01 April 2019

काँग्रेस की बहुचर्चित "न्याय" के पीछे खड़े दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री क्या चाहते हैं?



✍️ राघवेंद्र तिवारी

(इसमें दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से भी सलाह लिया गया है, जिनमें थॉमस पिकेटटी, नोबेल प्राइज से पुरस्कृत अंगुस डिटॉन, रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी का नाम मुख्यतः लिया गया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है।)

चुनावो का मौसम हो और वादों और घोषणाओं की बारिश ना हो ऐसा कहीं हो सकता है। चुनाव आते ही कोई 15 लाख देने की, कोई गरीबों को पेंशन तो कोई मानधन योजना देकर गरीबी खत्म करने का ढोल पीटने लगते हैं। हाल ही में राहुल गाँधी ने भी इसी तरह का एक शिगूफा उछाला है। "न्याय" के नाम की इस योजना में यह दावा किया जा रहा है कि देश के 5 करोड़ गरीब परिवारों को हर साल 72000₹ की न्यूनतम आय की सहायता दी जाएगी। इससे करीब 25 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे।  राहुल गाँधी ने कहा कि मोदी सरकार ने उद्योगपतियों का डूबा कर्ज़ माफ करने के लिए कई लाख करोड़ रुपया दिया है, कांग्रेस  गरीबों के लिए ये पैसा खर्च करेगी। राहुल गांधी ने इसे गरीबी पर  सबसे बड़ी "सर्जिकल स्ट्राइक" कहा है। इसके पहले बीजेपी सरकार ने भी गरीब किसानों को सालाना 6000 रुपये देने की घोषणा की थी। इन पार्टियों से ये तो पूछना ही चाहिए कि खुद को गरीबों की मसीहा बताने वाली ये पार्टियाँ बेरोजगारी, ठेका प्रथा, न्यूनतम वेतन को बढ़ाने और समान काम समान वेतन पर क्यों नही मुंह खोल रहीं? जो किसान पूरे देश का पेट भर रहा है, जो मज़दूर सुई से लेकर विमान तक बना रहा है, जो कर्मचारी दिनरात मेहनत करके पूरा सिस्टम चला रहा है, जो मेहनतकश वर्ग सीमाओं से लेकर अंदर तक देश की हर गतिविधि संचालित कर रहा है, उसे ये नेता और पार्टियाँ साल में 6000 या 72000 देकर असहाय और लाचार ही क्यों रहने देना चाहते हैं? केवल वोट के लिए? क्या कारण है कि ये नेता ऐसे भत्ते बाँटने की बात तो करते हैं लेकिन मज़दूरों की मेहनत का पूरा दाम देने को तैयार नही हैं? इन सवालों पर चर्चा किये बिना हम इन पार्टियों और इनके नेताओ का चरित्र नही समझ सकते।
राहुल ग़ांधी और कांग्रेस पार्टी ने दावा किया है कि न्याय योजना के लिए वो पिछले 6 महीने से बिना शोर-शराबे के काम कर रहे थे और इसमें दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से भी सलाह लिया गया है, जिनमें थॉमस पिकेटटी, नोबेल प्राइज से पुरस्कृत अंगुस डिटॉन, रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी का नाम मुख्यतः लिया गया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है।  इस योजना में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगो को 72000 रुपये सालाना बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। इस योजना में सरकारी खजाने पर करीब 3.6 लाख करोड़ खर्च आएगा। इसपर भी कई अर्थशास्त्री और वाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर अर्थशास्त्र के प्रोफेसर यह राग अलापने लगे हैं कि अमीर लोगों के टैक्स का पैसा गरीबों पर क्यों उड़ाया जा रहा है? इस मामले के अलग अलग पहलुओं पर हम अपनी बात रखेंगे- 

