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17 July 2019

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे - फैज़ अहमद फैज़

 कवितायेँ

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे - फैज़ अहमद फैज़

 

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है।
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले ।।

16 July 2019

क्या साक्षी मिश्रा ने भागकर गलती की? : भारतीय समाज में प्रेम और विवाह पर कुछ बातें



समाज और परिवार अगर स्वतंत्र प्रेम की इजाजत नहीं देता तो उससे लड़ना आपकी च्वाइस नहीं मज़बूरी होती है। मालिनी अवस्थी जी के अनुसार प्रेम करना गलत नहीं है, बस घर- परिवार की इज्जत सरेआम मत उछालो। वाह, क्या नेक खयाल हैं, पर मालिनी जी अगर प्रेम करने की आज़ादी को घर की इज्जत के नाम पर पैरों तले कुचला जाता हो तब क्या करें?

✍🏼 नितेश शुक्ला

 पिछले 4-5 दिनों से यह बात सुनने में आ रही है कि बरेली के विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतोल की बेटी  साक्षी का पार्टनर चयन सही नहीं है,  ऐसी बेटी भगवान किसी को न दे, वो अपने घर वालों की बदनामी क्यों कर रही है इत्यादि। लोक गायिका मालिनी अवस्थी जिनके पति सीएम योगी आदित्यनाथ के मुख्य सचिव हैं उन्होंने तो साक्षी के बहाने लड़कियों को यह सलाह तक दे डाली कि प्रेम करना गलत नहीं है पर प्रेम को पाने के लिए अपने पिता की सरेआम इज्जत उछालना गलत है। मध्यप्रदेश के बीजेपी नेता गोपाल भार्गव ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसी खबरों को देखकर लोग कन्या भ्रूणहत्या कराने लगेंगे। खुद को प्रगतिशील कहने वाले कई लोग भी साक्षी के परिवार की इज्जत मीडिया में उछलने के कारण पीड़ित परिवार के साथ सहानुभुति दिखा रहे हैं कि साक्षी को ऐसा नहीं करना था। 

ऐसे लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रेम की स्वतंत्रता को ही रोकना चाहते हैं।  समाज और परिवार अगर स्वतंत्र प्रेम की इजाजत नहीं देता तो उससे लड़ना आपकी च्वाइस नहीं मज़बूरी होती है। मालिनी अवस्थी जी के अनुसार प्रेम करना गलत नहीं है, बस घर- परिवार की इज्जत सरेआम मत उछालो। वाह, क्या नेक खयाल हैं, पर मालिनी जी अगर प्रेम करने की आज़ादी को घर की इज्जत के नाम पर पैरों तले कुचला जाता हो तब क्या करें? आज साक्षी की उसके पति समेत हत्या हो गयी होती जैसा कि अक्सर सुनने में आता है तब मालिनी जी किसको सलाह दे रही होतीं?  फिलहाल तो साक्षी का परिवार विक्टिम बन गया है क्योंकि खबर राष्ट्रीय मीडिया में आने के बाद मामला उनके हाथ से निकल गया है, पर ऐसे ही परिवार जब अपने बेटे बेटियों की हत्या कर देते हैं तब उनका प्यार कहाँ होता है? मालिनी जी, हर नई चीज के सृजन में संघर्ष और दर्द एक अनिवार्य चीज़ होती है। बच्चा पैदा होता है तो मां को दर्द होता है, वैसे ही समाज आज पुराने जातिवादी, रूढ़िवादी और सामंती जकड़न को तोड़कर आगे बढ़ेगा और नए समाज का सृजन होगा तो ऐसे में उन लोगों को कष्ट होगा ही जो उन पुरानी मूल्यों मान्यताओं को ढो रहे हैं। एक बेटा अगर बाप के खिलाफ जाकर दहेज के बिना शादी करता है तो भी उसके दहेज प्रेमी बाप को कष्ट होता है, उसके सपनों पर पानी फिर जाता है कि इतना पाल-पोस के बड़ा किया और ये बात ही नहीं सुन रहा है । तो क्या आप यहां भी पीड़ित बाप के साथ खड़ी होंगी? इसीप्रकार साक्षी के स्वतंत्र निर्णय से उसके परिवार को कष्ट होना स्वाभाविक है पर इसका कारण साक्षी का प्रेम करना नहीं बल्कि खुद उनका रूढ़िवादी विचारों का वाहक होना है। अगर उन्होंने अपनी लड़की को स्वतंत्रता से प्रेम करने की आज़ादी दी होती तो ये नौबत ही नहीं आती। परिवार की सरेआम बेइज्जती.... ये परिवार की इज्जत मापने के पैमाना क्या है? अप्रैल 2016 में कर्नाटक के मंड्या में एक लड़की को उसके पिता और चाचा ने इसलिए मार दिया कि वो नीची जाति के एक लड़के से प्यार करती थी, मई 2016 में कर्नाटक के कोलार में एक 17 साल की लड़की को उसके पिता ने नीची जाति के लड़के से रिश्ता तोड़ने को कहा जब लड़की नहीं मानी तब पिता ने उसकी हत्या कर दी,  जुलाई 2016 में नवी मुंबई के एक उच्च जाति की लड़की के परिवार वालों ने उसके 16 वर्षीय दलित प्रेमी की हत्या कर दी, फरवरी 2018 में अंकित सक्सेना की उसकी मुस्लिम पार्टनर के परिवार द्वारा की गई "सरेआम" हत्या को कौन नहीं जानता है, अगस्त 2018 में एक दलित लड़के जिसने एक साल पहले एक मुस्लिम लड़की से शादी की थी, उसकी हत्या लड़की के भाई ने कर दी, सितंबर 2018 में तेलंगाना के दलित लड़के प्रणय पेरुमल्ला को उसकी ऊची जाति की पत्नी के सामने "सरेआम" काट दिया गया जिसकी राष्ट्रीय मीडिया में काफी चर्चा भी हुई, आज से 6 दिन पहले गुजरात में एक दलित को उसकी उच्च जाति की पत्नी के परिवार वालों द्वारा "सरेआम" काट दिया गया। मतलब सरेआम हत्या कर दिया जाय तो चलेगा, इससे परिवार की इज्जत बनी रहेगी पर आप प्यार करके सरेआम अगर सुरक्षा की मांग कर दो तो इससे परिवार की इज्जत सरेआम चली जाती है। अगर ये सारे लोग भी समय से भाग लिए होते तो शायद ज़िंदा होते और मालिनी जी जैसे लोगों की लानतें ले रहे होते। दरअसल मालिनी जैसे लोग स्वतंत्र प्रेम के ही खिलाफ हैं, इसीलिए प्रत्यक्ष बोलने की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से यही बात बोल रही हैं। असल मे इनका कहने का मतलब यही है कि- आप प्रेम करिए पर घर वाले न मानें तो भागकर उनकी इज्जत मत उछालिये, बल्कि वो जिसके साथ बांध दें उसको प्रेम करना सीख लीजिए चाहे वो मारे, काटे या जलाए। मतलब कुल मिलाकर जो अरेंज मैरिज सिस्टम है उसीको चलने दीजिये।  

