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24 June 2019

जनसंख्या से बड़ी समस्या कुछ और है!


(अक्सर तमाम माध्यमों द्वारा लोगो के बीच में ये भ्रम फैलाया जाता है कि आज देश की बुरी स्थिति इसलिए है कि दिन पर दिन जनसँख्या बढ़ रही है। जनसंख्या को ही हर समस्या की जड़ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। बताया जाता है कि संसाधन तो सीमित हैं पर जनसंख्या लगातार बढ़े जा रही है इसलिए लोगों को खाने को अनाज, पहनने को कपड़ा, रहने को घर, बैठने को बस-ट्रैन की सीट, गाड़ी चलाने के लिए सड़कों पर जगह, सांस लेने को शुद्ध हवा इत्यादि नहीं मिल पा रही है। हम भी इसको मानते हुए हर समस्या के लिए जनसंख्या को कोसते रहते हैं, बिना ये जाने कि दरअसल इन समस्याओं का कारण जनसंख्या न होकर कुछ और ही है।)
✍️ प्रदीप सिंह

हाल ही में  संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट आई जिसके अनुसार 2027 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जायेगा। स्वतंत्रता के बाद 33 करोड़ से हम आज करीब 130 करोड़ से ऊपर जनसँख्या वाले हो गये हैं। इस रिपोर्ट के बाद जनसंख्या को लेकर एकबार फिर बहसबाजी शुरू हो जाएगी। अक्सर तमाम माध्यमों द्वारा लोगो के बीच में ये भ्रम फैलाया जाता है कि आज देश की बुरी स्थिति इसलिए है कि दिन पर दिन जनसँख्या बढ़ रही है। जनसंख्या को ही हर समस्या की जड़ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। बताया जाता है कि संसाधन तो सीमित हैं पर जनसंख्या लगातार बढ़े जा रही है इसलिए लोगों को खाने को अनाज, पहनने को कपड़ा, रहने को घर, बैठने को बस-ट्रैन की सीट, गाड़ी चलाने के लिए सड़कों पर जगह, सांस लेने को शुद्ध हवा इत्यादि नहीं मिल पा रही है। हम भी इसको मानते हुए हर समस्या के लिए जनसंख्या को कोसते रहते हैं, बिना ये जाने कि दरअसल इन समस्याओं का कारण जनसंख्या न होकर कुछ और ही है। वास्तव में इस तरह की सोच से सरकारों को फायदा होता है। सरकारें आम जनता से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के रूप में पैसा वसूलती हैं और उनकी ये जिम्मेदारी होती है कि वो देश के हर नागरिक के लिए जरूरी सुविधाएं (पानी, बिजली, सड़क, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, परिवहन, पार्क, रोजगार के अवसर इत्यादि) प्रदान करे। अगर सरकार इन जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करती है तो नागरिकों का यह अधिकार और कर्तव्य बन जाता है कि सरकार से इनके लिए संघर्ष करे और ऐसी सरकारों को उखाड़ फेंके। पर अगर जनता के बीच ऐसी सोच बैठा दी जाय कि सारी समस्याओं की वजह वो खुद है तो सरकारों के लिए सबकुछ बहुत आसान बन जाता है। इसीलिए "आबादी: एक समस्या" का यह भोपूं बार बार हमारे कानों पर बजाया जाता है। आगे हम देखेंगे कि कैसे असली समस्या जनसंख्या न होकर कुछ और है। इसका मतलब ये  नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोई अनगिनत बच्चे पैदा करे तो भी जनसँख्या कोई समस्या नहीं है।  दरअसल यह लेख इस झूठ का भांडाफोड़ है कि जनसँख्या की वजह से ही सारी दिक्कतें पैदा हो रही हैं। 

