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16 April 2019

आप राजनीति में रुचि रखें या न रखें राजनीति आपमें जरूर रुचि रखती है।

Credit : www.cartoonmovement.com
(विश्व में हमारा सम्मान केवल हमारे प्रधानमंत्री को देखकर या हमारी जीडीपी को देखकर नहीं हो सकता। देश केवल नेताओं और पूंजीपतियों से नहीं बनता, देश यहाँ की करोड़ों किसानों, मज़दूरों, कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं से बनता है। देश के विकास में अगर इनकी गिनती न हो तो वह विकास धोखा है। अगर देश के बहुसंख्यक आम जनता आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, बेघरी और महंगाई की चक्की तले पिस रही है तो हमें मानना होगा कि विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के कोई मतलब नहीं है। जब हमें यह पता चलता है कि विश्व भूख सूचकांक में लगातार हमारी रैंकिंग खराब हो रही है और भुखमरी से होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं तो क्या विश्व मे हमारा नाम "ऊँचा" करने के लिए हम अपने सरकारों की पीठ थापथपाएँगे?)

✍🏼 चंद्रसेन सिंह

 बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि हमको राजनीति से क्या लेना-देना, हमें तो अपना काम करना चाहिए। सारे नेता या "प्रबुद्धजन" छात्रों को राजनीति से दूर रहने की भी हिदायत देते हैं। दरअसल यह राजनीति ही है जो हमारे जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। राजनीति का लोगो के साथ किस प्रकार का संबंध है? तथा वह लोगो को किस प्रकार प्रभावित करती है? कई बार लोग ऐसे क्यों सोचने लगते हैं जैसा कि राजनीति  के ठेकेदार उनसे सोचवाना चाहते हैं? क्यों राजनीति में आज कल लोग अंधभक्त बनते जा रहे? ऐसे कई सवाल राजनीति से ही जुड़े हुए हैं। 

वास्तव में हमारी प्लेट में हम क्या खाएंगे, हमको दाल नसीब होगी कि नहीं, हम गैस भरवा पाएंगे कि नहीं, हम पम्पिंग सेट में डीजल भरकर अपने खेत की सिंचाई कर पाएंगे या नहीं, हमारा बेटा अच्छे कॉलेज में पढ़ पायेगा या नहीं, हमको रोजगार मिल पायेगा या नहीं, हमको सही इलाज मिल पायेगा कि नहीं यह सबकुछ राजनीति से तय होता है। हम राजनीति  से भाग नहीं सकते। हम राजनीति में रुचि लें या न लें राजनीति हममें जरूर रुचि लेती है। 
राजनेता और प्रसिद्ध विद्वान सी.  राजगोपालाचारी कहा करते थे कि राजनीति किसी देश का चरित्र होता है जो पूरी  दुनिया में उसके निवासियों का सम्मान निर्धारित करता है ।
लेकिन भारत में आजकल इतने निचले स्तर की राजनीति की जा रही है कि लोगो का राजनीति पर से विश्वास उठना स्वभाविक है। पर राजनीति से नाक-भौं सिकोड़ना क्या आम जनता के हित में है? अगर राजनीति बुरे लोगों का अखाड़ा बन चुकी है तो राजनीति के इस बिगड़ते स्वरूप को कैसे ठीक किया जा सकता है इसके बारे में हम लोग क्यो नही सोचते हैं?
विश्व में हमारा सम्मान केवल हमारे प्रधानमंत्री को देखकर या हमारी जीडीपी को देखकर नहीं हो सकता। देश केवल नेताओं और पूंजीपतियों से नहीं बनता, देश यहाँ की करोड़ों किसानों, मज़दूरों, कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं से बनता है। देश के विकास में अगर इनकी गिनती न हो तो वह विकास धोखा है। अगर देश के बहुसंख्यक आम जनता आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, बेघरी और महंगाई की चक्की तले पिस रही है तो हमें मानना होगा कि विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के कोई मतलब नहीं है। जब हमें यह पता चलता है कि विश्व भूख सूचकांक में लगातार हमारी रैंकिंग खराब हो रही है और भुखमरी से होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं तो क्या विश्व मे हमारा नाम "ऊँचा" करने के लिए हम अपने सरकारों की पीठ थापथपाएँगे? हम जब सुनते हैं भारत भ्रष्टाचार के मामले में एशिया का सबसे भ्रष्ट देश बन चुका है तो क्या यह भी हमारे देश का सम्मान ऊँचा करता है? जब हम सुनते हैं कि विश्व प्रसन्नता सूचकांक में भारत का स्थान (156 देशों में 133वां)  हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी खराब है तो हमें कैसा लगता है? दुनिया मे भारतीय मीडिया की साख लगातार गिर रही है, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 2018 में 156 देशों में 138वां हो चुका है। 
विश्व भूख सूचकांक में भारत का स्थान
2014 में 99वां
2015 में 93वां
2016 में 97वां
2017 में 100वां
2018 में 103वां
 भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का स्थान  
168 देशो की सूची में 
 2015 में 76 वां 
 2016 में 79 वां
 2017 में 81वां
 2018 में 78 वां है। 
इसी प्रकार 
मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 
188 देशो की सूची में
2015 में 130 वां
2016 में 131 वां
2017 में 130 वां
2018 में 130 वां
 इस प्रकार की रैंकिंग को देखकर हम अपने आप को कितना सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करते होंगे? जिससे हमारा और हमारे देश की जनता का भविष्य तय होना है उस रैंकिंग में हम इतना पीछे कैसे रह गये? क्या इसके लिए हमारा राजनीति से दूर रहना जिम्मेदार नहीं है? क्या अपने जनप्रतिनिधियों से हमनें इन मुद्दों को उठाया? 
2014 के लोक सभा चुनाव में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, काला धन, बेघरी जैसे मुद्दों को लेकर काफी चर्चा हुई थी ,तथा भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे , बेरोजगारी खत्म करेंगे, कालाधन वापस लायेंगे,   खुशहाली आयेगी जैसे वादे किए गए थे । पर न तो बेरोजगारी गई (उल्टा बढ़ गयी) , न ही भ्रष्टाचार खत्म हुआ, न काला धन आया और न ही ख़ुशहाली आई।  ऊपर के सारे सूचकांकों को देखे तो पता चलेगा कि पांच वर्ष पहले जैसा भारत था आज भी लगभग वैसा ही है या उसने खराब हालत में ही गया है। इसके बावजूद आज सवाल पूछने वालों से ज्यादा सरकार की भक्ति करने वालों की संख्या है। सरकार की भक्ति, चाहे वो कोई भी सरकार हो, लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। सवाल उठाना ही जनतंत्र को मजबूत करना है, सवाल उठाना ही तानाशाही पर वार करना है।
आज हमारी राजनीतिक उदासीनता ने भारत की राजनीति को कहा ला खड़ा किया है, इसकी कुछ बानगियाँ देखते हैं- 
 