जहाँ तक बात साक्षी के पार्टनर के सही न होने की है ये तय करना हमारा काम नहीं है की साक्षी के लिए वो सही है या नहीं। साक्षी एक वयस्क है और वह एक ऐसे लड़के को भी चुनती है जो आपकी नजरों में सही नहीं है तो भी ये उसकी आज़ादी है। वो गलत पार्टनर चुनकर अपनी ज़िंदगी खराब भी कर रही तो भी ये उसका अधिकार है। एक किस्सा सुना था कभी कि जब देश आजाद होने लगा तब अंग्रेजों ने गाँधीजी से कहा कि हमारे बिना तुमलोग देश कैसे चलाओगे, भारत बर्बाद हो जाएगा। गाँधीजी ने जबाब दिया हमें खुद को बर्बाद करने की भी आज़ादी चाहिए। 

दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि अगर साक्षी को शादी के बाद लगता है कि उसका ये पार्टनर सही नहीं है तो उसको भी इतनी हिम्मत रखनी चाहिए कि उससे अलग हो सके। इसमें कुछ बुराई भी नहीं है। खराब वैवाहिक रिश्ते को जबरजस्ती उम्रभर चलाना हमारे समाज में सफल शादी के तौर पर देखा जाता है। जिसमें अरेंज मैरिज वाले जीत जाते हैं क्योंकि प्रेम विवाह के टूटने की दर ज्यादा होती है। प्यार और सम्मान से रिक्त जीवनभर का रिश्ता असफल रिश्ता  है जबकि प्यार और सम्मान पर आधारित कुछ सालों का रिश्ता भी एक सफल रिश्ता कहा जायेगा। वास्तव में रिश्ते का आधार केवल प्यार और सम्मान ही होना चाहिए। जिस रिश्ते में ये दोनों नहीं हैं उसको घसीटकर दोनों की ज़िंदगी क्यों बर्बाद करना? इसके साथ ही जितनी सहजता से समाज को दो लोगों को एक साथ रहने के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए उतनी ही सहजता से दो लोगों के एक दूसरे से अलग होने के निर्णय को भी स्वीकार करना चाहिए। ज्यादातर अरेंज्ड मैरेज जीवनभर इसीलिए चल पाते हैं कि औरत के पास अलग होने का अधिकार तो है पर अवसर नहीं है। एक लड़की जो अपने अरेंज मैरिज से खुश नहीं है वो रिश्ता तोड़कर स्वतंत्र रहने के बारे में सोच भी नहीं सकती, पहले तो वो आत्मनिर्भर नहीं है, दूसरे उसे पता है कि अकेली स्वतंत्र औरतों को समाज किस नजरिये से देखता है। उसके पास मायके जाने का विकल्प है क्या? आस पड़ोस के लोग क्या कहेंगे, घर की भाभियाँ क्या कहेंगी ये सोचकर ही उनका मन मर जाता होगा। समाज उनको सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता इसीलिए या तो उसी वैवाहिक जीवन को अपनी नियति मानकर घुट घुट कर जीवन गुजार देती है या फिर आत्महत्या कर लेती है। दूसरी तरफ प्रेम विवाह में पहले से ही घर से विद्रोह करके आयी लड़कियों के लिए जो कि अपेक्षाकृत ज्यादा पढ़ी लिखी और आत्मनिर्भर होती हैं , उनके लिए अपने नीरस रिश्ते से भी विद्रोह करके बाहर निकलना अपेक्षाकृत आसान होता है। एकतरफ उम्रभर की घुटन है, मौत है तो दूसरी तरफ विद्रोह है, संघर्ष है, आज़ादी है। इसीलिए अरेंज मैरिज की उम्रदराज घुटन से प्रेमविवाह का टूटना ज़्यादा बेहतर है। 

