31 October 2019

सावरकर: क्रांतिवीर या माफीवीर?


✍🏼 नितेश शुक्ला

विनायक दामोदर सावरकर को भारतरत्न देने की बीजेपी की सिफारिश के बाद आजकल एक बहस चल पड़ी है कि सावरकर एक स्वतंत्रता वीर थे या अंग्रेजों से माफी मांगने वाले कायर। महाराष्ट्र चुनाव के पहले बीजेपी के लिए यह बहस काफी फायदेमंद भी साबित हुई है। सावरकर आरएसएस-बीजेपी की हिंदुत्व की विचारधारा को सैद्धांतिक आधार देने वाले व्यक्ति थे इसीलिए आरएसएस और बीजेपी लगातार उनको स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्य नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते रहते हैं। इसका कारण ये भी है कि 1925 में बने और अपने को देशभक्त और राष्ट्रवादी कहने वाले आरएसएस के पास एक भी स्वतंत्रता सेनानी नहीं है जिसे ये अपना कह सकें। इसलिए हिन्दू महासभा के नेता सावरकर को ही स्वतंत्रता आंदोलन के एक मुख्य चेहरे के रूप में दिखाने की कोशिश लगातार की जाती रही है। कुछ समय पहले जब राजस्थान में बीजेपी की सरकार थी तब इतिहास की किताबों में बदलाव करके सावरकर को ही आज़ादी की लड़ाई का मुख्य नेता दिखाने की कोशिश की गई थी। हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने रातों रात भगतसिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ सावरकर की त्रिमूर्ति लगा दी। काफी विरोध के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेश पर वो मूर्तियां हटा दी गईं। वास्तव में यह बस अभी शुरुआत है, आरएसएस आगे काफी ज़ोर-शोर से अपने नेताओं को भारतीय जनमानस और इतिहास में स्थापित करने की कोशिश करने वाला है। फिलहाल हम तथ्यों की पड़ताल करते हुए यह जानने की कोशिश करते हैं कि सावरकर का आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान था या नहीं।
सावरकर की राजनीति को ठीक से समझने के लिए उनके जीवन को दो हिस्सों में देखने की जरूरत है। पहला, 1911 में कालापानी जेल जाने से पहले के सावरकर और दूसरा, 1911 में जेल से अंग्रेजों को पहला माफीनामा लिखने के बाद वाले सावरकर। इन दोनों हिस्सों पर प्रकाश डालते हुए हम कुछ तथ्य रखेंगे जिससे पाठक यह खुद तय कर पाएंगे कि सावरकर का आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान था।

1911 के पहले के सावरकर
सावरकर का जन्म 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ। उन्होंने पहले फर्गुसन कॉलेज पुणे और आगे लंदन के ग्रे इन लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। राजनीतिक जीवन की शुरुआत स्कूली जीवन से ही हो गयी थी। पुणे में रहने के दौरान अपने भाई के साथ अभिनव भारत की स्थापना की। अभिनव भारत सोसाइटी भारत में सशस्त्र क्रांति करके इसे आज़ाद कराना चाहती थी। लंदन में रहते हुए 1909 में उन्होंने 1857 के विद्रोह पर एक किताब "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" लिखी जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले कई लोगों को प्रभावित किया। इस किताब में उन्होंने एक ऐसे भारत की ही कल्पना की थी जिसमें हर जाति-धर्म के लोग बराबरी और चैन से रह सकें। अंग्रेजों ने इस किताब को बैन कर दिया। सन् 1909 में इंग्लैंड में सावरकर के एक अनुयायी और मित्र मदन लाल ढींगरा ने एक जनसभा के दौरान एक ब्रिटिश अधिकारी विलियम हट कर्जन विली की हत्या कर दी। सावरकर ने इसका समर्थन किया व ढींगरा के समर्थन में लेख लिखा। लंदन में रहने के दौरान ही 1910 में क्रांतिकारी समूह 'इंडिया हाउस' की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल रहने के लिए उनको गिरफ्तार किया गया और भारत भेजा गया। भारत आते समय उन्होंने जहाज से भागकर फ़्रांस में शरण लेने का प्रयास भी किया पर फ्रांसीसी अधिकारियों ने उन्हें पकड़कर ब्रिटिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। आगे चलकर उनपर दो मामलों में सुनवाई चली, पहला नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए उकसाने और दूसरा राज्य के खिलाफ साजिश रचने की। दोनों मामलों में कोर्ट ने सज़ा सुनाते हुए उनको दोहरे उम्रकैद यानी 50 साल के कैद की सज़ा दी।


1911 के बाद के सावरकर
यह स्पष्ट है कि सावरकर कालापानी की सज़ा के पहले तक स्वतंत्रता के लिए एक क्रांतिकारी के रूप में काम कर रहे थे पर 1911 में कालापानी सेलुलर जेल जाने के बाद और वहां की  अमानवीय प्रताड़ना के बाद उनमें काफी बदलाव आया। जेल में जाने के डेढ़ महीने बाद ही अगस्त 1911 में अपना पहला माफीनामा लिखा। इसके बाद उनके माफिनामों का सिलसिला शुरू हुआ। सावरकर सज़ा से बचने के लिए अंग्रेजों को माफीनामे पर माफीनामे लिखते रहे। अपने माफिनामों मे एक जगह वो लिखते हैं-
"भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है। अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था।
इसलिए अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है।
....अगर हमें रिहा कर दिया जाता है, तो लोग ख़ुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में, जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे।
इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे। मैं भारत सरकार जैसा चाहे, उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं,.... मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फ़ायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले होने वाले फ़ायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है।
जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है। आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे।"

