24 June 2019

जनसंख्या से बड़ी समस्या कुछ और है!


(अक्सर तमाम माध्यमों द्वारा लोगो के बीच में ये भ्रम फैलाया जाता है कि आज देश की बुरी स्थिति इसलिए है कि दिन पर दिन जनसँख्या बढ़ रही है। जनसंख्या को ही हर समस्या की जड़ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। बताया जाता है कि संसाधन तो सीमित हैं पर जनसंख्या लगातार बढ़े जा रही है इसलिए लोगों को खाने को अनाज, पहनने को कपड़ा, रहने को घर, बैठने को बस-ट्रैन की सीट, गाड़ी चलाने के लिए सड़कों पर जगह, सांस लेने को शुद्ध हवा इत्यादि नहीं मिल पा रही है। हम भी इसको मानते हुए हर समस्या के लिए जनसंख्या को कोसते रहते हैं, बिना ये जाने कि दरअसल इन समस्याओं का कारण जनसंख्या न होकर कुछ और ही है।)
✍️ प्रदीप सिंह

हाल ही में  संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट आई जिसके अनुसार 2027 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जायेगा। स्वतंत्रता के बाद 33 करोड़ से हम आज करीब 130 करोड़ से ऊपर जनसँख्या वाले हो गये हैं। इस रिपोर्ट के बाद जनसंख्या को लेकर एकबार फिर बहसबाजी शुरू हो जाएगी। अक्सर तमाम माध्यमों द्वारा लोगो के बीच में ये भ्रम फैलाया जाता है कि आज देश की बुरी स्थिति इसलिए है कि दिन पर दिन जनसँख्या बढ़ रही है। जनसंख्या को ही हर समस्या की जड़ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। बताया जाता है कि संसाधन तो सीमित हैं पर जनसंख्या लगातार बढ़े जा रही है इसलिए लोगों को खाने को अनाज, पहनने को कपड़ा, रहने को घर, बैठने को बस-ट्रैन की सीट, गाड़ी चलाने के लिए सड़कों पर जगह, सांस लेने को शुद्ध हवा इत्यादि नहीं मिल पा रही है। हम भी इसको मानते हुए हर समस्या के लिए जनसंख्या को कोसते रहते हैं, बिना ये जाने कि दरअसल इन समस्याओं का कारण जनसंख्या न होकर कुछ और ही है। वास्तव में इस तरह की सोच से सरकारों को फायदा होता है। सरकारें आम जनता से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के रूप में पैसा वसूलती हैं और उनकी ये जिम्मेदारी होती है कि वो देश के हर नागरिक के लिए जरूरी सुविधाएं (पानी, बिजली, सड़क, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, परिवहन, पार्क, रोजगार के अवसर इत्यादि) प्रदान करे। अगर सरकार इन जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करती है तो नागरिकों का यह अधिकार और कर्तव्य बन जाता है कि सरकार से इनके लिए संघर्ष करे और ऐसी सरकारों को उखाड़ फेंके। पर अगर जनता के बीच ऐसी सोच बैठा दी जाय कि सारी समस्याओं की वजह वो खुद है तो सरकारों के लिए सबकुछ बहुत आसान बन जाता है। इसीलिए "आबादी: एक समस्या" का यह भोपूं बार बार हमारे कानों पर बजाया जाता है। आगे हम देखेंगे कि कैसे असली समस्या जनसंख्या न होकर कुछ और है। इसका मतलब ये  नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोई अनगिनत बच्चे पैदा करे तो भी जनसँख्या कोई समस्या नहीं है।  दरअसल यह लेख इस झूठ का भांडाफोड़ है कि जनसँख्या की वजह से ही सारी दिक्कतें पैदा हो रही हैं। 

