13 July 2019

भारतीय रेलवे और यात्रीजन दोनों की दुर्दशा

   


("ट्रैन में भीड़ की वजह से दम घुटने से युवती की मौत" सोचिए यह न्यूज़ की हैडलाइन कितनी खतरनाक है। खासकर एक ऐसे देश में जो दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है, जो अंतरिक्ष में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, विश्वगुरु होने का दम्भ भर रहा है। इसका जिम्मेदार किसे मानना चाहिए?)

✍️ राघवेंद्र तिवारी 

   भारत में ट्रेन यातायात का प्रमुख साधन है जिससे रोजाना लगभग  2.3 करोड़ लोग अपना सफर पूरा करते हैं और लगभग 30 लाख टन माल ढोया जाता है। 130 करोड़ जनसंख्या वाले भारत देश में साल 2017 तक लगभग 121,407 किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक का जाल बिछा हुआ था जो निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है।  लेकिन ट्रेन में सफर करना बहुत लोगों के लिए एक संघर्ष से कम नहीं है। रेलवे की तमाम योजनाओं और नियमों-कायदों के बावजूद भी ना तो रेलवे व्यवस्था की खामियाँ दूर हो सकी और ना ही यात्रियों को बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा मिल सकी। कुछ ही दिन पहले दिल्ली से मानिकपुर जा रही संपर्क क्रांति ट्रेन में अत्यधिक भीड़ की वजह से एक युवती की हुई मौत दिल दहला देने वाली है तथा रेलवे की इस पूरी व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े खड़ी करती है।
"ट्रैन में भीड़ की वजह से दम घुटने से युवती की मौत" सोचिए यह न्यूज़ की हैडलाइन कितनी खतरनाक है। खासकर एक ऐसे देश में जो दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है, जो अंतरिक्ष में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, विश्वगुरु होने का दम्भ भर रहा है। इसका जिम्मेदार किसे मानना चाहिए?
खुद युवती को या लोगों को जिनकी वजह से भीड़ ज्यादा हो गयी या फिर रेलवे को या सरकार को?
किसी भी सामान्य व्यक्ति के मन में यही सवाल उठेंगे। लेकिन ये सवाल इतना आसान नही है जितना हम समझते हैं। जब हम सफर करते हैं तो देखते हैं कि स्लीपर हो या जनरल, सभी  डिब्बो में व्यवस्थित सीटों से काफी अधिक लोग सफर करते हैं और ये भीड़ और बढ़ जाती है जब कोई पर्व या त्योहार का सीजन हो। भीड़ का आलम ये है कि क्या स्लीपर क्या जनरल सबमें सीट से अधिक यात्री तो सफर करते ही है, गर्मी के दिनों में भीड़ और गर्मी की वजह से परेशानियां और बढ़ जाती हैं। गत 10 जून को इसी भीड़ और उमस ने केरल एक्सप्रेस में सफर कर रहे यात्रियों को बेहाल कर दिया जिसमें 4 यात्रियों की मौत हो गयी। क्या इसको बदहाल व्यवस्था द्वारा की गई हत्या नहीं कहा जायेगा?
दूसरी तरफ रेलवे हर साल घाटे में होती है। इसके बावजूद कि एक स्लीपर में 72 यात्रियों की जगह 150-200 लोगों से किराया लेकर भरा जा रहा है, जनरल में 90 यात्रियों की जगह  250-300 लोगों को ठूसा जा रहा है, टिकट कैंसलेशन चार्ज से ही रेलवे को करोड़ो की कमाई हो रही है (2016-17 में टिकट कैंसलेशन से रेलवे को 1400 करोड़ की कमाई हुई)। इसके साथ ही तत्काल और प्रीमियम तत्काल जैसी सुविधाओं से 2 से 3 गुना ज्यादा किराया वसूला जा रहा है, तत्काल टिकट कैंसिल पर जीरो रिफंड है, रेलवे में कर्मचारियों की भारी संख्या में कमी है। इसके बाद भी जब आप रेलवे के फाइनेंस विंग का डेटा देखेंगे तो पता चलेगा रेलवे प्रति 100 रुपये कमाने के लिए 111.51 रुपये खर्च करता है। आखिर ऐसा क्यों?


