10 April 2019

लोकतंत्र को खतरा आज उसके चौकीदारों से है।


✍🏼 कौशिक 

हाल ही में यह बात सामने आई है कि ज़ी कंपनी से जुड़े चैनलों द्वारा प्रसारित कार्यक्रमों में अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार का प्रचार किया जा रहा है। यह टीवी कार्यक्रम जिनमें एक AND TV पर  "भाभीजी घर पर हैं" व दूसरा ZEE TV पर आने वाला कार्यक्रम "तुझसे है राबता" हैं। ये कार्यक्रम अपने कंटेंट में मोदी सरकार का प्रचार करके आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। ज्ञात हो कि ये दोनों चैनल ज़ी एंटरटेनमेंट इंटरप्राइजेज से जुड़े हैं जिसके मालिक बीजेपी समर्थित राज्यसभा सांसद सुभाष चंद्रा हैं। इसके कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NAMO TV लांच किया। वैसे नमो टीवी की कोई जरूरत नहीं थी जब पहले से ही मुख्यधारा मीडिया सरकार का दरबारी कवि बन चुका है। यही नहीं, चुनाव शुरू होने ठीक समय, 11 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फ़िल्म आ रही है। चुनाव के ठीक पहले इस तरह की तमाम चीजें किस ओर इशारा कर रही हैं?? 

    मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा गया है, क्या आज यही बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है? क्या वर्तमान परिस्थितियों में लोकतंत्र की मूल आत्मा पर ही आघात नहीं हो रहा है?

लोकतंत्र का मूल आधार इस बात में निहित है कि लोग स्वतंत्र रूप से अपने नेता का चुनाव कर सकें। "स्वतंत्र" रूप से चुनने का मतलब है - बिना किसी बाहरी दबाव के, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपनी मर्ज़ी से अपना विकल्प चुनना। क्या यह अधिकार आज सुरक्षित है?
  वैसे यह बात स्पष्ट करना जरूरी है कि पहले से ही हमारे पास चुनने के लिए कुछ खास विकल्प मौजूद नहीं हैं। आज जनता इस बात को अच्छी तरह से समझती है कि चाहे वो किसी नेता को भी चुन लें, अगले 5 साल वो फिर मुहँ दिखाने नहीं आएगा। वर्तमान पार्टियों में करोड़पति, अपराधिक पृष्टभूमि के, हत्या, आगजनी व बलात्कार के आरोपी नेता बड़े पैमाने पर मौजूद हैं।
  इसके बावजूद आज जिस तरह लोगों के दिमाग पर नियंत्रण करने की कोशिश की जा रही है वह "स्वतंत्र चुनाव" की आत्मा पर ही हमला है। लोग अपनी सोच के अनुसार ही निर्णय लेते हैं और लोगों की सोच बनती है उनके आसपास के माध्यमों जैसे कि अखबार, टीवी मीडिया, सोशल मीडिया, किताबें, फिल्में, धारावाहिक इत्यादि। अगर कोई पार्टी या सरकार इन सब पर नियंत्रण कर ले तो वह यह तय कर सकती है कि लोग क्या सोचें और क्या नहीं सोचें, लोग किन मुद्दों पर बहस करें और किन मुद्दों को भूल जायें। 

सरकार ⬅ स्वतंत्र निर्णय ⬅ स्वतंत्र सोच ⬅ लोगों की जानकारी के स्रोत 

आज पीआर एजेंसी और आईटी सेल का बढ़ता इस्तेमाल उसी खतरे का एक और पहलू है। इंडियन आर्मी के नाम से सैकड़ों फेसबुक पेज बीजेपी आईटी सेल के लोग चला रहे, फिल्मी सितारों के नाम से, शायरी, जोक्स और चुटकुला आदि नामों से पेज व ग्रुप बनाकर उसमें एकतरफा तरीके से चीजों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे एक गुलाम सोच वाले समूह का निर्माण हो रहा है। अगर कोई व्यक्ति किसी पार्टी के आईटी सेल के पेज लाइक कर देता है व वाट्सएप्प पर भी उन्हीं विचारों वाले ग्रुप से जुड़ जाता है तो बहुत संभव है की उसकी सोच किसी पार्टी की गुलाम बन जाएगी। फेसबुक और यूट्यूब का अल्गोरिथम उसको ऐसे ही पोस्ट या वीडियो रिकमेंड करेगा जो उसकी सोच को और पुख्ता बनाएंगे। ऐसे में एकतरफा जानकारी के कारण हो सकता है कि वह किसी पार्टी का कट्टर समर्थक बन जाये और किसी अन्य पार्टी का कट्टर विरोधी। फिलहाल हम मूल मुद्दे पर आते हैं। 

सच और प्रचार में जो फर्क होता है उसे अगर समाप्त कर दिया जाये तो लोगों को काफी आसानी से गुमराह किया जा सकता है। उदाहरण के लिए आप टीवी विज्ञापन में सुनते हैं कि  "डॉक्टरों ने पाया है कि फला साबुन 99% कीटाणुओं को समाप्त कर देता है।" तो उसकी विश्वनीयता उतनी नहीं होती, जबकि यही अगर किसी न्यूज़ चैनल पर खबर के रूप में बताया जाए कि "डॉक्टरों ने पाया है कि फला साबुन 99% कीटाणुओं को साफ कर देता है।" तो इसकी विश्वनीयता काफी ज्यादा होती है। फिल्मों और धारावाहिकों के पहले यह डिस्क्लेमर इसी लिए दिखाया जाना जरूरी होता है कि इस घटना के सभी पात्र काल्पनिक हैं या यह फ़िल्म सही घटनाओं पर आधारित है (यानी पूरी सही नहीं है, बस आधारित है)। इसके बावजूद फिल्मों का और अन्य दृश्य माध्यमों का काफी गहरा असर हमारे दिमाग पर पड़ता है क्योंकि एक तरीके से उस चीज को हमनें अपनी आँखों से देखा, कानों से सुना होता है, एक तरीके से उसे जीया होता है। ऐसे में डिस्क्लेमर का एक हद तक ही असर होता है खासतौर पर राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों,घटनाओं और व्यक्तियों पर बनी फिल्मों में डिस्क्लेमर का खास मतलब नहीं रह जाता। लोगों ने जो अपनी आँखों से देखा है, जो कानों से सुना है वो (झूठ या सच) उनके दिमाग में लंबे समय तक अंकित रहता है। आज जिस तरह सरकार या पार्टी के प्रचार को फिल्मों, धारावाहिकों के माध्यम से पहुँचाया जा रहा है वह इसीलिए खतरनाक है। मीडिया द्वारा सरकार का प्रचार करना और विपक्ष से सवाल पूछना इसीलिए ख़तरनाक है।  यह लोगों के दिमाग को नियंत्रित करने जैसा है। 

इसीलिए चुनावों के दौरान चुनाव आयोग की और सरकार के 5 सालों के दौरान सुप्रीम कोर्ट की भूमिका एक रेफरी की तरह होती है ताकि कोई फ़ाउल न खेले। पर अगर कोई इन संस्थाओं पर ही नियंत्रण कर ले तो वो फ़ाउल खेलते हुए हमेशा जीतता ही रह सकता है।

(नोट- यह लेख प्रकाशित होने तक रेफरी ने अपनी भूमिका निभाते हुए प्रधानमंत्री की बायोपिक के रिलीज होने पर चुनाव की समाप्ति तक रोक लगा दी है। )

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