20 August 2019

मुंबई में सफाई के लिए क्लीन-अप मार्शल या "लूट-अप मार्शल"?

(इन मार्शलों की करतुतें सिर्फ यही तक सीमित नहीं हैं; ये अक्सर नशे में धुत रहते हैं। कई बार लोगों को लूटने की या मनमानी पैसा वसूलने की शिकायतें भी आई हैं। जिन्होंने इनपर गौर किया होगा उसने तो इनके धर पकड़ का एक सेट पैटर्न भी देखा होगा; ज्यादातर शिकार जो इनकी रंगदारियों के शिकंजे में आसानी से आ जाता है वह है गरीब, मजदूर , खासतौर पर प्रवासी मजदूर और निम्न मध्यवर्गीय आबादी। कई जगहों पर तो जहाँ वसूली हो रही होती है वहाँ कूड़ेदान ही नहीं होते पर इससे फायदा ही होता है, वसूली ज्यादा होती है। इस तस्वीर में भी साफ है जहाँ एक तरफ आदमी से पैसे लिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ उसी के आस पास कूड़ा पड़ा हुआ है। अक्सर ये सिगरेट पी रहे लोगों या गुटका, चॉकलेट खा रहे लोगों को देखकर घात लगाकर यह इंतज़ार करते रहते हैं कि कब ये व्यक्ति उसका पैकेट फेंके या फिर थूके, इसके बाद तुरंत गैंग के सदस्य संबंधित व्यक्ति को पकड़कर उसे धमकाने लगते हैं और पैसा लेकर ही छोड़ते हैं।)




✍️ राखी नारायण

मुम्बई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) दो चीजों के लिए जानी जाती है; एक जो सबसे प्रचलित है वह यह कि मुम्बई की बारिश में हर साल बीएमसी की पोल खुल जाती है और इनकी बदइंतजामियों की वजह से मुम्बईकर बेहाल ओर परेशान हो जाते हैं। अभी हाल ही में गोरेगाँव स्थित एक खुले नाले में गिरकर एक 3 साल के बच्चे की मौत हो गयी व काफी मशक्कत करने के बाद भी उस बच्चे का शव भी न मिल पाया। यह बदइन्तजामी ही है जिसकी वजह से हर साल मुम्बई की बारिश में नालो में गिरने की वजह से कई लोगो की मौतें खबरों में रहती हैं। दूसरी बात जो सब जानते हैं वह है बीएमसी का बजट। मुम्बई की महानगर पालिका देश की सबसे अमीर नगरपालिका है जिसका इस बार का बजट 30,622 करोड़ था जो कि न सिर्फ सभी महानगरपालिकाओं में सबसे ज्यादा है अपितु यह भारत के कई छोटे राज्यों के बजट से भी ज्यादा है।
ऐस में इतने बड़े बजट के बावजूद हर साल मुम्बई की बारिश मे इसी बीएमसी की पोल खुल जाती है तो यह सवाल उठता है कि इतने सारे पैसों का इस्तेमाल कहा किया जाता है?
आज एक चीज और है जिसके बारे में पता होना चाहिए वह है बीएमसी द्वारा साफ-सफाई के नाम पर "क्लीन-अप मुम्बई" अभियान के तहत खड़ी की गई "क्लीन-अप मार्शल" की टीम जिसके बारे लगभग हर मुम्बईकर भली-भांति जानता है। क्लीन-अप मार्शल नाम कितना अच्छा है और इसे सुनकर ये तस्वीर जेहन में आती है कि एक ऐसी त्वरित टीम होगी जो जहाँ भी गंदगी फैलती होगी तुरंत उसको तत्परता से साफ कर देती होगी। पर ठहरिए, सच्चाई थोड़ी नहीं काफी अलग है।
यह तस्वीर मुम्बई के सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक दादर की है। मुम्बई के हर स्टेशनों की तरह यहां भी क्लीन-अप मार्शल अपनी "रंगदारी" वसूलते हुए मिलते हैं जैसा कि इस तस्वीर में देखा जा सकता है। तस्वीर में दिख रहे लोग गुटका खाकर उसका पैकेट नीचे गिरा देने के लिए एक व्यक्ति से पैसे वसूल रहे हैं। ये लोग कोई सरकारी आदमी नहीं हैं बल्कि किसी निजी कंपनी द्वारा ठेके पर रखे गए लोग हैं जिनको बीएमसी ने "क्लीन-अप मार्शल" के नाम पर लोगों से पैसा वसूलने के अधिकार दिया है। कुछ लोग कह सकते हैं कि वे तो साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं लोगों की बुरी आदत पेनाल्टी लगाने से ही दूर होगी फिर इतने अच्छे काम को हम "रंगदारी" क्यों कह रहे हैं। पर ऐसा वही लोग कह सकते है जो मुम्बई के बाहर के हैं या फिर मुम्बई में नए हों। यहां की आम जनता इनकी सच्चाई को भली-भांति जानती है। इसके बावजूद स्थानीय सरकार निजी कंपनीयों के मिलीभगत के साथ साफ-सफाई के नाम पर सालों से गरीबों से पैसे हथियाने का खेल चला रही है। इसपर कोई विरोध नहीं कर पाता क्योंकि ऐसे अभियानों को सरकार का न सिर्फ समर्थन है बल्की उस कमाई में उसका निजी कंपनी के साथ बराबरी का हिस्सा है।
साल 2007 में पहली बार मुम्बई की महानगर पालिका ने इस चीज की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य यह था कि किसी भी सार्वजनिक जगह पर कूड़ा-कचरा फैलाने से लोगों को रोका जाय, उन्हें अनुशासित और शिक्षित किया जाय। बताया गया कि इससे सार्वजनिक जगहों पर साफ सफाई बढ़ेगी। इस उद्देश्य से बीएमसी ने कुछ निजी ठेकेदारों के साथ गठजोड़ किया और इस अभियान के तहत क्लीन उप मार्शल रखे गये जो होने तो हर सार्वजनिक जगहों पर चाहिए पर उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र सिर्फ लोकल स्टेशनों ओर कुछ कपल-स्पॉट्स जहाँ लोग अक्सर घूमने जाते हैं को बनाया।
यह अभियान की पोल इसके गठन 2007 से ही खुलने लगी थी। मार्शलों की रंगदारियो के लिए, दुर्व्यवहार के लिए ,गरीबो को परेशान कर उनसे  छोटी मोटी गलतियों के लिए जबरन पैसे वसलूने जैसी शिकायतें अक्सर सामने आती रही हैं। 2007 से ही विवादों में रहने की वजह से 2011 में इसे बीएमसी को बंद करना पड़ा परन्तु इसमें जरूरी कानूनों की तब्दीली का दावा कर 2016 में इसे फिर शुरू किया गया।  2017 में कॉन्ट्रैक्ट रिन्यूअल के वक़्त बीएमसी के कई कॉर्पोर्टर्स ने इसका विरोध किया। शिवसेना के आशीष चेम्बूरकर ने इस "बीएमसी द्वारा नियुक्त वसूली गैंग" कहा तो दूसरे लोगों ने उन्हें "लोगों को धमकाने वाले माफिया" कहा। मांग यह की गयी कि इनके ठेके का पुनर्नवीनीकरण न किया जाय पर अडिशनल म्युनिसिपल कमिश्नर विजय सिंघल ने यह कह कर इसका समर्थन किया कि इससे 9 करोड़ की वसूली हुई है जिसमें 50-50 के कॉन्ट्रैक्ट के तहत 4.5 करोड़ बीएमसी को मिले हैं। इसकी दिक्कतों को सुधारा जाएगा इसमें सुधार की गुंजाइश है। इसके बाद भी सच्चाई यह है कि क्लीन-अप गैंग की लूट पहले से भी बढ़िया चल रही है। 
 
