Ads

Responsive Ads Here

05 March 2019

न्यूटन से आइंस्टीन तक भौतिक विज्ञान कैसे विकसित हुआ?

न्यूटन से आइंस्टीन तक भौतिक विज्ञान कैसे विकसित हुआ?

✍🏼 विकास गुप्ता (Vikas Gupta)

विज्ञान के विकास का क्रम निरंतर चलता रहता है। माना ये जाता है कि इस क्रम को न्यूटन ने एक बहुत क्रांतिकारी गति दिया था। न्यूटन ने भैतिक विज्ञान से लेकर गणित में कई महान कार्य किये जो उस समय के विद्वानों की सोच से काफी विकसित था। न्यूटन ने सिर्फ़ गति के नियम ही नही बताये थे अपितु न्यूटन ने ब्रह्मांड को समझने के लिए गुरुत्वाकर्षण का नियम भी बताया। हालाँकि न्यूटन के पहले केप्लर और गैलीलियो ने भी इस दिशा में कार्य किया था, (केप्लर ने सबसे पहले बताया था कि सभी ग्रह सूर्य के चारो तरफ वृत्तीय कक्षाओं में नही बल्कि दीर्घ वृत्तीय कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं, केप्लर ने ये माना था कि चुम्बकीय बल के कारण ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं) लेकिन न्यूटन ने इन सब के कार्यों को सुगठित और सुव्यवस्थित कर इनके कार्यों को एक वैज्ञानिक आयाम दिया। न्यूटन ने ये बताया कि,

“ब्रह्मांड में उपस्थित हर पिंड दूसरे पिंड के ऊपर एक बल लगाता है जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं, इस बल का मान दोनों पिंडो के द्रव्यमान के गुणनफल के सीधा समानुपाती और उनके बीच के दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है”। इस नियम को न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम (Universal Law of Gravitation) कहते हैं।


अपने समय में न्यूटन ने दुनिया को सोचने समझने की जो दिशा दी वो वाकई सराहनीय है। सराहनीय सिर्फ़ इसलिए नही है कि न्यूटन ने भौतिकी को समझाया, बल्कि सराहनीय इसलिए है कि न्यूटन ने उस समय फैले बहुत सारे मिथको पर चोट किया, सराहनीय इसलिए भी कि न्यूटन ने ये शुरुआत करके क्लासिकल फिजिक्स के विकास में एक मिशाल पेश दिया। न्यूटन को उनके कार्यों के चलते ही विज्ञान का पिता कहा गया न कि वो विज्ञान के पिता थे इसलिए उन्होंने इतना काम किया।

न्यूटन ने गणित के क्षेत्र में भी कार्य किया, मुख्यतः अपने प्रयोगों में प्रयुक्त गणनाओं के लिए। जब एक पिंड (ऑब्जेक्ट) की गति को देखा जा रहा था तो उस समय दूरी (Distance) और समय (Time) के बीच संबंध को मोटे तौर पर तो व्याख्या करने में आसानी थी लेकिन समस्या ये थी कि जब ऑब्जेक्ट समय के साथ अपना स्थान (Position) भी एक समान रूप में न बदलकर असमान रूप (non-uniform) में बदले। हर एक विशेष समय पर वस्तु के चाल (speed) या उसकी स्थिति की गणना करना कठिन था। वास्तव में तबतक न्यूटन गति को मोटे तौर पर (मोटे तौर का मतलब किसी चीज को ऊपर ऊपर ही देखना ज़्यादा गहराई में नही, गति के संदर्भ में मोटे तौर का मतलब औसत चाल या औसत वेग की गणना जैसे है) ही देख पा रहे थे। गणना में थोड़ा सा विचलन (deviation)  कम दूरी के लिए तो ज़्यादा अंतर नही पैदा करता लेकिन जब दूरी बहुत ज़्यादा हो, जैसे सूर्य की पृथ्वी से दूरी, तब मोटे तौर पर देखने पर गणना में इतना विचलन आएगा कि हम सूर्य की दिशा में रहेंगे ही नही। इन तमाम जटिल समस्याओं में उलझे हुए न्यूटन ने गणना के लिए कैल्कुलस (हालाँकि लिबनीज़ और न्यूटन दोनों को ही कैल्कुलस का पिता बोला जाता है, लिबनीज़ ने समाकलन गणित यानि कि इंटीग्रेशन को विकसित किया था) ही लिख दिया। इसमें बहुत बड़ी दूरी को छोटी-छोटी दूरियों में बांटकर सोचना शुरू किया गया और गणित के भाषा मे इसे अवकलन या Differentiation बोलते है। इसके बाद न्यूटन ने इन छोटी-छोटी दूरियों का योग किया ताकि सम्पूर्ण दूरी के लिए की गई गणना सटीक (Accurate) हो सके। इस प्रक्रिया को समाकलन (Integration) कहा जाता है। इस तरह न्यूटन ने गणित में भी एक नई शाखा विकसित कर दी जिसे हम कैल्कुलस (Calculas) के नाम से जानते हैं।