आज मुख्य सवाल ये भी है कि सामंती मूल्यों और पितृसत्ता की जकड़न से अगर मुक्ति भी मिल जाये तो क्या ऐसे समाज में प्यार करना और उसे बनाये रखना आसान है जिसके केंद्र में इंसान नहीं मुनाफा है? कार्ल मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद इंसानी रिश्तों से भावुकता का चादर हटाकर उनको कौड़ी-पाई के हिसाब में बदल देता है। आज हर व्यक्ति यह देखकर ही मित्र-यार-रिश्तेदार बनाता है कि इससे क्या फायदा होगा। इसीलिए इस मुनाफा आधारित समाज को बदलने की लड़ाई में लगना आज सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि लोग आपस में खोखले स्वार्थी रिश्तों की बजाय सच्चे इंसानी रिश्ते बिना रुकावट के बना सकें।

13 July 2019

भारतीय रेलवे और यात्रीजन दोनों की दुर्दशा

   


("ट्रैन में भीड़ की वजह से दम घुटने से युवती की मौत" सोचिए यह न्यूज़ की हैडलाइन कितनी खतरनाक है। खासकर एक ऐसे देश में जो दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है, जो अंतरिक्ष में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, विश्वगुरु होने का दम्भ भर रहा है। इसका जिम्मेदार किसे मानना चाहिए?)

✍️ राघवेंद्र तिवारी 

   भारत में ट्रेन यातायात का प्रमुख साधन है जिससे रोजाना लगभग  2.3 करोड़ लोग अपना सफर पूरा करते हैं और लगभग 30 लाख टन माल ढोया जाता है। 130 करोड़ जनसंख्या वाले भारत देश में साल 2017 तक लगभग 121,407 किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक का जाल बिछा हुआ था जो निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है।  लेकिन ट्रेन में सफर करना बहुत लोगों के लिए एक संघर्ष से कम नहीं है। रेलवे की तमाम योजनाओं और नियमों-कायदों के बावजूद भी ना तो रेलवे व्यवस्था की खामियाँ दूर हो सकी और ना ही यात्रियों को बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा मिल सकी। कुछ ही दिन पहले दिल्ली से मानिकपुर जा रही संपर्क क्रांति ट्रेन में अत्यधिक भीड़ की वजह से एक युवती की हुई मौत दिल दहला देने वाली है तथा रेलवे की इस पूरी व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े खड़ी करती है।
"ट्रैन में भीड़ की वजह से दम घुटने से युवती की मौत" सोचिए यह न्यूज़ की हैडलाइन कितनी खतरनाक है। खासकर एक ऐसे देश में जो दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है, जो अंतरिक्ष में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, विश्वगुरु होने का दम्भ भर रहा है। इसका जिम्मेदार किसे मानना चाहिए?
खुद युवती को या लोगों को जिनकी वजह से भीड़ ज्यादा हो गयी या फिर रेलवे को या सरकार को?
किसी भी सामान्य व्यक्ति के मन में यही सवाल उठेंगे। लेकिन ये सवाल इतना आसान नही है जितना हम समझते हैं। जब हम सफर करते हैं तो देखते हैं कि स्लीपर हो या जनरल, सभी  डिब्बो में व्यवस्थित सीटों से काफी अधिक लोग सफर करते हैं और ये भीड़ और बढ़ जाती है जब कोई पर्व या त्योहार का सीजन हो। भीड़ का आलम ये है कि क्या स्लीपर क्या जनरल सबमें सीट से अधिक यात्री तो सफर करते ही है, गर्मी के दिनों में भीड़ और गर्मी की वजह से परेशानियां और बढ़ जाती हैं। गत 10 जून को इसी भीड़ और उमस ने केरल एक्सप्रेस में सफर कर रहे यात्रियों को बेहाल कर दिया जिसमें 4 यात्रियों की मौत हो गयी। क्या इसको बदहाल व्यवस्था द्वारा की गई हत्या नहीं कहा जायेगा?
दूसरी तरफ रेलवे हर साल घाटे में होती है। इसके बावजूद कि एक स्लीपर में 72 यात्रियों की जगह 150-200 लोगों से किराया लेकर भरा जा रहा है, जनरल में 90 यात्रियों की जगह  250-300 लोगों को ठूसा जा रहा है, टिकट कैंसलेशन चार्ज से ही रेलवे को करोड़ो की कमाई हो रही है (2016-17 में टिकट कैंसलेशन से रेलवे को 1400 करोड़ की कमाई हुई)। इसके साथ ही तत्काल और प्रीमियम तत्काल जैसी सुविधाओं से 2 से 3 गुना ज्यादा किराया वसूला जा रहा है, तत्काल टिकट कैंसिल पर जीरो रिफंड है, रेलवे में कर्मचारियों की भारी संख्या में कमी है। इसके बाद भी जब आप रेलवे के फाइनेंस विंग का डेटा देखेंगे तो पता चलेगा रेलवे प्रति 100 रुपये कमाने के लिए 111.51 रुपये खर्च करता है। आखिर ऐसा क्यों?


