22 April 2019

ब्लैकहोल की पहली फोटो की कहानी : प्रकाश किरण भी जहाँ से वापस नहीं लौट सकती।

90 के दशक में MIT के एक शोध छात्र के रूप में शेफर्ड डॉयलमैन (Shepherd Doeleman) ने यह कल्पना की थी कि क्या ब्लैकहोल की तस्वीर खींचीं जा सकती है? उस समय यह एक असंभव सी चीज थी। अब तक ब्लैकहोल का जिक्र सिर्फ किताबों और सिद्धान्त में ही होता आया था। आगे चलकर इन्हीं डॉयलमैन ने 20 देशों के रिसर्च संस्थाओं और वैज्ञानिकों की एक टीम तैयार की और इसके लिए 40 मिलियन डॉलर भी जुटाए। इन सबके प्रयास से ही यह उपलब्धि हासिल हो सकी।
 
 

✍️ विकास गुप्ता

गत 10 अप्रैल को वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल की पहली फोटो जारी की जो काफी चर्चा में रही। "इवेंट होराइजन टेलिस्कोप" के नाम दुनिया के कई देशों की संयुक्त टीम द्वारा यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया। इसी के साथ विज्ञान अंतरिक्ष को अधिक गहराई से जानने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया। इस लेख में हम ब्लैक होल के बारे में और उसकी खोज होने से लेकर उसकी पहली फ़ोटो खींचे जाने तक कि यात्रा पर संक्षेप में बातचीत करेंगे।
 