मई 1921 में सावरकर का माफीनामा अंग्रेज सरकार ने स्वीकार कर लिया और उन्हें रत्नागिरी जेल में भेज दिया गया। अन्ततः जनवरी 1924 में सावरकर को जेल से इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वो अगले पांच साल रत्नागिरी जिले से बाहर नहीं जाएंगे और किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे। हालांकि ये प्रतिबंध 1937 में ही हटाया गया।
      कुछ लोग कहते हैं कि माफीनामा लिखना जिंदा रहने और देश सेवा करने की एक रणनीति थी, पर सावरकर ने 2 मई 1921 में अंडमान जेल से आने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया, उनकी राजनीति हिंदूवादी हो चुकी थी। अमरावती जेल में रहते हुए ही उन्होंने हिंदुत्ववादी राजनीति को वैचारिक आधार देने वाली किताब 'हिंदुत्व' लिखी। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब वॉयसराय ने भारत को भी युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी तब इसके विरोध में कांग्रेस के नेताओं ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया उस समय सावरकर की अध्यक्षता में हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाई। साथ ही उन्होंने अंग्रेजों की सेना में हिंदुओं की भर्ती के लिए खुद कैम्प लगवाए, नारा दिया गया- "राजनीति का ही हिन्दुकरण करो और हिंदुओं का सशस्त्रिकरण करो"। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध भी सावरकर और हिन्दू महासभा द्वारा किया गया। इस प्रकार देखा जा सकता है कि रिहाई के बाद एक शब्द या एक कार्य से भी सावरकर अंग्रेजों के खिलाफ नहीं गए। अपने माफीनामे के मुताबिक ब्रिटिश सरकार के सेवक बने रहे और आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर करते रहे।


देश के बँटवारे की सबसे पहली परिकल्पना सावरकर ने दी थी
सावरकर खुद एक नास्तिक व्यक्ति थे, वे हिन्दू को एक धर्म की बजाय एक संस्कृति की तरह देखते थे। अपनी किताब "हिंदुत्व" में उन्होंने हिंदुत्व शब्द को गढ़ा और परिभाषित किया है। उनके अनुसार हिंदुत्व तीन बातों से तय होता है-
1.) इस भारतीय भूभाग (सिन्धुस्थान या हिंदुस्थान) से खून का रिश्ता होना। इस देश के पूर्वजों का रक्त उनमें बह रहा हो यानि वो एक ही जाति के हों।
2.) वे भारत को अपनी पितृभूमि के रूप में मान्यता देते हों।
3.) वो भारत की संस्कृति जो कि हिंदुत्व है उसको अपनी संस्कृति मानते हों।
दूसरे शब्दों में "एक राष्ट्र, एक जाति, एक संस्कृति।"
हिंदुत्व की संस्कृति के लक्षण सावरकर बताते हैं- "वही व्यक्ति हिन्दू है जो सिन्धुस्थान (हिन्दुस्थान) को केवल पितृभूमि ही नहीं पुण्यभूमि भी मानता हो।" इस लक्षण के आधार पर सावरकर कहते हैं कि मुस्लिम कभी भी हिंदुत्व के दायरे में नहीं आ सकते, क्योंकि उनकी पुण्यभूमि हिंदुस्थान में न होकर मक्का में है। इसके अतिरिक्त बाकी जितने भी समुदायों के लोग हैं चाहें वो वैदिक, आस्तिक, नास्तिक, एकेश्वरवादी (सिक्ख, जैन, बौद्ध इत्यादि) हों चूंकि उनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही सिन्धुस्थान है इसलिए वो हिन्दू हैं। इसप्रकार सावरकर मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत जैसे ही एक सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं।
सावरकर की इस किताब में हिन्दू धर्म का काफी महिमामंडन देखने को मिलता है। सावरकर ज्यादातर पुराणों, वेदों और मध्यकालीन काव्य रचनाओं को इतिहास के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तथ्यपूर्ण व यथार्थवादी ऐतिहासिक संदर्भो का लगभग अभाव ही है। बीच-बीच में कपोल कल्पनाओं का काफी सहारा लिया गया है।