न्यूटन ने सिर्फ़ गति को ही नही समझाया बल्कि न्यूटन ने ऊर्जा के अन्य स्वरूपों जैसे ऊष्मा (Heat) और प्रकाश (लाइट) की घटनाओं पर भी अपनी प्रस्थापनाएँ दीं। न्यूटन ने समझाया कि अगर किसी वस्तु का तापमान (Temperature)  अधिक हो तो उसके ठंडा होने की दर भी अधिक होगी, जैसे-जैसे कोई वस्तु ठंडी होने लगती है वैसे-वैसे उसके ठंडा होने की दर घटने लगती है। उन्होंने बताया कि ठंडा होने की दर ताप अंतर के सीधा समानुपाती होता है। इस नियम को भौतिक विज्ञान में न्यूटन का ठंडा होने का नियम (Newton's Law of Cooling) कहा जाता है। 

प्रकाश की परिघटनाओं की भी व्याख्या न्यूटन ने करने की कोशिश की। न्यूटन के अनुसार प्रकाश एक कण के रूप में एक काल्पनिक माध्यम (imaginary medium) में गमन करता है। हालांकि न्यूटन की यह अवधारणा बहुत दिनों तक विवादास्पद रही। अपने मैकेनिक्स के नियम के आधार पर न्यूटन ने अपवर्तन (Refraction) और परावर्तन (Reflection) की घटनाओं पर कुछ हदतक संतोषजनक व्याख्या दी थी, लेकिन न्यूटन प्रकाश के अन्य गुणों जैसे व्यतिकरण(Interference), विवर्तन(Diffraction), ध्रुवीकरण (Polerisation) आदि की व्याख्या करने में असफ़ल रहे। यही कारण था कि न्यूटन की प्रकाश की अवधारणा बाद के वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकृत नहीं की जा सकी।
 
समय के क्रम में हाइजेनबर्ग नामक भौतिकविद (Physicist) ने प्रकाश को एक तरंग माना और अपने सिद्धांतों के द्वारा प्रकाश को तरंगरूप में दुनिया को समझाने में सफल रहे। हाइजेनबर्ग के सामने भी एक समस्या थी और समस्या छोटी नही बल्कि बहुत जटिल समस्या थी। समस्या ये थी कि तरंग के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है, लेकिन निर्वात में तो कोई भी माध्यम नही होता है। लेकिन हाइजेनबर्ग ने न्यूटन की तरह ही ये संकल्पना किया कि निर्वात में भी एक माध्यम है जिसका कोई द्रव्यमान नही है, जिसको ईथर कहा गया। बिना द्रव्यमान के किसी माध्यम का उपस्थित होना उस समय विज्ञान जगत के लोगों के गले नही उतर रहा था फिर भी इस संकल्पना को छोड़ दे तो हाइजेनबर्ग का सिद्धांत प्रकाश की सभी परिघटनाओं की सटीक व्याख्या दे रहा था। 

बाद में मैक्सवेल ने ये सिद्ध कर दिया कि प्रकाश एक विद्युत-चुम्बकीय तरंग है, जिसके संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं है। मैक्सवेल के इस काम ने हाइजेनबर्ग की प्रस्थापना की जटिल समस्या का अंत कर दिया और पूरी सहमति के साथ प्रकाश को एक तरंगरूप में स्वीकार कर लिया गया।