  अगर हमारे देश में सबको समान शिक्षा मिले, समान चिकित्सा मिले, परिवहन के पर्याप्त साधन मिलें, सबको रोजगार मिले तब भी क्या जनसंख्या समस्या होगी?  
    पूरे विश्व की आबादी लगभग 7.7 अरब के आस पास है।  जिसमें भारत की जनसँख्या करीब 130 करोड़ है यानी पूरे विश्व का हर 6वाँ व्यक्ति भारत का है। हम जब चारो तरफ झांक कर देखते हैं कि सरकार से लेकर हर तबके के लोग इस बिकराल समस्या को लेकर चिंतित है। इस समस्या से निपटने के लिए देश-बिदेश की तमाम संस्थाएं काम कर रही है और अरबो रूपये भी खर्च किये जा रहे हैं। कुछ "महान" हस्तियों को डर है कि अगर ऐसे ही आबादी बढ़ती रही तो मामला हाथ से निकल जायेगा। सोचने वाली बात यह है कि क्या समस्याएं सिर्फ उन देशों में हैं जहाँ जनसंख्या ज्यादा है? आइए देखते हैं।
  आज 21वीं सदी में भी मानव समाज भीषण तंगी, बदहाली और गरीबी से जूझ रहा है। यहाँ तक कि विकसित देशों में भी यही बुरा हाल है। 18 नवम्बर 2009 की न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में 490 लाख लोग भूखे सोते थे। करीब 4.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे का जीवन यापन कर रहे हैं। दिसंबर 2017 की वाशिंगटन पोस्ट की खबर कहती है कि अमेरिका में भीषण गरीबी दस्तक दे रही है। अमेरिका के शहरों में बेघरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जबकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यहाँ जनसंख्या दूसरे एशियाई देशों के मुकाबले काफी कम है। तो क्या हम अब भी मान लें की जनसंख्या ही समस्या की जड़ है? इस विषय पर आईआईटी कानपुर की प्रोफेसर मनाली चक्रवर्ती ने काफी अच्छा शोध किया था। आइये उनके इस शोध की कुछ बातों पर गौर करते है-
आधुनिक इतिहास में सुनियोजित तरीके से बढ़ती जनसंख्या के खतरे पर प्रकाश डालने वाले सबसे पहले शख्स हैं- रेमण्ड थॉमस माल्थस। बढ़ती आबादी की समस्यायों को देखते हुए अपनी गणितीय कैलकुलेशन के हिसाब से उन्होंने बताया कि एक दिन आबादी इतनी बढ़ जायेगी की खाद्यान खत्म हो जायेगा और मानव आबादी इस उपलब्ध खाद्यान को पार कर जायेगी। उनकी  एक किताब " एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन" में बताया गया है कि इस मानव आबादी को संतुलित बनाये रखने के लिए हमें गरीब तबके के लोगो को साफ- सुथरा रखने के बजाय गन्दगी की आदत डलवानी पड़ेगी, गांव की तरफ गन्दी नालिया, गंदे कस्बे, सड़ते हुए तालाब और गंदे नालों के पास बसाने होंगे, हमें प्लेग जैसी बीमारियों को खुले हाथों आमंत्रण देना होगा जिससे ये लोग मरते रहें और आबादी संतुलित रहे। इनकी यह किताब अमीर तबके के लोगो के बीच काफी प्रसिद्ध हुई और उस दौर में  काफी चर्चा में थी।
यह याद रखने वाली बात है कि माथल्स और उनके प्रशंसक लोग पिछड़े देश की नहीं अपितु उस दौर के लोगो के सबसे ताकतवर और समृद्ध देश इंग्लैंड की बात कर रहे थे।
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में डार्विन और उनके रिश्तेदार फ्रांसिस गाल्टन ने इस विचार को वैज्ञानिक तर्क का जामा पहनाया और बताया की बढ़ती जनसंख्या से मानव जाति धीरे धीरे मंदबुद्धि होती जा रही है। उन्होंने इसके लिए "युजैनिक्स (अच्छी नस्ल के प्रजनन)" की पद्धति सुझाई। इसके बाद मार्गरेट सैमर नाम की एक प्रसिद्ध समाजसेवी महिला ने " प्लांट पैरेंटहुड "की शुरुआत की  यानि योजनाबद्ध मातृत्व। उनका मानना था गरीबों की सहायता करना मानवता के खिलाफ है। उनका कहना था कि जिस प्रकार बगीचे की सुंदरता बनाये रखने के लिए  खर-पतवार को साफ करना जरुरी होता है ठीक उसी प्रकार गुणवत्ता बनाये रखने के लिए गरीबों को बच्चा पैदा न करने देना अनिवार्य है। उनका यह तर्क भी उस ज़माने के धनी लोगों को ख़ूब भाया, जैसे कि रॉकफेलर, ड्यूक, लास्कर, डुपोण्ट आदि को। बीसवी सदी के बीचो बीच जर्मनों ने इसको अमल में लाने का प्रयास किया और 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गयी। इमरजेंसी के दौरान इस देश में संजय गाँधी के नेतृत्व में भी जो नसबंदी अभियान छेड़ा गया था, उसकी बुरी यादें अभी भी हमें सताती हैं। पिछले कुछ सालों से यह विचार फिर ज़ोर-शोर से वापस आ रहा है। कइयों को कहते सुना जाता है कि ‘’साहब, अब अच्छा लगे या बुरा, तरीका तो वही है।