(1) राजनीति का व्यवसायिकरण
 यदि हम भारत की राजनीति को थोड़ा गहराई से देखें और समझें तो हमें पता चलेगा कि राजनीति पूर्णतः व्यवसाय बन चुकी है। प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने कहा था कि राजनीति दो प्रकार से की जाती है - कोई राजनीति के लिए जीता है या राजनीति पर जीता है। आज राजनीति पर जीने वालों की संख्या राजनीति के लिए जीने वालो की संख्या से काफी अधिक है , राजनीति के लिए जीने वाले लोगो की संख्या नाममात्र की रह गई है ।
 भारत मे अजादी के बाद मुठ्ठीभर अमीर लोगों की सेवा ही राजनीति का मुख्य पहलू बन गया। पार्टियों की फंडिंग बड़े बड़े पूंजीपति, धन्नासेठ करने लगे और सरकार की नीतियाँ इनके मुनाफे को ध्यान में रखकर बनने लगीं। राजनीति एक व्यवसायिक निवेश बन चुका है, बड़े बड़े पूंजीपति तमाम दलों में से एक को चुनते हैं, उनका मीडिया जोर-शोर से उस दल का प्रचार करते हैं और फिर चुनाव जीतने के बाद इन पूंजीपतियों को कहीं मुफ्त में ज़मीन तो कहीं कर्ज़ माफी तो कहीं सरकारी ठेकों से नवाजा जाता है। 
आज के समय मे राजनीति का व्यवसायिकरण इस हद तक बढ़ गया है कि छोटे से छोटे गांव के प्रधान के चुनाव में भी लोग 5 से 10 लाख रुपये खर्च कर दे रहे हैं। अब 10 लाख रुपये जो खर्च किये है वह तो उनका मूलधन है। वह जब तक  50 लाख रुपये व्याज सहित मिश्रधन नही निकाल लेंगे तब तक उन्हें गांव में कोई काम नजर नही आएगा। यदि उच्च स्तर के चुनाव की बात करें तो आप को टिकट पाने के लिए पहले करोड़पति होना पड़ेगा। तभी तो आप चुनाव में करोड़ो रूपये लगाएंगे और बाद में ब्याज सहित अरबो रुपये निकालेंगे। 

(2) राजनीति में अपराधियों का बढ़ता ज़ोर
तमाम पार्टियों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की भरमार बढ़ती जा रही है। इसके कई कारण है, पहला तो यह है कि इसके लिए हमारे देश मे अभी तक कोई ठोस कानून नही बन पाया है ,और इसकी उम्मीद भी कम है क्योंकि हमारे देश मे जो कानून निर्माता है उन्हीं में से 35% से अधिक के ऊपर हत्या, बलात्कार, दंगा भड़काने, घोटाले जैसे गंभीर अपराधों के आरोप लगे हैं। वह ऐसा कानून बनाने के बारे में कैसे सोचेंगे जिससे खुद उनका पूरा अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा? 
2018 में देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था की यदि किसी व्यक्ति के ऊपर आरोप निर्धारित हो चुके हैं लेकिन अभी सजा नही हुई, ऐसा व्यक्ति लोकसभा व विधानसभा का चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने का क़ानून सुप्रीम कोर्ट नही अपितु पार्लियामेंट बना सकती है और कोर्ट ने देश की संसद को इस बारे में कानून बनाने को भी कहा। जबकि इसपर कानून कुछ और ही बना। कानून यह बना की कोई व्यक्ति कितने भी अपराध क्यों न किया हो जब तक उसका अपराध साबित नही हो जाता तब तक वह चुनाव लड़ सकता है और यदि अपराध साबित भी हो जाता है और उसे 2 वर्ष की सजा हो जाती है तो वह अगले 6 वर्ष तक चुनाव नही लड़ सकता है। 6 वर्ष बाद वह फिर चुनाव लड़ सकता है। शायद वह अपराधी व्यक्ति 6 वर्ष बाद संत बनकर लौटेगा।

लोकतांत्रिक संस्थाओ में अपराधियों की भरमार बढ़ने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है पार्टीवाद की राजनीति। पार्टीवाद की राजनीति से मतलब है कि यदि हम कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा इत्यादि पार्टियों के समर्थक है तो हम उनका या उनके स्थानीय नेता का विरोध नही करते हैं, चाहे वे लाख गलतिया क्यों न करें, हम पार्टी का चेहरा देखकर या उसका नेतृत्व देखकर उससे चिपके रहते हैं। इसी कारण पार्टियां अपराधियों, बलात्कारियों, दंगाइयों या राजनीति से बिल्कुल मतलब न रखने वाले फ़िल्म कलाकारों, क्रिकेटरों को भी चुनाव मैदान में उतार देती है। उन्हें पता है कि इंडिया के लोग अंधभक्ति में डूबे हुए है ,वे पार्टी के उम्मीदवार को कम पार्टी को ज्यादा ध्यान में रखते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि भक्ति किसी की भी न कि जाय, सवाल सबसे पूछे जाएँ, अगर हमारी पार्टी कोई गलत उम्मीदवार खड़ा करती है तो हम खुद इसके विरोध में खड़े हों। पार्टीयों से यह मांग की जाय कि कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाकर उम्मीदवार का निर्णय लिया जाय, न कि बंद कमरों की मीटिंगों में। और वादा किया हुआ काम न होने पर हमने जिसको वोट दिया है उससे हमे प्रश्न करने चाहिए हमे उसके ऊपर जनदबाव बनाना चाहिए और अगर इसपर भी अगर चयनित नेता हमारी बात नहीं सुनता है तो अगले चुनावों में उस नेता का बहिष्कार करना चाहिए। 

इसी तरह केवल उम्मीदवार की जाति देखकर वोट देना भी उतना ही ख़तरनाक है। इसी जातिवादी मानसिकता को ध्यान में रखते हुए सभी पार्टियां अपने उम्मीदवार खड़े करती हैं। जीतता कोई भी है पर न तो जनता को कुछ मिलता है ना ही उस नेता के जाति वालों को। एक प्रसिद्ध कथन इस संदर्भ में काफी प्रासंगिक है- जंगल मे पेड़ खत्म हो रहे थे और सारे पेड़ कुल्हाड़ी को वोट कर रहे थे क्योंकि कुल्हाड़ी में लगी लकड़ी उनकी जाति की थी।
आज इसबात की बेहद जरूरत है कि पार्टीवाद और जातिवाद के नाम पर वोट न किया जाय।