भौतिक विज्ञान में कार्यों को इसी तरह आगे बढ़ाया गया। मैक्सवेल के बाद कई सारे भौतिक वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रिसिटी (विद्युत) और मैग्नेटिज्म (चुम्बकत्व) पर काम किया जिसमें प्रमुख तौर पर एम्पियर, फैराडे, टेस्ला आदि हैं। बाद में ये भी बताया गया कि वैद्युत बल और चुम्बकीय बल कैसे एक दूसरे से संबंधित है, यानि दोनों बलों एक ही तरह संयुक्त रूप में माना गया जिसे विद्युत-चुम्बकीय बल कहते हैं, और यह बल प्रकृति के एक मूल बल के रूप में भी स्वीकार किया जाता है। 19वी शताब्दी के अंत में पदार्थ के मूल कणों के विषय में शोध आगे बढ़ने लगी। जेजे थामसन (J J Thomsan) ने 1897 एक प्रयोग किया था जिसे कैथोड किरण प्रयोग से जाना जाता है, थामसन ने उस समय ये सुझाव दिया कि परमाणु के अंदर परमाणु से भी 1000 गुना कोई छोटा कण भी परमाणु में विद्यमान है। थामसन ने जिसे कण बोला था उसे बाद में विज्ञान जगत में इलेक्ट्रॉन बोला गया। इस खोज के लिए 1906 का नोबेल पुरस्कार थॉमसन को दिया गया था। परमाणु की संरचना जानने की तरफ यह पहला कदम था। 

बाद में रदरफोर्ड ने अपने प्रसिद्ध गोल्ड फॉयल प्रयोग में पाया कि गोल्ड फॉयल पर अल्फा कणों की किरण से बमबारी करने पर ज्यादातर कण आरपार निकल जाते हैं, इससे पता चलता है कि परमाणु का ज्यादातर हिस्सा खाली है। कुछ अल्फा कण फॉयल से टकराकर वापस लौट गए, इससे रदरफोर्ड ने ये निष्कर्ष निकाला कि परमाणु के अंदर बहुत ही छोटे भाग में इसका पूरा धनात्मक आवेश (Positive charge) और द्रव्यमान (mass) केंद्रित है, बाकी सब खाली है। इस केंद्रीय भाग को नाभिक कहा गया। इसके साथ ही प्रोटॉन की खोज का भी श्रेय रदरफोर्ड को या कुछ लोग गोल्डस्टीन को भी देते है। 20वी सदी के शुरुआती दौर में पदार्थ के सूक्ष्म स्तर पर बहुत कुछ प्रयोग हुआ और परमाणु की संरचना को लेकर बहुत सारे सिद्धान्त दिए गए। नील्स बोर ने परमाणु की सरंचना की अच्छी व्याख्या की कि कैसे धनात्मक नाभिक के चारो तरफ इलेक्ट्रॉन अलग-अलग ऊर्जा की कक्षाओं में नाभिक का चक्कर लगाते हैं।

धार्मिक या विचारवादी दर्शनों की तरह कभी संपूर्णता या अंतिम सत्य का दावा नहीं कर सकता है। विज्ञान को दुनिया के बारे में कहानियां या कल्पनायें नहीं बुननी होती हैं, जबकि एक लंबे समय के प्रयोगों, बहसों, थीसिस-एन्टीथीसिस के उतारचढावों के बाद विज्ञान एक सही निष्कर्ष पर पहुँचता है। विज्ञान सतत उदविकास की प्रक्रिया में ही आगे बढ़ता है। विज्ञान दुनिया को जानने की प्रकिया में जैसे एक सवाल को हल करता है वैसे उसके सामने नए सवाल खड़े हो जाते हैं। इसी प्रक्रिया में विज्ञान उथलेपन (shallowness) से गहराई (depth) की तरफ बढ़ता जाता है यानी दुनिया को और ज्यादा से ज्यादा गहराई से समझता जाता है। परमाणु को जानने की दिशा में भी यही हो रहा था। जैसे जैसे हम पदार्थ की एक गुणधर्म की व्याख्या कर रहे थे, नए सवाल खड़े हो रहे थे।  20वी सदी की शुरुआत में कुछ ऐसी भी परिघटनाओं को प्रेक्षित किया गया जिसकी व्यख्या वैज्ञानिकों के लिए मुश्किलें खड़ी करने लगी। इन परिघटनाओं में से एक था प्रकाशवैद्युत प्रभाव। यह देखा गया कि जब प्रकाश कुछ विशेष पदार्थों पर पड़ रहा है तो उनसे इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन हो रहा है। प्रकाशवैद्युत प्रभाव प्रकाश की कण प्रकृति को दिखाता था, इसने फ़िर से वैज्ञानिकों को ये सोंचने को मजबूर कर दिया कि प्रकाश की प्रकृति तरंग है या कण या दोनों। सबसे पहले प्रकाशवैद्युत प्रभाव की सटीक व्याख्या दी सदी के महानतम वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने। आइंस्टीन ने प्रकाश को कण के रूप में माना और ये बताया कि प्रकाश के कण को फोटॉन कहते है और हर एक फोटॉन एक ऊर्जा के एक पैकेट के रूप में होता है। आइंस्टीन ने साथ में ये भी बताया कि फोटॉन की ऊर्जा उसके आवृत्ति (frequency) के सीधा समानुपातिक (propotional) होता है। अपने सापेक्षता के सिद्धांत के आधार पर आइंस्टीन ने ये भी सिद्ध कर दिया कि फोटॉन का कोई द्रव्यमान नही होता है।