  अगर हमारे देश में सबको समान शिक्षा मिले, समान चिकित्सा मिले, परिवहन के पर्याप्त साधन मिलें, सबको रोजगार मिले तब भी क्या जनसंख्या समस्या होगी?  
    पूरे विश्व की आबादी लगभग 7.7 अरब के आस पास है।  जिसमें भारत की जनसँख्या करीब 130 करोड़ है यानी पूरे विश्व का हर 6वाँ व्यक्ति भारत का है। हम जब चारो तरफ झांक कर देखते हैं कि सरकार से लेकर हर तबके के लोग इस बिकराल समस्या को लेकर चिंतित है। इस समस्या से निपटने के लिए देश-बिदेश की तमाम संस्थाएं काम कर रही है और अरबो रूपये भी खर्च किये जा रहे हैं। कुछ "महान" हस्तियों को डर है कि अगर ऐसे ही आबादी बढ़ती रही तो मामला हाथ से निकल जायेगा। सोचने वाली बात यह है कि क्या समस्याएं सिर्फ उन देशों में हैं जहाँ जनसंख्या ज्यादा है? आइए देखते हैं।
  आज 21वीं सदी में भी मानव समाज भीषण तंगी, बदहाली और गरीबी से जूझ रहा है। यहाँ तक कि विकसित देशों में भी यही बुरा हाल है। 18 नवम्बर 2009 की न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में 490 लाख लोग भूखे सोते थे। करीब 4.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे का जीवन यापन कर रहे हैं। दिसंबर 2017 की वाशिंगटन पोस्ट की खबर कहती है कि अमेरिका में भीषण गरीबी दस्तक दे रही है। अमेरिका के शहरों में बेघरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जबकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यहाँ जनसंख्या दूसरे एशियाई देशों के मुकाबले काफी कम है। तो क्या हम अब भी मान लें की जनसंख्या ही समस्या की जड़ है? इस विषय पर आईआईटी कानपुर की प्रोफेसर मनाली चक्रवर्ती ने काफी अच्छा शोध किया था। आइये उनके इस शोध की कुछ बातों पर गौर करते है-
आधुनिक इतिहास में सुनियोजित तरीके से बढ़ती जनसंख्या के खतरे पर प्रकाश डालने वाले सबसे पहले शख्स हैं- रेमण्ड थॉमस माल्थस। बढ़ती आबादी की समस्यायों को देखते हुए अपनी गणितीय कैलकुलेशन के हिसाब से उन्होंने बताया कि एक दिन आबादी इतनी बढ़ जायेगी की खाद्यान खत्म हो जायेगा और मानव आबादी इस उपलब्ध खाद्यान को पार कर जायेगी। उनकी  एक किताब " एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन" में बताया गया है कि इस मानव आबादी को संतुलित बनाये रखने के लिए हमें गरीब तबके के लोगो को साफ- सुथरा रखने के बजाय गन्दगी की आदत डलवानी पड़ेगी, गांव की तरफ गन्दी नालिया, गंदे कस्बे, सड़ते हुए तालाब और गंदे नालों के पास बसाने होंगे, हमें प्लेग जैसी बीमारियों को खुले हाथों आमंत्रण देना होगा जिससे ये लोग मरते रहें और आबादी संतुलित रहे। इनकी यह किताब अमीर तबके के लोगो के बीच काफी प्रसिद्ध हुई और उस दौर में  काफी चर्चा में थी।
यह याद रखने वाली बात है कि माथल्स और उनके प्रशंसक लोग पिछड़े देश की नहीं अपितु उस दौर के लोगो के सबसे ताकतवर और समृद्ध देश इंग्लैंड की बात कर रहे थे।
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में डार्विन और उनके रिश्तेदार फ्रांसिस गाल्टन ने इस विचार को वैज्ञानिक तर्क का जामा पहनाया और बताया की बढ़ती जनसंख्या से मानव जाति धीरे धीरे मंदबुद्धि होती जा रही है। उन्होंने इसके लिए "युजैनिक्स (अच्छी नस्ल के प्रजनन)" की पद्धति सुझाई। इसके बाद मार्गरेट सैमर नाम की एक प्रसिद्ध समाजसेवी महिला ने " प्लांट पैरेंटहुड "की शुरुआत की  यानि योजनाबद्ध मातृत्व। उनका मानना था गरीबों की सहायता करना मानवता के खिलाफ है। उनका कहना था कि जिस प्रकार बगीचे की सुंदरता बनाये रखने के लिए  खर-पतवार को साफ करना जरुरी होता है ठीक उसी प्रकार गुणवत्ता बनाये रखने के लिए गरीबों को बच्चा पैदा न करने देना अनिवार्य है। उनका यह तर्क भी उस ज़माने के धनी लोगों को ख़ूब भाया, जैसे कि रॉकफेलर, ड्यूक, लास्कर, डुपोण्ट आदि को। बीसवी सदी के बीचो बीच जर्मनों ने इसको अमल में लाने का प्रयास किया और 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गयी। इमरजेंसी के दौरान इस देश में संजय गाँधी के नेतृत्व में भी जो नसबंदी अभियान छेड़ा गया था, उसकी बुरी यादें अभी भी हमें सताती हैं। पिछले कुछ सालों से यह विचार फिर ज़ोर-शोर से वापस आ रहा है। कइयों को कहते सुना जाता है कि ‘’साहब, अब अच्छा लगे या बुरा, तरीका तो वही है।

जनसंख्या पर शोध करने वाली प्रोफेसर मनाली चक्रवर्ती ने काफी स्पष्ट रूप से इस बात को गलत साबित किया है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण संसाधनों का अभाव पैदा हो गया है। आगे हम उनके द्वारा दिये गए आंकड़े देखते है कि क्या वर्तमान आबादी के लिए वास्तव में संसाधनों की कमी है?  पहले हम बुनियादी जरूरतों की बात करते है-

इंसान की सबसे मूलभूत जरूरत है रोटी, कपड़ा और मकान। 
सबसे पहले हम रहने के लिए जरूरी स्थान पर चर्चा करते हैं। धरती पर लगभग 7 अरब के आस पास जनसँख्या है, अगर 4 व्यक्तियों के एक परिवार को अच्छे तरीके से रहने के लिए 5000 वर्गफुट की ज़मीन दी जाय तो इस प्रकार धरती पर 7 अरब आबादी को बसाने के लिए कितनी जगह चाहिए?
दरअसल इतने लोगों को बसाने के लिए हमारे देश के दो बड़े राज्य महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ही काफी हैं। यानी पूरे विश्व के लोगों को भारत के दो राज्यों में ही बसाया जा सकता है जिसका क्षेत्रफल कुल 8000 अरब बर्गफुट है। अब यह बात बिलकुल साफ है कि आबादी के हिसाब से ज़मीन की कोई कमी नहीं है। यह गणना पूरी जमीन को समतल मानकर किया गया है, पर भारत में न तो केवल दो राज्य हैं न ही भारत दुनिया में अकेला देश है। 