(3) ध्रुवीकरण की राजनीति
आज कल के राजनीतिक परिणामों को देखकर ऐसा लगता है कि राजनैतिक परिणाम जनता के मुद्दे और सरकार के कामों पर कम निर्भर करते है बल्कि जुमले और ध्रुवीकरण की राजनीति पर सबसे अधिक निर्भर करते हैं। जो जितना अधिक ध्रुवीकरण कर लेगा जो जितना अधिक जुमलेबाजी कर लेगा उनका परिणाम भी उतना ही अच्छा होगा। मौजूदा भाजपा सरकार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 
जातिवादी राजनीति हो या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति 
या राष्ट्रवाद के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति, बहुमत के समुदाय के बीच एक असुरक्षा का वातावरण पैदा कर बीजेपी काफी चालाकी से अपनी चुनावी नैया पार कराने में सफल होती रही है। हिंदुओं का अस्तित्व मिट जाएगा, हिन्दू संस्कृति खतरे में है, 2050 तक भारत इस्लामिक हो जाएगा, पाकिस्तान, आतंकवाद आदि मुद्दे उभाड़कर लोगों की भावना का दोहन करने में बीजेपी-आरएसएस ने काफी सफलता पाई है।  पर जैसा कि ध्रुवीकरण की राजनीति के साथ होता है, उसका उस सम्प्रदाय की रक्षा या संस्कृति रक्षा से कुछ लेना देना नहीं होता है, इसका असली उद्देश्य बांटों और राज करो कि अंग्रेजों की नीति का अनुसरण करके सत्ता हासिल करना ही होता है। इसलिए आज साम्प्रदायिक-जातिगत ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद से भी बचने की जरूरत है। भावना की जगह तर्क को सबसे ऊपर रखने की जरूरत है। भगतसिंह ने कहा था कि साम्प्रदायिक दंगों का इलाज लोगों की आर्थिक दशा में सुधार है इसलिए आज हमें अपने वास्तविक मुद्दों जैसे बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, महँगाई, बेघरी, कम उम्र में मौतें आदि मुद्दों को सबसे पहले उठाने की जरूरत है और वोट मांग रहे नेताजी से यह पूछने की जरूरत है कि जाति-धर्म रक्षा तो सब ठीक है पर आप इन मुद्दों पर क्या करने वाले हैं?

10 April 2019

लोकतंत्र को खतरा आज उसके चौकीदारों से है।


✍🏼 कौशिक 

हाल ही में यह बात सामने आई है कि ज़ी कंपनी से जुड़े चैनलों द्वारा प्रसारित कार्यक्रमों में अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार का प्रचार किया जा रहा है। यह टीवी कार्यक्रम जिनमें एक AND TV पर  "भाभीजी घर पर हैं" व दूसरा ZEE TV पर आने वाला कार्यक्रम "तुझसे है राबता" हैं। ये कार्यक्रम अपने कंटेंट में मोदी सरकार का प्रचार करके आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। ज्ञात हो कि ये दोनों चैनल ज़ी एंटरटेनमेंट इंटरप्राइजेज से जुड़े हैं जिसके मालिक बीजेपी समर्थित राज्यसभा सांसद सुभाष चंद्रा हैं। इसके कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NAMO TV लांच किया। वैसे नमो टीवी की कोई जरूरत नहीं थी जब पहले से ही मुख्यधारा मीडिया सरकार का दरबारी कवि बन चुका है। यही नहीं, चुनाव शुरू होने ठीक समय, 11 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फ़िल्म आ रही है। चुनाव के ठीक पहले इस तरह की तमाम चीजें किस ओर इशारा कर रही हैं?? 

    मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा गया है, क्या आज यही बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है? क्या वर्तमान परिस्थितियों में लोकतंत्र की मूल आत्मा पर ही आघात नहीं हो रहा है?

लोकतंत्र का मूल आधार इस बात में निहित है कि लोग स्वतंत्र रूप से अपने नेता का चुनाव कर सकें। "स्वतंत्र" रूप से चुनने का मतलब है - बिना किसी बाहरी दबाव के, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपनी मर्ज़ी से अपना विकल्प चुनना। क्या यह अधिकार आज सुरक्षित है?
  वैसे यह बात स्पष्ट करना जरूरी है कि पहले से ही हमारे पास चुनने के लिए कुछ खास विकल्प मौजूद नहीं हैं। आज जनता इस बात को अच्छी तरह से समझती है कि चाहे वो किसी नेता को भी चुन लें, अगले 5 साल वो फिर मुहँ दिखाने नहीं आएगा। वर्तमान पार्टियों में करोड़पति, अपराधिक पृष्टभूमि के, हत्या, आगजनी व बलात्कार के आरोपी नेता बड़े पैमाने पर मौजूद हैं।
  इसके बावजूद आज जिस तरह लोगों के दिमाग पर नियंत्रण करने की कोशिश की जा रही है वह "स्वतंत्र चुनाव" की आत्मा पर ही हमला है। लोग अपनी सोच के अनुसार ही निर्णय लेते हैं और लोगों की सोच बनती है उनके आसपास के माध्यमों जैसे कि अखबार, टीवी मीडिया, सोशल मीडिया, किताबें, फिल्में, धारावाहिक इत्यादि। अगर कोई पार्टी या सरकार इन सब पर नियंत्रण कर ले तो वह यह तय कर सकती है कि लोग क्या सोचें और क्या नहीं सोचें, लोग किन मुद्दों पर बहस करें और किन मुद्दों को भूल जायें। 

सरकार ⬅ स्वतंत्र निर्णय ⬅ स्वतंत्र सोच ⬅ लोगों की जानकारी के स्रोत 

आज पीआर एजेंसी और आईटी सेल का बढ़ता इस्तेमाल उसी खतरे का एक और पहलू है। इंडियन आर्मी के नाम से सैकड़ों फेसबुक पेज बीजेपी आईटी सेल के लोग चला रहे, फिल्मी सितारों के नाम से, शायरी, जोक्स और चुटकुला आदि नामों से पेज व ग्रुप बनाकर उसमें एकतरफा तरीके से चीजों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे एक गुलाम सोच वाले समूह का निर्माण हो रहा है। अगर कोई व्यक्ति किसी पार्टी के आईटी सेल के पेज लाइक कर देता है व वाट्सएप्प पर भी उन्हीं विचारों वाले ग्रुप से जुड़ जाता है तो बहुत संभव है की उसकी सोच किसी पार्टी की गुलाम बन जाएगी। फेसबुक और यूट्यूब का अल्गोरिथम उसको ऐसे ही पोस्ट या वीडियो रिकमेंड करेगा जो उसकी सोच को और पुख्ता बनाएंगे। ऐसे में एकतरफा जानकारी के कारण हो सकता है कि वह किसी पार्टी का कट्टर समर्थक बन जाये और किसी अन्य पार्टी का कट्टर विरोधी। फिलहाल हम मूल मुद्दे पर आते हैं। 

सच और प्रचार में जो फर्क होता है उसे अगर समाप्त कर दिया जाये तो लोगों को काफी आसानी से गुमराह किया जा सकता है। उदाहरण के लिए आप टीवी विज्ञापन में सुनते हैं कि  "डॉक्टरों ने पाया है कि फला साबुन 99% कीटाणुओं को समाप्त कर देता है।" तो उसकी विश्वनीयता उतनी नहीं होती, जबकि यही अगर किसी न्यूज़ चैनल पर खबर के रूप में बताया जाए कि "डॉक्टरों ने पाया है कि फला साबुन 99% कीटाणुओं को साफ कर देता है।" तो इसकी विश्वनीयता काफी ज्यादा होती है। फिल्मों और धारावाहिकों के पहले यह डिस्क्लेमर इसी लिए दिखाया जाना जरूरी होता है कि इस घटना के सभी पात्र काल्पनिक हैं या यह फ़िल्म सही घटनाओं पर आधारित है (यानी पूरी सही नहीं है, बस आधारित है)। इसके बावजूद फिल्मों का और अन्य दृश्य माध्यमों का काफी गहरा असर हमारे दिमाग पर पड़ता है क्योंकि एक तरीके से उस चीज को हमनें अपनी आँखों से देखा, कानों से सुना होता है, एक तरीके से उसे जीया होता है। ऐसे में डिस्क्लेमर का एक हद तक ही असर होता है खासतौर पर राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों,घटनाओं और व्यक्तियों पर बनी फिल्मों में डिस्क्लेमर का खास मतलब नहीं रह जाता। लोगों ने जो अपनी आँखों से देखा है, जो कानों से सुना है वो (झूठ या सच) उनके दिमाग में लंबे समय तक अंकित रहता है। आज जिस तरह सरकार या पार्टी के प्रचार को फिल्मों, धारावाहिकों के माध्यम से पहुँचाया जा रहा है वह इसीलिए खतरनाक है। मीडिया द्वारा सरकार का प्रचार करना और विपक्ष से सवाल पूछना इसीलिए ख़तरनाक है।  यह लोगों के दिमाग को नियंत्रित करने जैसा है। 