इसप्रकार देखा जा सकता है कि सावरकर के जीवन के दो हिस्से रहे हैं एक में वो क्रांतिकारी की भूमिका में दिखते हैं तो दूसरे में इसके उलट अंग्रेजों के सामने शीश नवाते हिंदूवादी नेता की भूमिका में। उल्लेखनीय है कि सावरकर के समय गदर आंदोलन के कितने नेता कालापानी की सजा काट रहे थे, वो वहीं मर-खप गए पर माफी नहीं माँगी। एक तरफ भगतसिंह ये कह रहे थे कि "यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। मेरी कुर्बानी सैकड़ों नौजवानों को देश पर मर मिटने के लिए प्रेरित करेगी।"  दूसरी तरफ सावरकर अपने माफीनामे में कह रहे थे-"मेरी रिहाई मेरे अनुयायियों को खुशी से भर देगी और वे ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादार बनेंगे।" भगतसिंह को भी अंग्रेज सरकार कालापानी की सज़ा दे सकते थे और इसके पर्याप्त कारण भी थे, पूरे देश में भगतसिंह की फाँसी के खिलाफ गुस्सा था, जनता की तरफ से कांग्रेस पर भी यह दबाव था कि गाँधीजी लार्ड इरविन पैक्ट पर तबतक हस्ताक्षर न करें जबतक भगतसिंह की फाँसी की सज़ा को उम्रकैद में न बदल दिया जाय। पर अंग्रेजी हुकूमत इस बात को अच्छी तरह समझती थी कि उनके लिए भगतसिंह का ज़िन्दा रहना कितना घातक हो सकता था। कांग्रेस जैसी समझौता-दबाव वाली रणनीति अपनाने वाली धारा की जगह अगर अंग्रेजों की सत्ता का समूल उखाड़ फेंकने की बात करने वाली क्रांतिकारी धारा अगर जीवित रह जाती है तो यह उनके लिए कितनी ख़तरनाक हो सकती है। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने सावरकर, जो खुद को बचाने के लिए माफिनामों की फेहरिस्त जारी कर रहे थे, उनके माफीनामे स्वीकार कर अंग्रेजी सरकार ने उनको छोड़ दिया। उनको बाद में अंग्रेजों की तरफ से पेंशन भी दिया गया। यह सच भी है सावरकर ने अपने माफिनामों में अंग्रेजी सरकार से किया गया अपना वादा निभाया। बाहर आने के बाद 1947 तक अंग्रेजों के खिलाफ कभी किसी आंदोलन स्तर पर या लेखन स्तर पर वो शामिल रहे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती। उनके लिए अब अंग्रेजी गुलामी समस्या रह ही नहीं गयी थी, वो अब हिंदुत्व की राजनीति की राह पर निकल पड़े थे। इसीलिए आगे न तो अंग्रेजों ने कभी उनको गिरफ्तार किया ना कोई वार्निंग तक दी। एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अंग्रेजों ने सावरकर की पहली किताब "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" पर पाबंदी लगा दी थी, पर उनको जेल के अंदर "हिंदुत्व" किताब लिखने दिया गया और उसपर पाबंदी भी नहीं लगाई गई। ऐसा क्यों? ब्रिटिश सरकार यह समझती थी कि आजादी के लिए उभरते संघर्ष के बीच हिन्दू-राष्ट्र का नारा एक वरदान साबित होने वाला था। एक प्रकार से सावरकर उनकी टीम से ही खेल रहे थे। अंग्रेजों की बांटों और राज करो की रणनीति अब सावरकर खुद ही चला रहे थे। यही कारण था कि अंग्रेज आगे उनपर लगे सारे प्रतिबंध हटाते गए।
महात्मा गाँधी की हत्या के बाद एक अभियुक्त की गवाही के बावजूद सावरकर को स्वतंत्र गवाह या सबूत न होने के कारण छोड़ दिया गया, पर आगे जस्टिस कपूर आयोग ने अपनी जाँच में सावरकर को भी गाँधीजी की हत्या में दोषी माना था।
एक सेनानी का जीवन कीमती होता है जैसे भगतसिंह का था जिसको बचाने के लिए पूरे देश की जनता सड़कों पर उतर रही थी। पर अगर सेनानी खुद ही अपनी जान बचाने के लिए शत्रु से दया की याचना करने लगे तो उसे अवसरवादी कहा जा सकता है पर वीर नहीं। सोचिए अगर सारे क्रांतिकारी बलिदान देने की बजाय जिंदा रहने और देश सेवा करने की सोचते तो भारत कभी आज़ाद हो पाता? युध्द में हर सैनिक सोचने लगे कि अभी भागकर कहीं छुप जाता हूँ, ज़िन्दा रहूँगा तभी तो देश सेवा करूंगा तो क्या हम कभी कोई युध्द जीत पाएंगे??
इसीलिए आज हमारे आदर्श भगतसिंह जैसे बहादुर हो सकते हैं सावरकर जैसे अवसरवादी सेवक नहीं।

पाठक मंच: स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार, नहीं हमें इनकी दरकार



✍️हरिओम शुक्ला   

एक सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वो अपनी जनता को यथासंभव, स्वास्थ्य, शिक्षा, और रोजगार की व्यवस्था उपलब्ध करा सके। इस काम को करने के लिए सरकार जनता के ऊपर टैक्स लगाती और वसूलती है। किन्तु वर्तमान समय में सरकार इन सबसे किनारा करते हुए युवा वर्ग को सम्प्रदायिकता , जातिवाद, हिन्दू-मुस्लिम एवं मंदिर-मस्जिद में उलझाकर दिग्भ्रमित करने का काम कर रही है। आज की युवा पीढ़ी भी धुंआधार प्रचार के इस जलसे में इस कदर मशगूल है की उसे कुछ भी यथार्थ दिखाई ही नहीं दे रहा है। धर्म एवं संप्रदाय का नशा उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो चुका है जिसका लाभ नेता एवं वर्तमान राजनीतिक पार्टियां बखूबी उठा रही हैं।
      क्या हम कभी सोचते हैं या यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे और आपके चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने हमारे लिए कितने स्कूल-कालेज और कितने अस्पताल-चिकित्सालय खोले हैं? ज्यादातर आपको उतर मिलेगा- कभी नहीं। आपका अगला सवाल होगा- आखिर क्यों? सीधा सा उतर है कि यदि सरकारी कालेज और अस्पताल खुलेगा और इनमें शिक्षा और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था भी हो जाए तो जनता का तो भला होगा पर आपके नेता या विधायक जी का कल्याण होगा  क्या? जब उन्हें जाति-धर्म की आग लगाकर, जय श्री राम का नारा लगाकर ही वोट मिल जा रहे हैं तो फिर वो इन मुद्दों पर क्यों सोचेंगे? 
      आपके सांसद या विधायक जी यह सब सुविधाएं आपको देना भी नहीं चाहेंगे, उनके स्वयं के निजी कालेज और चिकित्सालय चल रहे हैं जिनमें आपके नेता जी स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर आपको खूब लूट रहे हैं। आपके नेताजी धीरे-धीरे स्वयं लखपति से करोड़पति और करोड़पति से अरबपति बनते जाएंगे। उनका तो एक ही नारा है- हम राज करें तुम राम भजो। वैसे भी आजकल आप प्राइवेट स्कूल कालेज और अस्पताल की स्थिति देख ही रहे हैं अगर इन्हे पूरी छूट मिल जाए तो यह स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर आपके शरीर से रक्त की एक-एक बूंद तक निचोड़ लेंगे।
     रही बात रोजगार की तो जिस तरह हर एक सरकारी विभागों का निजीकरण किया जा रहा है तो सरकारी नौकरी की उम्मीद तो युवाओं को त्याग ही देना चाहिए।
        वैसे भी सम्प्रदायिक आग लगने वाले और स्कूल-अस्पताल की जगह मंदिर-मस्जिद बनाने वाले नेता जी के साथ सुकून के दो पल वाली सेल्फी लेता युवा आज का पोस्टर बॉय है। ऐसे बेरोजगार युवाओं के लिए सरकार ने पकौड़ा रोजगार की समुचित व्यवस्था कर ही दी है, उन्हें रोजगार की अब आवश्यकता ही कहां है। मीडिया ने आज लोगों को अंधा बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया है। पर एकबार अगर हम अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी पर एक निगाह डालें और खुद से पूछें कि क्या सबकुछ ठीक चल रहा है? आज ज्यादातर आबादी अपनी जिंदगी की समस्याओं से जूझ रही है। किसी को रोजगार नहीं मिल रहा, किसी के घर कोई बीमार है पर इलाज कराने के पैसे नहीं हैं, किसी के घर ऋण चुकाने के पैसे नहीं हैं, किसी के घर अच्छा खाना तक नसीब नहीं हो रहा है, किसी को सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करने के बाद भी गुजारा करने भर का पैसा नहीं मिलता तो किसी की नौकरी छूट गयी है। क्या इन समस्याओं का सरकार से कोई संबंध है? जी हाँ, इसका सीधा संबंध सरकार की नीतियों से है। देश में लोगों को अच्छी शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराना, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, सड़क-बिजली-पानी का समुचित इंतज़ाम करना हर सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होता है। आज़ादी के बाद हर सरकारों ने हमारे देश की आम जनता के साथ दगाबाजी ही कि है, पर अगर हम खुद अपने मूलभूत मुद्दों को भूलकर धार्मिक उन्माद पागल हो जायेंगे तो आखिर कौन हमारे लिए संघर्ष करेगा? आज भारत के युवा वर्ग के सामने यह प्रश्न बार बार टिक-टिक कर रहा है, चेतावनी दे रहा है। अगर हमारी राष्ट्र की परिभाषा में राष्ट्र में रहने वाली जनता का दुख-दर्द नहीं है तो ऐसा राष्ट्रवाद निश्चित रूप से देश को गड्ढे में लेकर जाएगा। 
 अभी भी समय है, देश के भावी भविष्य! तुम अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाओ, अपनी जीवन को और समाज को बेहतर बनाने की लड़ाई लड़ो। अन्यथा भविष्य में शायद युवा कहने लगे कि-  
स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार नहीं हमें इनकी दरकार,
हमें तो चाहिए मंदिर-मस्जिद और दे दो एक तलवार। 