यह सफाई अभियान कितना सफल हुआ है यह हर मुम्बईकर भलीभाँति जानता है पर इसका अंदाजा आप इस तस्वीर से भी लगा सकते हैं जहाँ यह साफ नजर आ रहा है कि स्टेशन के पास कितनी गंदगी पड़ी है पर अगर किसी मज़दूर से जाने-अनजाने में भी कोई चीज नीचे गिर जाए तो यह उन्हें तुरंत धर लेते हैं और उनसे मनमानी तरीके से ठगी करते हैं। पैसा वसूली 100-500 रुपये या उससे ज्यादा हो सकती है। इसके अलावा अगर वह व्यक्ति प्रवासी मजदूर हो तो क्लीन-अप मार्शल उसके साथ गालीगलौज भी करते हैं।

इन मार्शलों की करतुतें सिर्फ यही तक सीमित नहीं हैं; ये अक्सर नशे में धुत रहते हैं। कई बार लोगों को लूटने की या मनमानी पैसा वसूलने की शिकायतें भी आई हैं। जिन्होंने इनपर गौर किया होगा उसने तो इनके धर पकड़ का एक सेट पैटर्न भी देखा होगा; ज्यादातर शिकार जो इनकी रंगदारियों के शिकंजे में आसानी से आ जाता है वह है गरीब, मजदूर , खासतौर पर प्रवासी मजदूर और निम्न मध्यवर्गीय आबादी। इनके अलावा यह जल्दी किसी को हाथ नहीं लगाते क्योंकि उनसे पैसे ऐठना आसान नही होता। कई जगहों पर तो जहाँ वसूली हो रही होती है वहाँ कूड़ेदान ही नहीं होते पर इससे फायदा ही होता है, वसूली ज्यादा होती है। इस तस्वीर में भी साफ है जहाँ एक तरफ आदमी से पैसे लिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ उसी के आस पास कूड़ा पड़ा हुआ है। अक्सर ये सिगरेट पी रहे लोगों या गुटका, चॉकलेट खा रहे लोगों को देखकर घात लगाकर यह इंतज़ार करते रहते हैं कि कब ये व्यक्ति उसका पैकेट फेंके या फिर थूके, इसके बाद तुरंत गैंग के सदस्य संबंधित व्यक्ति को पकड़कर उसे धमकाने लगते हैं और पैसा लेकर ही छोड़ते हैं। जिस बदतमीजी के साथ ये लोगों से बात करते हैं, उनको धमकाते-डराते हैं यह सब देखने पर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को इस तरह के सफाई अभियान पर ग़ुस्सा ही आ सकता है जिसका उद्देश्य 2007 से लेकर आजतक सिर्फ साफ-सफाई का दिखावा करना और ठेकेदारों के साथ मिलकर पैसे वसूलना रहा है। बाकी मुम्बई कितनी साफ हुई है यह बताने की जरूरत नहीं है। अब सवाल उठता है कि ऐसा अभियान जो हर बार अपने गलत कारणों से चर्चे में रहा है, जिसने अपने उद्देश्य को रत्ती भर भी पूरा नही किया हो और कमाई के हिसाब से इसने सारे सार्वजनिक जगहों को छोड़कर अब सिर्फ लोकल स्टेशनों के आसपास ही अपने को समेट लिया, जो बन्द होने के बाद पुनः नए वादों के साथ आता है और पुनः रंगदारी ही करता नजर आता है, जिसके बारे में हर मुम्बईकर जानता है फिर भी कानून के दायरे में लूट कैसे चलती आ रही है?
इनसब का बस एक जवाब है वह है- मुनाफ़ा। वसूली का बँटवारा बीएमसी और ठेकेदार के बीच 50-50 का होता है।  साल 2019 में इन ठेकेदारों की संख्या 22 है। अगर हम इनको हो रहे मुनाफे की ही बात करे तो यह तकरीबन 9 करोड़ सालाना है जिसका आधा हिस्सा कॉन्ट्रक्टर्स रखते है और आधा बीएमसी। यह महज एक ऑफिसियल आंकड़ा है, वसूली का असली आंकड़ा इसके दोगुना से चार गुना तक हो सकता है। यही कारण है कि इतने विवादों में होने के बावजूद यह अभियान चलता चला आ रहा है।
क्या ऐसे किसी अभियान को बने रहना चाहिए जो सफाई का ध्यान तो कतई नही रख पाता; जिसने साफ सफाई के लिए नई तकनीके नही लायी; नए तरीके नए कूड़े दान तक नही बनवाये ऐसे में जुर्माना लगाने का गरीबों को परेशान करने का कोई तुक नही बनता। यह भी सोचने वाली बात है कि जो मुम्बईकर बीएमसी को 30 हज़ार करोड़ का बड़ा बजट बनाने भर का टैक्स देते हैं उनसे साफ-सफाई के नाम पर यह 4-5 करोड़ की वसूली क्यों कि जा रही है? सफाई के नाम पर ठेकेदारों को करोड़ो का फायदा करवाने का मकसद क्या है? यह ऐसे सवाल हैं जो मुम्बईकर स्थानीय सरकार से पूछना चाहते हैं और यह भी की सफाई के नाम पर चल रही यह लूट कब बंद होगी?