जनता अपनी कमाई का कुछ हिस्सा निरन्तर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के रूप में सरकार को देती है। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन पैसों का उपयोग नागरिकों के बेहतर ज़िन्दगी के लिए करे। बेहतर सुविधाओं को तो छोड़ ही दें हमारे देश की एक बड़ी आबादी को साधारण सुविधाओ से भी वंचित रहना पड़ता है। यातायात के मामले में भी यही हाल है। ट्रेन यात्रा की सबसे बड़ी दिक्कतें हैं-
1. अत्यधिक भीड़
2. ट्रेन का देरी से चलना
3. रिजर्वेशन की धांधली
4. ट्रेन दुर्घटनाएं
5. ट्रेनों और प्लेटफार्म पर मिलने वाला खराब खाना
6. गंदगी
ये इतनी गंभीर समस्याएं बन चुकी हैं कि एक लेख में सभी समस्याओं पर बात करना संभव नहीं है। फिलहाल हम ट्रेन दुर्घटनाओं की बात करते हैं।
सितंबर 2017 में मुंबई के एलफिंस्टन रोड (अब प्रभादेवी) स्टेशन पर संकरे पुल पर अधिक भीड़ के कारण हुए भगदड़ में 23 लोगों की जान गई, पंजाब के अमृतसर में रावण दहन के कार्यक्रम के समय पटरी पर खड़े लोगो को रौंदती हुई ट्रेन निकल गयी जिसमें 60 ज्यादा लोगों की जान गई। वो घटना प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा था जिसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों, रेलवे व सरकार के नुमाइंदों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ और इस घटना को अनाधिकृत अतिक्रमण, जनता की लापरवाही और छोटे- मोटे अधिकारियों, ड्राइवर, रेलवे क्रासिंग गेट मैन आदि पर थोप दिया गया। ऐसी घटना ना तो पहली थी और ना ही आखिरी। 2009-10 से 2014-15 के बीच ट्रेन की ऐसी 803 दुर्घटनाओं में 620 लोगों ने अपनी जानें गवाईं और 1855 लोग घायल हुए। आज एक दिक्कत ये भी है कि रेलवे की बड़ी से बड़ी समस्याओं पर, गलतियों पर भी लोगो को गुस्सा नही आता, बड़ी से बड़ी दुर्घटना भी एक साधारण खबर बन कर रह जाती है। सरकारें अपनी नीतियां बनाती रहती हैं जिससे इस तरह की दुर्घटनाओं पर काबू पाया जा सके, लेकिन उनकी ये पहल जमीन पर नहीं दिखती और निरन्तर दिल दहला देने वाली घटनाएं होती रहती हैं। आगे हम ट्रेनों के देरी से चलने की समस्या पर बात करते हैं।
         आइए देखते हैं कि इस बारे में आँकड़ें क्या कहते हैं? रेलवे के आधिकारिक आंकड़े के अनुसार 2017-2018 में करीब 30% ट्रेनें लेट से चलाई गयी। जो पिछले 3 वर्षों का सबसे खराब प्रदर्शन है। रेलवे इतने लंबे समय में भी ट्रेनों के समय से चलने को लेकर कुछ नहीं कर सका। कई बार स्टेशन पर जाने के बाद आपको पता लगता है कि फला ट्रेन 18 घण्टा या 24 घण्टा देरी से चल रही है। ट्रेनों के लेट चलने से कितने यात्रियों को एग्जाम, ऑफिस, या किसी भी आवश्यक कार्य के लिए निर्धारित समय से ना पहुँच पाने से जो परेशानियां होती है उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
ट्रेनों के लेट चलने के पिछले चार वर्षों के आंकड़े
जब हम पिछले 4 वर्षों का डेटा देखते हैं तो पता चलता है कि वर्तमान स्थिति पहले से भी बत्तर हो गयी है और आगे भी होती नजर आ रही है।

ट्रैन
2014
2015
2016
2017
राजधानी
0
3
0
53
शताब्दी
0
15
6
19
सुपरफास्ट
280
357
93
886
एक्सप्रेस
102
122
72
451
गरीब रथ     
35
27
13
46

(यह आंकड़ा उन ट्रेनों का है जो 400 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करती हैं। यह आंकड़ा प्रतिवर्ष जनवरी से मार्च के बीच का है।)
       साथ ही उपरोक्त आंकड़ा सिर्फ उन्हीं ट्रेनों का है जो 15 घण्टे से ज्यादा की देरी से अपने गंतव्य तक पहुँची हैं। अगर हम सारे आंकड़ों को देखें तो अपने समय से लेट चलने वाली ट्रेनों की स्थिति बहुत ही बदतर दिखेगी।
कुछ लोग सोचते हैं कि इसका समाधान निजीकरण में है जो कि सच नहीं है। 2014 के बाद भाजपा के पहले शासनकाल में भोपाल के हबीबगंज स्टेशन को अंसल ग्रुप को चलाने के लिए दिया गया। उसके बाद अंसल ग्रुप ने एक महीने के कार पार्किंग का चार्ज 12000 रुपये कर दिया जिसका लोगों ने काफी विरोध किया। आज देश के कई हिस्सों में रेलवे के लाखों कर्मचारी सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। इसके बाद भी रेलवे का निजीकरण बदस्तूर जारी है। वास्तव में अगर किसी प्राइवेट कंपनी के मुनाफे के लिए रेलवे को नीलाम किया जाएगा तो वो लोगों से पाई-पाई निचोड़ने का ही काम करेगी। आगे के लेखों में इस विषय पर विस्तार से बात की जाएगी।