जनसंख्या पर शोध करने वाली प्रोफेसर मनाली चक्रवर्ती ने काफी स्पष्ट रूप से इस बात को गलत साबित किया है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण संसाधनों का अभाव पैदा हो गया है। आगे हम उनके द्वारा दिये गए आंकड़े देखते है कि क्या वर्तमान आबादी के लिए वास्तव में संसाधनों की कमी है?  पहले हम बुनियादी जरूरतों की बात करते है-

इंसान की सबसे मूलभूत जरूरत है रोटी, कपड़ा और मकान। 
सबसे पहले हम रहने के लिए जरूरी स्थान पर चर्चा करते हैं। धरती पर लगभग 7 अरब के आस पास जनसँख्या है, अगर 4 व्यक्तियों के एक परिवार को अच्छे तरीके से रहने के लिए 5000 वर्गफुट की ज़मीन दी जाय तो इस प्रकार धरती पर 7 अरब आबादी को बसाने के लिए कितनी जगह चाहिए?
दरअसल इतने लोगों को बसाने के लिए हमारे देश के दो बड़े राज्य महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ही काफी हैं। यानी पूरे विश्व के लोगों को भारत के दो राज्यों में ही बसाया जा सकता है जिसका क्षेत्रफल कुल 8000 अरब बर्गफुट है। अब यह बात बिलकुल साफ है कि आबादी के हिसाब से ज़मीन की कोई कमी नहीं है। यह गणना पूरी जमीन को समतल मानकर किया गया है, पर भारत में न तो केवल दो राज्य हैं न ही भारत दुनिया में अकेला देश है। 

अब रोटी की बात करते हैं
2007 में पूरे विश्व में भीषण खाद्यान की समस्या आ पड़ी थी । विशेषज्ञों का मानना था कि पूरी दुनिया में रोजाना 1 अरब लोग भूखे सोते थे। ऐसा सुन कर लग रहा है कि यह वाकई में बहुत गंभीर समस्या थी। 
थोड़ा गहराई में जाते है-
खाद्य पदार्थ कई तरह के होते है, गल्ला ,दालें, साग, सब्जी, बादाम, मांस , मछली आदि। अगर पूरी दुनिया में पैदा होने वाला गल्ला (अनाज) ही सबके लिए बराबरी से उपलब्ध करा दिया जाए तो पूरी दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को 3000 से 4000 कैलोरी का खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सकता है। जबकि एक आदमी को जीने के लिए 2200 से 2400 कैलोरी ऊर्जा की जरुरत होती है, इसमें फल, सब्जी, दूध, अंडा और मछली को तो जोड़ा भी नहीं गया है। सोचने वाली बात है जहाँ दुनिया में अरबो लोग आधे पेट खाकर सोते हैं, वही तकरीबन उतने ही लोग मोटापे की बीमारी से ग्रसित हैं। एक व्यक्ति अगर 2200-2300 कैलोरी से अधिक खाता है तो वह मोटापे का शिकार हो जाता है। वास्तव में कुछ लोगों को खाने के लिए बहुत ज्यादा मिल रहा तो कुछ लोगों को आधे पेट भी नहीं मिल रहा। इस हिसाब से साफ है कि खाद्यान की कोई कमी नहीं है बल्कि उसकी पहुँच जरूरतमंदों तक नहीं है। 
अब हम अपने देश की बात करते हैं। भारत अपनी जरूरत से करीब ढाई गुना खाद्यान्न उत्पन्न करता है जिसमें हर साल करीब 70 लाख टन अनाज FCI के गोदामों में सड़ जाता है।  दूसरी तरफ एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और हर रोज करीब 4000 बच्चे भूख और कुपोषण की वजह से मरते हैं।  

आवास-प्रश्न
इसीप्रकार आवास समस्या को समझने के लिए एक तथ्य काफी सटीक है। भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में करीब 60% आबादी झुग्गियों-झोपड़ियों में रहती है जहाँ जीवन परिस्थितियाँ काफी प्रतिकूल हैं जबकि दूसरी तरफ मुंबई में 11 लाख ऐसे घर हैं जो खाली पड़े हुए हैं। ये खाली घर या तो बिक नहीं रहे या बिक गए हैं पर उनमें कोई रहता नहीं है (स्रोत- MMRDA रिपोर्ट)। देश के अन्य शहरों में भी लाखों की संख्या में फ्लैट हैं जो बिक नहीं रहे पर दूसरी तरफ करोड़ों बेघर लोगों की फौज खड़ी है। 

स्वास्थ्य समस्या
    देश मे हर साल अरबों की दवाएँ एक्सपायर कर जाती हैं जिनको डंप किया जाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक केवल अमेरिका में हर साल 765 अरब डॉलर की दवाएँ  (एक्सपायरी या नॉन-एक्सपायरी) डंप कर दी जाती हैं। पूरी दुनिया के स्तर पर यह आँकड़े और चौकाने वाले होंगे। दूसरी तरफ आये दिन अखबारों में यह खबर आती है कि सामान्य सी दवा न मिलने से मरीज की मौत। क्या यह दवाओं की कमी है जिसकी वजह से मरीज मरते हैं?  प्रोफेसर मनाली चर्कवर्ती के शोध के अनुसार अगर दुनियाभर में हथियारों पर खर्च होने वाले पैसे का केवल एक तिहाई भी लोगों पर खर्च करें तो पूरी दुनिया की सभी मूलभूत जरूरतें (शिक्षा, स्वास्थ्य , पानी, सफाई, सैनिटेशन इत्यादि) पूरी की जा सकती हैं।

अबतक के तथ्यों और आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट हो गया होगा कि दरअसल यह जनसंख्या नहीं है जिसकी वजह से हम अभावों में जी रहे हैं और अभावों में मार रहे हैं। वास्तव में जो असली समस्या है वह है "मुनाफ़े पर आधारित व्यवस्था"।  यह मुनाफा ही है जिसकी वजह से जरूरत से काफी ज्यादा मात्रा में चीजें उपलब्ध होने के बावजूद एक बड़ी जरूरतमंद आबादी इन चीजों से महरूम रहती है, इनके अभाव में मरती रहती है। आज समाज का आर्थिक ढाँचा इस तरह का है कि मुट्ठीभर लोगों के हाथ में सारे संसाधन हैं, उत्पादन के साधन, फैक्टरियां, मिलें और खदानें हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। इसके लिए पूंजीपतियों का यह वर्ग अपने यहाँ काम करने वाले लोगों का शोषण करते हैं, हाड़तोड़ मेहनत कराने के बाद भी उन्हें उचित मज़दूरी नहीं देते, कोई सुविधाएं नहीं देते। इससे उनका मुनाफा बढ़ता जाता है और वे और अमीर से अमीर होते जाते हैं, यही कारण है कि आज भारत की एक प्रतिशत अमीर आबादी के पास देश की 58% संपदा आ चुकी है जबकि 2015 में इनके पास 53% संपत्ति का मालिकाना था और 2005 में 39% संपत्ति का मालिकाना इनके हाथ में था (ऑक्सफैम रिपोर्ट)। 
दूसरी तरफ मजदूर और गरीबी की खाई में गिरते जाते हैं। इससे यह होता है कि जो समान पूंजीपति विक्री के लिए उत्पादन करवाता है उसको खरीदने के लिए लोगों के पास पैसे ही नहीं बचते। लोगों को जरूरत रहती है और दुकानें सामानों से भरी पड़ी रहती हैं पर आदमी सामान नहीं खरीद पाता। इसके फलस्वरूप आर्थिक मंदी की शुरुआत होती है। 

इसप्रकार मुनाफे पर आधारित व्यवस्था में पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद पूरी आबादी को एक बेहतर ज़िन्दगी दे पाना असंभव है। एक मानव केंद्रित व्यवस्था का निर्माण ही आज इस बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को बेहतर ज़िंदगी दे सकता है। एक ऐसी व्यवस्था जहाँ देश के संसाधनों पर मुट्ठीभर अमीर लोगों का मालिकाना न हो। हम सभी को मिलकर इसपर गंभीरता से काम करने की जरुरत है जिससे हम आने वाले वक्त को बदल सकते हैं और हम सभी एक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं।

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