25 July 2019

नहीं, हम बंदर की संतान नहीं हैं!


 (क्रमिक विकास और उससे जुड़ी आम धारणाओं पर कुछ विज्ञान और कुछ फलसफे की बातें)

✍️ श्रवण यादव 

आम धारणा है कि बंदर हमारे पूर्वज थे, जबकि ऐसा नहीं है। हमारे और बंदरों के पूर्वज किसी समय में एक ज़रूर थे, लेकिन इंसान और बंदर का विकास अलग अलग रास्ते पर हुआ, इसीलिए हम इंसान बने और वे बंदर। इस नाते बंदर रिश्ते में हमारे पूर्वज नहीं, बल्कि हमारे चचेरे भाई (cousin) हुए। इसे समझने के लिए क्रमिक विकास (evolution) पर कुछ बुनियादी बातें जानना ज़रूरी है। 
क्रमिक विकास जीव जंतुओं और वनस्पतियों में पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले अनुवांशिक लक्षणों में होने वाले दीर्घकालिक परिवर्तनों को कहते हैं। यह प्रक्रिया जैविक संगठन (Biological construct) के अलग-अलग स्तरों (प्रजाति, जीव विशेष या कोशिका) पर बढ़ती विविधता (Diversity) के लिए ज़िम्मेदार है। विकासवाद की अवधारणा के अनुसार समय के साथ जीवों में क्रमिक-परिवर्तन होते हैं। इस सिद्धान्त के विकास का भी एक लम्बा इतिहास है। 18वीं सदी तक सामान्य ज्ञान यही था कि सभी प्राणियों को ईश्वर ने इसी रूप में बनाया है जिस रूप आज वो विद्यमान हैं। यहाँ तक कि पश्चिमी जीवविज्ञानी चिन्तन में भी यह विश्वास जड़ जमाये था कि प्रत्येक जीव में कुछ ऐसे विलक्षण गुण (supernatural characteristic) होते हैं जो बदले नहीं जा सकते। इस वैचारिक धारा को मूलतत्ववाद/सारतत्ववाद (essentialism) कहा जाता है। पुनर्जागरण काल में यह धारणा बदलने लगी। 
19वीं सदी की शुरुआत में फ्रांसीसी जीवविज्ञानी ज्याँ बैप्टिस्ट लैमार्क ने अपना विकासवाद का सिद्धान्त दिया। लैमार्क का सिद्धांत क्रम-विकास (evolution) से सम्बन्धित प्रथम पूर्णत: निर्मित वैज्ञानिक सिद्धान्त था। लैमार्क का सिद्धांत था कि वातावरण के परिवर्तन के कारण ही जीव की उत्पत्ति, अंगों का व्यवहार या अव्यवहार व जीवनकाल में अर्जित गुणों का जीवों द्वारा अपनी अगली पीढ़ी में हस्तांतरण होता है। लैमार्क ने इसके उदाहरण के रूप में जिराफ़ का जिक्र किया, और कहा कि जिराफ़ कभी छोटी गर्दन वाला गधा-नुमा जीव रहा होगा, जिसके आसपास की घास खतम हो जाने की वजह से उसे ऊँचे पेड़ों की पत्तियाँ खाने हेतु गर्दन ऊँची करनी पड़ी होगी, और इसी निरंतर प्रयास की प्रक्रिया में कई पीढ़ियों के विकास के बाद वह जिराफ़ बन गया। हालाँकि बाद में लैमार्क का यह सिद्धांत गलत सिद्ध हुआ, लेकिन उस दौर में यह सिद्धांत भी एक मील का पत्थर साबित हुआ था, जिसने जीव विज्ञान के इतिहास में पुरातन वैचारिक धारा पर व मूलतत्ववाद (essentialism) की जड़ पर पहली बार गहरी चोट की थी।
इसके बाद आए डार्विन, जिन्होंने प्रसिद्ध जहाज़ "एच एम एस बीगल" पर यात्रा करते हुए, प्रशांत महासागर में भूमध्य रेखा (Equator) पर स्थित गैलापागोस द्वीपसमूह पर जीव जंतुओं, पक्षियों, उनकी चोंच के प्रकार, पंजे के प्रकार आदि का लंबा और गहन अध्ययन करते हुए अपने अवलोकनों (observations) के आधार पर कुछ ऐसी प्रस्थापनाएँ दी जिसने क्रमिक विकास विज्ञान की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया। वह था प्राकृतिक चयन (Natural Selection) का सिद्धांत।  इस प्रक्रिया में एक ही तरह की प्रजाति के जीवों में बदलते परिवेश के अनुसार खुद को उसके अनुरूप ढालने की अलग अलग क्षमता के कारण कुछ जीवधारियों का अपनी संख्या बढ़ाना तथा कुछ का विलुप्त हो जाना 'प्राकृतिक चयन' कहलाता है। यह एक धीमी गति से क्रमशः होने वाली व्यवस्थित (non random) प्रक्रिया है। प्राकृतिक चयन ही क्रमिक-विकास की प्रमुख कार्यविधि है। डार्विन ने प्राकृतिक चयन द्वारा क्रमिक-विकास के सिद्धांत को अपनी किताब "जीवजाति का उद्भव" (Origin of Species) में 1859 में प्रकाशित किया। दिलचस्प बात ये है कि जीवों के क्रमिक विकास के बारे में जो निष्कर्ष डार्विन ने निकाले थे उन्हीं निष्कर्षों पर इंग्लैंड के दो और जीवविज्ञानी अल्फ़्रेड वॉलेस और विलियम बेटसन भी पहुंचे थे। अल्फ़्रेड वॉलेस एशिया के अलग-अलग द्वीपों के जीवों का अध्ययन कर रहे थे तथा विलियम बेटसन दक्षिणी अमेरिका के  विभिन्न जीवों का अध्ययन कर रहे थे। प्राकृतिक चयन द्वारा क्रमिक विकास की प्रक्रिया को निम्नलिखित अवलोकनों से द्वारा साबित किया जा सकता है:
1. जितनी संतानें संभवतः जीवित रह सकती हैं, उस से अधिक पैदा होती हैं
2. आबादी में रूपात्मक, शारीरिक व व्यवहारिक लक्षणों में विविधता होती है
3. विभिन्न लक्षण उत्तरजीविता (survival) और प्रजनन (reproduction) की अलग अलग संभावना प्रदान करते हैं
4. इन लक्षणों का पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता है।
प्राकृतिक चयन का अर्थ उन गुणों से है जो किसी प्रजाति को बचे रहने और प्रजनन करने में सहायता करते हैं और इसकी आवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती रहती है। यह इस तथ्य को और तर्कसंगत बनाता है कि इन लक्षणों के धारकों की सन्ताने अधिक होती हैं और वे यह गुण वंशानुगत (hereditary) रूप से ले भी सकती हैं।
डार्विन ने यह सिद्धांत तब प्रस्थापित किये जब जेनेटिक्स (Genetics) के अध्ययन के लिए न तो कोई तकनीक उपलब्ध थी, न ही डीएनए (DNA) की खोज हुई थी, न ही सूक्ष्मजीवियों (microbes) के विषय में जानने के लिए उस दौर में पर्याप्त यंत्र उपलब्ध थे। इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी (Electron microscope) के आविष्कार, डीएनए व जेनेटिक कोड (code) की खोज, व आणविक अनुवांशिकी (Molecular Genetics) के विकास ने डार्विन के सिध्दांतों की नींव पर ही क्रमिक विकास के विषय में हमारे ज्ञान का कई गुना विस्तार किया। जेनेटिक्स के विकास और सूक्ष्मजीवियों के और गहन अध्ययन के बाद पता चला कि प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया उत्तरजीविता और प्रजनन की आभासी उद्देश्यपूर्णता से उन लक्षणों को बनाती और बरकरार रखती है जो अपनी कार्यात्मक भूमिका (functionality) के अनुकूल हों। अनुकूलन का प्राकृतिक चयन क्रम-विकास का एक कारण ज़रूर है, लेकिन क्रम-विकास के और भी ज्ञात कारण हैं। माइक्रो-क्रम-विकास के अन्य गैर-अनुकूली कारण उत्परिवर्तन (mutation) और अनुवांशिक प्रवाह (genetic drift) हैं।
अर्न्स्ट हैकेल (1834-1919) द्वारा प्रतिपादित "जीवन वृक्ष"

