और सूक्ष्मजीवियों के और गहन अध्ययन के बाद पता चला कि प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया उत्तरजीविता और प्रजनन की आभासी उद्देश्यपूर्णता से उन लक्षणों को बनाती और बरकरार रखती है जो अपनी कार्यात्मक भूमिका (functionality) के अनुकूल हों। अनुकूलन का प्राकृतिक चयन क्रम-विकास का एक कारण ज़रूर है, लेकिन क्रम-विकास के और भी ज्ञात कारण हैं। माइक्रो-क्रम-विकास के अन्य गैर-अनुकूली कारण उत्परिवर्तन (mutation) और अनुवांशिक प्रवाह (genetic drift) हैं।
अर्न्स्ट हैकेल (1834-1919) द्वारा प्रतिपादित "जीवन वृक्ष"

खैर वापस आते हैं बंदर और इंसान के रिश्ते पर। तो हमारे साझे पूर्वज संभवतः जंगल के पेड़ों पर ही रहा करते होंगे, और माँसाहारी पशुओं के खतरे से दूर पेड़ की ऊंचाइयों पर उछलते कूदते जंगल के फल-फूल आदि पर मज़े से जीते रहे होंगे। किन्हीं कारणवश, किसी भयंकर दीर्घकालिक सुखा या जंगल की आग, या किसी तीव्र  दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन ने उनके इलाके के जंगलों का नाश कर दिया होगा, और इस प्रकार उन्हें पेड़ से उतरकर मैदानों और चरागाहों (grasslands) में भोजन पानी की खोज में आने को मजबूर किया होगा, यूँ कहिए, धकेला होगा। ज़मीन पर संतुलन के लिए अब पूँछ की जरूरत नहीं रह गयी होगी जो कालांतर में छोटी होते-होते लुप्त हो गयी। इसके साथ ही ज़मीन पर हाथ का इस्तेमाल बढ़ा व कुछ पूर्वजों ने धीरे-धीरे खड़ा होना भी सीख लिया। इस प्रक्रिया में हमारे पूर्वजों में से कुछ की रीढ़ की हड्डी सीधी होनी शुरू हुई होगी। इससे मैदानों और झाड़ियों में माँसाहारी नरभक्षी जानवरों, शेर, बाघ, चीतों का भी खतरे को दो पैरों पर खड़ा होकर खतरा दूर से भाँप लेने की क्षमता विकसित हुई। दोनों हाथ जब मुक्त हुए तो हमारे पूर्वजों ने हाथों की मदद से नुकीले पत्थरों व लकड़ियों के हथियार बनाना सीखा और इस क्रम में  हथेली की उंगलियों की सूक्ष्म पकड़ व fine motor skills विकसित हुई। इसी दौरान प्रकृति के साथ संघर्ष की इस प्रक्रिया में, मनुष्य ने शिकार करना सीखा होगा और माँसाहार की शुरुआत हुई होगी। माँसाहारी प्रोटीन से भरपूर भोजन से पोषित उनका मष्तिष्क और तेज़ी से विकसित हुआ। धरती पर खनन में प्राप्त हुईं सबसे पुरानी चीजें दरअसल शिकार के औजार ही हैं, यह दिखाता है कि अगर मनुष्य मांसाहार की तरफ न मुड़ता (या न मुड़ना पड़ता) तो शायद आज हम भी कहीं पेड़ों पर उछल-कूद कर रहे होते या फिर विलुप्त प्रजातियों में गिने जाते। चुकि हमारे पूर्वजों को प्रकृति ने शिकार के लिए नहीं बनाया था (पंजे, दाँत, नख इत्यादि) इसलिए शिकार ने एक साथ दो महान जरूरतों को जन्म दिया, पहला औज़ार बनाने के लिए श्रम की जरूरत और दूसरा समूह में शिकार करना जिसने हमारे पूर्वजों में पहली बार संगठन और सामाजिकता के बीज बोए। इन्हीं दोनों चीजों ने उन मानवाभ कापियों का भविष्य ही बदल दिया। आग की खोज भी एक मील का पत्थर साबित हुई जिसे नियंत्रित कर मानव के पूर्वजों ने गुफा में रोशनी, मांस पकाने और अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया। साथ ही पका माँस खाने से उसको चबाने और पचाने में लगा वक़्त काफी कम हुआ जिससे हमारे पूर्वजों के भारी जबड़े और दांतों की बनावट (और फलस्वरूप चेहरे की बनावट) में फर्क आने लगा। साथ ही जल्दी भोजन पचने से अब उसको कम आराम की जरूरत पड़ती जिससे बचे खाली समय में अन्य सामूहिक गतिविधियों के विकसित होने की संभावना पैदा हुई। ये चीजें बहुत ही धीमी प्रक्रिया में हुईं, इनमें एक-एक परिवर्तनों के लिए हजारों साल लगे और सैकड़ों पीढियां गुजर गईं। ज़ाहिर है हमारे सभी पूर्वज इस विकास की दिशा को पकड़ने में असफल रहे होंगे और प्रकृति ने ऐसे अनुकूल विकास का चयन करते हुए बाकियों को छाँट दिया होगा। हमारे सबसे करीबी भाई, और शारीरिक रूप से हमसे कहीं बलशाली, निएंडरथल इसी प्रक्रिया में खतम हो गए या कहें कि प्रकृति द्वारा छाँट दिए गए।
मानव और दूसरे प्रजातियों के कंकाल की बनावट

और बंदर? उनकी कहानी ये है कि हमारे साझे पूर्वजों के वे भाई बंधु जिन्हें भोजन और जीवन की तलाश में पेड़ से उतरकर मैदानों की ओर भटकने को मजबूर होना ही नहीं पड़ा होगा, जिनका जंगल आबाद रहा और उन्हें निरंतर भोजन पानी और मौज मस्ती मुहैया कराता रहा, जिन्हें हमारे पूर्वजों की तरह मैदानों और grasslands में भोजन की तलाश में उतर कर खुद को शेर, चीतों व अन्य नरभक्षी पशुओं के हाथों शहीद हो जाने का खतरा उठाना ही न पड़ा होगा, उनके विकास का रास्ता मनुष्यों के पूर्वजों से अलग हो गया और वे बंदर, ओरांगुटान, गिबन, गोरिल्ला, चिंपांज़ी बनकर रह गए। ऐसा कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वज बन्दर नहीं थे पर हमारे और बंदरों के पूर्वज एक थे। 

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