जनता अपनी कमाई का कुछ हिस्सा निरन्तर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के रूप में सरकार को देती है। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन पैसों का उपयोग नागरिकों के बेहतर ज़िन्दगी के लिए करे। बेहतर सुविधाओं को तो छोड़ ही दें हमारे देश की एक बड़ी आबादी को साधारण सुविधाओ से भी वंचित रहना पड़ता है। यातायात के मामले में भी यही हाल है। ट्रेन यात्रा की सबसे बड़ी दिक्कतें हैं-
1. अत्यधिक भीड़
2. ट्रेन का देरी से चलना
3. रिजर्वेशन की धांधली
4. ट्रेन दुर्घटनाएं
5. ट्रेनों और प्लेटफार्म पर मिलने वाला खराब खाना
6. गंदगी
ये इतनी गंभीर समस्याएं बन चुकी हैं कि एक लेख में सभी समस्याओं पर बात करना संभव नहीं है। फिलहाल हम ट्रेन दुर्घटनाओं की बात करते हैं।
सितंबर 2017 में मुंबई के एलफिंस्टन रोड (अब प्रभादेवी) स्टेशन पर संकरे पुल पर अधिक भीड़ के कारण हुए भगदड़ में 23 लोगों की जान गई, पंजाब के अमृतसर में रावण दहन के कार्यक्रम के समय पटरी पर खड़े लोगो को रौंदती हुई ट्रेन निकल गयी जिसमें 60 ज्यादा लोगों की जान गई। वो घटना प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा था जिसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों, रेलवे व सरकार के नुमाइंदों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ और इस घटना को अनाधिकृत अतिक्रमण, जनता की लापरवाही और छोटे- मोटे अधिकारियों, ड्राइवर, रेलवे क्रासिंग गेट मैन आदि पर थोप दिया गया। ऐसी घटना ना तो पहली थी और ना ही आखिरी। 2009-10 से 2014-15 के बीच ट्रेन की ऐसी 803 दुर्घटनाओं में 620 लोगों ने अपनी जानें गवाईं और 1855 लोग घायल हुए। आज एक दिक्कत ये भी है कि रेलवे की बड़ी से बड़ी समस्याओं पर, गलतियों पर भी लोगो को गुस्सा नही आता, बड़ी से बड़ी दुर्घटना भी एक साधारण खबर बन कर रह जाती है। सरकारें अपनी नीतियां बनाती रहती हैं जिससे इस तरह की दुर्घटनाओं पर काबू पाया जा सके, लेकिन उनकी ये पहल जमीन पर नहीं दिखती और निरन्तर दिल दहला देने वाली घटनाएं होती रहती हैं। आगे हम ट्रेनों के देरी से चलने की समस्या पर बात करते हैं।
         आइए देखते हैं कि इस बारे में आँकड़ें क्या कहते हैं? रेलवे के आधिकारिक आंकड़े के अनुसार 2017-2018 में करीब 30% ट्रेनें लेट से चलाई गयी। जो पिछले 3 वर्षों का सबसे खराब प्रदर्शन है। रेलवे इतने लंबे समय में भी ट्रेनों के समय से चलने को लेकर कुछ नहीं कर सका। कई बार स्टेशन पर जाने के बाद आपको पता लगता है कि फला ट्रेन 18 घण्टा या 24 घण्टा देरी से चल रही है। ट्रेनों के लेट चलने से कितने यात्रियों को एग्जाम, ऑफिस, या किसी भी आवश्यक कार्य के लिए निर्धारित समय से ना पहुँच पाने से जो परेशानियां होती है उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
ट्रेनों के लेट चलने के पिछले चार वर्षों के आंकड़े
जब हम पिछले 4 वर्षों का डेटा देखते हैं तो पता चलता है कि वर्तमान स्थिति पहले से भी बत्तर हो गयी है और आगे भी होती नजर आ रही है।

ट्रैन
2014
2015
2016
2017
राजधानी
0
3
0
53
शताब्दी
0
15
6
19
सुपरफास्ट
280
357
93
886
एक्सप्रेस
102
122
72
451
गरीब रथ     
35
27
13
46

(यह आंकड़ा उन ट्रेनों का है जो 400 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करती हैं। यह आंकड़ा प्रतिवर्ष जनवरी से मार्च के बीच का है।)
       साथ ही उपरोक्त आंकड़ा सिर्फ उन्हीं ट्रेनों का है जो 15 घण्टे से ज्यादा की देरी से अपने गंतव्य तक पहुँची हैं। अगर हम सारे आंकड़ों को देखें तो अपने समय से लेट चलने वाली ट्रेनों की स्थिति बहुत ही बदतर दिखेगी।
कुछ लोग सोचते हैं कि इसका समाधान निजीकरण में है जो कि सच नहीं है। 2014 के बाद भाजपा के पहले शासनकाल में भोपाल के हबीबगंज स्टेशन को अंसल ग्रुप को चलाने के लिए दिया गया। उसके बाद अंसल ग्रुप ने एक महीने के कार पार्किंग का चार्ज 12000 रुपये कर दिया जिसका लोगों ने काफी विरोध किया। आज देश के कई हिस्सों में रेलवे के लाखों कर्मचारी सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। इसके बाद भी रेलवे का निजीकरण बदस्तूर जारी है। वास्तव में अगर किसी प्राइवेट कंपनी के मुनाफे के लिए रेलवे को नीलाम किया जाएगा तो वो लोगों से पाई-पाई निचोड़ने का ही काम करेगी। आगे के लेखों में इस विषय पर विस्तार से बात की जाएगी।

3 comments:

  1. आंकड़ों को सही रूप से विस्तारित नहीं किया गया है सही से समझ नहीं आ रहा कि ये डाटा किस तथ्य को सूचित करती है.

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    1. Thank you for your comment. We will convey this to article's author.

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  2. बाकी लेख बहुत अच्छा है सिस्टम और उसके कार्यप्रणाली को बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है

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