अब रोटी की बात करते हैं
2007 में पूरे विश्व में भीषण खाद्यान की समस्या आ पड़ी थी । विशेषज्ञों का मानना था कि पूरी दुनिया में रोजाना 1 अरब लोग भूखे सोते थे। ऐसा सुन कर लग रहा है कि यह वाकई में बहुत गंभीर समस्या थी। 
थोड़ा गहराई में जाते है-
खाद्य पदार्थ कई तरह के होते है, गल्ला ,दालें, साग, सब्जी, बादाम, मांस , मछली आदि। अगर पूरी दुनिया में पैदा होने वाला गल्ला (अनाज) ही सबके लिए बराबरी से उपलब्ध करा दिया जाए तो पूरी दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को 3000 से 4000 कैलोरी का खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सकता है। जबकि एक आदमी को जीने के लिए 2200 से 2400 कैलोरी ऊर्जा की जरुरत होती है, इसमें फल, सब्जी, दूध, अंडा और मछली को तो जोड़ा भी नहीं गया है। सोचने वाली बात है जहाँ दुनिया में अरबो लोग आधे पेट खाकर सोते हैं, वही तकरीबन उतने ही लोग मोटापे की बीमारी से ग्रसित हैं। एक व्यक्ति अगर 2200-2300 कैलोरी से अधिक खाता है तो वह मोटापे का शिकार हो जाता है। वास्तव में कुछ लोगों को खाने के लिए बहुत ज्यादा मिल रहा तो कुछ लोगों को आधे पेट भी नहीं मिल रहा। इस हिसाब से साफ है कि खाद्यान की कोई कमी नहीं है बल्कि उसकी पहुँच जरूरतमंदों तक नहीं है। 
अब हम अपने देश की बात करते हैं। भारत अपनी जरूरत से करीब ढाई गुना खाद्यान्न उत्पन्न करता है जिसमें हर साल करीब 70 लाख टन अनाज FCI के गोदामों में सड़ जाता है।  दूसरी तरफ एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और हर रोज करीब 4000 बच्चे भूख और कुपोषण की वजह से मरते हैं।  

आवास-प्रश्न
इसीप्रकार आवास समस्या को समझने के लिए एक तथ्य काफी सटीक है। भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में करीब 60% आबादी झुग्गियों-झोपड़ियों में रहती है जहाँ जीवन परिस्थितियाँ काफी प्रतिकूल हैं जबकि दूसरी तरफ मुंबई में 11 लाख ऐसे घर हैं जो खाली पड़े हुए हैं। ये खाली घर या तो बिक नहीं रहे या बिक गए हैं पर उनमें कोई रहता नहीं है (स्रोत- MMRDA रिपोर्ट)। देश के अन्य शहरों में भी लाखों की संख्या में फ्लैट हैं जो बिक नहीं रहे पर दूसरी तरफ करोड़ों बेघर लोगों की फौज खड़ी है। 

स्वास्थ्य समस्या
    देश मे हर साल अरबों की दवाएँ एक्सपायर कर जाती हैं जिनको डंप किया जाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक केवल अमेरिका में हर साल 765 अरब डॉलर की दवाएँ  (एक्सपायरी या नॉन-एक्सपायरी) डंप कर दी जाती हैं। पूरी दुनिया के स्तर पर यह आँकड़े और चौकाने वाले होंगे। दूसरी तरफ आये दिन अखबारों में यह खबर आती है कि सामान्य सी दवा न मिलने से मरीज की मौत। क्या यह दवाओं की कमी है जिसकी वजह से मरीज मरते हैं?  प्रोफेसर मनाली चर्कवर्ती के शोध के अनुसार अगर दुनियाभर में हथियारों पर खर्च होने वाले पैसे का केवल एक तिहाई भी लोगों पर खर्च करें तो पूरी दुनिया की सभी मूलभूत जरूरतें (शिक्षा, स्वास्थ्य , पानी, सफाई, सैनिटेशन इत्यादि) पूरी की जा सकती हैं।

अबतक के तथ्यों और आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट हो गया होगा कि दरअसल यह जनसंख्या नहीं है जिसकी वजह से हम अभावों में जी रहे हैं और अभावों में मार रहे हैं। वास्तव में जो असली समस्या है वह है "मुनाफ़े पर आधारित व्यवस्था"।  यह मुनाफा ही है जिसकी वजह से जरूरत से काफी ज्यादा मात्रा में चीजें उपलब्ध होने के बावजूद एक बड़ी जरूरतमंद आबादी इन चीजों से महरूम रहती है, इनके अभाव में मरती रहती है। आज समाज का आर्थिक ढाँचा इस तरह का है कि मुट्ठीभर लोगों के हाथ में सारे संसाधन हैं, उत्पादन के साधन, फैक्टरियां, मिलें और खदानें हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। इसके लिए पूंजीपतियों का यह वर्ग अपने यहाँ काम करने वाले लोगों का शोषण करते हैं, हाड़तोड़ मेहनत कराने के बाद भी उन्हें उचित मज़दूरी नहीं देते, कोई सुविधाएं नहीं देते। इससे उनका मुनाफा बढ़ता जाता है और वे और अमीर से अमीर होते जाते हैं, यही कारण है कि आज भारत की एक प्रतिशत अमीर आबादी के पास देश की 58% संपदा आ चुकी है जबकि 2015 में इनके पास 53% संपत्ति का मालिकाना था और 2005 में 39% संपत्ति का मालिकाना इनके हाथ में था (ऑक्सफैम रिपोर्ट)। 
दूसरी तरफ मजदूर और गरीबी की खाई में गिरते जाते हैं। इससे यह होता है कि जो समान पूंजीपति विक्री के लिए उत्पादन करवाता है उसको खरीदने के लिए लोगों के पास पैसे ही नहीं बचते। लोगों को जरूरत रहती है और दुकानें सामानों से भरी पड़ी रहती हैं पर आदमी सामान नहीं खरीद पाता। इसके फलस्वरूप आर्थिक मंदी की शुरुआत होती है। 

इसप्रकार मुनाफे पर आधारित व्यवस्था में पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद पूरी आबादी को एक बेहतर ज़िन्दगी दे पाना असंभव है। एक मानव केंद्रित व्यवस्था का निर्माण ही आज इस बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को बेहतर ज़िंदगी दे सकता है। एक ऐसी व्यवस्था जहाँ देश के संसाधनों पर मुट्ठीभर अमीर लोगों का मालिकाना न हो। हम सभी को मिलकर इसपर गंभीरता से काम करने की जरुरत है जिससे हम आने वाले वक्त को बदल सकते हैं और हम सभी एक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं।

19 June 2019

समय का जन्म : (भाग-1) पृथ्वी की आयु हमने कैसे नापी?