09 July 2019

कहानी: काशी को बदनाम मत करो



✍🏼 नितेश शुक्ला

जबसे यह वाला थानेदार काशी की पुलिस चौकी का इंचार्ज बन कर आया था तबसे हर महीने चोरी-लूट-छेड़छाड़ व अन्य अपराधों की शिकायतें काफी कम हो गयी थीं। खुद एसपी साहब आश्चर्यचकित थे। करारी मूछों वाला यह थानेदार उनकी कल्पना से काफी ज्यादा अच्छा काम कर रहा था। लग रहा था कि काशी दुनिया के विश्वपटल पर अपना गौरव फिर से स्थापित करेगी। एसपी साहब देखना चाहते थे कि आखिर जो काम इतने थानेदार नहीं कर सके वो इस कड़ी मूछों वाले थानेदार ने कैसे कर दिखाया। उन्होंने इलाके में एक खबरी को भेजा। खबरी कुछ दिन बाजारों में टहलता रहा, कुछ दिन थाने पर तो कुछ दिन अस्सीघाट पर गुजारे, काफी कुछ देखा, लोगों की बातें सुनीं। लौटकर उसने जो कहानी एसपी साहब को सुनाई वो चौकानें वाली थी। इलाके में कड़क मूछों वाले थानेदार साहब का बड़ा रौब था। सुबह उठते ही गंगा नहाकर काशीनाथ के दर्शन करते थे। शाम को आरती का हिस्सा बनते थे। बुलेट पर अपनी तगड़ी मूछों को ताव देते हुए जब चलते थे तो काशी के राजा जैसे लगते थे। पनवाड़ी खिदमत में पान पेश करते थे तो लस्सी वाले लस्सी पीने का न्यौता देते थे। एसपी ने टोका- पर अपराध इतने कम कैसे हो गए? खबरी थोड़ा झुक गया और बोला- माफ कीजियेगा हुजूर पर इलाके में अपराध पहले से भी ज्यादा बढ़ गए हैं। हर रोज चोरी, डकैती, छेड़छाड़ होना अब आम बात हो गयी है। पर अपने थानेदार साहब में अद्भुत शक्ति है। इलाके में भद्रजन उन्हें काशी का रक्षक, बाबा विश्वनाथ का दूत आदि नामों से बुलाते हैं। उनके पास अपराधों से निपटने का बहुत अचूक अस्त्र है। दो दिन पहले काशी में दंगे हो गए पुलिस बुलाने पर भी काफी देर से आई और कई लोग मारे गए। लोगों ने पुलिस की नाकामी के खिलाफ जुलूस निकाला तब थानेदार साहब ने मंच से कहा दंगे होना दुखद है पर मेरी काशी को बदनाम मत करो। लोग घरों को लौट पड़े। आये दिन अपराध बढ़ रहे हैं। अभी परसो की बात है एक विदेशी पर्यटक पर आरती में शामिल न होने के कारण थानेदार साहब के लड़के ने हमला कर दिया। बस फिर क्या था, लोग थाने का घेराव करने लगे। अपराधी को सज़ा देने की मांग करने लगे। थानेदार साहेब बाहर आये और गरजे- विदेशी पर्यटक पर हुए हमले की वो कड़ी निंदा करते हैं पर ऐसे जुलूस निकालकर काशी को बदनाम मत करो। लोगों ने सोचा "सच बात है" और वो अपने घरों को लौट पड़े। अभी कल ही जब एक युवक को चोरी के इल्जाम में थानेदार साहब के लोगों ने पीट-पीट कर मार दिया तब भी मृतक के परिजन थाने पहुंचे, अपराधियों को गिरफ्तार करने की गुहार लगाई। मैं उनके साथ ही गया था। जाहिर सी बात है थानेदार साहब इस हत्या से बहुत दुखी हुए थे, पीड़ितों की बात सुनकर उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने रुंधे गले से कहा कि इस घटना से उनके दिल को घोर आघात पहुँचा है मृतक की आत्मा को भगवान शांति दें पर आपलोग इसकी रिपोर्ट लिखवाकर और मीडिया में ले जाकर काशी को बदनाम मत करें। और इस तरह बिना रिपोर्ट लिखवाए हमको वापस लौटना पड़ा। 
एसपी साहब चकित और चिंतित नजर आ रहे थे। उन्होंने पूछा -वहाँ के पत्रकार क्या कर रहे हैं? खबरी ने बताया कि वहां के पत्रकार ऐसे हो चुके हैं कि जब थानेदार साहब भरपेट अन्न ग्रहण करके तृप्त मन से डकार भी लेते हैं तब पत्रकार तालियां बजाते हैं और कहते  हैं  "क्या उत्तम विचार हैं"।

24 June 2019

जनसंख्या से बड़ी समस्या कुछ और है!


(अक्सर तमाम माध्यमों द्वारा लोगो के बीच में ये भ्रम फैलाया जाता है कि आज देश की बुरी स्थिति इसलिए है कि दिन पर दिन जनसँख्या बढ़ रही है। जनसंख्या को ही हर समस्या की जड़ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। बताया जाता है कि संसाधन तो सीमित हैं पर जनसंख्या लगातार बढ़े जा रही है इसलिए लोगों को खाने को अनाज, पहनने को कपड़ा, रहने को घर, बैठने को बस-ट्रैन की सीट, गाड़ी चलाने के लिए सड़कों पर जगह, सांस लेने को शुद्ध हवा इत्यादि नहीं मिल पा रही है। हम भी इसको मानते हुए हर समस्या के लिए जनसंख्या को कोसते रहते हैं, बिना ये जाने कि दरअसल इन समस्याओं का कारण जनसंख्या न होकर कुछ और ही है।)
✍️ प्रदीप सिंह

