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28 March 2019

सुब्रमण्यम स्वामी का यह बयान उनके हिन्दू राष्ट्र की पोल खोलता है।

 
 
✍🏼 संदीप सिंह

हाल ही में सुब्रमण्यम स्वामी ने यह बयान दिया कि मैं चौकीदार नहीं हो सकता क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ। यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए "मैं भी चौकीदार" अभियान के तहत आया। इस बयान को अगर समझने की कोशिश करें तो सुब्रमण्यम स्वामी का बयान एक ऐसे ब्राह्मणवादी समाज की तरफ इशारा कर रहा जो मनुस्मति के विचारों पर आधारित है।
सुब्रमण्यम स्वामी का ये बयान कि मैं चौकीदार नही हो सकता क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ, यहाँ स्वामी वर्ण या जाति के अनुसार कार्य विभाजन की बात कर रहे हैं जिसका जिक्र मनुस्मृति, भगवद्गीता और अन्य हिन्दू ग्रंथों में आता है। 
 इस वक्तव्य की अगर व्याख्या की जाय तो कई बातें निकलकर आती हैं- 
1. एक ब्राह्मण का काम केवल नेतृत्व करना, शिक्षा देना है। चौकीदार, कुली, सफाईकर्मी, चपरासी व मेहनत का काम करना छोटी जातियों का काम है। 
2. एक नीची जाति का इंसान नेतृतव नही कर सकता, वो शिक्षित होने के बावजूद शिक्षा नही दे सकता क्योंकि शिक्षा देना ब्राह्मणों का काम है।
3. ब्राह्मण कितना भी अयोग्य हो उसको चौकीदार, सफाईकर्मी, कुली इत्यादि काम नहीं करना चाहिए। 

ये बातें यह दिखा रही हैं कि हिंदुत्व के स्वयंभू विद्वान सुब्रमण्यम स्वामी की सोच अभी भी 3000 साल पुरानी है। एक समय में हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा के विरोधी रहे सुब्रमण्यम स्वामी आज आरएसएस और बीजेपी की इसी विचारधारा के साथ खड़े हैं। स्वामीजी का यह बयान बहुत अच्छा संकेत देता है कि स्वामीजी का हिन्दू राष्ट्र कैसा होगा। हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा को प्रस्थापित करने वाले सावरकर का भी यह मत था कि भारत को मनुस्मृति के नियमों के अनुसार चलना चाहिए, हमें संविधान की जरूरत नहीं है। इसका अर्थ यही निकलता है कि हिन्दू राष्ट्र में जाति के आधार पर ही कार्य विभाजन होगा, ब्राह्मण का काम शिक्षा देना, नेतृत्व करना होगा, क्षत्रिय का काम सेना में जाना, वैश्य का काम व्यवसाय करना होगा और बाकी चौकीदार, लुहार, कुली, सफाईकर्मी इत्यादि काम छोटी जाति के लोगों के लिए होगा। अगर हिन्दू राष्ट्र ऐसा होगा तो भारत के लोगों को यह तय करना होगा कि उन्हें किस तरफ जाना है। 
   
   आज जातिवाद भारत के पैरों की एक बेड़ी बना हुआ है। यह भी एक वजह है जिससे भारत इतना ज्ञान व संपदा संपन्न होने के बावजूद भी कई पश्चिमी देशो से तरक्की में हमेशा पीछे रहा है । उन देशो में इन्सान को जन्म या जाति के आधार पर किसी तरह के पदानुक्रम में रख देने या पक्षपात करने की बजाय उनकी योग्यता के हिसाब से उन्हें आँका जाता है।
धार्मिक और जातिगत भेदभाव की नींव पर बना समाज हमें एक रुग्ण और पिछड़े हुए देश की तरफ़ लेकर जाएगा जहाँ जाति और धर्म के नाम पर हमेशा झगड़े होते रहेंगे। हमारे देश मे जाति विभाजन करीब 3000 साल से अधिक समय से है जिसका परिणाम हम आज भी भुगत रहे हैं। धर्म और जाति की राजनीति लोगों को बांटने का एक बड़ा औजार बन चुकी है। आधुनिक समय में प्रगति का मूल मंत्र सभी धर्मों, संप्रदायों और जातियों से ऊपर उठकर एक नये समाज की स्थापना की ओर चलना है जहाँ सबके लिए समान शिक्षा की व्यवस्था हो, हर पेशे और कार्य को बराबर सम्मान मिलता हो। आज की युवा पीढ़ी को जाति की इस बेड़ी को उतार फेंकना होगा ताकि देश प्रगति पथ पर अग्रसर हो सके।

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