 
Source : newsweek.com

 (विज्ञान और तर्क ने धर्म के पवित्र किले में घुसपैठ करने का अक्षम्य अपराध कर दिया था, चर्च के अंदर पवित्र वेदी पर आसीन ईश्वर की वाणी पर एक पापी ने सवाल उठाने का दुस्साहस किया था, सदियों से चली आ रही बहुमूल्य मान्यताओं को चुनौती देने की जुर्रत की गयी थी। धर्माधिकारियों को ये कैसे बर्दास्त हो सकता था। यूरोप के इतिहास में यह पहली बार नहीं था जब विज्ञान धर्म के खिलाफ खड़ा हो गया था। गैलीलियो, कोपरनिकस और ब्रूनो को इस “अक्षम्य पाप” की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। लेकिन यह इस कहानी की बस शुरुआत थी। विज्ञान और तार्किकता का बवंडर यूरोप में प्रवेश कर चुका था, अगली शताब्दी उथलपुथल लेकर आ रही थी, विज्ञान की पताका के सामने धार्मिक पोंगापंथ की ध्वजा डगमगाने लगी थी। यह केवल धर्म नहीं था जिसकी प्रस्थापनाओं की बुनियाद हिलने वाली थी जबकि विज्ञान की पुरानी प्रस्थापनाओं की भी कड़ी परीक्षा होने वाली थी। )
 
✍🏼नितेश शुक्ला
 
   मानव सभ्यता के इतिहास में यह सवाल लंबे समय तक खोज का विषय रहा है। आश्चर्य से भरी इस धरती पर जब से मनुष्य ने अपने पांव फैलाने शुरू किए उसने प्रकृति द्वारा दी गई सीमाओं को तोड़ते हुए सभ्यता के भ्रुण रूपों को सहेजना शुरु किया। अपनी कल्पना में उसने देवताओं और राक्षसों के युद्ध की रचनाएँ की, दुनिया में काम करने वाली शक्तियों को उसने इंद्रदेव, अग्निदेव, पवनदेव आदि नाम दिए, पर एक सवाल उसके विकसित हो रहे मस्तिष्क में बार-बार आता रहा कि यह दुनिया कब अस्तित्व में आई क्या य किसी के द्वारा बनाई गई या खुद ही अस्तित्व में आई। तब से यह सवाल इतिहास में बहुत लंबी यात्रा कर चुका है और अन्ततः बीसवीं शताब्दी कि समाप्ति तक वह समय पहुंचा जहां इस सवाल को सुलझा लिया गयाइसके साथ जुड़ा एक सवाल ये भी है कि क्या ब्रम्हांड (Universe) किसी समय पर अस्तित्व में आया या खुद समय ब्रम्हांड के साथ अस्तित्व में आया? वैज्ञानिकों में प्रचलित मान्यता के अनुसार ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में आने से पहले के समय के बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं है, जिस क्षण ब्रम्हांड अस्तित्व में आया वही समय की शुरुत थी। समय की शुरुआत या समय का जन्म केवल धर्म और विज्ञान के बीच बहस का मुद्दा नहीं रहा है बल्कि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के बीच भी इसको लेकर एक बहस रही है। इस पूरी बहस को सुलझाने में 400 साल लग गए जो कि आखिर 1997 में सुलझाया गया। ब्रम्हांड की आयु की तलाश की यह यात्रा विख्यात कॉस्मोलॉजिस्ट जॉन ग्रिबिन (John Gribbin) ने अपनी किताब “द बर्थ ऑफ टाइम (The Birth of Time)” में बहुत अच्छे से दिखाया है। यह ले उसी यात्रा का एक संक्षिप्त वर्णन है।
      ब्रम्हांड के विषय में आधुनिक जांच-पड़ताल सत्तरहवीं शताब्दी में शुरू हुए। इसके पहले ध्वजवाहकों में गैलीलियो, देकार्ते, न्यूटन, ब्रूनो, कोपरनिकस आदि प्रमुख थे। उस समय तक दुनिया की आयु की गणना का कोई साधन या तरीका उपलब्ध नहीं था, इसका एकमात्र स्रोत धार्मिक किताबें थीं। बाइबिल में वर्णित घटनाओं के अनुसार एक प्रचलित मान्यता यह थी कि दुनिया ईसा से 4000 साल पहले बनी। 1620 ईसवी में आर्कविशप जेम्स उसर (James Ussher 1581-1656) ने सेक्रेड क्रोनोलॉजी “(Sacred Chronology)” किताब प्रकाशित की और बाइबिल में वर्णित घटनाओं के आधार पर दुनिया की उम्र ईसापूर्व 4004 साल बताया। उस समय इसने कोई विवाद पैदा नहीं किया क्योंकि वैज्ञानिकों के पास दुनिया की उम्र को मापने के कोई तरीका नहीं था।
    इसके बाद चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्मों (Fossils) का अध्ययन शुरू हुआ। यह कहानी काफी पहले दसवीं शताब्दी में ही शुरू हुई थी। एक अरब विद्वान अबु अली अल-हसन-इब्न-अल-हाय-थान (अल्हज़ान-Alhazan - 965 ईसवी से 1038 ईसवी तक) ने समुद्र तल से काफी ऊँचाई पर पहाड़ों पर चट्टानी परतों में मछलियों के जीवाश्म का अध्ययन किया। अल्हज़ान ने इसकी व्यख्या इस रूप में की कि समुद्र में मछलियाँ मर कर तली में बैठ गईं, उसके ऊपर बालू की परतें जमती गईं (sedimentation) और इसके बाद धीरे-धीरे समुद्र का तल ऊपर उठ गया जिससे पहाड़ बने। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से होती थी और पृथ्वी की वर्तमान अवस्था के लिए एक काफी लंबे समय की मांग करती थी। फिर भी अल्हज़ान को ये पता नहीं था कि इस प्रक्रिया में कितना समय लगा होगा।
   पहाड़ों पर मछलियों के जीवाश्म पाए जाने की व्याख्या चर्च की तरफ से भी दी गयी। यह कहा गया कि बाइबिल में वर्णित बाढ़ के समय पूरी दुनिया बाढ़ के पानी में डूब गई थी और इसी वजह से मछलियों के जीवाश्म पहाड़ों पर पाए जाते हैं। कई सारे लोगों ने इसपर सवाल उठाए, लियोनार्दो दा विंची उनमें से एक थे। उन्होंने दिखाया कि पहाड़ों पर केवल मछलियाँ ही नहीं बल्की घोंघे और सीप के जीवाश्म भी मिलते हैं और ये पहाड़ (लोम्बार्डी के पहाड़) नजदीकी समुद्र से 400 किलोमीटर तक दूर हैं। यह कैसे सम्भव है कि घोंघे और सीप 40 दिन की बारिश और 150 दिन की बाढ़ में 400 किलोमीटर चलकर पहाड़ों तक पहुँचे होंगे?
आगे यह सवाल निकोलस स्टेनो द्वारा 1667 में स्पष्ट किया गया। उन्होंने कहा कि पहाड़ों का निर्माण भूगर्भीय प्रक्रिया (Geological activity) द्वारा पृथ्वी की सतह के ऊपर उठ जाने के फलस्वरूप हुआ। मृत मछलियाँ और सीप समुद्र की तली में बैठते गए जिसके ऊपर परतें जमतीं गयीं। भूगर्भीय क्रिया के कारण इन समुद्र तलों के बहुत धीरे-धीरे ऊपर उठने के कारण पहाड़ो का निर्माण हुआ। इस भूगर्भीय प्रक्रिया को पूरा होने में 4004 साल से काफी ज्यादा समय की जरूरत होगी। जॉर्ज लुई लेक्लार्क (Georges Louis Leclerc) नाम के एक फ्रांसीसी प्रकृतिविज्ञानी ने इस व्याख्या का समर्थन किया। लेक्लार्क का जन्म 1707 में हुआ था । उन्होंने ‘Les Epoques De La Nature’ नाम की एक किताब लिखी जिसमें उन्होंने बिना ईश्वर द्वारा निर्माण की संकल्पना के धरती की विभिन्न स्थलाकृतियों (Topographical Features) की व्याख्या  की। उनके अनुसार एक लंबे समय तक धीमी गति से कार्य करती प्रक्रियाओं के कारण ही स्थलाकृतियों में गुणात्मक परिवर्तन आता है। ये प्रक्रियाएं आज भी पृथ्वी पर बहुत धीमी गति से काम करती हुई देखी जा सकती हैं। उन्होंने जेम्स उसर द्वारा बाईबल के आधार पर दी गयी 4004 ईसा पूर्व की पृथ्वी की आयु को नकार दिया। उन्होंने ये भी संकल्पना दी कि पृथ्वी का निर्माण एक उल्कापिंड के सूर्य से टकराने के फलस्वरूप टूटकर अलग हुए एक दहकते पिघले गोले से हुआ है। 

