19 July 2019

मिलिए राजधानी के इस मजदूर से जो आपका किचन सिंक चमकाता है!

✍🏼 राघवेंद्र, शुभम, स्वतंत्र 

भारत की राजधानी दिल्ली में अगर आप हैं और यहाँ की ज़मीनी परिस्थितियों से परिचित नही हैं तो यकीन मानिए आप दिल्ली में रहते तो हैं लेकिन खूबसूरत दिखने वाली राजधानी दिल्ली को जानते नहीं हैं। यमुना के किनारे बसा एक खूबसूरत शहर जो भारत की कला एवं संस्कृति का केंद्र भी माना जाता है; इस शहर की सुंदरता और चकाचौंध देखकर हजारों लोग अपने सपने को साकार करने इस शहर में आते हैं; उस शहर में काम करने वाले मजदूरों की हालत ये तस्वीर बयाँ कर रही है। इस तस्वीर को देखिए, इस मज़दूर की कहानी पढ़िए और सोचिए कि क्या वाकई में आप इस शहर को जानते हैं?



फोटो में दिख रहे व्यक्ति बीकू भाई हैं जो राजधानी के एक छोटे कारखाने में काम करते हैं। आपके किचन में चमचमाते सिंक को इन्होंने ही अपने हाथों से चमक दी है। जी हाँ, ये सिंक पॉलिश का काम करते हैं। काम किन परिस्थितियों में किये जाते हैं वो फोटो में देखा जा सकता है। जिस मोटर पर ये काम करते हैं वो एक सेकंड में 40 बार घूमता है; जरा सी चूक हुई और दुर्घटना घटी। इनका दिन कपड़े और फाइबर के डस्ट (बारीक धूल) के बीच गुजरता है जो सांस बनकर इनके फेफड़ों में उतरता है और धमनियों में बहता है। बीकू भाई से बात करने पर जो बातें सामने आई वह इंसानियत को शर्मसार करती हैं। ये लोग जिस तरह से काम करते है उसे देख कर हम अपने घरों में बैठकर यह कल्पना भी नही कर सकते कि किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा। इनको मूल जरूरतों से भी वंचित रहना पड़ता है जैसे कि पीने के लिए शुद्ध पानी भी नही मिलता। 
इस दिहाड़ी (दैनिक मजदुरी) पर काम करने वाले मजदूर से बात करने पर ये भी पता लगा कि ये लोग रोजाना 10 से 12 घण्टे काम करके 300 से 400 रुपये कमा लेते हैं जिससे वो अपना और अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। कमाई का आलम ये है कि कभी-कभी काम कम होने पर ये लोग महीने भर में 5 से 6 हजार रुपये ही कमा पाते हैं।
बीकू भाई के कारखाने का एक दृश्य
फिर भी इस मजदूर को अपनी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं है वो मेहनत और ईमानदारी से अपना और अपने परिवार का खर्च चला रहा है और इस बात से वो बहुत खुश है। हाँ, इतना जरूर है कि वो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल में दाखिला नही दिला पाते, तरह-तरह के पकवान नही खिला पाते, खुद की गाड़ियों में नही घूम पाते, उनके लिए अच्छे घर नहीं होते और भी बहुत कुछ जो दूसरों के लिए तो वो करते हैं लेकिन खुद उससे वंचित रहते है। यहाँ हम लोगो को एक बात समझ लेनी है कि जो शहर जितना खूबसूरत दिखता है उसके पीछे मजदूरों की उतनी ही कठोर मेहनत होती है। एक सुई से लेकर हवाई जहाज तक बनाने में मजदूरों का ही खून पसीना बहता है।
 बीकू भाई की मुख्य समस्याएं क्या हैं?
1. कल कारखानों द्वारा न्यूनतम वेतन का पालन ना करना
अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग न्यूनतम वेतन लागू है जो वर्तमान समय के हिसाब से बहुत कम है। फिर भी मालिकों द्वारा न्यूनतम मजदूरी के नियमों का पालन नही किया जाता है। बेरोजगारी के इस दौर में मालिक के मोलभाव करने की शक्ति बढ़ गयी है, "तू नहीं करेगा तो बहुत लोग इससे कम पर भी काम करने के लिए तैयार हैं" और  इसप्रकार न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर मजदूरों से काम लिया जाता है। क्या मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलनी चाहिए कि उनका परिवार भूखा ना रहे, और उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित ना रहना पड़े? मोदी सरकार ने अभी हाल ही में 178₹ का दिहाड़ी (Daily wage) तय किया है, यह लेबर कॉन्फ्रेंस व सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का एक चौथाई है। इस मज़दूरी में मज़दूर का परिवार कैसे चलेगा और सबका साथ सबका विकास कैसे होगा ये सोचने वाली बात है। 