हाल ही में  संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट आई जिसके अनुसार 2027 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जायेगा। स्वतंत्रता के बाद 33 करोड़ से हम आज करीब 130 करोड़ से ऊपर जनसँख्या वाले हो गये हैं। इस रिपोर्ट के बाद जनसंख्या को लेकर एकबार फिर बहसबाजी शुरू हो जाएगी। अक्सर तमाम माध्यमों द्वारा लोगो के बीच में ये भ्रम फैलाया जाता है कि आज देश की बुरी स्थिति इसलिए है कि दिन पर दिन जनसँख्या बढ़ रही है। जनसंख्या को ही हर समस्या की जड़ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। बताया जाता है कि संसाधन तो सीमित हैं पर जनसंख्या लगातार बढ़े जा रही है इसलिए लोगों को खाने को अनाज, पहनने को कपड़ा, रहने को घर, बैठने को बस-ट्रैन की सीट, गाड़ी चलाने के लिए सड़कों पर जगह, सांस लेने को शुद्ध हवा इत्यादि नहीं मिल पा रही है। हम भी इसको मानते हुए हर समस्या के लिए जनसंख्या को कोसते रहते हैं, बिना ये जाने कि दरअसल इन समस्याओं का कारण जनसंख्या न होकर कुछ और ही है। वास्तव में इस तरह की सोच से सरकारों को फायदा होता है। सरकारें आम जनता से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के रूप में पैसा वसूलती हैं और उनकी ये जिम्मेदारी होती है कि वो देश के हर नागरिक के लिए जरूरी सुविधाएं (पानी, बिजली, सड़क, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, परिवहन, पार्क, रोजगार के अवसर इत्यादि) प्रदान करे। अगर सरकार इन जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करती है तो नागरिकों का यह अधिकार और कर्तव्य बन जाता है कि सरकार से इनके लिए संघर्ष करे और ऐसी सरकारों को उखाड़ फेंके। पर अगर जनता के बीच ऐसी सोच बैठा दी जाय कि सारी समस्याओं की वजह वो खुद है तो सरकारों के लिए सबकुछ बहुत आसान बन जाता है। इसीलिए "आबादी: एक समस्या" का यह भोपूं बार बार हमारे कानों पर बजाया जाता है। आगे हम देखेंगे कि कैसे असली समस्या जनसंख्या न होकर कुछ और है। इसका मतलब ये  नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोई अनगिनत बच्चे पैदा करे तो भी जनसँख्या कोई समस्या नहीं है।  दरअसल यह लेख इस झूठ का भांडाफोड़ है कि जनसँख्या की वजह से ही सारी दिक्कतें पैदा हो रही हैं। 

  अगर हमारे देश में सबको समान शिक्षा मिले, समान चिकित्सा मिले, परिवहन के पर्याप्त साधन मिलें, सबको रोजगार मिले तब भी क्या जनसंख्या समस्या होगी?  
    पूरे विश्व की आबादी लगभग 7.7 अरब के आस पास है।  जिसमें भारत की जनसँख्या करीब 130 करोड़ है यानी पूरे विश्व का हर 6वाँ व्यक्ति भारत का है। हम जब चारो तरफ झांक कर देखते हैं कि सरकार से लेकर हर तबके के लोग इस बिकराल समस्या को लेकर चिंतित है। इस समस्या से निपटने के लिए देश-बिदेश की तमाम संस्थाएं काम कर रही है और अरबो रूपये भी खर्च किये जा रहे हैं। कुछ "महान" हस्तियों को डर है कि अगर ऐसे ही आबादी बढ़ती रही तो मामला हाथ से निकल जायेगा। सोचने वाली बात यह है कि क्या समस्याएं सिर्फ उन देशों में हैं जहाँ जनसंख्या ज्यादा है? आइए देखते हैं।
  आज 21वीं सदी में भी मानव समाज भीषण तंगी, बदहाली और गरीबी से जूझ रहा है। यहाँ तक कि विकसित देशों में भी यही बुरा हाल है। 18 नवम्बर 2009 की न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में 490 लाख लोग भूखे सोते थे। करीब 4.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे का जीवन यापन कर रहे हैं। दिसंबर 2017 की वाशिंगटन पोस्ट की खबर कहती है कि अमेरिका में भीषण गरीबी दस्तक दे रही है। अमेरिका के शहरों में बेघरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जबकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यहाँ जनसंख्या दूसरे एशियाई देशों के मुकाबले काफी कम है। तो क्या हम अब भी मान लें की जनसंख्या ही समस्या की जड़ है? इस विषय पर आईआईटी कानपुर की प्रोफेसर मनाली चक्रवर्ती ने काफी अच्छा शोध किया था। आइये उनके इस शोध की कुछ बातों पर गौर करते है-
आधुनिक इतिहास में सुनियोजित तरीके से बढ़ती जनसंख्या के खतरे पर प्रकाश डालने वाले सबसे पहले शख्स हैं- रेमण्ड थॉमस माल्थस। बढ़ती आबादी की समस्यायों को देखते हुए अपनी गणितीय कैलकुलेशन के हिसाब से उन्होंने बताया कि एक दिन आबादी इतनी बढ़ जायेगी की खाद्यान खत्म हो जायेगा और मानव आबादी इस उपलब्ध खाद्यान को पार कर जायेगी। उनकी  एक किताब " एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन" में बताया गया है कि इस मानव आबादी को संतुलित बनाये रखने के लिए हमें गरीब तबके के लोगो को साफ- सुथरा रखने के बजाय गन्दगी की आदत डलवानी पड़ेगी, गांव की तरफ गन्दी नालिया, गंदे कस्बे, सड़ते हुए तालाब और गंदे नालों के पास बसाने होंगे, हमें प्लेग जैसी बीमारियों को खुले हाथों आमंत्रण देना होगा जिससे ये लोग मरते रहें और आबादी संतुलित रहे। इनकी यह किताब अमीर तबके के लोगो के बीच काफी प्रसिद्ध हुई और उस दौर में  काफी चर्चा में थी।
यह याद रखने वाली बात है कि माथल्स और उनके प्रशंसक लोग पिछड़े देश की नहीं अपितु उस दौर के लोगो के सबसे ताकतवर और समृद्ध देश इंग्लैंड की बात कर रहे थे।
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में डार्विन और उनके रिश्तेदार फ्रांसिस गाल्टन ने इस विचार को वैज्ञानिक तर्क का जामा पहनाया और बताया की बढ़ती जनसंख्या से मानव जाति धीरे धीरे मंदबुद्धि होती जा रही है। उन्होंने इसके लिए "युजैनिक्स (अच्छी नस्ल के प्रजनन)" की पद्धति सुझाई। इसके बाद मार्गरेट सैमर नाम की एक प्रसिद्ध समाजसेवी महिला ने " प्लांट पैरेंटहुड "की शुरुआत की  यानि योजनाबद्ध मातृत्व। उनका मानना था गरीबों की सहायता करना मानवता के खिलाफ है। उनका कहना था कि जिस प्रकार बगीचे की सुंदरता बनाये रखने के लिए  खर-पतवार को साफ करना जरुरी होता है ठीक उसी प्रकार गुणवत्ता बनाये रखने के लिए गरीबों को बच्चा पैदा न करने देना अनिवार्य है। उनका यह तर्क भी उस ज़माने के धनी लोगों को ख़ूब भाया, जैसे कि रॉकफेलर, ड्यूक, लास्कर, डुपोण्ट आदि को। बीसवी सदी के बीचो बीच जर्मनों ने इसको अमल में लाने का प्रयास किया और 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गयी। इमरजेंसी के दौरान इस देश में संजय गाँधी के नेतृत्व में भी जो नसबंदी अभियान छेड़ा गया था, उसकी बुरी यादें अभी भी हमें सताती हैं। पिछले कुछ सालों से यह विचार फिर ज़ोर-शोर से वापस आ रहा है। कइयों को कहते सुना जाता है कि ‘’साहब, अब अच्छा लगे या बुरा, तरीका तो वही है।

