25 May 2019

डूबती सरकारी कंपनियां और बढ़ता कॉरपोरेट मुनाफा

 
 
(देश मे अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) दयनीय हाल में पहुच गए हैं। कैग (CAG) की रिपोर्ट में चौकाने वाली वाली बात सामने आई है। डूबती सरकारी कम्पनियां बदहाली की नई पटकथा लिख रही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश की 157 सरकारी कंपनिया  1 लाख करोड़ से भी अधिक के घाटे में डूब चुकी हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो तब होता है जब कोई "देश नही बिकने दूँगा" वाले जुमले के साथ सत्ता में हो फिर भी हर साल 30000 करोड़ रुपये का घाटा कंपनियो को हुआ हो।)

✍️ राघवेंद्र तिवारी  

अभी खबर आई कि दशकों से भारत की नंबर वन तेल कंपनी रहने वाली इंडियन ऑयल को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने पछाड़कर पहला स्थान प्राप्त कर लिया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज एक दशक पहले आईओसीएल से आधे से भी कम आकार की कंपनी थी पर आज यह देश की सबसे बड़ी तेल कम्पनी बन चुकी है। ऐसी कई सरकारी कम्पनीयां हैं जो या तो डूबती जा रही हैं या प्राइवेट कंपनियों से पिछड़ रही हैं। सरकारी नौकरियों की रेस लगाने वाले युवा इन खबरों से अनजान या बेपरवाह किसी न किसी पार्टी की भक्ति में जुटे हुए हैं। रोजगार सृजन का प्रयास तो पहले से ही लगभग खत्म हो गया है या हुआ भी है तो ऊँट के मुँह में जीरे जैसा। ऊपर से नोट बन्दी और GST जैसे मोदी जी के "साहसिक" फैसलों ने करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर दिया। 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाले ही अगर रोजगार सृजन की बजाय रोजगार खत्म करने लगें तो ये तो सीधा-सीधा जनता को मूर्ख बनाना हुआ। नोटबन्दी और GST से जो रोजगार गए अभी उनकी भरपाई भी नही हुई कि एक के बाद एक सरकारी कम्पनियाँ डूबती जा रही हैं साथ ही कई निजी कंपनियाँ भी बड़ी संख्या में दिवालिया हो रही हैं या बन्द हो रही हैं। अभी हाल ही में इंडिया पोस्ट का लगभग 15000 करोड़ रुपये का घाटा सामने आया है। देश भर में लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा डाकघरों को संचालित करने तथा बचत एवं निवेश की योजनाएं चलाने वाला इंडिया पोस्ट निरन्तर घाटे में जा रहा है। वित्त वर्ष 2017-2018 में जो सरकारी कंपनियां घाटे में गयी उनमें बीएसएनएल ,एयर इंडिया,एवं भारतीय डाकघर सबसे चर्चित रहीं जिसमें इंडिया पोस्ट 15000 करोड़ रुपये के घाटे के साथ पहले नंबर पर तथा 8000 करोड़ रुपये के साथ बीएसएनएल दूसरे तथा 5340 करोड़ रुपये के घाटे के साथ एयर इंडिया तीसरे स्थान पर है।
देश मे अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) दयनीय हाल में पहुच गए हैं। कैग (CAG) की रिपोर्ट में चौकाने वाली वाली बात सामने आई है। डूबती सरकारी कम्पनियां बदहाली की नई पटकथा लिख रही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश की 157 सरकारी कंपनिया  1 लाख करोड़ से भी अधिक के घाटे में डूब चुकी हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो तब होता है जब कोई "देश नही बिकने दूँगा" वाले जुमले के साथ सत्ता में हो फिर भी हर साल 30000 करोड़ रुपये का घाटा कंपनियो को हुआ हो।

2014 के पहले के वो दिन कौन भूला होगा जब देश मे एक के बाद एक घोटाले सामने आते थे,रुपया कमजोर होता जा रहा था,लोग अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे थे, बेरोजगारी बढ़ती जा रही थी ,अपराध बढ़ते जा रहे थे, जनता परेशान और हतास थी। ऐसे समय मे एक विकल्प के रूप में गुजरात मॉडल दिखा कर मोदी जी को जनता के सामने लाया गया। न्यूज़ चैनलों ने तो गुजरात को धरती का स्वर्ग बना के पेश किया और मोदी जी के नाम से प्रचार शुरू हुआ जिसमें देश के बढ़े-बढ़े पूंजीपतियों ने खुल के पैसे लुटाए, अपनी प्राइवेट जेट दी और इस तरह कांग्रेस के खिलाफ लहर का फायदा उठाकर मोदी जी को जनता के सामने उनकी सारी समस्याओं के निवारण करने के लिए एक मसीहा के रूप में पेश किया। बहुत कम लोगों ने ये सोचा था कि जो लोग आज मोदी जी को अपना प्राइवेट प्लेन दे रहे, जो बीजेपी को इतनी फंडिंग दे रहे हैं, चुनाव जीतने के बाद बीजेपी उनका एहसान कैसे चुकायेगी। 

