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17 March 2019

न्यूजीलैंड में हुआ आतंकवादी हमला एक गम्भीर खतरे की ओर इशारा करता है।

नितेश शुक्ला
दो दिन पहले न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर में दो मस्जिदों में हुए आतंकवादी हमले में 49 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 20 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। हमला करने वाला शख्स 28 साल का ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ब्रेंतों हैरिसन है। उसके पास से पुलिस को 87 पृष्ठों का प्रवासी विरोधी और मुस्लिम विरोधी घोषणापत्र मिला है। हाल ही में अमेरिका में भी ऐसे हमले देखने में आये हैं जिनमें प्रवासियों या मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे हमलों की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि पूरी दुनिया मे छाया आर्थिक संकट ही इसका जिम्मेदार है। उपर्युक्त हमला प्रवासियों और मुस्लिमों को टारगेट करके किया गया है, और ऐसे हमले इस समय कई देशों में प्रवासियों जिसमें भारतीय व हिन्दू भी शामिल हैं हो रहे हैं। इसका कारण क्या है? मोठे तौरे पर कहें तो इसका कारण वही है जो महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हुए हमले के लिए जिम्मेदार था। यानी आर्थिक संकट के कारण रोजगार का कम हो जाना, छोटे उद्योगों का बर्बाद होना, और जनता को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती, जनता की बदहाली। इसके बाद जब जनता में असंतोष पैदा होता है तो उस असंतोष को भुनाने के लिए कुछ समाज विरोधी फासीवादी राजनीतिक ताकतें आगे आती हैं। जो इस असंतोष और बर्बादी का कारण किसी एक अल्पसंख्यक वर्ग को ठहराकर जनता का गुस्सा उस वर्ग की तरफ मोड़ने का काम करती हैं। इसके लिए फेक प्रोपगंडा, हेट स्पीच, नफरत फैलाने वाले साहित्य आदि का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसी राजनीति के उभार हमेशा ऐसे समय पर होते हैं जब आर्थिक मंदी व्यवस्था पर हावी रहती है और लोगों में जबरजस्त असन्तोष पैदा हो जाता है। इसके कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं- 
1930 की महामंदी का समय था। हिटलर ने कहा कि जर्मनों की बर्बादी के लिए यहूदी नस्ल जिम्मेदार है, हमको इनको खत्म करके जर्मनी को फिर से महान बनाना है। फिर 60 लाख यहूदी कत्ल कर दिए गए। उनकी फासीवादी राजनीति का विरोध करने वाले हजारों कम्युनिस्ट कत्ल कर दिए गए। दुनिया ने द्वितीय विश्वयुद्ध के भीषण मंजर देखा।
   इसके बाद यह फासीवादी राजनीति दुनिया मे अलग अलग शक्लों में सामने आई। कभी नस्लीय श्रेष्ठता के रूप में, कभी साम्प्रदायिकता के रूप में, कभी क्षेत्रवाद के रूप में तो कभी विदेशी प्रवासियों के विरूद्ध।
    भारत में किसी ने कहा कि हर समस्या की जड़ मुसलमान हैं, इनको पाकिस्तान भेजो, मारो, खत्म करो। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाकर इसका पुराना गौरव फिर से स्थापित करो। भारत को विश्व गुरु बनाना है। इसका परिणाम आज जगह जगह दंगों और हत्याओं के रूप में देखने को मिल ही रहा है।
    महाराष्ट्र में किसी ने कहा कि हमारे मराठी लोगों की नौकरियां भइया (यूपी-बिहार वाले) ले जा रहे, हमको महाराष्ट्र और "मराठी मानुष" के गर्व को फिर से स्थापित करना है। "जय महाराष्ट्र" का नारा दिया गया। फिर उत्तर भारतीय प्रवासियों पर हमले शुरू हुए। 
    अमेरिका में  जनता की आर्थिक दशा पिछले दशकों में काफी खराब हुई है और ऊपर के 1% अमीरों के हाथों में नीचे की 50% आबादी से भी ज्यादा संपत्ति इक्कट्ठा हो गयी है। ऐसे में ट्रम्प आते हैं जो प्रवासियों के खिलाफ आग उगलते हैं कि अमेरिका के लोगों की हालत के जिम्मेदार प्रवासी हैं, हम वीजा नियमों को खूब कड़ा कर देंगे, "अमेरिका फर्स्ट", "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" जैसे नारे उठाये गए। परिणाम यह है कि अमेरिका में भी प्रवासियों पर हमले शुरू हो चुके हैं। मैक्सिको बॉर्डर वॉल इसी राजनीति का एक हिस्सा है। 
    न्यूजीलैंड की घटना इसी दक्षिणपंथी फासीवादी राजनीति के उभार की कड़ी है जो पूरी दुनिया में आर्थिक संकट के कारण आम जनता में पैदा हुए असंतोष को किसी अल्पसंख्यक वर्ग की तरफ मोड़ने के लिए पैदा हो रही है। जिस आदमी ने न्यूजीलैंड में हमला किया है उसके पास से प्रवासी विरोधी और मुस्लिम विरोधी साहित्य भी पाया गया है। इस तरह की सारी राजनीतिक उभार की घटनाओं में तीन चीजें कॉमन होती हैं- 

1. स्वर्णिम भूतकाल की कल्पना (कभी हम महान थे) 
2. टारगेट अल्पसंख्यक (इन्होंने हमें बर्बाद कर दिया)
3. स्वर्णिम भूतकाल की पुनर्स्थापना (हमें फिर से महान बनना है) 

ऐसा करते हुए फासीवादी राजनीति  दरअसल जनता की बर्बादी के असली कारण यानी पूँजीवाद को बचाने का काम करती है। पूँजीवाद कभी भी आर्थिक संकट (Economic Crisis) की बीमारी से मुक्त नहीं  हो सकता, हर उछाल के बाद चक्रीय क्रम में संकट आना ही है। ऐसे में अगर जनता का असंतोष इस व्यवस्था के खिलाफ जाकर पूंजीवादी व्यवस्था को ही खत्म कर दे और उसके स्थान पर एक मानवकेन्द्रित समाजवादी व्यवस्था कायम कर दे है तो इससे पूँजीवाद और इसके सत्ताधारी वर्ग (वो 1% लोग जो पूरी संपत्ति पर कब्ज़ा करके बैठे हैं) की सत्ता चली जायेगी। इसीलिए समय-समय पर ऐसी फासीवादी ताकतों को खड़ा करना या होना इनकी लूट और सत्ता की सुरक्षा के लिए संजीवनी का काम करता है। इसलिए विश्वभर में इस समय हो रहे फासीवादी उभार को विश्वभर में फैले आर्थिक संकट से जोड़कर ही आसानी से समझा जा सकता है। अगर इस मसले को सुलझाया नहीं जाता तो पूरी दुनिया को एक बर्बर परिणाम झेलना पड़ सकता है जैसा कि हिटलर और मुसोलिनी के फासीवादी उभार के दौरान हुआ था।

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