जनसंख्या पर शोध करने वाली प्रोफेसर मनाली चक्रवर्ती ने काफी स्पष्ट रूप से इस बात को गलत साबित किया है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण संसाधनों का अभाव पैदा हो गया है। आगे हम उनके द्वारा दिये गए आंकड़े देखते है कि क्या वर्तमान आबादी के लिए वास्तव में संसाधनों की कमी है?  पहले हम बुनियादी जरूरतों की बात करते है-

इंसान की सबसे मूलभूत जरूरत है रोटी, कपड़ा और मकान। 
सबसे पहले हम रहने के लिए जरूरी स्थान पर चर्चा करते हैं। धरती पर लगभग 7 अरब के आस पास जनसँख्या है, अगर 4 व्यक्तियों के एक परिवार को अच्छे तरीके से रहने के लिए 5000 वर्गफुट की ज़मीन दी जाय तो इस प्रकार धरती पर 7 अरब आबादी को बसाने के लिए कितनी जगह चाहिए?
दरअसल इतने लोगों को बसाने के लिए हमारे देश के दो बड़े राज्य महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ही काफी हैं। यानी पूरे विश्व के लोगों को भारत के दो राज्यों में ही बसाया जा सकता है जिसका क्षेत्रफल कुल 8000 अरब बर्गफुट है। अब यह बात बिलकुल साफ है कि आबादी के हिसाब से ज़मीन की कोई कमी नहीं है। यह गणना पूरी जमीन को समतल मानकर किया गया है, पर भारत में न तो केवल दो राज्य हैं न ही भारत दुनिया में अकेला देश है। 

अब रोटी की बात करते हैं
2007 में पूरे विश्व में भीषण खाद्यान की समस्या आ पड़ी थी । विशेषज्ञों का मानना था कि पूरी दुनिया में रोजाना 1 अरब लोग भूखे सोते थे। ऐसा सुन कर लग रहा है कि यह वाकई में बहुत गंभीर समस्या थी। 
थोड़ा गहराई में जाते है-
खाद्य पदार्थ कई तरह के होते है, गल्ला ,दालें, साग, सब्जी, बादाम, मांस , मछली आदि। अगर पूरी दुनिया में पैदा होने वाला गल्ला (अनाज) ही सबके लिए बराबरी से उपलब्ध करा दिया जाए तो पूरी दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को 3000 से 4000 कैलोरी का खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सकता है। जबकि एक आदमी को जीने के लिए 2200 से 2400 कैलोरी ऊर्जा की जरुरत होती है, इसमें फल, सब्जी, दूध, अंडा और मछली को तो जोड़ा भी नहीं गया है। सोचने वाली बात है जहाँ दुनिया में अरबो लोग आधे पेट खाकर सोते हैं, वही तकरीबन उतने ही लोग मोटापे की बीमारी से ग्रसित हैं। एक व्यक्ति अगर 2200-2300 कैलोरी से अधिक खाता है तो वह मोटापे का शिकार हो जाता है। वास्तव में कुछ लोगों को खाने के लिए बहुत ज्यादा मिल रहा तो कुछ लोगों को आधे पेट भी नहीं मिल रहा। इस हिसाब से साफ है कि खाद्यान की कोई कमी नहीं है बल्कि उसकी पहुँच जरूरतमंदों तक नहीं है। 
अब हम अपने देश की बात करते हैं। भारत अपनी जरूरत से करीब ढाई गुना खाद्यान्न उत्पन्न करता है जिसमें हर साल करीब 70 लाख टन अनाज FCI के गोदामों में सड़ जाता है।  दूसरी तरफ एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और हर रोज करीब 4000 बच्चे भूख और कुपोषण की वजह से मरते हैं।  