ब्लैकहोल की पहली फोटो की कहानी 
 
      "ब्लैक होल" (Black hole) यानि 'कृष्ण विवर' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वैज्ञानिक जॉन व्हीलर ने सन 1969 के करीब किया था। जॉन व्हीलर ने जिस प्रस्थापना का वर्णन करने के लिए ब्लैक होल शब्द का निर्माण किया था वह प्रस्थापना कम से कम दो सौ साल पुरानी है। उस समय प्रकाश के बारे में दो सिद्धान्त प्रचलित थे:- पहला सिद्धांत जिसके पक्षधर न्यूटन थे, यह था कि प्रकाश कणों से बना हुआ है जिसे कणिका सिद्धान्त भी कहा जाता है। दूसरा सिद्धान्त यह था कि प्रकाश का रूप कण नही तरंग है। हम आज यह जानते हैं कि वास्तव में दोनों सिद्धान्त सही हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) के अनुसार प्रकाश को कण और तरंग की द्वैतता (Duality) यानी प्रकाश को कण तरंग दोनों रूप में माना जाता है। प्रकाश के कण को फोटॉन (Photon) बोला जाता है।  इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रकाश पर गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational force) का महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। इसी धारणा पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मिशेल ने 1783 के अपने शोध पत्र में लिखा, जिसमें उन्होंने इस ओर ध्यान आकर्षित किया कि ऐसे तारे, जो पर्याप्त रूप से सघन (Highly dense) हों, उनका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र इतना प्रबल होगा कि यह प्रकाश की किरण को बाहर नही निकलने देगा। तारे के पृष्ठ तल से उत्सर्जित कोई भी प्रकाश बहुत दूर जाने से पहले ही तारे के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा वापस खींच लिया जाएगा। यही वे पिंड है, जिन्हें अब हम कृष्ण विवर या ब्लैक होल के नाम से जानते हैं। ब्लैक होल एक अत्यधिक घनत्व वाला पिंड (यानी बहुत ही कम आयतन में बहुत ज्यादा द्रव्यमान) हैं, जिसका गुरुत्वाकर्षण बल इतना प्रबल होता है कि जिसके प्रभाव के कारण प्रकाश किरणों का बच पाना भी संभव नही होता है। भारतीय वैज्ञानिक चंद्रशेखर ने यह गणना की कि हमारे सूर्य से लगभग डेढ़ गुना अधिक द्रव्यमान का कोई अतप्त तारा (Cold Star) अपने ही गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध स्वयं को नही संभाल सकेगा फलस्वरूप संकुचित होकर ब्लैक होल बन जायेगा। विज्ञान में इसे अब "चंद्रशेखर सीमा" (Chandrashekhar Limit) के नाम से जाना जाता है। जैसा कि हम जानते हैं कि न्यूटन ने बताया था कि ब्रह्मांड के सभी पिंड एक दूसरे से गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा आकर्षित होते हैं। फिर बाद में 1915 में आइंस्टीन ने अपने साधारण सापेक्षता के सिद्धांत (General Theory of Relativity) में बताया कि भारी पिंड अपने आस पास के चार आयाम (लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई और समय) जिसे स्पेस टाइम के नाम से जाना जाता है, को विकृत करते हैं यह विकृति हमें गुरुत्वाकर्षण के रूप में महसूस होती है। उदाहरण के लिए जैसे एक भारी लोहे की गेंद को चादर पर रखें तो वह चादर को विकृत (Deform) कर देता है और पास रखे छोटे कांच की गेंद को अपनी तरफ खींच लेता है। अपने इसी सिद्धान्त के आधार पर ब्रह्मांड की विस्तृत व्याख्या करते हुए आइंस्टीन ने ब्लैकहोल के होने का पूर्वानुमान लगाया था जिसे अब हम जान चुके हैं।
 इसके बाद वैज्ञानिक जॉन व्हीलर ने सन 1960 के दशक में इसपर काम किया था। उन्होंने ही इसको ब्लैकहोल नाम भी दिया। 90 के दशक में MIT के एक शोध छात्र के रूप में शेफर्ड डॉयलमैन (Shepherd Doeleman) ने यह कल्पना की थी कि क्या ब्लैकहोल की तस्वीर खींचीं जा सकती है? उस समय यह एक असंभव सी चीज थी। अब तक ब्लैकहोल का जिक्र सिर्फ किताबों और सिद्धान्त में ही होता आया था। आगे चलकर इन्हीं डॉयलमैन ने 20 देशों के रिसर्च संस्थाओं और वैज्ञानिकों की एक टीम तैयार की और इसके लिए 40 मिलियन डॉलर भी जुटाए। इन सबके प्रयास से ही यह उपलब्धि हासिल हो सकी। ब्लैकहोल को देखने का एक ही तरीका यह हो सकता था कि उसकी छाया को कैप्चर किया जाय। इसके लिए सीधे फोटो लेने की बजाय ब्लैकहोल के अदृश्य कंटूर्स से निकलने वाले वैद्युत चुम्बकीय सिग्नल्स को कैप्चर किया गया। इन सिग्नल्स के डेटा को इमेज बनाने वाले अल्गोरिथम से गुजारने के बाद हमें यह आभासी फोटो (Virtual image) प्राप्त हुई। 

ब्लैक होल की सरंचना

जैसा कि बताया जा चुका है ब्लैकहोल का घनत्व बहुत ही अधिक होता है। ब्लैकहोल के अंदर सारा द्रव्यमान एक छोटे क्षेत्र में सीमित होता है जिसे केंद्रीय सिंगुलैरिटी (Central Singularity) कहते हैं। ब्लैकहोल का बाहरी गोलीय आवरण जो सिंगुलैरिटी के पास होता है और जिसे पार करने के बाद प्रकाश और ऊर्जा ब्लैकहोल के गुरुत्वाकर्षण से बच नही सकते है उसे घटना क्षितिज (Event Horizon) कहा जाता है। ब्लैक होल के निकट उष्ण प्लाज्मा से उत्सर्जित फोटॉन जो गुरुत्वाकर्षण के कारण मुड़ कर एक बलय बनाते है इसे फोटॉन गोला (Photon Sphere) कहा जाता है। ब्लैकहोल का गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक होता है कि अपने आस पास किसी भी पिंड को अपने अंदर खींचने लगता है। जब ब्लैकहोल किसी तारे या अन्य पिंड को अपने अंदर खींचता है तो परमाण्विक कणों और विकिरण की एक तेज़ धारा चलती है जिसे रेलटिविस्टिक जेट कहा जाता है। विज्ञान यह जानने में सक्षम हुआ है कि हमारा ब्रह्माण्ड ब्लैकहोलों से भरा हुआ है। ब्लैक होल हमारे ब्रह्मांड को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आने वाले समय में ब्लैकहोल पर हुए रिसर्च हमें ब्रह्माण्ड के बारे में और अधिक रोचक जानकारी प्रदान करेंगे।