  पर ये क्या, विज्ञान और तर्क ने धर्म के पवित्र किले में घुसपैठ करने का अक्षम्य अपराध कर दिया था, चर्च के अंदर पवित्र वेदी पर आसीन ईश्वर की वाणी पर एक पापी ने सवाल उठाने का दुस्साहस किया था, सदियों से चली आ रही बहुमूल्य मान्यताओं को चुनौती देने की जुर्रत की गयी थी। धर्माधिकारियों को ये कैसे बर्दास्त हो सकता था। यूरोप के इतिहास में यह पहली बार नहीं था जब विज्ञान धर्म के खिलाफ खड़ा हो गया था। गैलीलियो, कोपरनिकस और ब्रूनो को इस “अक्षम्य पाप” की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। लेक्लार्क को भी चर्च से अलग मत रखने के कारण दमन का सामना करना पड़ा। धर्मशास्त्रियों ने उनके कार्यों की काफी निंदा की और उनपर दबाव डाला। दबाव में आकर लेक्लार्क को अपनी व्याख्या को वापस लेना पड़ा, लेक्लार्क को अपनी बात को काटते हुए लेख लिखना पड़ा, फिर भी अपनी इस अवस्थिति पर लेक्लार्क जीवन भर अड़े रहे।
  इस व्याख्या ने मछलियों के जीवाश्म का पहाड़ों पर पाए जाने की गुत्थी तो सुलझा दी पर एक नया सवाल सतह पर उभर आया। पिघले द्रव्य के गोले से निर्मित पृथ्वी को आज की स्थिति में पहुँचने में आखिर कितना समय लगा होगा? यह भी पृथ्वी की आयु को नापने के एक तरीका हो सकता था। लेक्लार्क के पहले न्यूटन ने अपनी किताब 'प्रिन्सिपिया (Principia)' में यह गणना की थी कि पृथ्वी के आकार के एक लाल गर्म लोहे के गोले को ठंढा होने में पचास हज़ार साल लगेंगे। लेक्लार्क ने अपनी प्रयोगशाला में विभिन्न प्रकार के गोलों को लेकर उनके गर्म और ठंढा होने का निरीक्षण किया। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी को इतना ठंढा होने में कि यहां पर जीवन संभव हो सके 36000 साल लगेंगे और उसके बाद वर्त्तमान अवस्था तक पहुँचने में और 39000 साल लगेंगे। इसके अनुसार धरती की आयु 75 हज़ार साल आयी। यह संख्या धार्मिक सूत्रों के आधार पर की गई गणना (4004 साल) से 20 गुना ज्यादा थी। इसका भी धर्माधिकारियों की तरफ से कड़ा विरोध किया गया और कड़े दबाव के चलते एक बार फिर लेक्लार्क को अपनी बात वापस लेनी पड़ी। 

लेकिन यह इस कहानी की बस शुरुआत थी। विज्ञान और तार्किकता का बवंडर यूरोप में प्रवेश कर चुका था, अगली शताब्दी उथलपुथल लेकर आ रही थी, विज्ञान की पताका के सामने धार्मिक पोंगापंथ की ध्वजा डगमगाने लगी थी। यह केवल धर्म नहीं था जिसकी प्रस्थापनाओं की बुनियाद हिलने वाली थी जबकि विज्ञान की पुरानी प्रस्थापनाओं की भी कड़ी परीक्षा होने वाली थी। 
19वीं शताब्दी में डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्त ने विज्ञान को एक नया क्षितिज दिया। प्राकृतिक चयनवाद के सिद्धांत द्वारा अलग अलग जीवधारियों की उत्पत्ति और विकास को समझने का एक तार्किक आधार मिला। लेकिन प्राकृतिक चयन की यह प्रक्रिया एक बहुत लंबे समय की मांग करती थी ताकि वर्तमान पृथ्वी पर उपस्थित जटिल जीवधारी  अस्तित्व में आ सकें। इस प्रकार डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्त ने बाइबिल की गणना और लेक्लार्क की गणना से भी काफी ज्यादा पृथ्वी की आयु की तरफ इशारा किया।  भूगर्भशास्त्र (Geology) भी एक लंबे समय की तरफ ही इशारा कर रहा था। 
 
James Fourier
   इस दिशा में
अगला उल्लेखनीय काम फ्रांसीसी जीन जोसफ फ़ौरीएर (Jean Joseph Fourier ) 1768-1830 ने किया। उन्होंने किसी बदलती हुई परिघटना की गणना के लिए गणितीय सूत्र (Fourier Analysis) विकसित किया। फ़ौरीएर ऐसे व्यक्ति थे जिनके लिए ऊष्मा प्रवाह (Heat Transfer) को समझना एक जूनून था। उन्होंने ठोस वस्तुओं में ऊष्मा के संचरण पर काफी मेहनत किया। इसके पहले लेक्लार्क ने पृथ्वी की आयु की गणना करने के लिए उसके ठंढे होने की दर को स्थिर माना था। फ़ौरीएर ने ठंढे होने की इस प्रक्रिया को अलग तरीके से देखा, पृत्वी जो शुरू में गर्म आग का गोला थी  फिर पहले ऊपर से ठंढी होती गयी पर अंदर से अभी भी गर्म थी। इसलिए इसकी ठंढा होने की दर एकसमान नहीं हो सकती थी। इसको ठंढा होने में काफी समय लगता। 1820 ई.  में उन्होंने अपनी पद्धति से पृथ्वी की आयु की गणना की जो कि 10 करोड़ (100 million)  साल आयी। यह लेक्लार्क कि गणना 75 हज़ार साल से काफी ज्यादा थी। इस ऊंची संख्या ने लेक्लार्क को अपनी पद्धति के बारे में इतना सशंकित कर दिया कि उन्होंने पृथ्वी की आयु के इस सूत्र को कभी प्रकाशित ही नहीं किया। फ़ौरीएर को यह आभास भी नहीं था कि यह संख्या वास्तव में कितनी छोटी थी।
  चार्ल्स लिएल्ल (Charles Lyell) (1797-1875) कानून के छात्र थे पर घूमने फिरने और प्रकृति की रहस्यों की छानबीन के जबरदस्त शौक और उत्कंठा ने उनको भूविज्ञानी बना दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में उन्होंने यूरोप के अलग अलग क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण किया जहाँ उन्होंने प्रकृति की शक्तियों के मंद लेकिन अनवरत क्रियाशीलता के प्रमाण देखे। बाद में 1830 से 1833 के बीच उन्होंने तीन खंडों में अपनी रचना 'भूविज्ञान के सिद्धान्त' (Principles of Geology) प्रकाशित की। उन्होंने कहा कि भूगर्भीय शक्तियाँ बहुत ही धीमी गति से काम करती हैं इसलिए पृथ्वी की वर्तमान भौगोलिक अवस्था के निर्माण के लिए बहुत लंबे समय की जरूरत होगी। यह वह समय था जब महान जीवविज्ञानी डार्विन विकासवाद के सिद्धान्त पर काम कर रहे थे। चार्ल्स लीएल द्वारा दिये गए समय  ने डार्विन के सिद्धान्त को निरूपित करने के लिए पर्याप्त समय का आधार दिया। 1859 में 'जीवों की उत्पत्ति (Origin of Species)' के प्रकाशन के बाद भूविज्ञान और जीवविज्ञान (Biology) दोनों ही धरती की काफी लंबी उम्र की बात कर रहे थे। साथ ही यह आवश्यक था कि सूर्य भी कम से कम पृथ्वी जितना ही पुराना था।  इस प्रस्थापना ने इन दोनों का भौतिकविदों (Physicists) के साथ विवाद पैदा कर दिया। 