खैर वापस आते हैं बंदर और इंसान के रिश्ते पर। तो हमारे साझे पूर्वज संभवतः जंगल के पेड़ों पर ही रहा करते होंगे, और माँसाहारी पशुओं के खतरे से दूर पेड़ की ऊंचाइयों पर उछलते कूदते जंगल के फल-फूल आदि पर मज़े से जीते रहे होंगे। किन्हीं कारणवश, किसी भयंकर दीर्घकालिक सुखा या जंगल की आग, या किसी तीव्र  दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन ने उनके इलाके के जंगलों का नाश कर दिया होगा, और इस प्रकार उन्हें पेड़ से उतरकर मैदानों और चरागाहों (grasslands) में भोजन पानी की खोज में आने को मजबूर किया होगा, यूँ कहिए, धकेला होगा। ज़मीन पर संतुलन के लिए अब पूँछ की जरूरत नहीं रह गयी होगी जो कालांतर में छोटी होते-होते लुप्त हो गयी। इसके साथ ही ज़मीन पर हाथ का इस्तेमाल बढ़ा व कुछ पूर्वजों ने धीरे-धीरे खड़ा होना भी सीख लिया। इस प्रक्रिया में हमारे पूर्वजों में से कुछ की रीढ़ की हड्डी सीधी होनी शुरू हुई होगी। इससे मैदानों और झाड़ियों में माँसाहारी नरभक्षी जानवरों, शेर, बाघ, चीतों का भी खतरे को दो पैरों पर खड़ा होकर खतरा दूर से भाँप लेने की क्षमता विकसित हुई। दोनों हाथ जब मुक्त हुए तो हमारे पूर्वजों ने हाथों की मदद से नुकीले पत्थरों व लकड़ियों के हथियार बनाना सीखा और इस क्रम में  हथेली की उंगलियों की सूक्ष्म पकड़ व fine motor skills विकसित हुई। इसी दौरान प्रकृति के साथ संघर्ष की इस प्रक्रिया में, मनुष्य ने शिकार करना सीखा होगा और माँसाहार की शुरुआत हुई होगी। माँसाहारी प्रोटीन से भरपूर भोजन से पोषित उनका मष्तिष्क और तेज़ी से विकसित हुआ। धरती पर खनन में प्राप्त हुईं सबसे पुरानी चीजें दरअसल शिकार के औजार ही हैं, यह दिखाता है कि अगर मनुष्य मांसाहार की तरफ न मुड़ता (या न मुड़ना पड़ता) तो शायद आज हम भी कहीं पेड़ों पर उछल-कूद कर रहे होते या फिर विलुप्त प्रजातियों में गिने जाते। चुकि हमारे पूर्वजों को प्रकृति ने शिकार के लिए नहीं बनाया था (पंजे, दाँत, नख इत्यादि) इसलिए शिकार ने एक साथ दो महान जरूरतों को जन्म दिया, पहला औज़ार बनाने के लिए श्रम की जरूरत और दूसरा समूह में शिकार करना जिसने हमारे पूर्वजों में पहली बार संगठन और सामाजिकता के बीज बोए। इन्हीं दोनों चीजों ने उन मानवाभ कापियों का भविष्य ही बदल दिया। आग की खोज भी एक मील का पत्थर साबित हुई जिसे नियंत्रित कर मानव के पूर्वजों ने गुफा में रोशनी, मांस पकाने और अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया। साथ ही पका माँस खाने से उसको चबाने और पचाने में लगा वक़्त काफी कम हुआ जिससे हमारे पूर्वजों के भारी जबड़े और दांतों की बनावट (और फलस्वरूप चेहरे की बनावट) में फर्क आने लगा। साथ ही जल्दी भोजन पचने से अब उसको कम आराम की जरूरत पड़ती जिससे बचे खाली समय में अन्य सामूहिक गतिविधियों के विकसित होने की संभावना पैदा हुई। ये चीजें बहुत ही धीमी प्रक्रिया में हुईं, इनमें एक-एक परिवर्तनों के लिए हजारों साल लगे और सैकड़ों पीढियां गुजर गईं। ज़ाहिर है हमारे सभी पूर्वज इस विकास की दिशा को पकड़ने में असफल रहे होंगे और प्रकृति ने ऐसे अनुकूल विकास का चयन करते हुए बाकियों को छाँट दिया होगा। हमारे सबसे करीबी भाई, और शारीरिक रूप से हमसे कहीं बलशाली, निएंडरथल इसी प्रक्रिया में खतम हो गए या कहें कि प्रकृति द्वारा छाँट दिए गए।
मानव और दूसरे प्रजातियों के कंकाल की बनावट