10 अप्रैल 2019 का ऐतिहासिक दिन

हम भले ही ब्लैकहोल के बारे दशकों से जानते हों, लेकिन  इसकी वास्तविक तस्वीर हमने अभी तक नहीं देखी थी। जो तस्वीर हमारे सामने पेश किए जाते रहे हैं वो कंप्यूटर ग्राफ़िक्स द्वारा बनाये गए काल्पनिक चित्र होते थे। 10 अप्रैल 2019 को अंतरीक्ष वैज्ञानिकों ने ब्लैकहोल की पहली तस्वीर जारी की। यह ब्लैकहोल आकाशगंगा एम 87 के केंद्र में है जो हमसे 53.5 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है। अंतरीक्ष वैज्ञानिकों ने जिस टेलिस्कोप की सहायता से ब्लैकहोल की तस्वीर जारी की है  उसका नाम इवेंट होरिज़ॉन (Event Horizon) टेलिस्कोप है और इस प्रोजेक्ट का भी नाम यही था। मूल रूप से अंतरीक्ष वैज्ञानिक हमारी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैकहोल सेजेटेरियस A (A*) का वास्तविक चित्र भी जारी करने वाले थे लेकिन तकनीकी कारणों से नही कर पाए।
इवेंट होरिज़ॉन टेलिस्कोप (EHT) एक अकेला टेलिस्कोप नही है बल्कि यह आठ अलग अलग रेडियो दूरदर्शियों का नेटवर्क है जो वेरी लांग बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री (Very Long Baseline Interferometry, VLBI) तकनीकी पर काम करता है। इसके कार्य को सटीक और एक साथ करने के लिए परमाणु घड़ियों का प्रयोग किया गया है। यह आठ रेडियो दूरदर्शियों का नेटवर्क संयुक्त रूप से हमारी पृथ्वी से भी बड़े दूरदर्शी (Telescope) का निर्माण करते हैं। इन आठ दूरबीनों से प्राप्त आंकड़ो को एक ही स्थान पर मिलाया जाता है, इन आंकड़ो की साइज पेटाबाइट (Petabyte) में होती है जिसे इंटरनेट से भेजा नही जा सकता इसलिए इन आंकड़ो को हार्डडिस्क में लोड कर के हवाई जहाज से भेजा जाता है। जब सभी आंकड़ो को एक स्थान पर प्राप्त कर लिया गया तो उसके बाद सुपर कंप्यूटर की सहायता से इमेज प्रोसेसिंग तकनीकी का प्रयोग करके ब्लैकहोल का तस्वीर प्राप्त किया गया। इस तस्वीर को पाने में वैज्ञानिकों को लगभग दो साल का समय लगा।
आकाशगंगा एम 87 के केंद्र में हमने जिस ब्लैकहोल की तस्वीर देखी है दरअसल वो उस ब्लैकहोल के इवेंट होरिज़ॉन और फोटॉन गोला की तस्वीर है। इस ब्लैकहोल का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 6.5 अरब गुना और इसका व्यास 38 अरब किलोमीटर है।

मानव इतिहास में पहली बार वैज्ञानिकों ने ब्लैकहोल की वास्तविक तस्वीर जारी की है और इस तरह 10 अप्रैल विज्ञान जगत में एक ऐतिहासिक दिन बन गया। इस चित्र से ब्रह्माण्ड के सबसे रहस्यमय पिंड ब्लैकहोल के बारे और जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी और इसके साथ ही आकाशगंगाओ की उत्पत्ति और ब्रह्माण्ड के बारे भी कई रोचक जानकारी मिलेगी।

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