20 October 2019

शातिर समाज और मासूम चोर: हमारे बर्बर समाज की एक कहानी

 मैं सोंचने लगा कैसे किसी को छोटी सी चोरी मात्र के लिए मार कर पैर तोड़ा जा सकता है? कैसे हम इतने असंवेदनशील हो सकते हैं? अब ये सब सुनकर तो वहाँ से जाना मेरे बस का नहीं रहा और शायद किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए ये सब जानने के बाद अपने आप को उन परिस्थितियों से अलग करना मुश्किल होगा। अब मैंने सोच लिया कि उनको देखकर ही यहाँ से जाऊँगा।
Picture for Representation only
 
✍️ राघवेंद्र तिवारी

 अभी कुछ दिन पहले मैं ड्यूटी के लिए सुबह 9 बजे रूम से निकला और कुछ दूर जाने के पश्चात मुझे कुछ ऐसा देखने को मिला जो समाज में एक बर्बर भीड़ की बढ़ रही मानसिकता की क्रूर तस्वीर प्रस्तुत करता है। अक्सर मैं पैदल ही ड्यूटी जाता हूँ जो कि करीब दो किलोमीटर की दूरी पर है तो रोजाना लगभग चार किलोमीटर का चलना भी हो जाता है।
उस दिन रास्ते में मुझे कुछ लोग एकत्रित दिखे जिसके अगल-बगल में कुछ छोटे-मोटे उद्योग और बड़ी-बड़ी इमारतें थी। क्योंकि मेरा उधर से हमेशा जाना-आना रहता है और उस  जगह पर बहुत शांति रहती है इसलिए  लोगों का हुजूम देख मुझसे रहा नहीं गया, कुछ अलग और अजीब सा लगा तो खिंचा चला गया। वहाँ खड़े कुछ मध्य या निम्नमध्यवर्गीय दिखने वाले लोग हो-हल्ला मचाए हुए थे, पूछने पर उन्होंने बताया की दो चोर पकड़े गए हैं, उन्हीं को सामने वाले कमरे में बन्द किया गया है। वो लोग ये भी बताए कि ये बहुत ही शातिर चोर हैं, पहले कनेक्शन काटते हैं फिर कैमरा दूसरी तरफ मोड़ देते है जिससे कुछ भी दिखाई ना दे। उसके बाद ये सब एक-एक करके अंदर प्रवेश करते हैं और चोरी करके चंपत हो जाते हैं। वो बता तो ऐसे रहे थे जैसे कोई चोर ना पकड़ के किसी खूंखार डाकू को दबोच लिया हो।
लोगों की अभी तक की बातों से एक बात जो समझ में नहीं आई वो ये की वो इतने शातिर और चालाक हैं तो फिर कनेक्शन काटने के बाद कैमरा क्यों घूमाते हैं और यदि कैमरा घुमाने से काम हो जाता है तो कनेक्शन क्यों काटते हैं, और दूसरी बात कि जब वे इतने शातिर हैं तो यहाँ क्या चोरी कर रहे हैं? यहाँ तो कुछ भी बहुत बड़ा हाथ लगने वाला था नहीं क्योंकि यहाँ तो छोटे-छोटे उद्योग और बिल्डिंगे हैं जहाँ लोगो की मौजूदगी भी हमेशा रहती है, आखिर यहाँ क्या मिलता? मैं एक मिनट के लिए यही सब सोचने लगा। 
 ये सब सुनने के बाद मैं उनको देखने के लिए बहुत उत्सुक था  जिनके बारे में वहाँ खड़े लोग उत्साह से बताते न थक रहे थे।  लेकिन वहाँ स्थिति ऐसी नहीं थी कि कोई भी कुछ सुनने को तैयार हो। कुछ लोगों से बात करके रिक्वेस्ट भी किया कि भाई एक बार उनको देखना चाहता हूँ जो इतने बड़े-बड़े कारनामे करते हैं। एक बार दिखा दो कि वो दोनों कहाँ हैं लेकिन 
किसी ने नहीं सुना, फिर मुझे ड्यूटी के लिए लेट भी हो रहा था, तो सोचा चलो ये सब तो होता रहता है ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है।
यही सब दिमाग मे चल रहा तभी किसी ने मेरा नाम पुकारा, आवाज सामने की छत से मेरे एक दोस्त के पिताजी ने दी थी। वो भी छत पर खड़े होकर यही सब देख रहे थे, मैं भी उनको नमस्ते बोला और वहाँ से निकलने लगा। जैसे ही वहाँ से 10 कदम आगे निकला तबतक किसी ने बोला कि उसका पैर टूट गया है, ये सुनते ही मेरे दिमाग मे कुछ अजीब सा चलने लगा, मैं सोचने लगा उसका पैर कैसे टूट गया? मैं उन लोगों के पास गया जो ये बातें कर रहें थे, मैंने उनसें पूछा भाई उसका पैर कैसे टूट गया है? उन लोगों को भी बहुत सही जानकारी नहीं थी, इतना जरूर बता दिए कि उनको मार पड़ी है और पैर टूटा है, ये नहीं पता कैसे टूटा है, हो सकता है उनको पता भी हो पर मुझे बताना सही नहीं समझे।
ये सब सुनने के बाद मैं सोंचने लगा कैसे किसी को छोटी सी चोरी मात्र के लिए मार कर पैर तोड़ा जा सकता है? कैसे हम इतने असंवेदनशील हो सकते हैं? अब ये सब सुनकर तो वहाँ से जाना मेरे बस का नहीं रहा और शायद किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए ये सब जानने के बाद अपने आप को उन परिस्थितियों से अलग करना मुश्किल होगा। अब मैंने सोच लिया कि उनको देखकर ही यहाँ से जाऊँगा। थोड़ी देर तक वहाँ रुकने के बाद मुझे पता लगा कि उनको वही पास के एक कमरे में बंद करके बाहर से ताला लगाया गया है। आश्चर्य तो तब हुआ जब ये पता लगा कि उनको 5 बजे से ही बन्द किया गया है और अभी 10 बजने को थे तो उनकी दिनचर्या के बारे में भी सोचने लगा कि वो दोनों मल-मूत्र भी क्या उसी कमरे में कर रहे होंगे? क्या किसी ने उनको नित्यकर्म के लिए बाहर निकाला होगा?
मैं जुगत लगाने  लगा कि उनसे कैसे मिला जाय, मैं उस व्यक्ति के पास गया जिसके पास चाभी थी और उससे कुछ बातें करने के बाद मैंने कहा कि  एक बार उनको देख लिया जाए नहीं तो कही कुछ अनहोनी हो गयी तो आपको ज्यादा दिक्कत हो सकती है। एक बार देखकर फिर बन्द कर दीजिएगा, इतना समझाने पर वो तैयार हो गए और मैं भी उनके साथ हो लिया। मुझे उन सब से मिलना था इसलिए थोड़ा डरा कर ही सही लेकिन ताला खुलवा लिया। जैसे ही कमरा खुला और फिर जो आँखों ने देखा उसे यकीन करना मुश्किल हो रहा था। जिन चोरों की कल्पना मेरे दिमाग मे चल रही थी, वहाँ पर उपस्थित लोगों की बातें सुनने के बाद सच्चाई मेरे सामने उससे बिल्कुल विपरीत थी। असल में वो दो मासूम बच्चे थे, आँखों मे आंसू, शरीर पर चोट के निशान, और डरा हुआ सा चेहरा, लगा जैसे वो उनके साथ हुए वाकये की कहानी बयां कर रहा हो।