और बंदर? उनकी कहानी ये है कि हमारे साझे पूर्वजों के वे भाई बंधु जिन्हें भोजन और जीवन की तलाश में पेड़ से उतरकर मैदानों की ओर भटकने को मजबूर होना ही नहीं पड़ा होगा, जिनका जंगल आबाद रहा और उन्हें निरंतर भोजन पानी और मौज मस्ती मुहैया कराता रहा, जिन्हें हमारे पूर्वजों की तरह मैदानों और grasslands में भोजन की तलाश में उतर कर खुद को शेर, चीतों व अन्य नरभक्षी पशुओं के हाथों शहीद हो जाने का खतरा उठाना ही न पड़ा होगा, उनके विकास का रास्ता मनुष्यों के पूर्वजों से अलग हो गया और वे बंदर, ओरांगुटान, गिबन, गोरिल्ला, चिंपांज़ी बनकर रह गए। ऐसा कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वज बन्दर नहीं थे पर हमारे और बंदरों के पूर्वज एक थे। 

19 July 2019

मिलिए राजधानी के इस मजदूर से जो आपका किचन सिंक चमकाता है!

✍🏼 राघवेंद्र, शुभम, स्वतंत्र 

भारत की राजधानी दिल्ली में अगर आप हैं और यहाँ की ज़मीनी परिस्थितियों से परिचित नही हैं तो यकीन मानिए आप दिल्ली में रहते तो हैं लेकिन खूबसूरत दिखने वाली राजधानी दिल्ली को जानते नहीं हैं। यमुना के किनारे बसा एक खूबसूरत शहर जो भारत की कला एवं संस्कृति का केंद्र भी माना जाता है; इस शहर की सुंदरता और चकाचौंध देखकर हजारों लोग अपने सपने को साकार करने इस शहर में आते हैं; उस शहर में काम करने वाले मजदूरों की हालत ये तस्वीर बयाँ कर रही है। इस तस्वीर को देखिए, इस मज़दूर की कहानी पढ़िए और सोचिए कि क्या वाकई में आप इस शहर को जानते हैं?