2. सुरक्षा के इंतजामों का अभाव 
अगर मजदूरों के सुरक्षा से सम्बंधित विषय पर बात की जाए तो लगभग सभी कंपनियों में हालात एक जैसे ही हैं। दिल्ली में आये दिन इस तरह की घटनाएं सामने आती रहती हैं, कभी आग लगने के वजह से मजदूरों की मौत तो कभी धुँए की वजह से दम घुटने से मौत तो कभी बिना सुरक्षा बेल्ट के ऊँचाई पर काम कर रहे मजदूर की गिरने से मौत तो कभी लगातार काम करते रहने की वजह से मौत। काम करते हुए उंगलियां कटना तो बहुत आम बात है। इस तरह की दुर्घटनाओं को ज्यादातर कुछ लेनदेन करके दबा दिया जाता है। बाकी "सभ्य समाज" को भी मज़दूरों की मौतों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। 

3. ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा
वर्तमान समय में ठेका प्रथा एक बीमारी बन चुकी है और यह बढ़ती ही जा रही है। ठेके पर काम करने पर मजदूर अपने सारे अधिकार खो देते हैं और वो किसी भी समस्या के लिए कंपनी को जिम्मेदार नही ठहरा सकते। कंपनियाँ भी ठेकेदारी पर काम कराकर मजदूरों को दी जाने वाली सुविधाओं जैसे PF, फंड, बोनस, मेडिकल, इत्यादि देने से बच जाती हैं। अमूल आइसक्रीम तो लगभग सभी लोग खाते होंगे लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि अमूल आइसक्रीम बेचने में एक या दो स्तर पर ठेकेदार होते हैं। पहले स्तर के ठेकेदार एक इलाके में आइसक्रीम विक्री का ठेका कंपनी से लेते हैं जिसमें उनको 33% कमीशन मिलता है। इस काम को आगे वो एक सेल्स मैनेजर (दूसरा ठेकेदार) को 15% कमीशन पर दे देते हैं जो अपने अंदर 10,12,15 लड़के (मजदूर) रखते हैं। यह 15% सेल्स वाले ठेकेदार की कमाई है जबकि पहला ठेकेदार बस ठेका ट्रांसफर करके बैठे-बैठे 18% कमा लेता है। वहीँ, अगर ठेकेदारी ना होती तो ये 33% सीधे असली काम करने वाले मज़दूरों को मिलता। साथ ही ठेके पर काम करने वाले मजदूरों को कंपनी कभी भी निकल देती है। और ध्यान रहे ये कुछ लोगों की बात नहीं है; आज देश में जितने काम करने वाले लोग हैं उनमें 93% ठेके पर काम करने वाले लोग हैं। सोचिए कि कितनी बड़ी समस्या है ये। पर क्या आपने किसी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल, किसी पार्टी या किसी नेता को ठेका प्रथा का मुद्दा उठाते हुए सुना है? नहीं ना? आखिर क्यों? इसका जबाब तब मिलेगा जब आप यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि मीडिया कंपनियों का मालिक कौन है, और इन नेताओं और पार्टियों को चंदा कौन देता है? तब शायद ये भी समझ आ जाये कि ये मंदिर-मस्जिद का मुद्दा, हिन्दू- मुस्लिम का मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है। 

4. समान कार्य समान मजदूरी
समान कार्य के लिए समान मजदूरी होनी चाहिए परन्तु इनका पालन सिर्फ सरकारी परमानेंट कर्मचारियों तक ही सीमित है। प्राइवेट कंपनियों में पूरे दिन काम करने के बाद भी मजदूरी के नाम पर पुरुष और महिलाओं में भेद-भाव है। जिस कार्य के लिए पुरुष को 12000 रुपये दिए जाते हैं उसी कार्य के लिए महिलाओं को 6000 से 8000 रुपये दिए जाते हैं।
देश के विकास में मजदूरों का सबसे अहम योगदान होता है। मजदूरों के बिना किसी औद्योगिक ढांचे, कल-कारखाने को खड़ा होने और चलाने की कल्पना नही की जा सकती लेकिन आज सबसे ज्यादा बर्बाद मजदूर ही है। 
भारत का संविधान एक आम नागरिक को जो अधिकार देता है वो सारे अधिकार हम मजदूरों के भी हैं फिर भी हम क्यों चुप हैं, क्यो हम अपने हक के लिए नही लड़ते है?

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