बाहर खड़े आदमखोर लोग जो कुछ भी बताए थे वो सब मैं एक झटके में भूल गया और उन बच्चों के पास गया और प्यार से पहले उनका हाल पूछा। बच्चे इतने डरे हुए थे कि कुछ भी बोल नही पा रहे थे, कई बार पूछने पर एक लड़का जिसने अपनी उम्र 11 साल बताई उसने कहा कि प्यास लगी है, वहाँ पानी तक नहीं था कि वो पानी पी सकें। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था इन क्रूर लोगों पर लेकिन गुस्सा करने से कोई फायदा नहीं था।
 मैंने वहाँ खड़े कुछ लोगों से विनती की कि आप लोग यहाँ से थोड़ा दूर जाइए और हो सके तो थोड़ा पानी ला दीजिये फिर जो करना होगा कीजियेगा इनके साथ। मैं सोच नहीं पा रहा था कि कैसे हो गए हैं लोग! सामने कोई प्यासा है और पानी तक नहीं दे रहे, एक नौजवान जो उसी रास्ते से अपने काम पर जा रहा था वो भी रुक कर हमारी बातचीत सुन रहा था, उसी ने अपने बैग से एक पानी का बोतल निकाला और उन बच्चों को पिलाने के लिए दिया। दोनों ने पानी पिया और फिर सब कुछ बताने लगें जो उनके साथ हुआ और जो उन लोगों ने किया था। दोनों की उम्र लगभग बराबर ही थी एक ने तो पहले ही 11 वर्ष बता दिया था दूसरे ने भी अपना 13 वर्ष बताया। सामान्यतः इस उम्र के बच्चे मां की ममता और पिता के प्यार की छांव में घूमते-फिरते, खेलने-कूदने और पढने में ही समय देते हैं पर इसी उम्र में ये बच्चे चोरी के लिए पकड़े गए हैं। दोनों ने बताया कि हम लोग कूड़ा-कबाड़ घूम-घूम कर उठाते हैं और जब बेचने भर का इकट्ठा हो जाता है तो उसे बेच देते हैं। इससे जो पैसा मिलता है उसमें से कुछ हम खर्च करते हैं और जो बचता है घर पर दे देते हैं। उनके घर के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि कॉलोनी के पीछे झुग्गी बस्ती है उसी में रहतें हैं। मैंने पूछा पढ़ने जाते हो तो जबाब मिला कि हम लोग कभी स्कूल नहीं गए। 
ये सब सुनने के बाद मेरे दिमाग में उनकी झुग्गी-बस्तियाँ तैरने लगीं, चारो तरफ गंदे नाले, उसमें पौराते सुअर और कुत्ते, इधर-उधर पड़ा कचरा जिनको कुत्ते और सुअर और बिखेरते रहते, चारों तरफ तिरपाल से बनी झुग्गियों के बीच रहने को मजबूर, पीने के साफ पानी तक कि व्यवस्था नहीं, ऐसी परिस्थिति में रहने वाले दों मासूम बच्चों से हम क्या उम्मीद कर रहें हैं? सभ्य-सुसंस्कृत लोग अच्छे इसलिए हैं क्योंकि उनके पास सभ्य बने रहने के संसाधन हैं। जिनकी ज़िन्दगी बोझ लगने लगी हो, जिनके दरवाजे पर सुबह शाम भूख पहरा देती हो, शिक्षा जिनको देखकर दूर से ही नाक-भौं सिकोड़ लेती हो उनसे आप किस सभ्यता, नैतिकता और संस्कृति की आशा कर रहे हैं? हम हमारे समाज और व्यवस्था की नाकामियों को क्यों दुसरों पर थोप रहे हैं? सरकारें आती हैं और जाती हैं, चेहरे बदलते रहते हैं लेकिन जो नही बदलती है वो मेहनतकश और गरीबों की ज़िंदगी। जिन सुविधाओं के लिए तमाम तरह की योजनाएं चलाई जाती हैं वो इन लोगो तक क्यों नहीं पहुँचती, हम ये बात क्यों नहीं सोचते कि भूखे पेट किसी को भी ज्ञान देने से कोई फायदा नहीं है। 
यही कुछ सवाल मेरे जेहन में चल रहे थे। फिर मैं उनसे कुछ और बातें करते हुए मुख्य बात पर आया कि तुम लोग और क्या-क्या करते हो, इस बात पर उन दोनों ने बड़ी ईमानदारी से बताया कि हम लोग घूमते-फिरते छोटी-छोटी चोरी भी कर लेते हैं। दोनों की बातों में सच्चाई दिख रही थी। बाहर खड़े लोगों ने इन बच्चों पर जिन चीजों की चोरी का इल्जाम लगाया था उनमें एक भरा हुआ गैस सिलेंडर था और एक 35kg की डाई (जो घरों में उपयोग होने वाली चलनी बनाने के लिए यूज़ की जाती है) ले कर गए हैं। जबकि पीछे के रास्ते से जहाँ से ये सब चोरी हुआ बताया जा रहा, 8 फिट ऊँची दीवाल है औऱ कोई गेट भी नहीं है। 8 फीट की दीवार और 30 से 35 kg का सामान, दो बच्चे ये कैसे निकाल सकते हैं? चोरी हुई हो या ना हुई हो पर इन्होंने इन बच्चों को पकड़ कर इतना मारा है कि पैर टूट गया है, शरीर पर जगह-जगह चोटें लगी हैं,  अब आगे की कार्यवाही से बचने के लिए और बाहरी लोगों का समर्थन लेने के लिए ये लोग झूठी कहानियां गढ़ रहे हैं। उन बच्चों ने बताया कि हम लोग पहले भी यहाँ आते रहे हैं गत्ते और प्लास्टिक बीनते हुए, आज भी वही कर रहे थे, ऊपर दीवाल पर कुछ कबाड़ था तो हम दोनों वही उठाने के लिए ऊपर चढ़े थे तभी ये लोग पकड़ लिए और पहले के चोरी हुए बहुत से सामानों के बारे में पूछने लगे। किसी भी सामान के बारे में हम लोगों को कोई जानकारी नहीं थी। छोटे लड़के ने आगे बताया कि ये लोग हमसे पूछ रहे हैं कि अपने बॉस या मालिक का नाम और पता बता दो, तुम दोनों को छोड़ देंगे। मैंने झट से कहा तो इसमें दिक्कत क्या है बता दो और तुम लोग चले जाओ। लड़के ने धीरे से कहा हमारा कोई मालिक नहीं है, हम लोग अपने खर्च के लिए काम करते हैं, घर पर माँ और बहन हैं, हमारे पापा नही हैं। जो 11 साल का लड़का था उसका पैर टूटा था और जो 13 साल का था उसका दाहिने पैर का अंगूठा फटा था। जब उसका फटा अंगूठा देखा तो बहुत गुस्सा आ रहा था, ये लोग इंसान हैं या जानवर। कैसे इनको मासूम बच्चे नही दिखते! अगर इन्होंने चोरी भी की है तो ये पुलिस का मामला है इस तरह मारना कहाँ तक सही है। 