फोटो में दिख रहे व्यक्ति बीकू भाई हैं जो राजधानी के एक छोटे कारखाने में काम करते हैं। आपके किचन में चमचमाते सिंक को इन्होंने ही अपने हाथों से चमक दी है। जी हाँ, ये सिंक पॉलिश का काम करते हैं। काम किन परिस्थितियों में किये जाते हैं वो फोटो में देखा जा सकता है। जिस मोटर पर ये काम करते हैं वो एक सेकंड में 40 बार घूमता है; जरा सी चूक हुई और दुर्घटना घटी। इनका दिन कपड़े और फाइबर के डस्ट (बारीक धूल) के बीच गुजरता है जो सांस बनकर इनके फेफड़ों में उतरता है और धमनियों में बहता है। बीकू भाई से बात करने पर जो बातें सामने आई वह इंसानियत को शर्मसार करती हैं। ये लोग जिस तरह से काम करते है उसे देख कर हम अपने घरों में बैठकर यह कल्पना भी नही कर सकते कि किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा। इनको मूल जरूरतों से भी वंचित रहना पड़ता है जैसे कि पीने के लिए शुद्ध पानी भी नही मिलता। 
इस दिहाड़ी (दैनिक मजदुरी) पर काम करने वाले मजदूर से बात करने पर ये भी पता लगा कि ये लोग रोजाना 10 से 12 घण्टे काम करके 300 से 400 रुपये कमा लेते हैं जिससे वो अपना और अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। कमाई का आलम ये है कि कभी-कभी काम कम होने पर ये लोग महीने भर में 5 से 6 हजार रुपये ही कमा पाते हैं।
बीकू भाई के कारखाने का एक दृश्य
फिर भी इस मजदूर को अपनी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं है वो मेहनत और ईमानदारी से अपना और अपने परिवार का खर्च चला रहा है और इस बात से वो बहुत खुश है। हाँ, इतना जरूर है कि वो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल में दाखिला नही दिला पाते, तरह-तरह के पकवान नही खिला पाते, खुद की गाड़ियों में नही घूम पाते, उनके लिए अच्छे घर नहीं होते और भी बहुत कुछ जो दूसरों के लिए तो वो करते हैं लेकिन खुद उससे वंचित रहते है। यहाँ हम लोगो को एक बात समझ लेनी है कि जो शहर जितना खूबसूरत दिखता है उसके पीछे मजदूरों की उतनी ही कठोर मेहनत होती है। एक सुई से लेकर हवाई जहाज तक बनाने में मजदूरों का ही खून पसीना बहता है।
 बीकू भाई की मुख्य समस्याएं क्या हैं?
1. कल कारखानों द्वारा न्यूनतम वेतन का पालन ना करना
अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग न्यूनतम वेतन लागू है जो वर्तमान समय के हिसाब से बहुत कम है। फिर भी मालिकों द्वारा न्यूनतम मजदूरी के नियमों का पालन नही किया जाता है। बेरोजगारी के इस दौर में मालिक के मोलभाव करने की शक्ति बढ़ गयी है, "तू नहीं करेगा तो बहुत लोग इससे कम पर भी काम करने के लिए तैयार हैं" और  इसप्रकार न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर मजदूरों से काम लिया जाता है। क्या मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलनी चाहिए कि उनका परिवार भूखा ना रहे, और उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित ना रहना पड़े? मोदी सरकार ने अभी हाल ही में 178₹ का दिहाड़ी (Daily wage) तय किया है, यह लेबर कॉन्फ्रेंस व सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का एक चौथाई है। इस मज़दूरी में मज़दूर का परिवार कैसे चलेगा और सबका साथ सबका विकास कैसे होगा ये सोचने वाली बात है। 

2. सुरक्षा के इंतजामों का अभाव 
अगर मजदूरों के सुरक्षा से सम्बंधित विषय पर बात की जाए तो लगभग सभी कंपनियों में हालात एक जैसे ही हैं। दिल्ली में आये दिन इस तरह की घटनाएं सामने आती रहती हैं, कभी आग लगने के वजह से मजदूरों की मौत तो कभी धुँए की वजह से दम घुटने से मौत तो कभी बिना सुरक्षा बेल्ट के ऊँचाई पर काम कर रहे मजदूर की गिरने से मौत तो कभी लगातार काम करते रहने की वजह से मौत। काम करते हुए उंगलियां कटना तो बहुत आम बात है। इस तरह की दुर्घटनाओं को ज्यादातर कुछ लेनदेन करके दबा दिया जाता है। बाकी "सभ्य समाज" को भी मज़दूरों की मौतों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। 

3. ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा
वर्तमान समय में ठेका प्रथा एक बीमारी बन चुकी है और यह बढ़ती ही जा रही है। ठेके पर काम करने पर मजदूर अपने सारे अधिकार खो देते हैं और वो किसी भी समस्या के लिए कंपनी को जिम्मेदार नही ठहरा सकते। कंपनियाँ भी ठेकेदारी पर काम कराकर मजदूरों को दी जाने वाली सुविधाओं जैसे PF, फंड, बोनस, मेडिकल, इत्यादि देने से बच जाती हैं। अमूल आइसक्रीम तो लगभग सभी लोग खाते होंगे लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि अमूल आइसक्रीम बेचने में एक या दो स्तर पर ठेकेदार होते हैं। पहले स्तर के ठेकेदार एक इलाके में आइसक्रीम विक्री का ठेका कंपनी से लेते हैं जिसमें उनको 33% कमीशन मिलता है। इस काम को आगे वो एक सेल्स मैनेजर (दूसरा ठेकेदार) को 15% कमीशन पर दे देते हैं जो अपने अंदर 10,12,15 लड़के (मजदूर) रखते हैं। यह 15% सेल्स वाले ठेकेदार की कमाई है जबकि पहला ठेकेदार बस ठेका ट्रांसफर करके बैठे-बैठे 18% कमा लेता है। वहीँ, अगर ठेकेदारी ना होती तो ये 33% सीधे असली काम करने वाले मज़दूरों को मिलता। साथ ही ठेके पर काम करने वाले मजदूरों को कंपनी कभी भी निकल देती है। और ध्यान रहे ये कुछ लोगों की बात नहीं है; आज देश में जितने काम करने वाले लोग हैं उनमें 93% ठेके पर काम करने वाले लोग हैं। सोचिए कि कितनी बड़ी समस्या है ये। पर क्या आपने किसी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल, किसी पार्टी या किसी नेता को ठेका प्रथा का मुद्दा उठाते हुए सुना है? नहीं ना? आखिर क्यों? इसका जबाब तब मिलेगा जब आप यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि मीडिया कंपनियों का मालिक कौन है, और इन नेताओं और पार्टियों को चंदा कौन देता है? तब शायद ये भी समझ आ जाये कि ये मंदिर-मस्जिद का मुद्दा, हिन्दू- मुस्लिम का मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है। 

4. समान कार्य समान मजदूरी
समान कार्य के लिए समान मजदूरी होनी चाहिए परन्तु इनका पालन सिर्फ सरकारी परमानेंट कर्मचारियों तक ही सीमित है। प्राइवेट कंपनियों में पूरे दिन काम करने के बाद भी मजदूरी के नाम पर पुरुष और महिलाओं में भेद-भाव है। जिस कार्य के लिए पुरुष को 12000 रुपये दिए जाते हैं उसी कार्य के लिए महिलाओं को 6000 से 8000 रुपये दिए जाते हैं।
देश के विकास में मजदूरों का सबसे अहम योगदान होता है। मजदूरों के बिना किसी औद्योगिक ढांचे, कल-कारखाने को खड़ा होने और चलाने की कल्पना नही की जा सकती लेकिन आज सबसे ज्यादा बर्बाद मजदूर ही है। 
भारत का संविधान एक आम नागरिक को जो अधिकार देता है वो सारे अधिकार हम मजदूरों के भी हैं फिर भी हम क्यों चुप हैं, क्यो हम अपने हक के लिए नही लड़ते है?