इसीलिए चुनावों के दौरान चुनाव आयोग की और सरकार के 5 सालों के दौरान सुप्रीम कोर्ट की भूमिका एक रेफरी की तरह होती है ताकि कोई फ़ाउल न खेले। पर अगर कोई इन संस्थाओं पर ही नियंत्रण कर ले तो वो फ़ाउल खेलते हुए हमेशा जीतता ही रह सकता है।

(नोट- यह लेख प्रकाशित होने तक रेफरी ने अपनी भूमिका निभाते हुए प्रधानमंत्री की बायोपिक के रिलीज होने पर चुनाव की समाप्ति तक रोक लगा दी है। )

05 April 2019

ऑप्शन बी : एक बेरोजगार मोदी भक्त की कहानी

Photo for representation only.


✍🏼नितेश शुक्ला

दिल्ली के साकेत की धूलभरी सड़क पर मैं चल रहा हूँ। शाम धीरे-धीरे सरक रही है। नाली से निकाला गया कीचङ सड़क पर ही रखा है। उससे काली-काली धारियाँ साँप जैसे निकलकर सड़क पर रेंग रही हैं। मैं एक सँकरी गली में मुड़ता हूँ। एक तीन मंजिला इमारत में ग्राउंड फ्लोर के रूम का ताला खोलता हूँ। रूम में एक शान्ति छाई रहती है जिसे मैं भंग कर देता हूँ। सामने टेबल पर बैंक परीक्षा का गाइड रखा हुआ है। हैंगर पर कुछ कपड़े टंगे हैं। कोने में पानी से भरा टब है जिसके बगल में कुछ जूठे बर्तन जैसे मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। दीवार में बनी आलमारी में ऊपर के खाने में किताबें रखी हैं , बीच के खाने में कपड़े ठुसे हुए हैं और नीचे कुछ डिब्बों में आंटा , चावल और दाल वगैरह हैं। शाम ढल रही है और अब सब्जी लाने जाना होगा। मोबाईल की घंटी बजती है, देखा तो माँ का फोन है। उस चिरपरिचित आवाज़ में माँ पूछती है, कैसे हो बेटा? और मेरा रोज का जबाब - अच्छा हूँ। गाँव की कोई बात सुनाती है, मेरी आँखें बंद होने लगती हैं और गाँव दिखने लगता है। घर की ठंढी छाँह मन में दौड़ने लगती है। अच्छा था या बुरा था पर बेफिक्री तो वहीं थी। फिर ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जिनमें गलत उत्तर ही सही जबाब होता है। मैं रोज के उन सवालों के जबाब 'ऑप्शन बी' देता रहता हूँ। अपना ख़याल रखना , ठीक से खाना-पीना बोल के माँ फोन रख देती है।एक गहरी साँस लेता हूँ फिर ,जैसे किसी से पीछा छुड़ा लिया। मैं चाहता हूँ बात जल्दी खत्म हो, या न करनी पड़े बात , माँ से या किसी परिचित से। उन सवालों का सामना नहीं करना चाहता जिनका उत्तर हमेशा ऑप्शन बी देना पड़ता है, जबकि सही उत्तर कुछ और होता है। मैं इस शाम से डरता हूँ , ये मुझे अकेला कर देती है। इस साल 12 फॉर्म भरे हैं , 4 की परीक्षा दे चुका हूँ, 5वां कल सुबह है।

      कमरे की दीवारें तीन साल से चुपचाप मुझे देख रही हैं। शाम 8 से 12 बजे रात तक मेरे साथ  लाभ-हानि के फॉर्मूले ये भी याद करती होंगी। 13 का घनमूल इनको भी याद हो शायद। 3 साल से हर रोज गर्म चावल की खुशबू को इन्होंने भी चखा है। छत पे घूम रहे पंखे ने तीन सालों में मेरे बराबर मेहनत की है।

      अगला घंटा सब्जी लाने और खाना बनाने में गुजरता है। गरम-गरम भात और सब्जी खाते हुए खुद को सराहता हूँ। बाहर आकर इतना तो सीखा।

     9 बज चुके हैं , अब किताबों और नोट्स के पन्ने पलटते हुए समय भाग रहा है। रात की इस शांति में पंखे की आवाज़ और बीच बीच मे पन्ने पलटने की आवाज़ ही आती रहती है। कल तक जो फॉर्मूले याद लग रहे थे आज मुँह चिढ़ाते हुए दिख रहे हैं। सभी मोबाईल पेंसिल हैं और सभी किताबें मेज हैं वाला सवाल दिमाग में और हुड़दंग मचा देता है। जल्दी जल्दी फॉर्मूले दुहराकर सोना भी है।

    अब 12 बज चुके हैं। बिस्तर पर लेट गया हूँ पर नींद का ठिकाना नहीं है। पूरी दिल्ली सो रही है, कल सुबह जब दिल्ली जगेगी , सड़कों पर गाड़ियां दौड़ेंगी तब मेरे हाथ में एक प्रश्नपत्र होगा और दिमाग में जबरदस्त हलचल होगी। पिछली बार इस परीक्षा में कटऑफ से 12 अंक कम मिले थे। इस बार पिछली बार से आधी भर्तियों के ही पद निकले हैं जबकि पिछली बार से लगभग दुगुने लोग इस बार परीक्षा में बैठ रहे हैं। थोड़ा डर सा लग रहा पर खुद को भरोसा दिलाता हूँ कि इस बार मेहनत भी तो पिछली बार से ज्यादा की है।

    1 बज गए पर नींद गायब है। ढलती हुई रात मेरे आत्मविश्वास को और भी कमज़ोर कर रही है। आँखे बंद करने पर कुछ भूतकाल की परछाईयाँ  सामने आ जाती हैं। गणित की कमज़ोरी बचपन से रही है। बाबूजी से बोला था ट्यूशन लगाने को पर पता था धान बेचकर किताबें खरीदी जा रही हैं, कहाँ से पैसा आएगा। स्कूल की बकाया फीस के लिए मार खाने के डर से स्कूल छोड़कर नहर के पुलिया पर भैंस चराने वालों के साथ समय गुजारा, फिर भला कैसे गणित समझ में आती। इस बात पर हँसी भी आई कि बचपन में स्कूल में खुद के मार खाने के लिए खुद ही डंडा तोड़ के लाना पड़ता था।  ये सब सोचते-सोचते आखिर नींद ने रहम कर दिया।

    सुबह दूध वाले की आवाज़ से नींद टूटी। बाहर पूरी दिल्ली जाग चुकी थी। ये सुबह रोज जैसी नहीं थी। अलार्म कब बजा पता नहीं चला , उठने में ही देर हो चुकी थी।  कुछ ऐसा था जो परिस्थितियों को प्रतिकूल कर दे रहा था। चाय बनाने के लिए गैस चालू की तो एक मिनट जल कर खतम हो गयी। सोचा तैयार होकर निकलता हूँ रास्ते में चाय नाश्ता कर लूंगा। नहाने तैयार होने में 8 बज गये। साकेत से विश्वविद्यालय जाना था,  डेढ़ घंटे लगते। जल्दी जल्दी नोट्स की कॉपी और गाइड बैग में लेकर निकल गया कि रास्ते मे पढ़ लूंगा। सड़क पर आया तो ऑटो वाला ही नहीं आ रहा था। गुस्सा आने लगा कि आज क्यों नहीं आ रहा। मुझे नौकरी न मिले इसकी साजिश पूरी दिल्ली करते हुए लग रही थी। थोड़ी देर में ऑटो मिल गयी और मैं मेट्रो स्टेशन पहुच गया। मेट्रो में इतनी भीड़ थी कि खड़ा होकर भी पढ़ना मुश्किल था और फिर मन बार बार समय पर पहुँचने के लिए विचलित हो रहा था। एक बार सारे फॉर्मूलों को देख लेता तो ठीक से याद हो जाते। जैसे तैसे परीक्षा केंद्र पहुच गया। लग रहा था जैसे किसी सैनिक को टूटे फूटे हथियारों के साथ लड़ने मैदान में भेज दिया गया हो।

     परीक्षा केंद्र पर परीक्षा थोड़ी देर में शुरू होने को थी। एग्जाम हाल में सब अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर निगाहे लगाए बैठे थे। कुछ कुर्सियां अभी भी खाली थीं, कुछ लोग अपने बाजू वालों से कानाफूसी वाली आवाज़ में बातें कर रहे थे। एक कंप्यूटर पर मेरा नाम लिखा था। ये पूरा माहौल देख कर मेरे दिल की धड़कनें बढ़ चुकी थीं और कॉन्फिडेंस विदाई ले रहा था। जल्दी से पहुँचकर मैं सीट पर बैठ गया। स्क्रीन पर परीक्षा शुरू होने की उल्टी गिनती चल रही थी। 2 मिनट 33 सेकण्ड बचे थे। अभी दिशा-निर्देश  भी पढ़ने थे। जल्दी जल्दी उनपर नज़र दौड़ाई। नेगेटिव मार्किंग भी थी, कुल 100 सवाल थे, सही पर 4 और गलत होने पर -1। उल्टी गिनती अब जीरो पर पहुच रही थी और तभी परीक्षक ने लॉगिन करने को बोला। परीक्षा शुरू हो चुकी थी।

   माँ सरस्वती का नाम लेकर लॉगिन किया, सवाल सामने थे। कुछ मिलते जुलते, कुछ भूल बिखरे से, कुछ बाउंस मारते हुए, कुछ आसान से भी , कुछ उलझाने वाले, कुछ आसान से पर फार्मूला दिमाग से नदारद था, कुछ सुलझे हुए पर उत्तर दो सही लग रहे थे, कुछ सीधे तो कुछ टेढ़े। 20 मिनट गुजर चुके थे 15 सवाल पढ़े पर 6 ही हल हो पाए। समय भाग रहा था। दिमाग मे भी जबरजस्त हलचल हो रही थी। आगे अंग्रेजी आने वाली थी ,उसमे तो और दिक्कत होगी। इन 50 एप्टीट्यूड के सवालों में अच्छा स्कोर करना था। अगले 15 सवाल भी गुजर गए जिनमें 7 हल हो पाए।  20 सवाल बचे थे। अब फिर दौर शुरू हुआ डिडक्टिव रीजनिंग का। सभी आदमी पेड़ हैं , कुछ पेड़ बकरियाँ हैं। रमेश रिया से छोटा है पर मोहन से बड़ा है। रिया दीप्ती से बड़ी है जो खुद राजू से बड़ी है। ये सब सवाल सही हल हुए या नहीं पता नहीं। एप्टीट्यूड अब खत्म हो चुका था और 50 में 23 सवाल हल हुए थे। अंग्रेजी का दौर अंग्रेजों को गाली देते हुए गुजरने लगा। sarcasm, criticism के ज्यादा करीब है कि taunt के, इनके बीच की करीबी में परीक्षक को इतनी रुचि क्यों है?

 पूरा पेपर बीतने पर भी 100 में से 39 प्रश्न ही हल हुए। इतने में तो कुछ नही होना था। 2 घंटे से ज्यादा हो चुके थे। अब कई बातें जेहन में तैरने लगीं। सुबह पढ़ पाया होता तो शायद और सवाल हल हो जाते। इसबार का पेपर ही कठिन बना है शायद, या क्या पता मुझे ही कठिन लग रहा हो, बाकी सब तो सवाल हल करने में व्यस्त हैं। इसबार भी सेलेक्शन मुश्किल है। बाबूजी पूछेंगे हुआ कि नहीं और बिना पूरा उत्तर सुने बाहर चले जायेंगे। मौसा जी हँसते हुए फिर पूछेंगे जॉब लगी कि नहीं। गाँव के पुरनिये पीछे से बोलेंगे की सभे ऑफीसरे थोड़े न बन जाईं। समझ नहीं आ रहा था कि खुद को कोसूं या किसी और को। इसबार तो पिछली बार से आधे पदों की भर्ती ही निकली है ,ऊपर से परीक्षा देने वाले लोग दुगुने हो गए हैं। कल अख़बार में देखा कि सरकार 5 साल से खाली पड़े 5 लाख पदों को समाप्त करेगी। और एक बयान भी कि रोजगार नहीं  तो सड़क के किनारे पकौड़े बेचो। एक गुस्सा उमड़ा अंदर, इस सरकार के लिए दोस्तों से बहस किया, गाँव में लोगों से वोट मांगे , फ़ेसबुक-वाट्सएप्प पर पोस्ट लिख-लिखकर लोगों से झगड़ा किया कि इनको मौका तो दो, देखना हम एक दिन नए उज्ज्वल भारत का चेहरा देखेंगे। अंधेरे में एक उम्मीद की किरण देखी थी हमनें इस सरकार में पर अब लगा कि जैसे मैं एक ऐसी चीज था जिसे इस्तेमाल करके कचरे में फेंक दिया गया हो, जैसे एक गरीब को महलों के सपने दिखाकर उसकी झोपड़ी ले ली गयी हो। जिस पार्टी ने विकास, रोजगार, भ्रष्टाचार, कालाधन के नाम पर वोट लिया था अब राम मंदिर, पाकिस्तान, धर्मरक्षा, गोरक्षा की रट लगा रही है। इस नए भारत में झूठों की, फेक ख़बरों की बाढ़ आयी है।  सोचा कि अगर गलत उत्तर लिखने से हमारे नंबर काट लिए जाते हैं और हम फेल हो जाते हैं तो इन नेताओं द्वारा इतना झूठ बोलने पर कुछ क्यों नहीं होता? क्या जनता के पास चार विकल्पों में एक सही विकल्प मौजूद है? या चार चोरों में से एक को चुनना ही है? सिर को झटक दिया, मैं एग्जाम हॉल में था। परीक्षा खत्म होने में 5 मिनट थे। अब लगने लगा कि और सवाल तो करना ही पड़ेगा। कटऑफ तो ऐसे भी क्लियर नहीं होना है। मैंने खुद से कहा, कहने दो सालों को तुक्केबाज और कंप्यूटर पर बचे हुए अगले हर सवाल का एक ही जबाब देने लगा, 'ऑप्शन बी'।

03 April 2019

हाँ मोदीजी, हिन्दू "आतंकवादी" नहीं होते।


 ✍🏼 विकास गुप्ता 
 
(भारतीय राजनीति का ये बुरा दौर ही कहा जायेगा जब कोई सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी जनता के जरूरी मुद्दों पर चुनाव न लड़ कर धर्म के नाम पर, मंदिर के नाम पर, लोगों को आतंकवाद और पाकिस्तान से डरा कर चुनाव लड़ रही है। बीते पांच सालों में देश की आर्थिक हालात बदतर होते गए हैं जिससे बेरोजगारी अपने चरम स्तर पर है। वर्तमान में सरकार अपने आप को चौतरफ़ा घिरा हुआ पा रही है। सरकार के सारे स्टंट योजनाएं जैसे नोटबन्दी और GST बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुए हैं और इसकी वजह से 1.1 करोड़ लोगों की नौकरी चली गयी। बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है और इस मुद्दें पर कोई नेता बोल नही पा रहा है। चारो तरफ से मुद्दाविहीन होती जा रही सत्ताधारी पार्टी के पास बहुसंख्यक आबादी को ध्रुवीकरण करने के अलावा और कोई विकल्प नही हैं।)

दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली में कहा कि इतिहास देखे तो कोई एक भी आतंकी घटना हिंदुओं ने नही की है और हिन्दू आतंकवाद शब्द कांग्रेस ने हिन्दूओं को बदनाम करने के लिए बनाया है। यह बयान काफी चालाकी भरा है, इसका जबाब देते-देते मोदी के विरोधी इसमें फँस सकते हैं। आईये देखते हैं कैसे- 
मोदी जी ने कहा है कि हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता।
ऐसे में बहुत सारे लोग इस बयान का खंडन करते हुए कहेंगे कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधी जी की हत्या से लेकर सनातन संस्था द्वारा किये गए बम धमाकों तक के लिए हिन्दू कट्टरपंथ जिम्मेदार रहा है। 
ऐसे में बीजेपी ऐसा माहौल बना सकती है कि देखिए कैसे ये लोग हिंदुओं को आतंकवादी साबित करने पर तुले हैं। 
इस प्रकार काफी चालाकी से एक बड़ी हिन्दू आबादी के बीच ध्रुवीकरण हो जाएगा, बिना कोई नकारात्मक भड़काऊ बयान दिए। फिलहाल बात यह है कि इसका खंडन आम लोग ही कर रहे, किसी विपक्षी नेता ने इसपर कोई टिप्पणी नहीं की है। 

 एक चीज़ जो पूरी तरह से साफ दिख रही है कि 2014 के चुनावों में जिस तरह गुजरात मॉडल, विकास, कालाधन, भ्रष्टाचार आदि मुद्दा हुआ करता था, आज मुद्दे बदल चुके हैं। इनकी जगह पर बीजेपी साम्प्रदायिकता, आतंकवाद और राष्ट्रवाद का भरपूर इस्तेमाल कर रही है। इसकी तैयारी 2014 से ही चल रही थी। आये दिन व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर पर हमेशा ऐसे फेक या भड़काऊ चीजें प्रसारित किया जाता रहता है जिससे माहौल ख़राब कर के बहुसंख्यक आबादी को अपने पक्ष में कर के वोट लिया जा सके। इसीलिए आज एक बड़ी आबादी ऐसी भी पैदा हो गयी है जो यह कहती है- 
"रोजगार नहीं चाहिए, विकास नहीं चाहिए, शिक्षा-चिकित्सा नहीं चाहिए पर राम मंदिर चाहिए।"
जो यह कहती है कि- 
"चाहे 200 रुपये लीटर पेट्रोल खरीद लेंगे लेकिन मोदीजी को ही जिताएंगे।"
ऐसे लोगों के दिमाग मे पुछले कुछ सालों में यह बात बैठा दी गयी है कि हिन्दू संस्कृति खतरे में हैं जिसे मोदीजी ही बचा सकते हैं, बाकी पार्टियाँ तो देश के खिलाफ हैं। ऐसे लोगों के दिमाग पर बीजेपी-आरएसएस आईटी सेल का एक वर्चस्व बन चुका है। जो इनकी सोच को इसतरह से ढाल रहा है कि इनको बीजेपी का विरोध करने वाला हर व्यक्ति देशद्रोही लगे, या देश के खिलाफ साजिश करने वाला लगे, पाकिस्तानी एजेंट लगे। हरिशंकर परसाई ने कहा था कि  ऐसी भीड़ का इस्तेमाल ताकतवर लोग अपने राजनीतिक फायदों के लिए कर सकते हैं। 

  जहाँ तक आतंकवाद की बात है वो किसी विशेष धर्म से नही जुड़ा है जबकि आतंकवाद की समस्या पूरी तरह से एक राजनीतिक-आर्थिक समस्या है। प्रधानमंत्री आरएसएस की जिस विचारधारा को लेकर चलते हैं उनसे इस तरह की बातें सुनकर आश्चर्य की कोई बात नही है। दंगे करवाना, फ़र्ज़ी एनकाउंटर करवाना, बलात्कारियों के समर्थन में रैली निकालना ये शायद इनकी आतंकवाद की परिभाषा में नहीं आता। 2002 के गुजरात दंगों में बीसों लोगों को मौत के घाट उतारने वाला बाबू बजरंगी इसीलिए बाहर आ सका है कि शायद वह "आतंकवाद" की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। दादरी में अखलाक की गाय के मांस खाने के शक के आधार पर जो हत्या हुई उस हत्या का मुख्य अभियुक्त शायद इसीलिए योगी आदित्यनाथ की सभा मे सबसे आगे स्थान पा सकता है। शायद इसीलिए स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी नाथूराम गोडसे आरएसएस व हिन्दू महासभा के लिए एक "शहीद नाथूराम जी" हो सकता है। समझौता एक्सप्रेस धमाके के अभियुक्त NIA द्वारा मुख्य सबूत न दिए जाने के कारण इसीलिए बाहर आ सकते हैं। सनातन संस्था के कार्यकर्ता के घर 20 किलो से ज्यादा विस्फोटक और हथियार मिलने के बाद भी शायद इसीलिए उसपर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है। उत्तर प्रदेश में अभी कुछ दिन पहले ही पुलिस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह की हत्या इसलिये की गई क्योंकि सुबोध ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए एक दंगा भड़कने से रोका था, सुबोध की हत्या भी धर्म बचाने के नाम पर ही की गयी थी।
शायद दंगा भड़काने, हत्या, बलात्कार, को बीजेपी द्वारा आतंकवाद की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता तभी तो ADR की रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी में ही सबसे ज्यादा दंगाई व आपराधिक बैकग्राउंड के नेता भरे पड़े हैं। 
अब फिर से आते हैं प्रधानमंत्री के बयान पर, एक बात स्पष्ट है प्रधानमंत्री ने यह बयान अपने राजनीतिक फायदे के लिए ही दिया है। भारतीय राजनीति का ये बुरा दौर ही कहा जायेगा जब कोई सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी जनता के जरूरी मुद्दों पर चुनाव न लड़ कर धर्म के नाम पर, मंदिर के नाम पर, लोगों को आतंकवाद और पाकिस्तान से डरा कर चुनाव लड़ रही है। बीते पांच सालों में देश की आर्थिक हालात बदतर होते गए हैं जिससे बेरोजगारी अपने चरम स्तर पर है। वर्तमान में सरकार अपने आप को चौतरफ़ा घिरा हुआ पा रही है। सरकार के सारे स्टंट योजनाएं जैसे नोटबन्दी और GST बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुए हैं और इसकी वजह से 1.1 करोड़ लोगों की नौकरी चली गयी। बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है और इस मुद्दें पर कोई नेता बोल नही पा रहा है। चारो तरफ से मुद्दाविहीन होती जा रही सत्ताधारी पार्टी के पास बहुसंख्यक आबादी को ध्रुवीकरण करने के अलावा और कोई विकल्प नही हैं। 2014 में विकास के नाम पर वोट मांगने वाली भाजपा के पास अंधराष्ट्रवाद और धर्म का ही मुद्दा है जिसके दम पर 2019 में किसी तरह लोंगो को भावनात्मक रूप से अपने तरफ कर के ये चुनाव जीतना चाहते हैं। 2014 के सारे मुद्दे बीजेपी भूल चुकी है। धर्म और राजनीति का यह समांगी मिश्रण एक मीठे जहर की तरह है जो स्वाद में अच्छा तो लगता है लेकिन शरीर को बहुत नुकसान पहुचाता है। ऐसे में आज जनता को बीजेपी की इस चाल को समझने की जरूरत है। 