मैं अभी उन बच्चों से बात ही कर रहा तभी कुछ औरतें जो वहाँ खड़ी थीं, फिर बोलना शुरू कर दीं, मुझसे भी रहा नहीं गया और उनके पास जाकर बोला कि जरा सोचिए! क्या आपके बच्चे का जन्म किसी ऐसे घर मे हुआ होता जहाँ उनको जो सुविधाएं आप अभी मुहैया करा रही हैं वो नहीं मिलतीं और वो उन्हीं गंदी बस्तियों में रहता होता जहाँ पर ये बच्चे रहते हैं तो क्या तब भी आपके जो अभी बच्चे हैं उनकी जो स्थिति है वो होती? क्या आप ये नहीं मानतीं की आर्थिक और सामाजिक स्थितियां सभी क्रियाओं के लिए जिम्मेदार होती हैं ? ये सब बातें सुनने के बाद उनकी इंसानियत थोड़ी जागी लेकिन फिर भी उनको छोड़ने के पक्ष में कोई नहीं हुआ। अंततः बहुत कोशिशों के बाद भी वो लोग उनको तबतक छोड़ने को तैयार नही हुए जब तक उनके माँ- बाप आकर वहाँ अपनी बात नहीं रखे।
मुझे भी कम्पनी से बार-बार फोन आ रहा था। अब उदास और निराश होकर वहाँ से निकलना ही पड़ा क्योंकि मैं वहाँ रुक कर भी कुछ नहीं कर पाता ये बात मुझे उतने ही समय में पता चल गया था।