17 July 2019

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे - फैज़ अहमद फैज़

 कवितायेँ

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे - फैज़ अहमद फैज़

 

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है।
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले ।।

16 July 2019

क्या साक्षी मिश्रा ने भागकर गलती की? : भारतीय समाज में प्रेम और विवाह पर कुछ बातें



समाज और परिवार अगर स्वतंत्र प्रेम की इजाजत नहीं देता तो उससे लड़ना आपकी च्वाइस नहीं मज़बूरी होती है। मालिनी अवस्थी जी के अनुसार प्रेम करना गलत नहीं है, बस घर- परिवार की इज्जत सरेआम मत उछालो। वाह, क्या नेक खयाल हैं, पर मालिनी जी अगर प्रेम करने की आज़ादी को घर की इज्जत के नाम पर पैरों तले कुचला जाता हो तब क्या करें?

✍🏼 नितेश शुक्ला

 पिछले 4-5 दिनों से यह बात सुनने में आ रही है कि बरेली के विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतोल की बेटी  साक्षी का पार्टनर चयन सही नहीं है,  ऐसी बेटी भगवान किसी को न दे, वो अपने घर वालों की बदनामी क्यों कर रही है इत्यादि। लोक गायिका मालिनी अवस्थी जिनके पति सीएम योगी आदित्यनाथ के मुख्य सचिव हैं उन्होंने तो साक्षी के बहाने लड़कियों को यह सलाह तक दे डाली कि प्रेम करना गलत नहीं है पर प्रेम को पाने के लिए अपने पिता की सरेआम इज्जत उछालना गलत है। मध्यप्रदेश के बीजेपी नेता गोपाल भार्गव ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसी खबरों को देखकर लोग कन्या भ्रूणहत्या कराने लगेंगे। खुद को प्रगतिशील कहने वाले कई लोग भी साक्षी के परिवार की इज्जत मीडिया में उछलने के कारण पीड़ित परिवार के साथ सहानुभुति दिखा रहे हैं कि साक्षी को ऐसा नहीं करना था। 

ऐसे लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रेम की स्वतंत्रता को ही रोकना चाहते हैं।  समाज और परिवार अगर स्वतंत्र प्रेम की इजाजत नहीं देता तो उससे लड़ना आपकी च्वाइस नहीं मज़बूरी होती है। मालिनी अवस्थी जी के अनुसार प्रेम करना गलत नहीं है, बस घर- परिवार की इज्जत सरेआम मत उछालो। वाह, क्या नेक खयाल हैं, पर मालिनी जी अगर प्रेम करने की आज़ादी को घर की इज्जत के नाम पर पैरों तले कुचला जाता हो तब क्या करें? आज साक्षी की उसके पति समेत हत्या हो गयी होती जैसा कि अक्सर सुनने में आता है तब मालिनी जी किसको सलाह दे रही होतीं?  फिलहाल तो साक्षी का परिवार विक्टिम बन गया है क्योंकि खबर राष्ट्रीय मीडिया में आने के बाद मामला उनके हाथ से निकल गया है, पर ऐसे ही परिवार जब अपने बेटे बेटियों की हत्या कर देते हैं तब उनका प्यार कहाँ होता है? मालिनी जी, हर नई चीज के सृजन में संघर्ष और दर्द एक अनिवार्य चीज़ होती है। बच्चा पैदा होता है तो मां को दर्द होता है, वैसे ही समाज आज पुराने जातिवादी, रूढ़िवादी और सामंती जकड़न को तोड़कर आगे बढ़ेगा और नए समाज का सृजन होगा तो ऐसे में उन लोगों को कष्ट होगा ही जो उन पुरानी मूल्यों मान्यताओं को ढो रहे हैं। एक बेटा अगर बाप के खिलाफ जाकर दहेज के बिना शादी करता है तो भी उसके दहेज प्रेमी बाप को कष्ट होता है, उसके सपनों पर पानी फिर जाता है कि इतना पाल-पोस के बड़ा किया और ये बात ही नहीं सुन रहा है । तो क्या आप यहां भी पीड़ित बाप के साथ खड़ी होंगी? इसीप्रकार साक्षी के स्वतंत्र निर्णय से उसके परिवार को कष्ट होना स्वाभाविक है पर इसका कारण साक्षी का प्रेम करना नहीं बल्कि खुद उनका रूढ़िवादी विचारों का वाहक होना है। अगर उन्होंने अपनी लड़की को स्वतंत्रता से प्रेम करने की आज़ादी दी होती तो ये नौबत ही नहीं आती। परिवार की सरेआम बेइज्जती.... ये परिवार की इज्जत मापने के पैमाना क्या है? अप्रैल 2016 में कर्नाटक के मंड्या में एक लड़की को उसके पिता और चाचा ने इसलिए मार दिया कि वो नीची जाति के एक लड़के से प्यार करती थी, मई 2016 में कर्नाटक के कोलार में एक 17 साल की लड़की को उसके पिता ने नीची जाति के लड़के से रिश्ता तोड़ने को कहा जब लड़की नहीं मानी तब पिता ने उसकी हत्या कर दी,  जुलाई 2016 में नवी मुंबई के एक उच्च जाति की लड़की के परिवार वालों ने उसके 16 वर्षीय दलित प्रेमी की हत्या कर दी, फरवरी 2018 में अंकित सक्सेना की उसकी मुस्लिम पार्टनर के परिवार द्वारा की गई "सरेआम" हत्या को कौन नहीं जानता है, अगस्त 2018 में एक दलित लड़के जिसने एक साल पहले एक मुस्लिम लड़की से शादी की थी, उसकी हत्या लड़की के भाई ने कर दी, सितंबर 2018 में तेलंगाना के दलित लड़के प्रणय पेरुमल्ला को उसकी ऊची जाति की पत्नी के सामने "सरेआम" काट दिया गया जिसकी राष्ट्रीय मीडिया में काफी चर्चा भी हुई, आज से 6 दिन पहले गुजरात में एक दलित को उसकी उच्च जाति की पत्नी के परिवार वालों द्वारा "सरेआम" काट दिया गया। मतलब सरेआम हत्या कर दिया जाय तो चलेगा, इससे परिवार की इज्जत बनी रहेगी पर आप प्यार करके सरेआम अगर सुरक्षा की मांग कर दो तो इससे परिवार की इज्जत सरेआम चली जाती है। अगर ये सारे लोग भी समय से भाग लिए होते तो शायद ज़िंदा होते और मालिनी जी जैसे लोगों की लानतें ले रहे होते। दरअसल मालिनी जैसे लोग स्वतंत्र प्रेम के ही खिलाफ हैं, इसीलिए प्रत्यक्ष बोलने की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से यही बात बोल रही हैं। असल मे इनका कहने का मतलब यही है कि- आप प्रेम करिए पर घर वाले न मानें तो भागकर उनकी इज्जत मत उछालिये, बल्कि वो जिसके साथ बांध दें उसको प्रेम करना सीख लीजिए चाहे वो मारे, काटे या जलाए। मतलब कुल मिलाकर जो अरेंज मैरिज सिस्टम है उसीको चलने दीजिये।  