मोदी सरकार बनी और उन्होंने वो सभी कार्य करने शुरू किए जिससे उन लोगो को फायदा पहुँच सके जो लोग उनके कुल चुनावी खर्च का 80% लगाए थे। दरअसल पिछले एक दशक से पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था का संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में पूँजीवादी धनकुबेर अपने घटते मुनाफे को हमारी सरकारों की मदद से ही एक-एक करके सरकारी संस्थानों, लोगों की नौकरियों और जिंदगियों को निगल कर पूरा कर रहे हैं।  
   दूसरी तरफ जनता के मूल जरूरतों से उनका ध्यान हटाने के लिए समाज मे जाति, धर्म, क्षेत्र, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर नफरत फैलाई जा रही है। सत्ताधारी लोग अपने शासन को बनाये रखने के लिए समाज मे अराजकता, युद्धोन्माद, अंधराष्ट्रवाद व संप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं, वही दूसरी तरफ पूंजीपति वर्ग के मुनाफे को बरकरार रखने व निरन्तर बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों व जनता की गाढ़ी कमाई को पूंजीपतियों को लूटा रहे हैं। सरकारी कम्पनियों का एक के बाद एक घाटे में जाना इसी बात का उदाहरण है जिसके आंकड़े ऊपर दिये गए हैं। दूसरी तरफ ऊपर के 1% अमीर आबादी के हाथ में 73% (2017) संपत्ति का जाना भी इसी बात का उदाहरण है। 
2017 में किसकी संपत्ति कितनी बढ़ी-
आचार्य बालकृष्ण (पतंजलि) - 173%
गौतम अडानी - 125%
राधाकिशन दमानी - 320%
मुकेश अम्बानी - 78%
कुमार बिरला - 50%
अज़ीम प्रेमजी - 47%
उदय कोटक - 45%
(SOURCE: Hurun India rich list 2017 and Bloomberg-Higher one is taken)
2016 में जय शाह (अमितशाह के पुत्र) की संपत्ति में बढ़ोतरी- 1600000%
 
दूसरी तरफ कुछ निजी कंपनियों का भी दिवालिया होकर बन्द होना बेरोजगारी को बढ़ावा देने में आग में घी का काम कर रहा है। हाल ही में जेट एयरवेज ने अपनी सारी उड़ाने बन्द कर दी जिससे एक पल में 20000 कर्मचारियों की नौकरियां चली गयी। उड़ान बन्द होने के दूसरे दिन सभी कर्मचारी रामलीला मैदान में धरने पर थे, उसी समय पुराने फौजी भी पेंशन की मांग को लेकर धरने पर थे, कुछ दूरी पर तमिलनाडु के किसान भी थे । ये देख कर राहत इंदौरी की ये लाइन याद आ गयी।
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,
यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।
तीन साल पहले जब तमिलनाडु के किसान दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे, विरोध के नए नए तरीके अपना रहे थे तब शायद जेट एयरवेज के कर्मचारी अपने आरामदायक कमरों में बैठकर चिप्स खाते हुए मोदीजी का भाषण सुन रहे थे, किसानों पर हँस रहे थे, जब एसएससी के छात्र दिल्ली में आंदोलन पर थे तब उन्होंने शायद उनकी लड़ाई में दिलचस्पी नहीं ली होगी, किसानों के आंदोलनों को कांग्रेस की साजिश बताने के सरकार के नैरेटिव को शायद सही माना होगा पर यह आज जब आग उनके घरों तक भी पहुँची तो उनको भी सड़क पर उतरना पड़ रहा है। 
कोई सहज ही समझ सकता है कि ये देश का कौन सा विकास है जिसमें बेरोजगारी बढ़ रही है, नौकरियां छीनी जा रही हैं, किसान मर रहे है, महिलाएं असुरक्षित हैं, छात्रों की फीस रिकार्ड तोड़ बढ़ रही है। ऐसे में कौन है जिसकी सम्पति कई गुना बढ़ रही है? मोदी जी किसके चौकीदार रहे हैं, जिनकी दौलत बढ़ रही है या जिसकी नौकरी जा रही है? देश की मेहनतकश जनता को इस सवाल पर सोचने की जरूरत है।

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