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16 April 2019

आप राजनीति में रुचि रखें या न रखें राजनीति आपमें जरूर रुचि रखती है।

Credit : www.cartoonmovement.com
(विश्व में हमारा सम्मान केवल हमारे प्रधानमंत्री को देखकर या हमारी जीडीपी को देखकर नहीं हो सकता। देश केवल नेताओं और पूंजीपतियों से नहीं बनता, देश यहाँ की करोड़ों किसानों, मज़दूरों, कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं से बनता है। देश के विकास में अगर इनकी गिनती न हो तो वह विकास धोखा है। अगर देश के बहुसंख्यक आम जनता आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, बेघरी और महंगाई की चक्की तले पिस रही है तो हमें मानना होगा कि विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के कोई मतलब नहीं है। जब हमें यह पता चलता है कि विश्व भूख सूचकांक में लगातार हमारी रैंकिंग खराब हो रही है और भुखमरी से होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं तो क्या विश्व मे हमारा नाम "ऊँचा" करने के लिए हम अपने सरकारों की पीठ थापथपाएँगे?)

✍🏼 चंद्रसेन सिंह

 बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि हमको राजनीति से क्या लेना-देना, हमें तो अपना काम करना चाहिए। सारे नेता या "प्रबुद्धजन" छात्रों को राजनीति से दूर रहने की भी हिदायत देते हैं। दरअसल यह राजनीति ही है जो हमारे जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। राजनीति का लोगो के साथ किस प्रकार का संबंध है? तथा वह लोगो को किस प्रकार प्रभावित करती है? कई बार लोग ऐसे क्यों सोचने लगते हैं जैसा कि राजनीति  के ठेकेदार उनसे सोचवाना चाहते हैं? क्यों राजनीति में आज कल लोग अंधभक्त बनते जा रहे? ऐसे कई सवाल राजनीति से ही जुड़े हुए हैं। 