जहाँ तक बात साक्षी के पार्टनर के सही न होने की है ये तय करना हमारा काम नहीं है की साक्षी के लिए वो सही है या नहीं। साक्षी एक वयस्क है और वह एक ऐसे लड़के को भी चुनती है जो आपकी नजरों में सही नहीं है तो भी ये उसकी आज़ादी है। वो गलत पार्टनर चुनकर अपनी ज़िंदगी खराब भी कर रही तो भी ये उसका अधिकार है। एक किस्सा सुना था कभी कि जब देश आजाद होने लगा तब अंग्रेजों ने गाँधीजी से कहा कि हमारे बिना तुमलोग देश कैसे चलाओगे, भारत बर्बाद हो जाएगा। गाँधीजी ने जबाब दिया हमें खुद को बर्बाद करने की भी आज़ादी चाहिए। 

दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि अगर साक्षी को शादी के बाद लगता है कि उसका ये पार्टनर सही नहीं है तो उसको भी इतनी हिम्मत रखनी चाहिए कि उससे अलग हो सके। इसमें कुछ बुराई भी नहीं है। खराब वैवाहिक रिश्ते को जबरजस्ती उम्रभर चलाना हमारे समाज में सफल शादी के तौर पर देखा जाता है। जिसमें अरेंज मैरिज वाले जीत जाते हैं क्योंकि प्रेम विवाह के टूटने की दर ज्यादा होती है। प्यार और सम्मान से रिक्त जीवनभर का रिश्ता असफल रिश्ता  है जबकि प्यार और सम्मान पर आधारित कुछ सालों का रिश्ता भी एक सफल रिश्ता कहा जायेगा। वास्तव में रिश्ते का आधार केवल प्यार और सम्मान ही होना चाहिए। जिस रिश्ते में ये दोनों नहीं हैं उसको घसीटकर दोनों की ज़िंदगी क्यों बर्बाद करना? इसके साथ ही जितनी सहजता से समाज को दो लोगों को एक साथ रहने के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए उतनी ही सहजता से दो लोगों के एक दूसरे से अलग होने के निर्णय को भी स्वीकार करना चाहिए। ज्यादातर अरेंज्ड मैरेज जीवनभर इसीलिए चल पाते हैं कि औरत के पास अलग होने का अधिकार तो है पर अवसर नहीं है। एक लड़की जो अपने अरेंज मैरिज से खुश नहीं है वो रिश्ता तोड़कर स्वतंत्र रहने के बारे में सोच भी नहीं सकती, पहले तो वो आत्मनिर्भर नहीं है, दूसरे उसे पता है कि अकेली स्वतंत्र औरतों को समाज किस नजरिये से देखता है। उसके पास मायके जाने का विकल्प है क्या? आस पड़ोस के लोग क्या कहेंगे, घर की भाभियाँ क्या कहेंगी ये सोचकर ही उनका मन मर जाता होगा। समाज उनको सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता इसीलिए या तो उसी वैवाहिक जीवन को अपनी नियति मानकर घुट घुट कर जीवन गुजार देती है या फिर आत्महत्या कर लेती है। दूसरी तरफ प्रेम विवाह में पहले से ही घर से विद्रोह करके आयी लड़कियों के लिए जो कि अपेक्षाकृत ज्यादा पढ़ी लिखी और आत्मनिर्भर होती हैं , उनके लिए अपने नीरस रिश्ते से भी विद्रोह करके बाहर निकलना अपेक्षाकृत आसान होता है। एकतरफ उम्रभर की घुटन है, मौत है तो दूसरी तरफ विद्रोह है, संघर्ष है, आज़ादी है। इसीलिए अरेंज मैरिज की उम्रदराज घुटन से प्रेमविवाह का टूटना ज़्यादा बेहतर है। 

आज मुख्य सवाल ये भी है कि सामंती मूल्यों और पितृसत्ता की जकड़न से अगर मुक्ति भी मिल जाये तो क्या ऐसे समाज में प्यार करना और उसे बनाये रखना आसान है जिसके केंद्र में इंसान नहीं मुनाफा है? कार्ल मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद इंसानी रिश्तों से भावुकता का चादर हटाकर उनको कौड़ी-पाई के हिसाब में बदल देता है। आज हर व्यक्ति यह देखकर ही मित्र-यार-रिश्तेदार बनाता है कि इससे क्या फायदा होगा। इसीलिए इस मुनाफा आधारित समाज को बदलने की लड़ाई में लगना आज सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि लोग आपस में खोखले स्वार्थी रिश्तों की बजाय सच्चे इंसानी रिश्ते बिना रुकावट के बना सकें।