भौतिकविद यह कह रहे थे कि भौतिकी (Physics) के नियमों के अनुसार यह संभव ही नहीं है कि सूर्य इतने लंबे समय तक चमकता रह सके जितना उद्विकास (Evolution) की प्रक्रिया या भूविज्ञान को जरूरत है। लार्ड केल्विन (Lord Kelvin, 1824-1907) एक महान वैज्ञानिक थे जिन्होंने उष्मागतिकी (Thermodynamics) की नींव रखी थी। शुरू में केल्विन और हर्मोन वोन हेल्महोल्टज़ (Hermann Von Helmholtz) ने मिलकर केल्विन-हेल्महोल्टज़ समय पैमाना दिया था। बाद में उन्होंने उष्मागतिकी का इस्तेमाल करके इस समीकरण को संशोधित किया। 1887 में रॉयल इंस्टीट्यूशन में दिए वक्तव्य में केल्विन ने कहा कि-
1. सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला है जिसका द्रव्यमान पृथ्वी से 33000 गुना ज्यादा है। 
2. इसे अपने खुद के भार के कारण संकुचित (shrink) होते जाना चाहिए पर केंद्र में विद्यमान ऊष्मा के कारण यह अपने आकार में बना रहता है।
3. जब सूर्य के द्रव्यकण गुरुत्वाकर्षण  के कारण केंद्र की तरफ गिरते हैं तो आपस में टकराते हैं जिससे गतिज ऊर्जा (Kinetic energy) ऊष्मा ऊर्जा (Heat Energy) में बदल जाती है। 
इस प्रकार केल्विन ने सूर्य की ऊष्मा के स्रोत की व्याख्या की। इसके आधार पर उन्होंने सूर्य की आयु की गणना 2 करोड़ साल की। बाद में 1897 में केल्विन ने अपनी गणनाओं को संशोधित करके सूर्य की आयु 2.4 करोड़ साल दी। लेकिन सूर्य की यह आयु धरती पर भूगर्भीय और उद्विकास की प्रक्रियाओं के लिए  पर्याप्त नहीं थी। दोनों पक्षों में से कोई एक गलत था, पर कौन गलत था यह खुद समय तय करने वाला था। 
आज भविष्य में बैठकर हम देख सकते हैं कि यह उस समय की सीमा ही थी जब भौतिकी यह जान नहीं पाई थी सूर्य की ऊर्जा का वास्तविक स्रोत क्या है। केल्विन द्वारा निकली गयी सूर्य की उम्र इस परिकल्पना पर आधारित थी कि सूर्य की ऊष्मा का स्रोत अपने भार के कारण इसका सिकुड़ना है जो कि सही नहीं था। 
  19वीं शताब्दी का अंतिम दशक भौतिकी के लिए काफी उत्तेजना भरा समय था। नई नई खोजें दुनिया के कई नए रहस्यों को खोलने जा रही थीं। कई प्रस्थपनाएँ टूटने वाली थीं और उनका स्थान नयी प्रस्थपनाएँ लेने वाली थीं। यही खोजें भौतिकी और भूविज्ञान-जीवविज्ञान के बीच सूर्य के उम्र को लेकर चले आ रहे विवाद को भी खत्म करने वाली थीं। ये खोजें थीं रेडियोएक्टिविटी और एक्स रे।
1895 में जर्मन भौतिकविद विहेल्म रोंटजेन ने एक्स-रे की खोज की। इसके बाद 1896 में हेनरी बेकुरल ने रेडियोधर्मिता (Radioactivity) की खोज की। जे जे थॉमसन ने भी यह पाया कि कैथोड किरणे वास्तव में सूक्ष्म आवेशित कणों से बनी हैं (जिनको आज इलेक्ट्रान कहा जाता है)। यह रदरफोर्ड (1871-1937) थे जिन्होंने इन तीनों खोजों के टुकड़ों को जोड़कर व्यवस्थित रूप दिया और सूर्य के नए ऊर्जा स्रोत की परिकल्पना प्रस्तुत की, साथ ही सूर्य की एक  नयी आयु की तरफ इशारा किया। 
रदरफोर्ड के साथ काम करने वाली एक टीम ने परमाणु (Atom) की आन्तरिक संरचना का मॉडल दिया। रदरफोर्ड ने रेडियोधर्मिता की व्याख्या दी कि यह परमाणु के विघटन (Decay) की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में रेडियोधर्मी तत्वों के अस्थाई परमाणु (Unstable Atoms) दूसरे तत्वों के अधिक स्थायी परमाणुओं (stable atoms) में बदल जाते हैं। रदरफोर्ड ने यह भी पता लगाया कि किसी रेडियोधर्मी तत्व के सैंपल के आधे परमाणु एक खास समय में विघटित हो जाते हैं जो कि आज 'अर्द्ध-आयु (Half life)' के नाम से जाना जाता है। रदरफोर्ड ने महसूस किया कि इस तरीके से पृथ्वी की भी आयु की गणना की जा सकती है। अगर हम यह जान सकें कि किसी चट्टान के सैंपल में शुरुआत में कितने रेडियोधर्मी परमाणु थे और कितने परमाणु अब मौजूद हैं तो अर्ध-आयु के आधार पर यह पता लगा सकते हैं कि वह चट्टान कब बना। लेकिन यह जानना मुश्किल था कि चट्टान बनने के शुरुआत में उसमें कितने रेडियोधर्मी परमाणु मौजूद थे। रदरफोर्ड ने इस समस्या को भी हल कर लिया। उन्होंने इसके लिए रेडियोधर्मी परमाणुओं के विघटन से प्राप्त उपउत्पाद (daughter product) का इस्तेमाल किया। हीलियम रेडियोधर्मी विघटन का ऐसा उत्पाद था जो चट्टान सैंपल में शुरू में उपस्थित नहीं हो सकता था। रदरफोर्ड और उनके सहयोगी बेर्टरम बोल्टवुड (Bertram Boltwood) ने यूरेनियम आधारित चट्टान   के नमूनों में फँसे हीलियम के ट्रेस को मापना शुरू किया। इससे उन्होंने उस चट्टान के नमूने की उम्र 50 करोड़ साल आँकी। यह वांछित उम्र से कम था क्योंकि कुछ हीलियम के परमाणु चट्टान से बाहर पलायन कर गए होंगे। फिर भी यह आयु केल्विन द्वारा दिए गए  अधिकतम आयु से 20 गुना ज्यादा थी, फिर भी यह बस शुरुआत थी। 