इसके बाद डी ब्रोगली ने ये भी बता दिया कि कोई भी वस्तु अगर गति में है तो उसके साथ एक तरंग भी जुड़ा होता है। डी ब्रोगली के सिद्धांतों ने ये बता दिया कि प्रकाश की प्रकृति दोनो है, यानि प्रकाश एक तरंग भी है और प्रकाश एक कण भी... इस बात को प्रकाश की द्वैत प्रकृति (Dual Nature of Light) कहा जाता है। आइंस्टीन ने इसी के साथ पदार्थ के द्रव्यमान और ऊर्जा के संबंध वाला अपना प्रसिद्ध समीकरण E = mc2 दिया जिससे पता चला कि ऊर्जा भी पदार्थ का ही एक रूप है।

भौतिकी में इतना काम होने के बाद एक नए भौतिकी का भी जन्म हुआ जिसे क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) के नाम से जाना जाता है। क्वांटम भौतिकी ने पदार्थ, ऊर्जा और चेतना पर एक नए सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया। इसी की देन है कि भौतिकवादी वैज्ञानिको (Materialist Scientists) की संख्या बढ़ने लगी यानि कि ये माना जाने लगा पदार्थ ही सबकुछ है और ऊर्जा और चेतना भी पदार्थ के ही रूप हैं। आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत बहुत ही क्रांतिकारी सिद्धान्त था जिससे ये निष्कर्ष निकल कर आया कि समय कुछ नही है समय भी एक आयाम (Dimension) है, और समय को चौथा विमा कहा गया।

कुछ समय तक सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of relativity) में कही हुई बाते चमत्कार से कम नही लगती है। उदाहरण के लिए जैसे ये कि कोई वस्तु अगर बहुत तेज़ चलती है तो उसके लिए सापेक्षिक समय धीमा हो जाता है और दूरी छोटी होने लगती है। इतना ही नही प्रकाश की चाल पर चलने पर बहुत सारी चीजें उलट दिखाई देने लगेंगी जिसका हमे अंदाजा तक नही। एक और उदाहरण लेते है मान लेते है कि हमसे कोई एक लाख प्रकाश वर्ष दूर है। और वह व्यक्ति हमें अगर देख रहा होगा तो दो बातें संभव है या तो वो हमसे एक लाख साल आगे देख रहा होगा या हमसे एक लाख साल पीछे। कई ऐसे भी बातें निकल कर सामने आई है जिससे ऐसा लगता है कि हम समय के साथ यात्रा ही कर रहे है। इतना ही नही जो घटना इस क्षण घटित हो रही है, क्या इसे हर जगह इसी क्षण देखा जा सकता है ? नहीं,  ऐसा भी हो सकता है कि ये घटना लाखो वर्ष बाद देखा जा सके जब हमारा ही अस्तित्व न हो। सूर्य जो कि हमारा सबसे निकटतम तारा है उससे भी रोशनी हमतक पहुँचने में 8 मिनट लग जाते हैं। 
    इसे सीधी भाषा में समझते हैं। जैसे कि हमसे करोड़ो प्रकाश वर्ष दूर कोई तारा है, ज़ाहिर सी बात है उस तारे का प्रकाश हम तक आने में करोड़ो साल लगे होंगे। इस समय तो हम उसे देख रहे हैं लेकिन उस तारे पर जो भी घटना देख रहे है, वो करोड़ो साल पहले की घटना है यानि कि हमारे सापेक्ष जो भी घटना उस तारे हो रहे होंगे वो करोड़ो साल पहले का है। अब बात ये है कि अगर इसी क्षण तारा टूट कर समाप्त हो जाए या उसका अस्तित्व ख़त्म हो जाये तो क्या होगा ? क्या ये घटना हम अभी देख सकते हैं ? इस घटना को हमे देखने के लिए करोड़ो साल इंतजार करना पड़ेगा। इतने साल तो लगेंगे ही इस समय के घटना को हमें दिखने में क्योंकि प्रकाश को ही आने में करोड़ो साल लग जाएंगे। कुल मिलाकर बात ये है कि ब्रम्हांड के जिस पिण्ड को हम इस समय देख रहे है जिस जग़ह पर वो वही पर अब अस्तित्व में है कि नही ये हम नही कह सकते।