 हमें अपने महान शहीदों को याद करने की जरूरत है, महान लेखकों को याद करने की जरूरत है। भगतसिंह ने जनता को बार बार साम्प्रदायिकता के प्रति आगाह किया था, जनता को ऐसे नेताओं और ऐसी मीडिया से दूर रहने के लिए कहा था। मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई देती है, उसे अपने असली रूप में आने में लज्जा आती है इसलिए वह संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है। आज जो हिन्दू संस्कृति की रक्षा की बात हो रही है शायद हमारे नौजवान उसको इस रोशनी में समझ पाएंगे।

01 April 2019

काँग्रेस की बहुचर्चित "न्याय" के पीछे खड़े दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री क्या चाहते हैं?



✍️ राघवेंद्र तिवारी

(इसमें दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से भी सलाह लिया गया है, जिनमें थॉमस पिकेटटी, नोबेल प्राइज से पुरस्कृत अंगुस डिटॉन, रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी का नाम मुख्यतः लिया गया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है।)

चुनावो का मौसम हो और वादों और घोषणाओं की बारिश ना हो ऐसा कहीं हो सकता है। चुनाव आते ही कोई 15 लाख देने की, कोई गरीबों को पेंशन तो कोई मानधन योजना देकर गरीबी खत्म करने का ढोल पीटने लगते हैं। हाल ही में राहुल गाँधी ने भी इसी तरह का एक शिगूफा उछाला है। "न्याय" के नाम की इस योजना में यह दावा किया जा रहा है कि देश के 5 करोड़ गरीब परिवारों को हर साल 72000₹ की न्यूनतम आय की सहायता दी जाएगी। इससे करीब 25 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे।  राहुल गाँधी ने कहा कि मोदी सरकार ने उद्योगपतियों का डूबा कर्ज़ माफ करने के लिए कई लाख करोड़ रुपया दिया है, कांग्रेस  गरीबों के लिए ये पैसा खर्च करेगी। राहुल गांधी ने इसे गरीबी पर  सबसे बड़ी "सर्जिकल स्ट्राइक" कहा है। इसके पहले बीजेपी सरकार ने भी गरीब किसानों को सालाना 6000 रुपये देने की घोषणा की थी। इन पार्टियों से ये तो पूछना ही चाहिए कि खुद को गरीबों की मसीहा बताने वाली ये पार्टियाँ बेरोजगारी, ठेका प्रथा, न्यूनतम वेतन को बढ़ाने और समान काम समान वेतन पर क्यों नही मुंह खोल रहीं? जो किसान पूरे देश का पेट भर रहा है, जो मज़दूर सुई से लेकर विमान तक बना रहा है, जो कर्मचारी दिनरात मेहनत करके पूरा सिस्टम चला रहा है, जो मेहनतकश वर्ग सीमाओं से लेकर अंदर तक देश की हर गतिविधि संचालित कर रहा है, उसे ये नेता और पार्टियाँ साल में 6000 या 72000 देकर असहाय और लाचार ही क्यों रहने देना चाहते हैं? केवल वोट के लिए? क्या कारण है कि ये नेता ऐसे भत्ते बाँटने की बात तो करते हैं लेकिन मज़दूरों की मेहनत का पूरा दाम देने को तैयार नही हैं? इन सवालों पर चर्चा किये बिना हम इन पार्टियों और इनके नेताओ का चरित्र नही समझ सकते।
राहुल ग़ांधी और कांग्रेस पार्टी ने दावा किया है कि न्याय योजना के लिए वो पिछले 6 महीने से बिना शोर-शराबे के काम कर रहे थे और इसमें दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से भी सलाह लिया गया है, जिनमें थॉमस पिकेटटी, नोबेल प्राइज से पुरस्कृत अंगुस डिटॉन, रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी का नाम मुख्यतः लिया गया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है।  इस योजना में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगो को 72000 रुपये सालाना बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। इस योजना में सरकारी खजाने पर करीब 3.6 लाख करोड़ खर्च आएगा। इसपर भी कई अर्थशास्त्री और वाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर अर्थशास्त्र के प्रोफेसर यह राग अलापने लगे हैं कि अमीर लोगों के टैक्स का पैसा गरीबों पर क्यों उड़ाया जा रहा है? इस मामले के अलग अलग पहलुओं पर हम अपनी बात रखेंगे- 

1. देश केवल अमीरों के पैसे से नहीं चलता
पहली बात तो यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कुछ लोगों को यह भ्रम रहता है कि देश मे केवल अमीर लोग टैक्स देते हैं जिससे देश चलता है। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। सरकार को जो आय होती है उसमें प्रत्यक्ष (आयकर, निगम कर इत्यादि) और अप्रत्यक्ष कर (GST, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि) दोनों शामिल होते हैं। इनमें सरकार को आयकर से बहुत कम (करीब 20%) आय होती है। ज्यादातर आय अप्रत्यक्ष कर से होती है जो कि पूरी जनता को देना पड़ता है। ऐसे में यह कहना कि ये योजना गरीबों को खैरात है ये मानसिक दिवालियापन का परिचय देना होगा। इस देश का हर परिवार सरकार को टैक्स देता है। उसी पैसे का एक छोटा हिस्सा ही उन्हें ऐसी लुभावनी योजनाओं में मिल पाता है। 

2. दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री यह योजना क्यों चाहते हैं?
यहाँ ये समझना यहाँ जरूरी है कि दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों ने काँग्रेस को यह योजना क्यों सुझायी और इसका समर्थन क्यों किया?
इसका मुख्य कारण है दुनियाभर में संकट से घिरी अर्थव्यवस्था को गति देना। ये सारे अर्थशास्त्री वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के हिमायती माने जाते हैं और इस समय जो पूँजीवादी संकट पूरी दुनिया मे छाया हुआ है इसको लेकर ये अर्थशास्त्री काफी चिंतित भी रहते हैं। हाल ही में रघुराम राजन ने यह बयान दिया था कि पूँजीवाद खतरे में है क्योंकि यह सबको एक बेहतर ज़िंदगी नहीं दे पा रहा है। इसलिए इस संकटग्रस्त पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को एक (अल्पकालिक ही सही पर) गति देने के लिए यह योजना सुझाई गयी है।
   इसको थोड़ा आसान भाषा में कहें तो दुनिया में जो भी समान पैदा होता है जबतक वो बिकता रहता है तबतक यह पूंजीवादी व्यवस्था चलती रहती है पर यह पूंजीवादी व्यवस्था ज्यादा से ज्यादा मुनाफे के लिए सामान बनाने वाले लोगों यानी मज़दूरों का आर्थिक शोषण करती है, उनको पूरा मेहनताना नहीं देती है, इससे लोगों की क्रयशक्ति घटती जाती है।  इस घटती क्रयशक्ति के कारण जो सामान पैदा होता है उसे खरीदने वाले लोग नहीं मिलते हैं। लोगों को सामान की जरूरत होने के बावजूद, दुकानें सामानों से भरी होने के बावजूद लोग सामान नहीं खरीद पाते। यह अतिउत्पादन का संकट है यानी लोगों की क्रयशक्ति के मुकाबले ज्यादा उत्पादन हो चुका है। ऐसे में कंपनियों-उद्योगों को अपना उत्पादन रोकना पड़ता है जबतक बाज़ार में फिर से मांग न पैदा हो। इसके फलस्वरूप कर्मचारियों की छंटनी की जाती है। चुकि सारे उद्योग आपस मे जुड़े हुए हैं इसलिए यह आर्थिक मंदी एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर में फैलती जाती है। वर्तमान में भारत सहित दुनिया के बड़े हिस्से में अतिउत्पादन की मंदी चल रही है, बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में एक फौरी नुस्खे के तौर पर अगर लोगों तक कुछ पैसा पहुँचें और वे फिर से सामान खरीदना शुरू करें तो बाज़ार और अर्थव्यवस्था में कुछ देर के लिए गति आएगी। इसी उद्देश्य से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के इन पैरोकार अर्थशास्त्रियों ने कांग्रेस को यह नुस्खा सुझाया है। 

3. तीसरा पहलू है- बेरोजगारी
 आज बेरोजगारी भयंकर विस्फोट की स्थिति में पहुँच चुकी है। रघुराम राजन ने भी इसतरफ इशारा किया था। इस परिस्थिति से भाजपा सरकार भी वाकिफ़ है पर फिलहाल वो चुनावों के मद्देनज़र इसको ज़ाहिर करने से होने वाले नुकसान को समझती है। कांग्रेस इस बात को समझती है कि बेरोजगारी से पीड़ित जनता को अगर न्यूनतम आय के वादे से कुछ राहत पहुँचायी जाय तो इससे चुनाव में बाजी पलट सकती है। इसीलिए इसको बार बार गेमचेंजर कहा जा रहा है।

क्या राहुल गांधी का गरीबी खत्म करने का यह वादा सच साबित होने वाला है?
गरीबी को हटाने की बात 1947 से लेकर 2019 तक सबने की है, लेकिन हालात जस के तस हैं। भारत में भुखमरी और कुपोषण आज भी सबसे बड़ी समस्या बने हुए हैं, करीब 4 हजार बच्चे हर रोज भूख, कुपोषण और छोटी-मोटी बीमारियों से मर जाते हैं यानी सालाना करीब 15 लाख बच्चे। स्थिति ये है कि कुपोषण और विश्व भूख सूचकांक के मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी बुरी स्थिति में है। विश्व की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, परमाणु शक्ति, मंगल मिशन, अंतरिक्ष मिशन "शक्ति", सैन्य ताकत का क्या मतलब है अगर आपके देश मे करोड़ों लोग भूखों सोते हो और कुपोषण से लगभग 4000 बच्चे प्रति दिन मरते हों। इस तरह की मौतें किसी युद्ध या आतंकवाद के कारण हुई मौतों से काफी ज्यादा हैं।
    गरीबी खत्म करने की बात कोई नई नहीं है और ना ही ऐसे वादे नए है। सन् 1971 में इंदिरा गांधी ने नारा दिया था- "गरीबी हटाओ" और इसका उनको राजनीति फायदा भी पहुँचा। ये नारा लोगो के दिलो दिमाग मे छा गया था। इंदिरा गांधी के पहले भी बहुत बार इसपे पहल की गई है लेकिन स्थितियाँ आज सबके सामने है। क्या ग़रीबी खत्म हुई?
1947 में जब देश आजाद हुआ तो हर 3 में 2 व्यक्ति गरीब था आज कहा जाता है कि हर 3 व्यक्ति में 1 व्यक्ति गरीब है । हालांकि ये सरकारी आंकड़े हैं, सच्चाई इसके अलग है क्योंकि गरीबी मांपने का सरकारी पैमाना हास्यास्पद है। गरीबी के सरकारी मानक अपने आप में भरोसेमंद नहीं हैं क्योंकि योजना आयोग ने बताया है कि भारत में खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की यह परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा था कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। असली सच्चाई इससे काफी अलग है। 1947 से अब तक भारत में गरीबी और अमीरी की खाई बहुत तेजी से बढ़ी है। आज भारत मे ऊपर के 1% अमीरों के वास करीब 60% संपत्ति है जबकि नीचे के 80% आबादी के पास कुल सम्पत्ति का 10% ही है। ऐसे में इन 80% आबादी की ज़िन्दगी कितनी उन्नत स्तर की होगी? फिर यह सोचने की बात हैं कि बिना अमीरी गरीबी की यह खाई भरे, बिना रोजगार दिए गरीबी किस हद तक खत्म की जाएगी?
सरकार पूरी जनता से टैक्स वसूलती है तो उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता के लिए सड़क, बिजली, पानी, परिवहन, शिक्षा, चिकित्सा के साथ-साथ रोजगार का भी इंतजाम कर। अगर सरकार रोजगार नहीं दे सकती तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाय। यहाँ पर काँग्रेस पार्टी चुनाव जीतने की बदहवासी में ही ऐसा कदम उठा रही है। यह याद रखने की जरूरत है कि बेरोजगारी और गरीबी-अमीरी की बढ़ती खाई कांग्रेस सरकार की उदारीकरण-निजीकरण नीतियों की ही देन है जिसे अब बीजेपी सरकार आगे बढ़ा रही है। ऐसे में इस दोनों पार्टियों से यह उम्मीद करना कि ये गरीबी या बेरोजगारी को खत्म करेंगे यह रेगिस्तान में पानी ढूंढने जैसा होगा।