दिन-प्रतिदिन की बढ़ती असमानताओं ने देश को कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है। ये बढ़ती असमानताएं देश की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही हैं। आज के युवा वर्ग की ये प्रमुख जिम्मेदारी बनती है कि इस बढ़ती असमानताओं पर सोचे और मिलकर इसे खत्म करें। आज के समय में तो ऐसी असमानता है कि कोई खा-खा कर मरे जा रहा, कोई खाने के बिना मर रहा है, कोई खाने के लिए दिन भर चलता है, कोई पचाने के लिए चलता है।
क्यों हम लोग ये नहीं सोचते कि एक बच्चा जो झुग्गियों में पला-बढ़ा है, स्कूल के कभी दर्शन नहीं हुए, सामाजिक भेद-भाव अलग से झेला है, खुद मेहनत करता है तो खाता है, वो बहुत अच्छा करेगा ऐसी उमीद क्यों? आज उसने चोरी किया हो या ना किया हो लेकिन जो कष्ट और सामाजिक प्रताड़ना झेल रहा है उसे भूल पाएगा? एक तथाकथित सभ्य समाज को देखने का उनका नजरिया क्या होगा? ये वो सवाल थे जो ये सब देख कर मेरे अंदर  उठे। इसी देश में नेताओं और मंत्रियों को चाय भत्ता 15 से 30 हजार मासिक दिया जाता है और इसी देश में कोई बच्चा 30 रुपये जमा करने के लिए कूड़ा बीनता है। हम कैसे राष्ट्र का निर्माण करेंगे इन असमानताओं के बीच! किसी ने सच कहा है कि अगर किसी राज्य में कोई रोटी के लिए चोरी करता है तो चोर के नहीं राजा के हाथ काटे जाने चाहिए।

मैं कुछ कर नहीं पाया इसका दुःख तो हुआ लेकिन ऐसी कितनी घटनाएं रोज होती होंगी सोचने लगा, और यही सब सोचते हुए ड्यूटी पहुँच गया। वहाँ पहुँचने के बाद भी मैं पूरा दिन उन्हीं के बारे में सोचता रहा। इन्हीं सब के बीच भगतसिंह की कही वो बात याद आ गयी जो उन्होंने निचली अदालत में जज के एक सवाल पर दिया था।
निचली अदालत में एक बार उनसे सवाल हुआ- क्या है क्रांति?
इसी सवाल के जबाब में उन्होंने कहा था। 
  भयानक असमानता और जबर्दस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती।
स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ो शोषित लोग एक भयानक खड्डे की कगार पर चल रहें हैं।
इसी असमानता, गैरबराबरी और हर तरह के शोषण के खात्मे को भगतसिंह ने क्रांति का असली मतलब कहा था। 
 पूरे देश में ऐसी जाने कितनी घटनाएं प्रतिदिन होती होंगी ये सोचकर ही मन दहल जाता है। आज जरूरत है भगतसिंह के विचारों पर चलते हुए नए और समानता युक्त समाज की स्थापना करने की। समाज के हर तबके तक समान शिक्षा व चिकित्सा और रोजगार की व्यवस्था मुहैया कराने की। आज हम युवाओं को ही पहल करने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये। 


27 September 2019

अमर शहीद भगतसिंह की 112वीं जयंती पर युवाओं के नाम भगतसिंह का संदेश

 
 (भगतसिंह की 112वीं  जयंती पर टीम इंक़लाब की तरफ से जारी पर्चा।)