आधुनिक भौतिकी में बहुत कार्य हुआ है, आइंस्टीन ने 1915 में गुरुत्वाकर्षण तरंग के होने की बात कही थी जो आगे कई प्रयोगों द्वारा सत्यापित होती रही। अभी हाल में ही प्रयोगों द्वारा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के होने का प्रमाण मिला है। आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण को समझने के लिए बहुत ही काम किया और बहुत काम अधूरा भी रह गया। अपने जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी (सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धांत) के माध्यम से आइंस्टीन ने दिक-काल (Space-Time) की अवधारणा रखी थी। इसी मॉडल के साथ गुरुत्वाकर्षण बल के लिए भी एकीकरण करने की कोशिशें की गई जो अभी तक संभव नही हो पाईं हैं। इसके बाद भौतिकी में ब्रह्मण्ड की व्याख्या के लिए स्ट्रिंग थ्योरी भी विकसित हुआ। वर्तमान समय में ब्रह्मांड को समझने के लिए स्टीफेन हॉकिंग्स की बिग बैंग थ्योरी सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त मॉडल है। इस दिशा में और भी तमाम सवाल हैं जिन्हें समझा जाना है और खोजा जाना है। विज्ञान की खूबसूरती यही तो है ये हमेशा अपने आप को तर्क की कसौटी पर रख कर परखता रहता है और दुनिया और पदार्थ की ज्यादा से ज्यादा गहराई से व्याख्या करता रहता है। 

 विज्ञान क्या कभी "अंतिम सत्य (Final Truth)" को खोज पायेगा? इसका जबाब यही है कि दुनिया में "अंतिम सत्य" नाम की कोई चिड़िया नहीं होती , जैसे ही आप दुनिया या पदार्थ के एक रहस्य से पर्दा उठाते हैं उससे जुड़े और नए सवाल पैदा होते हैं। इसी प्रक्रिया में विज्ञान विकसित होता है और उसी ज्ञान का प्रयोग मनुष्य प्रकृति को नियंत्रित करने में करता है। ऐसा कभी नहीं होगा कि विज्ञान के पास हर सवाल का जबाब हो क्योंकि ऐसा कभी हुआ तो उस दिन विज्ञान ही खत्म हो जाएगा। सारे सवालों का जबाब देने का दावा धर्म या विचारवाद (Idealism) ही कर सकता है क्योंकि उसको कोई प्रयोग, विश्लेष, शोध नही करना है बस कहानियाँ बनानी हैं। जिस सौरमंडल को ठीक ठीक जानने में विज्ञान को करीब 2000 साल लग गए उसे बाइबिल ने उसी समय बता दिया था कि ब्रह्मांड के केंद्र में पृथ्वी है, सूर्य और सारे ग्रह पृथ्वी के चक्कर लगाते हैं। हालाँकि बाद में ये कोरा गप्प पाया गया। आकाश में बिजली कैसे चमकती है इसे जानने में विज्ञान को हज़ारों साल लगे पर हिन्दू धार्मिक ग्रंथों ने 2000 साल पहले ही बता दिया कि बारिश इंद्र देव करते हैं और वही क्रोधित होने पर बिजली भी कड़काते हैं। 
  इसप्रकार विज्ञान का विकास एक अनवरत प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नही है। यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि दुनिया का ऐसा कोई रहस्य या सवाल नहीं है जिसे विज्ञान हल न कर सकता हो पर विज्ञान जैसे ही एक सवाल को सुलझाता है और नए और जटिल सवाल पैदा होते हैं और ऐसे ही व्यज्ञान आगे बढ़ता है। ज्ञात दुनिया का दायरा बढ़ता है और अज्ञात दुनिया का दायरा सिमटता जाता है। आज ब्रह्मांड की उत्पत्ति और इसके मॉडल की गुत्थी विज्ञान सुलझा रहा है, जब ये गुत्थी सुलझा ली जाएगी, विज्ञान के सामने फिर नए सवाल हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि विज्ञान की यात्रा एक अनन्त सागर की यात्रा है, और इससे दिलचस्प बात कुछ नहीं हो सकती है।

1 comment: