27 September 2019

अमर शहीद भगतसिंह की 112वीं जयंती पर युवाओं के नाम भगतसिंह का संदेश

 
 (भगतसिंह की 112वीं  जयंती पर टीम इंक़लाब की तरफ से जारी पर्चा।)

✍️ टीम इंक़लाब

आज अमर शहीद भगतसिंह की 112वीं जयंती है। वर्तमान समय में जब हर तरफ महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और अपराधों का बोलबाला है, जब ज़िंदगी की भागदौड़ और बदहाली में हर व्यक्ति स्वयं का वजूद खोते जा रहा है जब सुबह से शाम तक की जद्दोजहद में आपको एक पल ठहर कर सोचने का भी वक़्त नहीं है ऐसे समय में भगतसिंह जैसे एक स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी को याद करने की जरूरत क्यों है? थोड़ा रुकिए और सोचिए; आज़ादी के 72 साल बाद हम जिस देश में रह रहे हैं क्या हमारे शहीदों ने इसी भारत के लिए अपनी कुर्बानी दी थी? क्या केवल अंग्रेजों से आज़ादी पाना ही उनका मकसद था? नहीं दोस्तों, हमारे महान शहीदों ने बस गोरे अंगेजों से आज़ादी हासिल करने का सपना नहीं देखा था, वो एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जहाँ समाज के हर व्यक्ति को बराबरी, सम्मान और एक सुखी जीवन जीने का अवसर मिले, जहाँ एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण करता हो, जहाँ किसानों और मज़दूरों को उनका सही हक़ मिले और समाज में अमन-चैन कायम हो। आज हमारे देश की परिस्थितियों को देखकर क्या आपको लगता है कि इसी देश के सपने को लेकर भगतसिंह और उनके साथियों ने फाँसी के फंदे को चूम लिया था? जाहिर सी बात है-नहीं। आज भारत दो हिस्सों में बंटा हुआ है, एक तरफ मुठ्ठीभर अमीर लोग हैं जिनके हाथ में सारे कल कारखाने, संसाधन और धन सम्पत्ति केंद्रित है जो अपने छोटे-मोटे शौकों के लिए भी लाखों के वारे-न्यारे कर देते हैं; दूसरी तरफ देश की 80% आम आबादी है  जो सुबह से लेकर शाम तक कल-कारखानों, फैक्टरियों, ऑफिसों और खेतों में खटने के बावजूद भी बदहाली की ज़िंदगी जीने को मजबूर है। अगर हम आंकड़ों की बात करें तो इस देश 80% संपत्ति ऊपर के 10% अमीरों के हाथों में केंद्रित है जबकि नीचे की 80% आबादी मात्र 10% संसाधनों में गुजारा कर रही है। ऐसा नहीं है कि भारत में अनाज या अन्य संसाधनों की कमी है, भारत में एक तरफ 70 लाख टन अनाज हर साल एफसीआई के गोदामों में सड़ जाता है तो दूसरी तरफ भूख और कुपोषण से प्रतिदिन 4000 बच्चे मर जाते हैं, एक तरफ अरबों की दवाएं एक्सपायर कर जाती हैं और समुद्रों या लैंडफिल में फेंक दी जाती हैं तो दूसरी तरफ हज़ारों लोग दवाओं के अभाव में असमय मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। भारत दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है पर यह विश्व भूख सूचकांक में 120 देशों में 103वें नम्बर पर आता है। बेरोजगारी, गरीबी और महंगाई की चक्की तले देश की आम जनता जिस तरह पिस रही है उसको बताने की जरूरत नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए कि यह पूरी व्यवस्था मुठ्ठीभर मालिकों पूंजीपतियों के लिए काम करती है। सारी पार्टियों की फंडिंग करने वाले लोग यही पूंजीपति हैं और इन्हीं के हाथ में सारी मीडिया है। ये धन्नासेठ अपने फायदे के हिसाब से कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी तो कभी किसी अन्य पार्टी को सामने लाते रहते हैं। मोदी सरकार जिस तरह आम जनता को हिन्दू-मुस्लिम के झगड़ों में फंसाकर और उसकी जेब से पाई-पाई निचोड़कर इन पूंजीपतियों की जेबें भर रही है, उनके डूबे कर्जों को माफ कर रही है, उनको छूटें दे रही है इसीलिए अभी बीजेपी पूंजीपतियों की पहली पसंद बनी हुई है। आम जनता को बीजेपी, कांग्रेस अन्य ऐसी पार्टियों से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।



फिर विकल्प क्या है?

आज भगतसिंह को याद करने की जरूरत है जिन्होंने 1930 में ही कहा था कि गांधी और कांग्रेस के रास्ते जो आज़ादी आएगी वो मुठ्ठीभर अमीर लोगों की आज़ादी होगी। वह आज़ादी इन अमीर पूंजीपतियों की तिजोरियों में समा कर रह जाएगी। गोरे अंग्रेज देश से चले जायेंगे पर उनकी जगह भूरे अंग्रेज आम जनता का शोषण करेंगे। देश में जाति-धर्म के नाम पर ऐसे ही आग लगती रहेगी। अपने अदालत के बयान में भगतसिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हमारी आज़ादी का मतलब सिर्फ अंगेजों से आज़ादी नहीं है बल्कि हमारी आज़ादी का मतलब है हर तरह के शोषण का खात्मा; चाहे वो कारखानों का आर्थिक शोषण हो, जातिगत-साम्प्रदायिक शोषण हो या फिर लैंगिक शोषण हो। भगतसिंह ने यह भी कहा था कि शासकवर्ग लोगों को जाति-धर्म के झगड़ों में उलझाकर उनके अधिकारों की असली लड़ाई से दूर रखना चाहते हैं जिससे भारत की जनता को सावधान रहने की जरूरत है। भगतसिंह ने उस समय युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि हम युवाओं से यह नहीं कहेंगे कि वो बम-पिस्तौल उठायें, आज नौजवानों को देश के कोने-कोने जाकर झुग्गियों-बस्तियों, खेतों-खलिहानों में लोगों को क्रांति का संदेश देना होगा, उन्हें संगठित करना होगा, तब जाकर ही ऐसी क्रांति आएगी जो हर तरह के शोषण का अंत कर देगी। भगतसिंह के सपनों का भारत बनाना ही आज वर्तमान समस्या का समाधान है और वही एकमात्र विकल्प भी है। आज हमें शहरों की कालोनियों, ब्लाकों, गांवों और कस्बों में भगतसिंह के विचारों पर आधारित संगठन बनाने की जरूरत है और आम जनता की समस्याओं पर काम करते हुए उनको संगठित करने की जरूरत है। आगे चलकर ऐसा ही देश व्यापी संगठन पूरी व्यवस्था को बदलकर भगतसिंह के सपनों का भारत बनाने में सक्षम हो सकता है। भगतसिंह की जयंती के अवसर पर हम न्यायप्रिय, संवेदनशील और बहादुर नौजवानों का आह्वान करते हैं कि वे इस मुहिम में शामिल होकर इस आंदोलन को मजबूत बनाये ताकि एक नए भारत का निर्माण हो सके।



इंक़लाब ज़िंदाबाद                                                                        भगतसिंह अमर रहें