वास्तव में हमारी प्लेट में हम क्या खाएंगे, हमको दाल नसीब होगी कि नहीं, हम गैस भरवा पाएंगे कि नहीं, हम पम्पिंग सेट में डीजल भरकर अपने खेत की सिंचाई कर पाएंगे या नहीं, हमारा बेटा अच्छे कॉलेज में पढ़ पायेगा या नहीं, हमको रोजगार मिल पायेगा या नहीं, हमको सही इलाज मिल पायेगा कि नहीं यह सबकुछ राजनीति से तय होता है। हम राजनीति  से भाग नहीं सकते। हम राजनीति में रुचि लें या न लें राजनीति हममें जरूर रुचि लेती है। 
राजनेता और प्रसिद्ध विद्वान सी.  राजगोपालाचारी कहा करते थे कि राजनीति किसी देश का चरित्र होता है जो पूरी  दुनिया में उसके निवासियों का सम्मान निर्धारित करता है ।
लेकिन भारत में आजकल इतने निचले स्तर की राजनीति की जा रही है कि लोगो का राजनीति पर से विश्वास उठना स्वभाविक है। पर राजनीति से नाक-भौं सिकोड़ना क्या आम जनता के हित में है? अगर राजनीति बुरे लोगों का अखाड़ा बन चुकी है तो राजनीति के इस बिगड़ते स्वरूप को कैसे ठीक किया जा सकता है इसके बारे में हम लोग क्यो नही सोचते हैं?
विश्व में हमारा सम्मान केवल हमारे प्रधानमंत्री को देखकर या हमारी जीडीपी को देखकर नहीं हो सकता। देश केवल नेताओं और पूंजीपतियों से नहीं बनता, देश यहाँ की करोड़ों किसानों, मज़दूरों, कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं से बनता है। देश के विकास में अगर इनकी गिनती न हो तो वह विकास धोखा है। अगर देश के बहुसंख्यक आम जनता आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, बेघरी और महंगाई की चक्की तले पिस रही है तो हमें मानना होगा कि विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के कोई मतलब नहीं है। जब हमें यह पता चलता है कि विश्व भूख सूचकांक में लगातार हमारी रैंकिंग खराब हो रही है और भुखमरी से होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं तो क्या विश्व मे हमारा नाम "ऊँचा" करने के लिए हम अपने सरकारों की पीठ थापथपाएँगे? हम जब सुनते हैं भारत भ्रष्टाचार के मामले में एशिया का सबसे भ्रष्ट देश बन चुका है तो क्या यह भी हमारे देश का सम्मान ऊँचा करता है? जब हम सुनते हैं कि विश्व प्रसन्नता सूचकांक में भारत का स्थान (156 देशों में 133वां)  हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी खराब है तो हमें कैसा लगता है? दुनिया मे भारतीय मीडिया की साख लगातार गिर रही है, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 2018 में 156 देशों में 138वां हो चुका है। 
विश्व भूख सूचकांक में भारत का स्थान
2014 में 99वां
2015 में 93वां
2016 में 97वां
2017 में 100वां
2018 में 103वां
 भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का स्थान  
168 देशो की सूची में 
 2015 में 76 वां 
 2016 में 79 वां
 2017 में 81वां
 2018 में 78 वां है। 
इसी प्रकार 
मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 
188 देशो की सूची में
2015 में 130 वां
2016 में 131 वां
2017 में 130 वां
2018 में 130 वां
 इस प्रकार की रैंकिंग को देखकर हम अपने आप को कितना सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करते होंगे? जिससे हमारा और हमारे देश की जनता का भविष्य तय होना है उस रैंकिंग में हम इतना पीछे कैसे रह गये? क्या इसके लिए हमारा राजनीति से दूर रहना जिम्मेदार नहीं है? क्या अपने जनप्रतिनिधियों से हमनें इन मुद्दों को उठाया? 
2014 के लोक सभा चुनाव में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, काला धन, बेघरी जैसे मुद्दों को लेकर काफी चर्चा हुई थी ,तथा भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे , बेरोजगारी खत्म करेंगे, कालाधन वापस लायेंगे,   खुशहाली आयेगी जैसे वादे किए गए थे । पर न तो बेरोजगारी गई (उल्टा बढ़ गयी) , न ही भ्रष्टाचार खत्म हुआ, न काला धन आया और न ही ख़ुशहाली आई।  ऊपर के सारे सूचकांकों को देखे तो पता चलेगा कि पांच वर्ष पहले जैसा भारत था आज भी लगभग वैसा ही है या उसने खराब हालत में ही गया है। इसके बावजूद आज सवाल पूछने वालों से ज्यादा सरकार की भक्ति करने वालों की संख्या है। सरकार की भक्ति, चाहे वो कोई भी सरकार हो, लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। सवाल उठाना ही जनतंत्र को मजबूत करना है, सवाल उठाना ही तानाशाही पर वार करना है।
आज हमारी राजनीतिक उदासीनता ने भारत की राजनीति को कहा ला खड़ा किया है, इसकी कुछ बानगियाँ देखते हैं- 
 