✍️ टीम इंक़लाब

आज अमर शहीद भगतसिंह की 112वीं जयंती है। वर्तमान समय में जब हर तरफ महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और अपराधों का बोलबाला है, जब ज़िंदगी की भागदौड़ और बदहाली में हर व्यक्ति स्वयं का वजूद खोते जा रहा है जब सुबह से शाम तक की जद्दोजहद में आपको एक पल ठहर कर सोचने का भी वक़्त नहीं है ऐसे समय में भगतसिंह जैसे एक स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी को याद करने की जरूरत क्यों है? थोड़ा रुकिए और सोचिए; आज़ादी के 72 साल बाद हम जिस देश में रह रहे हैं क्या हमारे शहीदों ने इसी भारत के लिए अपनी कुर्बानी दी थी? क्या केवल अंग्रेजों से आज़ादी पाना ही उनका मकसद था? नहीं दोस्तों, हमारे महान शहीदों ने बस गोरे अंगेजों से आज़ादी हासिल करने का सपना नहीं देखा था, वो एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जहाँ समाज के हर व्यक्ति को बराबरी, सम्मान और एक सुखी जीवन जीने का अवसर मिले, जहाँ एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण करता हो, जहाँ किसानों और मज़दूरों को उनका सही हक़ मिले और समाज में अमन-चैन कायम हो। आज हमारे देश की परिस्थितियों को देखकर क्या आपको लगता है कि इसी देश के सपने को लेकर भगतसिंह और उनके साथियों ने फाँसी के फंदे को चूम लिया था? जाहिर सी बात है-नहीं। आज भारत दो हिस्सों में बंटा हुआ है, एक तरफ मुठ्ठीभर अमीर लोग हैं जिनके हाथ में सारे कल कारखाने, संसाधन और धन सम्पत्ति केंद्रित है जो अपने छोटे-मोटे शौकों के लिए भी लाखों के वारे-न्यारे कर देते हैं; दूसरी तरफ देश की 80% आम आबादी है  जो सुबह से लेकर शाम तक कल-कारखानों, फैक्टरियों, ऑफिसों और खेतों में खटने के बावजूद भी बदहाली की ज़िंदगी जीने को मजबूर है। अगर हम आंकड़ों की बात करें तो इस देश 80% संपत्ति ऊपर के 10% अमीरों के हाथों में केंद्रित है जबकि नीचे की 80% आबादी मात्र 10% संसाधनों में गुजारा कर रही है। ऐसा नहीं है कि भारत में अनाज या अन्य संसाधनों की कमी है, भारत में एक तरफ 70 लाख टन अनाज हर साल एफसीआई के गोदामों में सड़ जाता है तो दूसरी तरफ भूख और कुपोषण से प्रतिदिन 4000 बच्चे मर जाते हैं, एक तरफ अरबों की दवाएं एक्सपायर कर जाती हैं और समुद्रों या लैंडफिल में फेंक दी जाती हैं तो दूसरी तरफ हज़ारों लोग दवाओं के अभाव में असमय मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। भारत दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है पर यह विश्व भूख सूचकांक में 120 देशों में 103वें नम्बर पर आता है। बेरोजगारी, गरीबी और महंगाई की चक्की तले देश की आम जनता जिस तरह पिस रही है उसको बताने की जरूरत नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए कि यह पूरी व्यवस्था मुठ्ठीभर मालिकों पूंजीपतियों के लिए काम करती है। सारी पार्टियों की फंडिंग करने वाले लोग यही पूंजीपति हैं और इन्हीं के हाथ में सारी मीडिया है। ये धन्नासेठ अपने फायदे के हिसाब से कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी तो कभी किसी अन्य पार्टी को सामने लाते रहते हैं। मोदी सरकार जिस तरह आम जनता को हिन्दू-मुस्लिम के झगड़ों में फंसाकर और उसकी जेब से पाई-पाई निचोड़कर इन पूंजीपतियों की जेबें भर रही है, उनके डूबे कर्जों को माफ कर रही है, उनको छूटें दे रही है इसीलिए अभी बीजेपी पूंजीपतियों की पहली पसंद बनी हुई है। आम जनता को बीजेपी, कांग्रेस अन्य ऐसी पार्टियों से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।



फिर विकल्प क्या है?

आज भगतसिंह को याद करने की जरूरत है जिन्होंने 1930 में ही कहा था कि गांधी और कांग्रेस के रास्ते जो आज़ादी आएगी वो मुठ्ठीभर अमीर लोगों की आज़ादी होगी। वह आज़ादी इन अमीर पूंजीपतियों की तिजोरियों में समा कर रह जाएगी। गोरे अंग्रेज देश से चले जायेंगे पर उनकी जगह भूरे अंग्रेज आम जनता का शोषण करेंगे। देश में जाति-धर्म के नाम पर ऐसे ही आग लगती रहेगी। अपने अदालत के बयान में भगतसिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हमारी आज़ादी का मतलब सिर्फ अंगेजों से आज़ादी नहीं है बल्कि हमारी आज़ादी का मतलब है हर तरह के शोषण का खात्मा; चाहे वो कारखानों का आर्थिक शोषण हो, जातिगत-साम्प्रदायिक शोषण हो या फिर लैंगिक शोषण हो। भगतसिंह ने यह भी कहा था कि शासकवर्ग लोगों को जाति-धर्म के झगड़ों में उलझाकर उनके अधिकारों की असली लड़ाई से दूर रखना चाहते हैं जिससे भारत की जनता को सावधान रहने की जरूरत है। भगतसिंह ने उस समय युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि हम युवाओं से यह नहीं कहेंगे कि वो बम-पिस्तौल उठायें, आज नौजवानों को देश के कोने-कोने जाकर झुग्गियों-बस्तियों, खेतों-खलिहानों में लोगों को क्रांति का संदेश देना होगा, उन्हें संगठित करना होगा, तब जाकर ही ऐसी क्रांति आएगी जो हर तरह के शोषण का अंत कर देगी। भगतसिंह के सपनों का भारत बनाना ही आज वर्तमान समस्या का समाधान है और वही एकमात्र विकल्प भी है। आज हमें शहरों की कालोनियों, ब्लाकों, गांवों और कस्बों में भगतसिंह के विचारों पर आधारित संगठन बनाने की जरूरत है और आम जनता की समस्याओं पर काम करते हुए उनको संगठित करने की जरूरत है। आगे चलकर ऐसा ही देश व्यापी संगठन पूरी व्यवस्था को बदलकर भगतसिंह के सपनों का भारत बनाने में सक्षम हो सकता है। भगतसिंह की जयंती के अवसर पर हम न्यायप्रिय, संवेदनशील और बहादुर नौजवानों का आह्वान करते हैं कि वे इस मुहिम में शामिल होकर इस आंदोलन को मजबूत बनाये ताकि एक नए भारत का निर्माण हो सके।



इंक़लाब ज़िंदाबाद                                                                        भगतसिंह अमर रहें