बोल्टवुड इसके आगे गए और उन्होंने यूरेनियम के विघटन के हर उपउत्पादों का अध्ययन किया।  उन्होंने अवलोकन किया कि यूरेनियम पहले रेडियम में विघटित होता है जो खुद अस्थायी परमाणु है और खुद विघटित होकर स्थायी तत्व लेड में बदल जाता है। सैंपल में इन दोंनो तत्वों की मात्रा निकालकर और दोनों के अर्द्ध-आयु के साथ गणना करते हुए बोल्टवुड ने कई चट्टान के नमूनों की आयु निकाली। ये आयु कुछ त्रुटि के साथ 40 करोड़ साल से 2 अरब साल के बीच आयी। आगे इस काम को आर्थर होम्स ने अपने हाथ में लिया। 
 आर्थर होम्स (Arthur Holmes) ने, जो कि लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में कार्यरत थे, कई चट्टान के नमूनों की आयु की गणना की। यही वह व्यक्ति थे जिन्होंने रेडियोधर्मी आयु गणना को ज्यादा परिशुद्ध तरीके के रूप में विकसित किया। उन्होंने रेडियोधर्मी तत्वों के समस्थानिकों (Isotopes) को भी अपने अध्ययन में शामिल किया और आयु गणना को और परिशुद्ध (Accurate) बनाया। 1913 में उन्होंने उसी चट्टान सैंपल का अध्ययन करके बहुत अल्प प्रायोगिक त्रुटियों (experimental errors) के साथ उसकी आयु 1.64 अरब साल दी (जिसकी पहले रदरफोर्ड और बोल्टवुड ने 50 करोड़ साल दी थी)। अंततोगत्वा ब्रिटिश एसोसिएशन फ़ॉर एडवांसमेंट ऑफ साइंस की वार्षिक बैठक में भूगर्भशास्त्री, जीवविज्ञानी, जंतुविज्ञानी और भौतिकविद इस बात पर एक साथ सहमत हुए की धरती कुछ अरब साल पुरानी है। उसके बाद पृथ्वी की कई जगहों से प्राप्त पुरातन चट्टान के नमूनों के अध्ययन के बाद इस अंक में कई परिवर्धन हुए हैं। वर्तमान में पृथ्वी की अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन चट्टान की आयु 3.8 अरब साल आँकी गयी है। इसके अतिरिक्त उल्कापिंडों व अंतरिक्ष से पृथ्वी पर गिरने वाले चट्टानी पदार्थों के की आयु गणना से 4.5अरब साल की आयु प्राप्त हुई है। उल्कापिंड (Meteorites) ऐसे पदार्थ हैं जो सूर्य से ग्रहों के निर्माण के समय अंतरिक्ष में बचे हुए पदार्थ हैं। इसलिए 4.5 करोड़ साल की यह आयु हमारे सौरमंडल की आयु की सबसे परिष्कृत गणना है। यह आयु  केल्विन द्वारा दी गयी आयु की 200 गुनी है और धर्मशास्त्रियों द्वारा दी गयी आयु की करीब दस लाख गुनी है। केल्विन अपने समय की सीमा से आगे नहीं जा सकते थे क्योंकि भौतिकी की बहुत सी खोजें तब तक अस्तित्व में ही नहीं आयी थीं। अब रेडियोधर्मिता ने सूर्य की ऊर्जा के एक नए स्रोत का संकेत भी दे दिया था। 1905 में आइंस्टीन ने भी अपनी  'सापेक्षिकता का विशिष्ट सिद्धान्त (Special theory of relativity)' प्रकाशित किया और द्रव्यमान और ऊर्जा के बीच संबंध स्थापित किया, विज्ञान का एक विख्यात समीकरण E= mc2 । इस समीकरण ने रेडियोधर्मी विघटन में उत्पन्न ऊर्जा की व्याख्या की। रेडियोधर्मिता की प्रक्रिया में प्राप्त उपउत्पादों के द्रव्यमान (Mass)  का कुल योग रेडियोधर्मी तत्व के प्रारंभिक द्रव्यमान से कम होता है, यह विघटित द्रव्यमान ही ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। बाद में इस नाभिकीय ऊर्जा के सिद्धांत ने सूर्य की ऊर्जा के स्रोत को लेकर चल रही बहस का अंत कर दिया। इसके बाद भौतिकी के अनुसार भी यह संभव हो सका कि सूर्य पिछले 4.5 अरब सालों से चमकता रह सकता था। 
  इस प्रकार 300 सालों की इस यात्रा में धर्माधिकारियों द्वारा दी गयी एक गप्प से चलकर विज्ञान धरती और सौरमंडल की आयु की सही गणना कर सका। इस लेख के अगले भाग में हम इस यात्रा को और आगे बढ़ायेंगे जब विज्ञान तमाम उथलपुथल से गुजरते हुए पूरे ब्रह्मांड की आयु की गणना कर सका, जो कि खुद  'समय का जन्म' था।