1. देश केवल अमीरों के पैसे से नहीं चलता
पहली बात तो यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कुछ लोगों को यह भ्रम रहता है कि देश मे केवल अमीर लोग टैक्स देते हैं जिससे देश चलता है। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। सरकार को जो आय होती है उसमें प्रत्यक्ष (आयकर, निगम कर इत्यादि) और अप्रत्यक्ष कर (GST, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि) दोनों शामिल होते हैं। इनमें सरकार को आयकर से बहुत कम (करीब 20%) आय होती है। ज्यादातर आय अप्रत्यक्ष कर से होती है जो कि पूरी जनता को देना पड़ता है। ऐसे में यह कहना कि ये योजना गरीबों को खैरात है ये मानसिक दिवालियापन का परिचय देना होगा। इस देश का हर परिवार सरकार को टैक्स देता है। उसी पैसे का एक छोटा हिस्सा ही उन्हें ऐसी लुभावनी योजनाओं में मिल पाता है। 

2. दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री यह योजना क्यों चाहते हैं?
यहाँ ये समझना यहाँ जरूरी है कि दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों ने काँग्रेस को यह योजना क्यों सुझायी और इसका समर्थन क्यों किया?
इसका मुख्य कारण है दुनियाभर में संकट से घिरी अर्थव्यवस्था को गति देना। ये सारे अर्थशास्त्री वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के हिमायती माने जाते हैं और इस समय जो पूँजीवादी संकट पूरी दुनिया मे छाया हुआ है इसको लेकर ये अर्थशास्त्री काफी चिंतित भी रहते हैं। हाल ही में रघुराम राजन ने यह बयान दिया था कि पूँजीवाद खतरे में है क्योंकि यह सबको एक बेहतर ज़िंदगी नहीं दे पा रहा है। इसलिए इस संकटग्रस्त पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को एक (अल्पकालिक ही सही पर) गति देने के लिए यह योजना सुझाई गयी है।
   इसको थोड़ा आसान भाषा में कहें तो दुनिया में जो भी समान पैदा होता है जबतक वो बिकता रहता है तबतक यह पूंजीवादी व्यवस्था चलती रहती है पर यह पूंजीवादी व्यवस्था ज्यादा से ज्यादा मुनाफे के लिए सामान बनाने वाले लोगों यानी मज़दूरों का आर्थिक शोषण करती है, उनको पूरा मेहनताना नहीं देती है, इससे लोगों की क्रयशक्ति घटती जाती है।  इस घटती क्रयशक्ति के कारण जो सामान पैदा होता है उसे खरीदने वाले लोग नहीं मिलते हैं। लोगों को सामान की जरूरत होने के बावजूद, दुकानें सामानों से भरी होने के बावजूद लोग सामान नहीं खरीद पाते। यह अतिउत्पादन का संकट है यानी लोगों की क्रयशक्ति के मुकाबले ज्यादा उत्पादन हो चुका है। ऐसे में कंपनियों-उद्योगों को अपना उत्पादन रोकना पड़ता है जबतक बाज़ार में फिर से मांग न पैदा हो। इसके फलस्वरूप कर्मचारियों की छंटनी की जाती है। चुकि सारे उद्योग आपस मे जुड़े हुए हैं इसलिए यह आर्थिक मंदी एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर में फैलती जाती है। वर्तमान में भारत सहित दुनिया के बड़े हिस्से में अतिउत्पादन की मंदी चल रही है, बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में एक फौरी नुस्खे के तौर पर अगर लोगों तक कुछ पैसा पहुँचें और वे फिर से सामान खरीदना शुरू करें तो बाज़ार और अर्थव्यवस्था में कुछ देर के लिए गति आएगी। इसी उद्देश्य से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के इन पैरोकार अर्थशास्त्रियों ने कांग्रेस को यह नुस्खा सुझाया है। 

3. तीसरा पहलू है- बेरोजगारी
 आज बेरोजगारी भयंकर विस्फोट की स्थिति में पहुँच चुकी है। रघुराम राजन ने भी इसतरफ इशारा किया था। इस परिस्थिति से भाजपा सरकार भी वाकिफ़ है पर फिलहाल वो चुनावों के मद्देनज़र इसको ज़ाहिर करने से होने वाले नुकसान को समझती है। कांग्रेस इस बात को समझती है कि बेरोजगारी से पीड़ित जनता को अगर न्यूनतम आय के वादे से कुछ राहत पहुँचायी जाय तो इससे चुनाव में बाजी पलट सकती है। इसीलिए इसको बार बार गेमचेंजर कहा जा रहा है।

क्या राहुल गांधी का गरीबी खत्म करने का यह वादा सच साबित होने वाला है?
गरीबी को हटाने की बात 1947 से लेकर 2019 तक सबने की है, लेकिन हालात जस के तस हैं। भारत में भुखमरी और कुपोषण आज भी सबसे बड़ी समस्या बने हुए हैं, करीब 4 हजार बच्चे हर रोज भूख, कुपोषण और छोटी-मोटी बीमारियों से मर जाते हैं यानी सालाना करीब 15 लाख बच्चे। स्थिति ये है कि कुपोषण और विश्व भूख सूचकांक के मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी बुरी स्थिति में है। विश्व की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, परमाणु शक्ति, मंगल मिशन, अंतरिक्ष मिशन "शक्ति", सैन्य ताकत का क्या मतलब है अगर आपके देश मे करोड़ों लोग भूखों सोते हो और कुपोषण से लगभग 4000 बच्चे प्रति दिन मरते हों। इस तरह की मौतें किसी युद्ध या आतंकवाद के कारण हुई मौतों से काफी ज्यादा हैं।
    गरीबी खत्म करने की बात कोई नई नहीं है और ना ही ऐसे वादे नए है। सन् 1971 में इंदिरा गांधी ने नारा दिया था- "गरीबी हटाओ" और इसका उनको राजनीति फायदा भी पहुँचा। ये नारा लोगो के दिलो दिमाग मे छा गया था। इंदिरा गांधी के पहले भी बहुत बार इसपे पहल की गई है लेकिन स्थितियाँ आज सबके सामने है। क्या ग़रीबी खत्म हुई?
1947 में जब देश आजाद हुआ तो हर 3 में 2 व्यक्ति गरीब था आज कहा जाता है कि हर 3 व्यक्ति में 1 व्यक्ति गरीब है । हालांकि ये सरकारी आंकड़े हैं, सच्चाई इसके अलग है क्योंकि गरीबी मांपने का सरकारी पैमाना हास्यास्पद है। गरीबी के सरकारी मानक अपने आप में भरोसेमंद नहीं हैं क्योंकि योजना आयोग ने बताया है कि भारत में खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की यह परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा था कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। असली सच्चाई इससे काफी अलग है। 1947 से अब तक भारत में गरीबी और अमीरी की खाई बहुत तेजी से बढ़ी है। आज भारत मे ऊपर के 1% अमीरों के वास करीब 60% संपत्ति है जबकि नीचे के 80% आबादी के पास कुल सम्पत्ति का 10% ही है। ऐसे में इन 80% आबादी की ज़िन्दगी कितनी उन्नत स्तर की होगी? फिर यह सोचने की बात हैं कि बिना अमीरी गरीबी की यह खाई भरे, बिना रोजगार दिए गरीबी किस हद तक खत्म की जाएगी?
सरकार पूरी जनता से टैक्स वसूलती है तो उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता के लिए सड़क, बिजली, पानी, परिवहन, शिक्षा, चिकित्सा के साथ-साथ रोजगार का भी इंतजाम कर। अगर सरकार रोजगार नहीं दे सकती तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाय। यहाँ पर काँग्रेस पार्टी चुनाव जीतने की बदहवासी में ही ऐसा कदम उठा रही है। यह याद रखने की जरूरत है कि बेरोजगारी और गरीबी-अमीरी की बढ़ती खाई कांग्रेस सरकार की उदारीकरण-निजीकरण नीतियों की ही देन है जिसे अब बीजेपी सरकार आगे बढ़ा रही है। ऐसे में इस दोनों पार्टियों से यह उम्मीद करना कि ये गरीबी या बेरोजगारी को खत्म करेंगे यह रेगिस्तान में पानी ढूंढने जैसा होगा।

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