(1) राजनीति का व्यवसायिकरण
 यदि हम भारत की राजनीति को थोड़ा गहराई से देखें और समझें तो हमें पता चलेगा कि राजनीति पूर्णतः व्यवसाय बन चुकी है। प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने कहा था कि राजनीति दो प्रकार से की जाती है - कोई राजनीति के लिए जीता है या राजनीति पर जीता है। आज राजनीति पर जीने वालों की संख्या राजनीति के लिए जीने वालो की संख्या से काफी अधिक है , राजनीति के लिए जीने वाले लोगो की संख्या नाममात्र की रह गई है ।
 भारत मे अजादी के बाद मुठ्ठीभर अमीर लोगों की सेवा ही राजनीति का मुख्य पहलू बन गया। पार्टियों की फंडिंग बड़े बड़े पूंजीपति, धन्नासेठ करने लगे और सरकार की नीतियाँ इनके मुनाफे को ध्यान में रखकर बनने लगीं। राजनीति एक व्यवसायिक निवेश बन चुका है, बड़े बड़े पूंजीपति तमाम दलों में से एक को चुनते हैं, उनका मीडिया जोर-शोर से उस दल का प्रचार करते हैं और फिर चुनाव जीतने के बाद इन पूंजीपतियों को कहीं मुफ्त में ज़मीन तो कहीं कर्ज़ माफी तो कहीं सरकारी ठेकों से नवाजा जाता है। 
आज के समय मे राजनीति का व्यवसायिकरण इस हद तक बढ़ गया है कि छोटे से छोटे गांव के प्रधान के चुनाव में भी लोग 5 से 10 लाख रुपये खर्च कर दे रहे हैं। अब 10 लाख रुपये जो खर्च किये है वह तो उनका मूलधन है। वह जब तक  50 लाख रुपये व्याज सहित मिश्रधन नही निकाल लेंगे तब तक उन्हें गांव में कोई काम नजर नही आएगा। यदि उच्च स्तर के चुनाव की बात करें तो आप को टिकट पाने के लिए पहले करोड़पति होना पड़ेगा। तभी तो आप चुनाव में करोड़ो रूपये लगाएंगे और बाद में ब्याज सहित अरबो रुपये निकालेंगे। 

(2) राजनीति में अपराधियों का बढ़ता ज़ोर
तमाम पार्टियों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की भरमार बढ़ती जा रही है। इसके कई कारण है, पहला तो यह है कि इसके लिए हमारे देश मे अभी तक कोई ठोस कानून नही बन पाया है ,और इसकी उम्मीद भी कम है क्योंकि हमारे देश मे जो कानून निर्माता है उन्हीं में से 35% से अधिक के ऊपर हत्या, बलात्कार, दंगा भड़काने, घोटाले जैसे गंभीर अपराधों के आरोप लगे हैं। वह ऐसा कानून बनाने के बारे में कैसे सोचेंगे जिससे खुद उनका पूरा अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा? 
2018 में देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था की यदि किसी व्यक्ति के ऊपर आरोप निर्धारित हो चुके हैं लेकिन अभी सजा नही हुई, ऐसा व्यक्ति लोकसभा व विधानसभा का चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने का क़ानून सुप्रीम कोर्ट नही अपितु पार्लियामेंट बना सकती है और कोर्ट ने देश की संसद को इस बारे में कानून बनाने को भी कहा। जबकि इसपर कानून कुछ और ही बना। कानून यह बना की कोई व्यक्ति कितने भी अपराध क्यों न किया हो जब तक उसका अपराध साबित नही हो जाता तब तक वह चुनाव लड़ सकता है और यदि अपराध साबित भी हो जाता है और उसे 2 वर्ष की सजा हो जाती है तो वह अगले 6 वर्ष तक चुनाव नही लड़ सकता है। 6 वर्ष बाद वह फिर चुनाव लड़ सकता है। शायद वह अपराधी व्यक्ति 6 वर्ष बाद संत बनकर लौटेगा।

लोकतांत्रिक संस्थाओ में अपराधियों की भरमार बढ़ने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है पार्टीवाद की राजनीति। पार्टीवाद की राजनीति से मतलब है कि यदि हम कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा इत्यादि पार्टियों के समर्थक है तो हम उनका या उनके स्थानीय नेता का विरोध नही करते हैं, चाहे वे लाख गलतिया क्यों न करें, हम पार्टी का चेहरा देखकर या उसका नेतृत्व देखकर उससे चिपके रहते हैं। इसी कारण पार्टियां अपराधियों, बलात्कारियों, दंगाइयों या राजनीति से बिल्कुल मतलब न रखने वाले फ़िल्म कलाकारों, क्रिकेटरों को भी चुनाव मैदान में उतार देती है। उन्हें पता है कि इंडिया के लोग अंधभक्ति में डूबे हुए है ,वे पार्टी के उम्मीदवार को कम पार्टी को ज्यादा ध्यान में रखते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि भक्ति किसी की भी न कि जाय, सवाल सबसे पूछे जाएँ, अगर हमारी पार्टी कोई गलत उम्मीदवार खड़ा करती है तो हम खुद इसके विरोध में खड़े हों। पार्टीयों से यह मांग की जाय कि कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाकर उम्मीदवार का निर्णय लिया जाय, न कि बंद कमरों की मीटिंगों में। और वादा किया हुआ काम न होने पर हमने जिसको वोट दिया है उससे हमे प्रश्न करने चाहिए हमे उसके ऊपर जनदबाव बनाना चाहिए और अगर इसपर भी अगर चयनित नेता हमारी बात नहीं सुनता है तो अगले चुनावों में उस नेता का बहिष्कार करना चाहिए। 

इसी तरह केवल उम्मीदवार की जाति देखकर वोट देना भी उतना ही ख़तरनाक है। इसी जातिवादी मानसिकता को ध्यान में रखते हुए सभी पार्टियां अपने उम्मीदवार खड़े करती हैं। जीतता कोई भी है पर न तो जनता को कुछ मिलता है ना ही उस नेता के जाति वालों को। एक प्रसिद्ध कथन इस संदर्भ में काफी प्रासंगिक है- जंगल मे पेड़ खत्म हो रहे थे और सारे पेड़ कुल्हाड़ी को वोट कर रहे थे क्योंकि कुल्हाड़ी में लगी लकड़ी उनकी जाति की थी।
आज इसबात की बेहद जरूरत है कि पार्टीवाद और जातिवाद के नाम पर वोट न किया जाय।

(3) ध्रुवीकरण की राजनीति
आज कल के राजनीतिक परिणामों को देखकर ऐसा लगता है कि राजनैतिक परिणाम जनता के मुद्दे और सरकार के कामों पर कम निर्भर करते है बल्कि जुमले और ध्रुवीकरण की राजनीति पर सबसे अधिक निर्भर करते हैं। जो जितना अधिक ध्रुवीकरण कर लेगा जो जितना अधिक जुमलेबाजी कर लेगा उनका परिणाम भी उतना ही अच्छा होगा। मौजूदा भाजपा सरकार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 
जातिवादी राजनीति हो या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति 
या राष्ट्रवाद के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति, बहुमत के समुदाय के बीच एक असुरक्षा का वातावरण पैदा कर बीजेपी काफी चालाकी से अपनी चुनावी नैया पार कराने में सफल होती रही है। हिंदुओं का अस्तित्व मिट जाएगा, हिन्दू संस्कृति खतरे में है, 2050 तक भारत इस्लामिक हो जाएगा, पाकिस्तान, आतंकवाद आदि मुद्दे उभाड़कर लोगों की भावना का दोहन करने में बीजेपी-आरएसएस ने काफी सफलता पाई है।  पर जैसा कि ध्रुवीकरण की राजनीति के साथ होता है, उसका उस सम्प्रदाय की रक्षा या संस्कृति रक्षा से कुछ लेना देना नहीं होता है, इसका असली उद्देश्य बांटों और राज करो कि अंग्रेजों की नीति का अनुसरण करके सत्ता हासिल करना ही होता है। इसलिए आज साम्प्रदायिक-जातिगत ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद से भी बचने की जरूरत है। भावना की जगह तर्क को सबसे ऊपर रखने की जरूरत है। भगतसिंह ने कहा था कि साम्प्रदायिक दंगों का इलाज लोगों की आर्थिक दशा में सुधार है इसलिए आज हमें अपने वास्तविक मुद्दों जैसे बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, महँगाई, बेघरी, कम उम्र में मौतें आदि मुद्दों को सबसे पहले उठाने की जरूरत है और वोट मांग रहे नेताजी से यह पूछने की जरूरत है कि जाति-धर्म रक्षा तो सब ठीक है पर आप इन मुद्दों पर क्या करने वाले हैं?

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