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27 March 2019

एडीआर का यह रिपोर्टकार्ड मोदी सरकार के लिए बुरी खबर है।



✍🏼 विकास गुप्ता
 
जब जब चुनाव आते हैं तब तब बड़े बड़े वादे किए जाते हैं। 2014 में भी बहुत सारी बातें कही गयी थी - प्रतिवर्ष 2 करोड़
नौकरियों के वादे, महंगाई कम करने के वादे, किसानों की आय बढ़ाने के वादे, पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस सस्ता करने के वादे, रुपये को मजबूत करने के वादे, महिला सुरक्षा के वादे और ऐसे तमाम वादे। 5 साल पूरा होने के बाद अब मोदी सरकार इन सारे मुद्दों से भागती नजर आ रही है और राम मंदिर, देश की सुरक्षा, आतंकवाद जैसे मुद्दों को उछालकर नैरेटिव बदलने की कोशिश में लगी है। इसका चुनावों पर कितना असर पड़ेगा ये तो वक़्त ही बताएगा पर ज़मीनी स्तर के सर्वेक्षणों में सरकार के कामों को लेकर जनता में व्याप्त निराशा बार-बार सामने आ रही है जो मोदी सरकार के लिए चिंता का सबब बन रही है।
   लोकसभा चुनाव होने से पहले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने एक सर्वे का रिपोर्ट जारी किया है। यह सर्वे अक्टूबर 2018 से दिसंबर 2018 के बीच 534 लोकसभा क्षेत्रों में किया गया। इसमें 2.73 लाख मतदाताओं की राय ली गयी और सरकार के काम काज पर रेटिंग दी गई।  रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि लोग सरकार के कामकाज से खुश नही हैं, क्योंकि सरकार उनके अपेक्षाओं पर खरी नही उतर सकी है। यह सर्वे कई मुद्दों और विषयों पर किया गया है, मतदाताओं की प्राथमिकताओं में रोजगार पहले नंबर पर है जिसे लगभग 46.80% लोगों ने प्राथमिकता दिया है। इस सर्वे का रिपोर्ट कार्ड सरकार के हवाई दावों की असलियत को सामने रखता है (यहाँ एक चीज बता देना जरूरी है- "अच्छा" को 5, "औसत" को 3 और "बुरा" को 1 अंक दिया गया है। ) - 

           मुद्दा                                               प्राथमिकता (%)              रेटिंग (5 में से)
  • रोजगार और बेहतर अवसर -                  48%                               2.15
  • बेहतर अस्पताल/ स्वास्थ्य केंद्र-                34.60%                          2.35
  • पेयजल -                                                30.50%                           2.52
  • बेहतर सड़कें -                                       28.34%                           2.41
  • सार्वजनिक परिवहन                               27.35%                           2.52
  • कृषि ऋण की उपलब्धता -                      25.62%                           2.15
अगर इस सर्वे को ज़मीनी परिस्थितियों का सूचक मानें तो लोगों में सरकार के कामों को लेकर काफी निराशा है। जितने भी मुद्दों पर ADR ने अपनी रिपोर्ट तैयार की है वो सभी बुनियादी मुद्दे हैं। अगर सम्पूर्ण सर्वे के परिणामों को एक साथ करके भी देखें तो मोदी सरकार का स्कोर  2.35 आता है जो औसत से भी कम है। सरकार के कामकाज से लोग कहीं से भी खुश नजर नही आ रहे हैं। यह सर्वे दस या बीस लोकसभा क्षेत्रों में नही हुआ है बल्कि इसमें 534 लोकसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया है यानि भारत के लगभग सभी भौगोलिक क्षेत्रों को शमिल कर रिपोर्ट तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मौजूदा सरकार ने जनता के बुनियादी मुद्दों पर संतोषजनक स्तर का भी काम नही किया है। रोजगार के बारे में जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि बेरोजगारी की समस्या बहुत ही गंभीर होती जा रही है।
इतना ही नही अक्टूबर 2018 के अनुसार वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का स्थान 119 देशों में से 103 है जो कि बांग्लादेश (86वां स्थान)  से भी खराब है। 2014 से वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की रैंकिंग में लगातर गिरावट देखा गया है जो किसी देश के लिए चिंताजनक बात है। ये तर्क भी दिया जाता है कि भारत में इतनी समस्या इसलिए है क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत अधिक है, लेकिन एक बात जरूर जानना चाहिए कि दुनिया के 64 लोगों के पास दुनिया के 50 प्रतिशत लोगों के बराबर धन है। अब यह बताना पड़ेगा कि आखिर कौन सी आबादी समस्या है, 64 लोगों की आबादी जो दुनिया के 50% संपत्ति पर कब्ज़ा करके बैठी है या बाकी 7 अरब की आबादी जो बाकी के 50% में अपनी ज़िंदगी गुजार रही है? इससे साफ पता चलता है कि समस्या जनसंख्या नही है समस्या आर्थिक नीतियां हैं जो अमीरी और गरीबी में खाई पैदा कर रही हैं। 
    जैसा कि ADR की रिपोर्ट में ही बताया गया है कि आम जनता किस तरह से सरकार के कामकाज से असंतुष्ट है लेकिन एक ऐसा भी वर्ग है जो सरकार के कामकाज से बहुत खुश है। ये वर्ग है देश के बड़े बड़े उद्योगपतियों का। मोदी सरकार में देश के बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति पहले से काफी तेजी से बढ़ रही है जिससे स्पष्ट होता है कि अच्छे दिन किसके आये हैं और क्यों मुख्यधारा मीडिया जो कि उद्योगपतियों की मालिकाना है मोदी सरकार की गोद में बैठी हुई है। 

2017 में किसकी संपत्ति कितनी बढ़ी-
आचार्य बालकृष्ण (पतंजलि) - 173%
गौतम अडानी - 125%
राधाकिशन दमानी - 320%
मुकेश अम्बानी - 78%
कुमार बिरला - 50%
अज़ीम प्रेमजी - 47%
उदय कोटक - 45%
(SOURCE: Hurun India rich list 2017 and Bloomberg-Higher one is taken)
2016 में जय शाह (अमितशाह के पुत्र) की संपत्ति में बढ़ोतरी- 1600000%

अब ये भी याद कर लिया जाय कि CMIE के आंकड़ों के अनुसार नोटबन्दी और GST के बाद अब तक करीब 1.1 करोड़  लोग अपनी नौकरियाँ गवां चुके हैं और हज़ारो की संख्या में छोटे उद्योग तबाह हुए हैं। फिर समझा जा सकता है कि सरकार की इन नीतियों से वास्तव में किसको फायदा हुआ है।
यही कारण है कि लगातार सरकार के तरफ से ऐसे मुद्दे उछाले जाते रहते है जिससे जनता का ध्यान असली मुद्दों पर न जाये। कभी धर्मरक्षा के नाम पर बहस होती है तो कभी गोत्र के नाम पर बहस होती है तो कभी मंदिर का मुद्दा उछाला जाता है। यही बहसें आज के कॉर्पोरेट संचालित मीडिया का प्राइम कंटेंट (मुख्य विषयवस्तु) बन चुका है जो लगातार युवाओं को एक असली मुद्दों से भटकाकर एक भीड़ के रूप में तब्दील कर रहा है। एक सच्चे देश प्रेमी होने के नाते सभी जिम्मेदार नागरिको का कर्तव्य है कि अपने बुनियादी मुद्दों को लेकर सजग रहेें और इसके लिए लगातार जो भी सत्ता में हो उससे प्रश्न करते रहे और अपने हक के लिए संघर्ष करते रहे।

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