16 June 2019

अगर मुस्लिम खुद साम्प्रदायिक हों तो वे संघी साम्प्रदायिकता से कैसे लड़ेंगे?

(अब तक भारत के बुद्धिजीवी और प्रगतिशील लोगों ने बीजेपी-आरएसएस की साम्प्रदायिकता पर खुलकर हमला बोला है जो कि जरूरी भी है पर दूसरी तरफ मुस्लिमों को "पीड़ित कौम" का लाभ देते हुए उनकी रूढ़िवादिता और साम्प्रदायिकता पर खुलकर चोट नहीं की है। यह भी एक कारण है कि बीजेपी-आरएसएस का प्रचारतंत्र ऐसे सेक्युलर लोगों को जनता के सामने मुस्लिमों को अपीज करने वाले, फर्जी सेक्युलर, सिकुलर आदि छवियों के रूप में पेश कर पाए हैं।)

✍🏼 कौशिक 

कुछ दिन पहले मुम्बई में रहने वाले एक दोस्त ने एक बात बताई थी। जब जम्मू के कठुआ में आसिफा वाली जघन्य घटना हुई थी तो उस समय पूरे देश में जनता का गुस्सा अलग-अलग तरीकों के विरोध प्रदर्शनों  में सामने आया था। उसके इलाके के बहुत सारे मुस्लिम जो कि ऑटो चलाते हैं उन्होंने इस घटना के खिलाफ एकजुट होकर कैंडल मार्च किया था और इलाके में "जस्टिस फ़ॉर आसिफा" का बड़ा बैनर लगवाया था। ये एक सराहनीय बात थी। पर उनके बारे में दूसरी सच्चाई ये है कि वो खुद भी इतने साम्प्रदायिक हैं कि जिस चौक से वो सवारी उठाते हैं वहाँ अपना वर्चस्व बनाकर रखते हैं। पहले तो वे वहाँ किसी गैर मुस्लिम को घुसने नहीं देते और कोई गैर मुस्लिम उनके बीच आ भी जाये तो उसको काफी तंग करते हैं। कुल मिलाकर वहाँ ऑटो चलाने का अवसर मिलना गैर मुस्लिम के लिए काफी कठिन है। ऐसे और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। दिल्ली के फोटोग्राफर अंकित सक्सेना को एक मुस्लिम लड़की से प्रेम करने के लिए लड़की की फैमिली द्वारा बीच सड़क पर मौत के घाट उतार दिया गया। मेरठ में एक मुस्लिम लड़की ने हिन्दू लड़के से शादी कर ली और इसके बाद लड़की के भाई ने दोनों को मौत के घाट उतार दिया। ऐसी कितनी घटनाएँ दोनों कौमों की तरफ से गिनायीं जा सकती हैं। 
ऐसे लोग हिन्दू कट्टरपंथी गौरक्षकों द्वारा अख़लाक़, जुनैद या पहलू खान की हत्या पर फेसबुक पर साम्प्रदायिकता के खिलाफ पोस्ट शेयर करते हुए देखे जा सकते हैं, विरोध प्रदशनों में शामिल होते हुए देखे जा सकते हैं जो कि इनका मूलभूत अधिकार भी है। पर क्या इस आबादी को भी आत्मविश्लेषण नहीं करना चाहिए? स्वाभाविक रूप से ऐसी रूढ़िवादिता और साम्प्रदायिकता हिन्दू आबादी के भीतर भी है। साथ ही ये बात भी सच है कि आज बीजेपी-आरएसएस द्वारा हिन्दू आबादी का साम्प्रदायिकीकरण किया जा रहा है वह आज सबसे बड़ी समस्या है पर मुस्लिमों में जो साम्प्रदायिकता है क्या उसको नजरअंदाज किया जा सकता है? क्या इस साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल बीजेपी-आरएसएस हिन्दू आबादी में असुरक्षा की भावना पैदा कर उन्हें और साम्प्रदायिक बनाने में, उनमें और नफरत भरने में नहीं करेंगे? ये ऐसे सवाल हैं जिनपर गहराई से सोचने की जरूरत है। 
   अब तक भारत के बुद्धिजीवी और प्रगतिशील लोगों ने बीजेपी-आरएसएस की साम्प्रदायिकता पर खुलकर हमला बोला है जो कि जरूरी भी है पर दूसरी तरफ मुस्लिमों को "पीड़ित कौम" का लाभ देते हुए उनकी रूढ़िवादिता और साम्प्रदायिकता पर खुलकर चोट नहीं की है। यह भी एक कारण है कि बीजेपी-आरएसएस का प्रचारतंत्र ऐसे सेक्युलर लोगों को जनता के सामने मुस्लिमों को अपीज करने वाले, फर्जी सेक्युलर, सिकुलर आदि छवियों के रूप में पेश कर पाए हैं। उनका प्रचारतंत्र इतना व्यापक है कि वो एक सामान्य अपराध की घटना को भी साम्प्रदायिक बनाकर लोगों में फैला सकते हैं। ऐसे में आज संघी कट्टरपंथ से लड़ना सबसे अहम कार्यभार है क्योंकि इससे भारत की विविधता, एकता और शांति को ही खतरा है पर इसके साथ ही मुस्लिम आबादी के अंदर व्याप्त रूढ़िवादी और साम्प्रदायिक सोच से लड़ना भी जरूरी है। 

    अपने धर्म को मानना एक बात है और दूसरे धर्मों के लोगों से वैमनस्यता रखना दूसरी बात। आप अगर अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण इस चीज का समर्थन करते हैं कि अगर एक मुस्लिम लड़की हिन्दू लड़के से प्रेम विवाह कर ले तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए तो जब हिंदुओं की एक भीड़ अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण आपके बेटे की हत्या कर देती है तो आप उसके विरोध में कैसे बोलेंगे? क्या सबको उसकी धार्मिक मान्यता के अनुसार दूसरों को सज़ा देने का अधिकार दिया जा सकता है? यही बात हिन्दू आबादी के लिए भी कही जानी चाहिए, अगर हम कट्टरता का हल कट्टरता में खोजेंगे तो समाज बर्बादी की तरफ जाएगा।  आज हिन्दू और मुस्लिम आबादी को भावनाओं में बहने की बजाय तार्किक होने की जरूरत है। साम्प्रदायिकता और रूढ़िवादी सोच से पूरे समाज के अस्तित्व को ही खतरा है। दंगे और मारकाट से आजतक किसी को फायदा हुआ है तो वे साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले नेता और पार्टियाँ (बीजेपी-आरएसएस, सपा, एआईएमआईएम इत्यादि) हैं, जनता ने हमेशा दंगों में अपना सगा खोया है चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम, दंगों में उनकी ही दुकानें जलती हैं, चाहे हिंदुओं की जलें या मुस्लिमों की। इसलिए आज रूढ़िवादी सोच और धार्मिक कट्टरपंथ को उखाड़ फेंकने की जरूरत है, चाहे वो किसी धर्म में हो, इससे समाज की सुरक्षा और शांति को ही खतरा है। ऐसे मित्रों, सहकर्मियों से इसपर खुलकर बात करने की जरूरत है जो साम्प्रदायिकता और रूढ़िवाद में जकड़े हुए हैं। इसके साथ ही ऐसा क्रांतिकारी धर्मनिरपेक्ष संगठन खड़ा करने की जरूरत है जो हर धर्म के लोगों से मिलकर बना हो और कहीं भी साम्प्रदायिक घटना होने पर दंगाइयों (चाहे हिन्दू दंगाई हों या मुस्लिम) से जमीन पर उतरकर संघर्ष करने की क्षमता रखता हो। ऐसा संगठन ही आज देश और समाज को बचा सकता है। मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ हिन्दू कट्टरपंथ खड़ा करना और हिन्दू कट्टरपंथ के खिलाफ मुस्लिम कट्टरपंथ को खड़ा करना एक अनंत काल तक चलने वाली लड़ाई को जन्म देगा जिसमें खून आम जनता का बहेगा।

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