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17 March 2019

भारत में रोजगार का सबसे बड़ा "अकाल" : 82% पुरुष और 92% महिलायें 10,000 से भी कम वेतन पर काम कर रहे


 


Kalpana


कुछ समय पहले CMIE द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2018 में 1.1 करोड़ लोगों की नौकरियाँ चली गईं। NSSO के पीरियाडिक सर्वे का रोजगार के ऊपर डेटा सरकार जारी ही नहीं करना चाहती थी, पर बिज़नेस स्टैण्डर्ड को ये रिपोर्ट मिल गयी। NSSO की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है। इन दो रिपोर्टों के बाद एक तीसरी रिपोर्ट आई है जो रोजगार की उसी भयानक कहानी को दुहराती है। 
   हाल ही में जारी State of Working India 2018  के मुताबिक हमारे देश की बेरोजगारी दर बीते 20 सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच चुकी है। यह रिपोर्ट Centre for Sustainable Employment ,Azim Premji University ने जारी किए हैं। इसके नतीजे हमारी सरकारों के झूठे दावों की पोल खोलकर रख देते हैं। शायद यही कारण है कि वर्तमान मोदी सरकार ने रोजगार पर किसी भी तरह के सरकारी आंकड़े निकालना बंद कर दिया है। इसके साथ ही बीजेपी ऐसे मुद्दे उछाल रही जिससे बेरोजगारी की इस भयानक तस्वीर को छुपाकर असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटा रहे, खासकर युवाओं का, जो किसी भी सरकार को बनाने या गिराने की ताकत रखते हैं। हर साल करीब 2 करोड़ युवा हमारे देश में मतदान करने योग्य बन जाते हैं, इस साल 2019 के चुनाव के लिए भी करीब 2.5 करोड़ नए मतदाता कतार में लग चुके हैं,  जितने नए मतदाता हर साल मतदान के योग्य बन जाते हैं हमारी सरकार 5 साल के अपने कार्यकाल में भी उतने रोजगार निर्मित नही कर पा रही है। बीते 5 साल में हर युवा बेरोजगारी की इस दास्तान को भलीभांति जानता है और उसे किसी अकड़े की भी दरकार नही है। साल में 20-20 फॉर्म भरने और भर्ती परीक्षा देने के बावजूद जिसको कोई रोजगार नहीं मिल पा रहा है उसके लिए बेरोजगारी एक क्रूर पर जीवित सच्चाई है। 
इसी रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश के  GDP का एक तरफ ग्राफ ऊपर गया है वहीं दूसरी तरफ रोजगार का आंकड़ा गिरते हुए नज़र आ रहा है। 1970-80 मे जीडीपी दर 3-4 % थी और रोजगार 2% की सालाना की दर से पैदा हो रहा था । 1990 की उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के बाद 1990-2000 में देश की जीडीपी 7% की दर से बढ़ती तो दिखी परंतु रोजगार पैदा होने की दर 1 % या उसे भी कम रही थी। निजीकरण के इस दौर में रोजगार की दर गिरते गिरते कब बेरोजगार की दर बन गयी पता ही नहीं चला। अब ऐसी स्थिति बन गयी है कि जितने नए रोजगार पैदा हो रहे उससे काफी ज्यादा पुराने रोजगार खत्म हो रहे हैं। 1990-91में उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को लागू करने के दौरान जो सपने दिखाए गए थे वो छलावा साबित हुए हैं। तबसे अबतक देश मे बहुत विकास हुआ है पर वो रोजगार विहीन विकास रहा है, वो विकास चंद अमीर घरानों की तिजोरियों में समा कर रह गया है। 


 इस रिपोर्ट में एक और बेहद चौकानें वाली बात सामने आयी है कि भारत में काम करने वाले लगभग 82% पुरुष और 92% महिलायें 10,000 से भी कम वेतन पर काम करते हैं। 7वें वेतन आयोग के अनुसार किसी व्यक्ति को आम तरीके से जीवन गुज़र बसर करने के लिए कम से कम आय 18,000 होनी चाहिए। फिर भारत की बहुसंख्यक काम करने वाली आबादी कैसे गुजर बसर करती होगी ये सोचने वाली बात है। यह स्थिति काफी भयावह है पर यही सच्चाई है कि उदारीकरण और निजीकरण के बाद जिस ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया गया उसका यही परिणाम होना था। देश में 90% से ज्यादा काम करने वाली आबादी ठेके पर ही काम करती है जहाँ 10-12 घंटे हाड़तोड़ काम के बावजूद जो वेतन मिलता है वो उनको किसी तरह बस जिंदा रहने और फिर मालिक के लिए खटने जितना ही होता है। यही कारण है कि पीएचडी से लेकर बीटेक-एमबीए किये हुए लोग चपरासी और कलर्क जैसी सरकारी नौकरियों के लिए बड़ी मात्रा में आवेदन कर रहे हैं। हालाँकि ठेका प्रथा की यह बीमारी अब सरकारी विभागों को भी लग चुकी है। 

  एकतरह से हमारा देश रोजगार के एक बड़े अकाल से गुजर रहा है। इसको कोई 20 सालों का सबसे बड़ा अकाल बोल रहा है तो कोई पिछले 45 सालों का सबसे बड़ा अकाल बोल रहा है। खेती की अकाल से किसान मरता है और रोजगार का अकाल आज नौजवानों को निगल रहा है। NCRB के अनुसार मध्यप्रदेश में बेरोजगारी की वजह से होने वाली आत्महत्याओं में 2005 से 2015 के बीच 2000% की बढ़ोतरी हुई है। दूसरी तरफ "बेरोजगार और हताश लोगों की भीड़ का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल" के जिस खतरे की तरफ हरिशंकर परसाई जी अपने लेख "आवारा भीड़ के खतरे" में करते हैं उसकी भी प्रबल संभावना बन रही है। क्या हम भारत के विकास की कल्पना उस देश के नौजवानों को पक्के रोजगार और उस देश के मज़दूरों-किसानों को उनकी मेहनत का सही हक़ दिलाए बिना कर  सकते हैं? अभी तक के विकास में इन दोनों ही क्षेत्रो में अनिश्चतकालीन सूखा नज़र आ रहा है जो बहुत ही खतरनाक संकट की ओर इशारा कर रहा है।  आने वाले समय में यह स्थिति और भयावह हो सकती है अगर वक़्त रहते इस संकट की जड़ को समझ कर उसका कोई इलाज न किया गया तो।

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