आवास-प्रश्न
इसीप्रकार आवास समस्या को समझने के लिए एक तथ्य काफी सटीक है। भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में करीब 60% आबादी झुग्गियों-झोपड़ियों में रहती है जहाँ जीवन परिस्थितियाँ काफी प्रतिकूल हैं जबकि दूसरी तरफ मुंबई में 11 लाख ऐसे घर हैं जो खाली पड़े हुए हैं। ये खाली घर या तो बिक नहीं रहे या बिक गए हैं पर उनमें कोई रहता नहीं है (स्रोत- MMRDA रिपोर्ट)। देश के अन्य शहरों में भी लाखों की संख्या में फ्लैट हैं जो बिक नहीं रहे पर दूसरी तरफ करोड़ों बेघर लोगों की फौज खड़ी है। 

स्वास्थ्य समस्या
    देश मे हर साल अरबों की दवाएँ एक्सपायर कर जाती हैं जिनको डंप किया जाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक केवल अमेरिका में हर साल 765 अरब डॉलर की दवाएँ  (एक्सपायरी या नॉन-एक्सपायरी) डंप कर दी जाती हैं। पूरी दुनिया के स्तर पर यह आँकड़े और चौकाने वाले होंगे। दूसरी तरफ आये दिन अखबारों में यह खबर आती है कि सामान्य सी दवा न मिलने से मरीज की मौत। क्या यह दवाओं की कमी है जिसकी वजह से मरीज मरते हैं?  प्रोफेसर मनाली चर्कवर्ती के शोध के अनुसार अगर दुनियाभर में हथियारों पर खर्च होने वाले पैसे का केवल एक तिहाई भी लोगों पर खर्च करें तो पूरी दुनिया की सभी मूलभूत जरूरतें (शिक्षा, स्वास्थ्य , पानी, सफाई, सैनिटेशन इत्यादि) पूरी की जा सकती हैं।

अबतक के तथ्यों और आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट हो गया होगा कि दरअसल यह जनसंख्या नहीं है जिसकी वजह से हम अभावों में जी रहे हैं और अभावों में मार रहे हैं। वास्तव में जो असली समस्या है वह है "मुनाफ़े पर आधारित व्यवस्था"।  यह मुनाफा ही है जिसकी वजह से जरूरत से काफी ज्यादा मात्रा में चीजें उपलब्ध होने के बावजूद एक बड़ी जरूरतमंद आबादी इन चीजों से महरूम रहती है, इनके अभाव में मरती रहती है। आज समाज का आर्थिक ढाँचा इस तरह का है कि मुट्ठीभर लोगों के हाथ में सारे संसाधन हैं, उत्पादन के साधन, फैक्टरियां, मिलें और खदानें हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। इसके लिए पूंजीपतियों का यह वर्ग अपने यहाँ काम करने वाले लोगों का शोषण करते हैं, हाड़तोड़ मेहनत कराने के बाद भी उन्हें उचित मज़दूरी नहीं देते, कोई सुविधाएं नहीं देते। इससे उनका मुनाफा बढ़ता जाता है और वे और अमीर से अमीर होते जाते हैं, यही कारण है कि आज भारत की एक प्रतिशत अमीर आबादी के पास देश की 58% संपदा आ चुकी है जबकि 2015 में इनके पास 53% संपत्ति का मालिकाना था और 2005 में 39% संपत्ति का मालिकाना इनके हाथ में था (ऑक्सफैम रिपोर्ट)। 
दूसरी तरफ मजदूर और गरीबी की खाई में गिरते जाते हैं। इससे यह होता है कि जो समान पूंजीपति विक्री के लिए उत्पादन करवाता है उसको खरीदने के लिए लोगों के पास पैसे ही नहीं बचते। लोगों को जरूरत रहती है और दुकानें सामानों से भरी पड़ी रहती हैं पर आदमी सामान नहीं खरीद पाता। इसके फलस्वरूप आर्थिक मंदी की शुरुआत होती है। 

इसप्रकार मुनाफे पर आधारित व्यवस्था में पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद पूरी आबादी को एक बेहतर ज़िन्दगी दे पाना असंभव है। एक मानव केंद्रित व्यवस्था का निर्माण ही आज इस बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को बेहतर ज़िंदगी दे सकता है। एक ऐसी व्यवस्था जहाँ देश के संसाधनों पर मुट्ठीभर अमीर लोगों का मालिकाना न हो। हम सभी को मिलकर इसपर गंभीरता से काम करने की जरुरत है जिससे हम आने वाले वक्त को बदल सकते हैं और हम सभी एक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं।