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25 May 2019

डूबती सरकारी कंपनियां और बढ़ता कॉरपोरेट मुनाफा

 
 
(देश मे अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) दयनीय हाल में पहुच गए हैं। कैग (CAG) की रिपोर्ट में चौकाने वाली वाली बात सामने आई है। डूबती सरकारी कम्पनियां बदहाली की नई पटकथा लिख रही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश की 157 सरकारी कंपनिया  1 लाख करोड़ से भी अधिक के घाटे में डूब चुकी हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो तब होता है जब कोई "देश नही बिकने दूँगा" वाले जुमले के साथ सत्ता में हो फिर भी हर साल 30000 करोड़ रुपये का घाटा कंपनियो को हुआ हो।)

✍️ राघवेंद्र तिवारी  

अभी खबर आई कि दशकों से भारत की नंबर वन तेल कंपनी रहने वाली इंडियन ऑयल को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने पछाड़कर पहला स्थान प्राप्त कर लिया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज एक दशक पहले आईओसीएल से आधे से भी कम आकार की कंपनी थी पर आज यह देश की सबसे बड़ी तेल कम्पनी बन चुकी है। ऐसी कई सरकारी कम्पनीयां हैं जो या तो डूबती जा रही हैं या प्राइवेट कंपनियों से पिछड़ रही हैं। सरकारी नौकरियों की रेस लगाने वाले युवा इन खबरों से अनजान या बेपरवाह किसी न किसी पार्टी की भक्ति में जुटे हुए हैं। रोजगार सृजन का प्रयास तो पहले से ही लगभग खत्म हो गया है या हुआ भी है तो ऊँट के मुँह में जीरे जैसा। ऊपर से नोट बन्दी और GST जैसे मोदी जी के "साहसिक" फैसलों ने करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर दिया। 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाले ही अगर रोजगार सृजन की बजाय रोजगार खत्म करने लगें तो ये तो सीधा-सीधा जनता को मूर्ख बनाना हुआ। नोटबन्दी और GST से जो रोजगार गए अभी उनकी भरपाई भी नही हुई कि एक के बाद एक सरकारी कम्पनियाँ डूबती जा रही हैं साथ ही कई निजी कंपनियाँ भी बड़ी संख्या में दिवालिया हो रही हैं या बन्द हो रही हैं। अभी हाल ही में इंडिया पोस्ट का लगभग 15000 करोड़ रुपये का घाटा सामने आया है। देश भर में लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा डाकघरों को संचालित करने तथा बचत एवं निवेश की योजनाएं चलाने वाला इंडिया पोस्ट निरन्तर घाटे में जा रहा है। वित्त वर्ष 2017-2018 में जो सरकारी कंपनियां घाटे में गयी उनमें बीएसएनएल ,एयर इंडिया,एवं भारतीय डाकघर सबसे चर्चित रहीं जिसमें इंडिया पोस्ट 15000 करोड़ रुपये के घाटे के साथ पहले नंबर पर तथा 8000 करोड़ रुपये के साथ बीएसएनएल दूसरे तथा 5340 करोड़ रुपये के घाटे के साथ एयर इंडिया तीसरे स्थान पर है।
देश मे अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) दयनीय हाल में पहुच गए हैं। कैग (CAG) की रिपोर्ट में चौकाने वाली वाली बात सामने आई है। डूबती सरकारी कम्पनियां बदहाली की नई पटकथा लिख रही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश की 157 सरकारी कंपनिया  1 लाख करोड़ से भी अधिक के घाटे में डूब चुकी हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो तब होता है जब कोई "देश नही बिकने दूँगा" वाले जुमले के साथ सत्ता में हो फिर भी हर साल 30000 करोड़ रुपये का घाटा कंपनियो को हुआ हो।

2014 के पहले के वो दिन कौन भूला होगा जब देश मे एक के बाद एक घोटाले सामने आते थे,रुपया कमजोर होता जा रहा था,लोग अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे थे, बेरोजगारी बढ़ती जा रही थी ,अपराध बढ़ते जा रहे थे, जनता परेशान और हतास थी। ऐसे समय मे एक विकल्प के रूप में गुजरात मॉडल दिखा कर मोदी जी को जनता के सामने लाया गया। न्यूज़ चैनलों ने तो गुजरात को धरती का स्वर्ग बना के पेश किया और मोदी जी के नाम से प्रचार शुरू हुआ जिसमें देश के बढ़े-बढ़े पूंजीपतियों ने खुल के पैसे लुटाए, अपनी प्राइवेट जेट दी और इस तरह कांग्रेस के खिलाफ लहर का फायदा उठाकर मोदी जी को जनता के सामने उनकी सारी समस्याओं के निवारण करने के लिए एक मसीहा के रूप में पेश किया। बहुत कम लोगों ने ये सोचा था कि जो लोग आज मोदी जी को अपना प्राइवेट प्लेन दे रहे, जो बीजेपी को इतनी फंडिंग दे रहे हैं, चुनाव जीतने के बाद बीजेपी उनका एहसान कैसे चुकायेगी। 

मोदी सरकार बनी और उन्होंने वो सभी कार्य करने शुरू किए जिससे उन लोगो को फायदा पहुँच सके जो लोग उनके कुल चुनावी खर्च का 80% लगाए थे। दरअसल पिछले एक दशक से पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था का संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में पूँजीवादी धनकुबेर अपने घटते मुनाफे को हमारी सरकारों की मदद से ही एक-एक करके सरकारी संस्थानों, लोगों की नौकरियों और जिंदगियों को निगल कर पूरा कर रहे हैं।  
   दूसरी तरफ जनता के मूल जरूरतों से उनका ध्यान हटाने के लिए समाज मे जाति, धर्म, क्षेत्र, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर नफरत फैलाई जा रही है। सत्ताधारी लोग अपने शासन को बनाये रखने के लिए समाज मे अराजकता, युद्धोन्माद, अंधराष्ट्रवाद व संप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं, वही दूसरी तरफ पूंजीपति वर्ग के मुनाफे को बरकरार रखने व निरन्तर बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों व जनता की गाढ़ी कमाई को पूंजीपतियों को लूटा रहे हैं। सरकारी कम्पनियों का एक के बाद एक घाटे में जाना इसी बात का उदाहरण है जिसके आंकड़े ऊपर दिये गए हैं। दूसरी तरफ ऊपर के 1% अमीर आबादी के हाथ में 73% (2017) संपत्ति का जाना भी इसी बात का उदाहरण है। 
2017 में किसकी संपत्ति कितनी बढ़ी-
आचार्य बालकृष्ण (पतंजलि) - 173%
गौतम अडानी - 125%
राधाकिशन दमानी - 320%
मुकेश अम्बानी - 78%
कुमार बिरला - 50%
अज़ीम प्रेमजी - 47%
उदय कोटक - 45%
(SOURCE: Hurun India rich list 2017 and Bloomberg-Higher one is taken)
2016 में जय शाह (अमितशाह के पुत्र) की संपत्ति में बढ़ोतरी- 1600000%
 
दूसरी तरफ कुछ निजी कंपनियों का भी दिवालिया होकर बन्द होना बेरोजगारी को बढ़ावा देने में आग में घी का काम कर रहा है। हाल ही में जेट एयरवेज ने अपनी सारी उड़ाने बन्द कर दी जिससे एक पल में 20000 कर्मचारियों की नौकरियां चली गयी। उड़ान बन्द होने के दूसरे दिन सभी कर्मचारी रामलीला मैदान में धरने पर थे, उसी समय पुराने फौजी भी पेंशन की मांग को लेकर धरने पर थे, कुछ दूरी पर तमिलनाडु के किसान भी थे । ये देख कर राहत इंदौरी की ये लाइन याद आ गयी।
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,
यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।
तीन साल पहले जब तमिलनाडु के किसान दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे, विरोध के नए नए तरीके अपना रहे थे तब शायद जेट एयरवेज के कर्मचारी अपने आरामदायक कमरों में बैठकर चिप्स खाते हुए मोदीजी का भाषण सुन रहे थे, किसानों पर हँस रहे थे, जब एसएससी के छात्र दिल्ली में आंदोलन पर थे तब उन्होंने शायद उनकी लड़ाई में दिलचस्पी नहीं ली होगी, किसानों के आंदोलनों को कांग्रेस की साजिश बताने के सरकार के नैरेटिव को शायद सही माना होगा पर यह आज जब आग उनके घरों तक भी पहुँची तो उनको भी सड़क पर उतरना पड़ रहा है। 
कोई सहज ही समझ सकता है कि ये देश का कौन सा विकास है जिसमें बेरोजगारी बढ़ रही है, नौकरियां छीनी जा रही हैं, किसान मर रहे है, महिलाएं असुरक्षित हैं, छात्रों की फीस रिकार्ड तोड़ बढ़ रही है। ऐसे में कौन है जिसकी सम्पति कई गुना बढ़ रही है? मोदी जी किसके चौकीदार रहे हैं, जिनकी दौलत बढ़ रही है या जिसकी नौकरी जा रही है? देश की मेहनतकश जनता को इस सवाल पर सोचने की जरूरत है।

यह निराश होंने और जनता को कोसने का समय नहीं है बल्कि चुनौती स्वीकार करने का वक़्त है।


(2014 में नरेंद्र मोदी की जो लहर पैदा की गई थी वो गुजरात मॉडल, काला धन, अच्छे दिन के सपने, विकास पुरुष की छवि, 2 करोड़ रोजगार  इनसब चीजों से बनी थी जिसके पीछे काफी बड़ी संख्या में सेक्युलर लोग, पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियाँ और यहां तक कि काफी हद तक अल्पसंख्यक भी खड़े हुए थे। ऐसी प्रचंड लहर में बीजेपी को 31% वोट शेयर मिला था। 2019 में परिस्थितियाँ थोड़ी अलग थीं।)
✍🏼 इंक़लाब टीम


इसबार लोकसभा चुनाव के काफी अप्रत्याशित परिणाम आये हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी की जो लहर पैदा की गई थी वो गुजरात मॉडल, काला धन, अच्छे दिन के सपने, विकास पुरुष की छवि, 2 करोड़ रोजगार  इनसब चीजों से बनी थी जिसके पीछे काफी बड़ी संख्या में सेक्युलर लोग, पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियाँ और यहां तक कि काफी हद तक अल्पसंख्यक भी खड़े हुए थे। ऐसी प्रचंड लहर में बीजेपी को 31% वोट शेयर मिला था। 2019 में परिस्थितियाँ थोड़ी अलग थीं। पिछले कार्यकाल में अल्पसंख्यक और दलित विरोधी घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के पूर्ण हिस्से और दलितों के एक बड़े हिस्से को बीजेपी से दूर कर दिया था। देश का सेक्युलर, प्रगतिशील और उदारपंथी तबका भी बीजेपी के खिलाफ खड़ा था, दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों ने गठबंधन कायम किया था जिसका एक हद तक असर पड़ना ही था। ऐसे में बीजेपी का वोट शेयर पिछली बार से भी बढ़ते हुए ऐतिहासिक रूप से 40% के पार चला जाना पूरी चुनाव प्रक्रिया पर काफी गंभीर सवाल खड़ा करता है। इसीलिए इस परिणाम को अप्रत्याशित कहा जाना चाहिए। अगर चुनाव में धांधली वाली बात किनारे भी कर दें तो इस परिणाम से पता चलता है कि किस हद तक लोगों पर अन्धराष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता और फेक प्रोपगंडा हावी रहा है। विपक्ष तो लगभग धराशायी दिख रहा है। चुनावी वामपंथ सफाये के कगार पर पहुँच चुका है। बीजेपी की जीत के संकेत तब मिलने लगे थे जब इस चुनाव में कॉरपोरेट चंदे का 92% बीजेपी को प्राप्त हुआ जबकि बाकी सारी पार्टियों को केवल 8% कॉरपोरेट चंदा मिला। दूसरा कारण संघ का पूरी ताकत के साथ बीजेपी के प्रचार में लगना था। कुछ समय पहले ऐसी खबरें आ रही थीं कि संघ मोदी-शाह जोड़ी से नाखुश है और गडकरी को आगे करना चाहता है उसके बाद कई कयास लगाए जाते रहे। ऐसी खबरें भी आयीं की संघ आज जिस तरीके से साम्प्रदायिकता विरोधी, फासीवाद विरोधी आंदोलन का निशाना बन रहा था, राहुल गाँधी तक खुले मंचों से बीजेपी-आरएसएस की राजनीति से देश को आज़ाद करने की  बात करने लगे थे ऐसे में संघ ने किसी भी सूरत में सरकार बदलने पर आने वाले खतरे की आशंका से प्रेरित हो पूरी ताकत से बीजेपी को जिताने का निर्णय लिया है। जो भी हो संघ के ज़मीनी पकड़ और काडर आधारित ढाँचे की पूरी ताकत बीजेपी के प्रचार में लगी थी। बीच में एक खबर ये भी आई थी कि संघ ने कन्हैया कुमार को हराने के लिए 200 से ज्यादा समर्पित कार्यकर्ताओं को बेगूसराय में उतारा है जो घर-घर जाकर जनेऊ की सौगंध दे रहे। 
    
यह चुनाव केंद्रीय चुनाव आयोग के ऐतिहासिक पक्षपात के लिए भी याद रखा जाएगा। यह चुनाव ऐतिहासिक तिङकमों के लिए भी याद रखा जाएगा। हैदराबाद की एक फर्म ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि केवल महाराष्ट्र में करीब 40 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हैं। इनमें 17 लाख दलित हैं और 10 लाख मुस्लिम हैं। यूपी के चंदौली से एक खबर ये भी आई कि कुछ बीजेपी नेता दलित बस्ती में पैसे बाँटकर चुनाव के एक दिन पहले ही उनकी उंगली में स्याही लगा चुके थे। 20 लाख ईवीएम गायब होने की बात भी अभी-अभी निकल कर आई है। 

जैसे भी हो, अब मोदी सरकार 2.0 बन रही है। देश के सेक्युलर, प्रगतिशील, उदारवादी, वामपंथी लोगों को अगले 5 साल और कठिन संघर्षों के लिए तैयार रहना होगा। यह चुनाव 2014 के विकास व अच्छे दिन के नारों की बजाय हिंदुत्व, आतंकवाद और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर ही लड़ा गया है, बीजेपी हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्लेटफार्म पहले ही तैयार कर चुकी है। अब यह काम पिछलिबर के मुकाबले तेजी से होने वाला है। इस बार विरोधियों का और नंगा दमन देखने को मिल सकता है। खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के कारण पहले से भी प्रचंड बेरोजगारी, जनता के पैसे की लूट, सब्सिडी कटौती देखने को मिल सकती है। अगले सालों में आर्थिक मंदी की वजह आम जनता की जरूरतें पूरी करने में असफल होने के कारण ये सरकार साम्प्रदायिक और अंधराष्ट्रवादी एजेंडे को और हवा देगी। प्रोपगंडा फिल्मों का सिलसिला आगे बढ़ेगा। किताबों और पाठ्यक्रम को बदल कर संघी एजेंडे के अनुरूप बनाया जाएगा। इन सबके लिए भारतीय जनता को तैयार रहना चाहिए।  

इस बीच कुछ लोग निराश हताश हो रहे हैं तो कुछ लोग जनता को कोस रहे हैं। जनता की चेतना तक अगर फासीवादी-साम्प्रदायिक राजनीति ही पहुँची और क्रांतिकारी राजनीति नहीं पहुँच पाई इसकी जिम्मेदार जनता नहीं है बल्कि वो लोग हैं जिनको पूरी ताकत से वैकल्पिक राजनीति को लोगों तक पहुँचाना था। ये असफलता उनकी भी है। अब निराश होने की बजाय सच्चाई को स्वीकार कर वर्तमान समय की चुनौती को स्वीकार करने की जरूरत है। प्रगतिशील लोगों को आज जनता में लगातार काम करते रहना चाहिए और जनता के असली मुद्दों पर सत्ता से सवाल करना जारी रखना चाहिए। जल्द ही क्रूर आर्थिक हकीकत संघी प्रोपगंडा की चादर को बेधकर आम जनता के सामने ठोस सच्चाई रख देगी। ऐसे में उनको फिर साम्प्रदायिक और अंधराष्ट्रवादी प्रचारतंत्र से बचाने के लिए प्रगतिशील वर्गों को भी एक क्रांतिकारी प्रचार तंत्र खड़ा करना होगा। ऐसी सांस्कृतिक टोलियां बनाये जाने की जरूरत है जो मुहल्ले-मुहल्ले, गावँ-गावँ जाकर सेक्युलर और क्रांतिकारी विचारों को फैलाने में मदद कर सकें। कन्हैया कुमार, शेहला रशीद के "संविधान बचाओ" जैसे पॉपुलिस्ट लेकिन खोखले आंदोलन के साथ खड़े होने की बजाय ज़मीनी संपर्क, ठोस जनाधार और प्रतिबद्ध काडर आधारित रैडिकल फासीवाद विरोधी आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। गाँवों से लेकर शहरों के मुहल्लों के स्तर के जनसंगठनों को खड़ा करने की जरूरत है जो प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के ढाँचे पर खड़ा हो। ज़मीनी स्तर पर संघी ब्रिगेड का मुकाबला करने में जो सक्षम हो। इससे कम कुछ भी फासीवादी उभार को रोकने में सक्षम नहीं होगा।

05 May 2019

2019 लोकसभा चुनाव में वायरल 8 फेक न्यूज़



(क्या विश्व बैंक ने मोदी रिटर्न को कहा हानिकारक? आजकल सोशल मीडिया पर चुनाव और राजनीति से जुड़ी एक और खबर वायरल हो रही है। इसमें यह दावा किया जा रहा है कि विश्व बैंक ने मोदी के सत्ता में वापस आने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अगर मोदी दोबारा सत्ता में आते है तो भारत में वित्तीय संकट और बेरोज़गारी भारी तबाही मचा सकते हैं।)

✍🏼 चंद्रसेन सिंह 

2019 लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही राजनीतिक पार्टियों के आईटी सेल और उनके समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया पर  फेक न्यूज़ की वर्षा इस तरह से की जाने लगी है कि फेक न्यूज़ की बाढ़ सी आ गई है। आज इसमें हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी डुबकियां लगा रही है जो इसकी सच्चाई से लगभग अनजान है। आज भारत की सवा अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फोन है इनमें से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन है 15.5 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सएप पर रहते हैं। इनमे से एक बड़ी आबादी फेक न्यूज़ का शिकार हो जाती है, क्योंकि उनके लिए फेक न्यूज़ एक अनजान चिड़िया है या उनके पास फेक न्यूज़ की जांच-पड़ताल करने का समय नहीं रहता।
ऐसे ही कुछ फेक न्यूज़ की हम आज बात करेंगे जो 2019 के चुनावों के दौरान वायरल होते रहे।  

1) विंग कमांडर अभिनंदन ने दिया भाजपा को वोट

भारतीय जनता पार्टी और उनके कट्टर समर्थकों द्वारा देश की सेना का राजनीतिकरण इस हद तक कर दिया गया है कि उन्होंने विंग कमांडर अभिनंदन को भी नही छोड़ा। भाजपा समर्थकों द्वारा कुछ दिन पहले एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल की गयी। इसके साथ यह दावा किया गया कि विंग कमांडर अभिनंदन ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया है। साथ ही उनके द्वारा यह कहा गया है कि मोदी जैसा नेतृत्व भारत और देश के लोगो के लिए सौभाग्य की बात है। तस्वीर में दिखाई दे रहे व्यक्ति ने अभिनंदन स्टाइल में मूछें रखी हैं और गले मे भगवा दुपट्टा लपेट हुआ है। पर वायरल फ़ोटो और अभिनंदन के चेहरे में कोई बहुत बड़ी समानता नही है, केवल मूछों में थोड़ी समानता है।
ऑल्ट न्यूज़ की पड़ताल में यह दावा झूठा पाया गया। जो तस्वीर ली गई है उसमें पीछे के भाग में गुजराती में 'समोसा सेंटर' लिखा दिखाई दे रहा है। इससे कहा जा सकता है कि यह फोटो गुजरात मे ली गई है। अभिनंदन का जन्म तमिलनाडु में हुआ था। इसलिए मतदाता के तौर पर उनका नाम तमिलनाडु से ही रजिस्टर होना चाहिए। लोकसभा चुनाव का पहला चरण 11 अप्रैल को हुआ, लेकिन इस चरण में तमिलनाडु और गुजरात दोनो ही राज्यों की किसी भी सीट के लिए मतदान नही हुआ। इस न्यूज़ को गलत साबित करने का सबसे ठोस सबूत है ' द एयरफ़ोर्स रूल्स 1969 के सेक्शन 164(सी) है ' जिसके अनुसार कोई भी अफसर सेवा में रहते हुए किसी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल नही हो सकता और खुद को राजनीतिक विचारधारा से नही जोड़ सकता है। इन सभी बातों से हमे पता चलता है कि यह एक फेक न्यूज़ है जिसका एक ही  मकसद है, आम वोटर को प्रभावित करना।

2) बुर्के की आड़ में हो रही फर्जी वोटिंग- संजीव बालियान (BJP)
लोकसभा का पहला चरण गुरुवार को सम्पन्न हुआ। उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर सीट से बीजेपी प्रत्याशी संजीव बालियान ने बयान दिया कि बुर्के की आड़ में फर्जी वोटिंग हो रही है। इस बयान से जोड़कर सोशल मीडिया पर एक फोटो शेयर किया जा रहा है जिसमे कुछ लोगो ने बुर्का पहने लड़कों को पकड़ रखा है। लेकिन बुर्का पहने लड़के वाली वायरल फ़ोटो चार साल से इंटरनेट पर मौजूद है और इसे अलग-अलग झूठे दावों के साथ शेयर किया जा रहा है। 2015 में इसी फ़ोटो को शेयर कर के दूसरा फर्जी दावा किया गया था ।
न्यूज़ एजेंसी एएनआई यूपी से बात करते हुए एडिशनल चीफ इलेक्शन ऑफिसर वी आर तिवारी ने संजीव बालियान के बयानों के जबाब में कहा कि सभी बूथों पर बुर्का पहनकर आने वाली महिलाओं की जांच की जा रही है। इसके लिए प्रत्येक बूथ पर महिला कर्मचारी मौजूद है। उन्होंने बताया कि बुर्का पहनकर फर्जी वोट करते हुए पकड़े जाने का कोई मामला सामने नही आया है। इस तरह के फेक न्यूज़ को फैलाने का केवल और केवल एक ही मकसद है, हिन्दू मतदाता को ध्रुवीकृत करना । अतः इस तरह के फेक न्यूज़ से सबको बचना चाहिए।

3)  फेक न्यूज़ के माध्यम से सरकार की नाकामियों को छुपाने के प्रयास 
मौजूदा सरकार और उसके समर्थकों द्वारा समुद्र के किनारे की एक सड़क की तस्वीर को उत्तराखंड के चारधाम कॉरिडोर का बताया जा रहा है, जो कि मोरक्को(अफ्रीका) के तांगेर की है। वायरल तस्वीर के साथ यह दावा किया जा रहा है , की इसमें दिखाई दे रहीं सड़क उत्तराखंड की चारधाम परियोजना की है। तस्वीर में दिखाई दे रही सड़क समुद्र के किनारे है। जबकि उत्तराखंड में कोई समुद्र नही है। वही तस्वीर को ध्यान से देखने पर  यह पता चल रहा है कि तस्वीर में गाड़ियाँ सड़क की दायीं ओर से चल रही हैं, जबकि भारत मे गाड़ी सड़क के बाई ओर से चलाने का नियम है। इससे यह पता चलता है कि वायरल तस्वीर उत्तराखंड की तो क्या भारत की ही नहीं है। इस तरह के फेक न्यूज़ शेयर करने का एक ही मकसद है सरकार के कार्यों को बढ़ाचढ़ाकर दिखाकर उसकी नाकामियों को छुपाना।

4) क्या पंजाब में प्रचार कर रहे कांग्रेसी नेता नवजोत सिंह सिध्दू को पंजाब की जनता ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा??

आजकल सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरे बहुत तेजी से वायरल हो रही हैं। इन तस्वीरों में कुछ युवक कांग्रेस का झंडा लिए बाइक सवार लोगो को पीटते दिखाई दे रहे है। दावा किया जा रहा है कि तस्वीर में दिखाई दे रहा व्यक्ति नवजोत सिंह सिद्धू हैं, जिन्हें पंजाब में दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। जबकि वास्तव में वह तस्वीर 25 सितंबर 2016 को पंजाब के अजनाल में हुई कांग्रेस की बाइक रैली की है। रैली के दौरान शिरोमणि अकाली दल के कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया था । जिसमे कुछ लोग घायल भी हुए थे। इस तरह के फेक न्यूज़ को शेयर करके मौजूदा सरकार के समर्थक यह साबित करना चाहते है कि कांग्रेस या अन्य पार्टियों को लोग पसंद नही कर रहे हैं। लोगो के बीच जाकर यह कह रहे है कि पूरी सीट पर हम जीत रहे है, कांग्रेस या अन्य पार्टीयाँ शून्य पर हैं। आप अपना वोट क्यों बर्बाद करेंगे, इसलिए जीतने वाली पार्टी को वोट दें। इस तरह की बातें करके वे लोगों को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं।

5) राहुल गांधी ने कहा कि यूपी की महिलाएं हर हप्ते एक बच्चा पैदा कर सकती हैं?

सोशल मीडिया पर इन दिनों राहुल गांधी का एक वीडियो वायरल हो रहा है। जो इंडिया टीवी के लोगो वाला है। इस वीडियो में राहुल कह रहे हैं कि उत्तरप्रदेश में ऐसी महिलाएं है जो हर हप्ते एक बच्चा पैदा कर सकती है। महिलाएं साल में 52 बच्चे पैदा कर रही हैं। दोस्तो राहुल गांधी का यह वीडियो 8 साल पुराना है। जिसमें राहुल गांधी जननी सुरक्षा योजना में हुए भ्रष्टाचार की बात करते दिखाई दे रहे हैं। वे कहते है कि हमने आरटीआई निकलवाई तो रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि यूपी में ऐसी भी महिलाएं है जो साल में 52 बच्चो को जन्म दे रही हैं। साफ है राहुल गांधी यहां जननी सुरक्षा योजना में हुए भ्रष्टाचार को इंगित कर रहे थे। कुछ महिलाएं ऐसी थी जो जननी सुरक्षा योजना के माध्यम से मिलने वाले 1400 रुपये का लाभ हर हप्ते ले रही थी। राहुल गांधी का  बयान इसी संदर्भ में है। ओरिजनल वीडियो में से 10 सेकंड की क्लिप काटकर वायरल की जा रही है। ठीक ऐसे ही राहुल गांधी की एक आलू से सोना बनाने वाली वीडियो को संदर्भ से काटकर वायरल किया गया था। ऐसी फेक जानकारियों का उद्देश्य एक नेता के व्यक्तित्व पर हमला करना होता है जिसमें यह साबित किया जाता है कि विरोधी पक्ष के नेता तो मूर्ख हैं, हमारी पार्टी के नेता बहुत दमदार और बुद्धिमान हैं।

6.)  क्या विश्व बैंक ने मोदी रिटर्न को कहा हानिकारक??

आजकल सोशल मीडिया पर चुनाव और राजनीति से जुड़ी एक और फर्जी खबर वायरल हो रही है। इसमें यह दावा किया जा रहा है कि विश्व बैंक ने मोदी के सत्ता में वापस आने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अगर मोदी दोबारा सत्ता में आते है तो भारत में वित्तीय संकट और बेरोज़गारी भारी तबाही मचा सकते हैं। इस खबर के साथ विश्व बैंक के पूर्व प्रेसिडेंट जिम योंग किम की तस्वीर भी वायरल हो रही है।जबकि विश्व बैंक के पूर्व प्रेसिडेंट ने पीएम मोदी के बारे में ऐसा कोई दावा नही किया है। 

7) क्या नीरव मोदी ने कहा कि भाजपा नेताओ ने हमसे 456 करोड़ लेकर हमे भागने में हमारी मदद की?

न्यूज़ 18 इंडिया द्वारा ट्वीट की गई खबर के स्क्रीनशॉट को एडिट करके उसमें नीरव मोदी का यह फर्जी बयान डाला गया है। इसी को  सोशल मीडिया पर यूजर्स बिना सोचो समझे धड़ल्ले से शेयर कर रहे है। वायरल हो रहे बयान और खबर में कोई सच्चाई नही है।

8) क्या रोहिंग्या, बांग्लादेशी शरणार्थियों ने बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ किया दुर्व्यवहार?

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल किया जा रहा है जिसके माध्यम से यह दावा किया जा रहा है कि कैसे बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के रोहिंग्या और बांग्लादेशी शरणार्थियों की बस्तियों से गुजरने पर, रोहिंग्या और बांग्लादेशी शरणार्थियों द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है। इस वीडियो क्लिप के साथ शेयर की गई एक चेतावनी भी लिखी है "अगर आप भाजपा को वोट नही देते है, तो यह बहुत जल्द पूरे देश मे हो जाएगा।"
जो वीडियो वायरल हो रहा है दरअसल वह 7 दिसंबर 2017 को बीजेपी की सूरत रैली का है। इसमें भाजपा कार्यकर्ता आपस मे हाथापाई करते नजर आ रहे हैं। यह वीडियो 7 दिसंबर 2017 के एबीपी न्यूज़ के यूट्यूब लिंक पर मिल जाएगा । चूंकि बीजेपी का आईटी सेल और  कार्यकर्ता लोगो को डराकर राजनीति करने में महारथ हासिल कर चुके हैं इसीलिए ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं।

 ऐसे माध्यमों द्वारा यह बात भी ज़ोर शोर से फैलाई जाती है कि विरोधी पक्ष के नेता उनके खिलाफ कोई षड्यंत्र कर रहे हैं इसलिए फेक न्यूज़ की खुराक का आदी कोई व्यक्ति उनकी सोच से किसी भी प्रकार का विरोध रखने वाले व्यक्तियों, न्यूज़ चैनलों या पत्रकारों की हर बात को उसी षड्यंत्र का हिस्सा मानकर उसको सिरे से नकार देते हैं। इसलिए उनकी पार्टी के खिलाफ लगातार खुलासे होने के बावजूद उसको वो विरोधियों की एक चाल समझते रहते हैं।

ज्यादातर आबादी सोशल मीडिया से ऐसी खबरों को प्राप्त करती है तो कई बार न्यूज़ चैनल भी फेक न्यूज़ परोसने लगते हैं। अगर देश में  लोगों के दिमाग में फेक न्यूज़ भरकर उनकी सोच को ही नियंत्रित किया जाने लगे तो फिर जनतंत्र का क्या महत्व होगा? ऐसे में आज भगतसिंह की एक बात को गांठ बांधकर रख लेने की जरूरत है। भगतसिंह ने कहा था कि 'कठोर आलोचना और स्वतंत्र विचार  क्रांतिकारी सोच के दो मुख्य गुण हैं।' कठोर और निर्विवाद आलोचना मतलब, हर चीज को आलोचनात्मक तरीके से देखना, किसी बात को यूं ही न मानकर उसकी जाँच पड़ताल करके ही उसको सच मानना। दूसरी बात है-स्वतंत्र विचार। दूसरे लोग हमारे दिमाग में अपना विश्लेषण भरें हमें उनको ये इजाजत नहीं देनी चाहिए। ना ही कोई बात अगर ज्यादा लोग मान रहे तो उसको हम भी मान लें यानी धारा के साथ बह जाएँ, इसकी बजाय हमारा मत स्वतंत्र रूप से बनना चाहिए, हमें सही स्रोतों से जानकारियां जुटानी चाहिए पर उनका तार्किक विश्लेषण खुद करना चाहिए। तभी हम अंधभक्त की बजाय एक स्वतंत्र सोच के व्यक्ति बन पाएंगे।


22 April 2019

ब्लैकहोल की पहली फोटो की कहानी : प्रकाश किरण भी जहाँ से वापस नहीं लौट सकती।

90 के दशक में MIT के एक शोध छात्र के रूप में शेफर्ड डॉयलमैन (Shepherd Doeleman) ने यह कल्पना की थी कि क्या ब्लैकहोल की तस्वीर खींचीं जा सकती है? उस समय यह एक असंभव सी चीज थी। अब तक ब्लैकहोल का जिक्र सिर्फ किताबों और सिद्धान्त में ही होता आया था। आगे चलकर इन्हीं डॉयलमैन ने 20 देशों के रिसर्च संस्थाओं और वैज्ञानिकों की एक टीम तैयार की और इसके लिए 40 मिलियन डॉलर भी जुटाए। इन सबके प्रयास से ही यह उपलब्धि हासिल हो सकी।
 
 

✍️ विकास गुप्ता

गत 10 अप्रैल को वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल की पहली फोटो जारी की जो काफी चर्चा में रही। "इवेंट होराइजन टेलिस्कोप" के नाम दुनिया के कई देशों की संयुक्त टीम द्वारा यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया। इसी के साथ विज्ञान अंतरिक्ष को अधिक गहराई से जानने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया। इस लेख में हम ब्लैक होल के बारे में और उसकी खोज होने से लेकर उसकी पहली फ़ोटो खींचे जाने तक कि यात्रा पर संक्षेप में बातचीत करेंगे।
 
ब्लैकहोल की पहली फोटो की कहानी 
 
      "ब्लैक होल" (Black hole) यानि 'कृष्ण विवर' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वैज्ञानिक जॉन व्हीलर ने सन 1969 के करीब किया था। जॉन व्हीलर ने जिस प्रस्थापना का वर्णन करने के लिए ब्लैक होल शब्द का निर्माण किया था वह प्रस्थापना कम से कम दो सौ साल पुरानी है। उस समय प्रकाश के बारे में दो सिद्धान्त प्रचलित थे:- पहला सिद्धांत जिसके पक्षधर न्यूटन थे, यह था कि प्रकाश कणों से बना हुआ है जिसे कणिका सिद्धान्त भी कहा जाता है। दूसरा सिद्धान्त यह था कि प्रकाश का रूप कण नही तरंग है। हम आज यह जानते हैं कि वास्तव में दोनों सिद्धान्त सही हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) के अनुसार प्रकाश को कण और तरंग की द्वैतता (Duality) यानी प्रकाश को कण तरंग दोनों रूप में माना जाता है। प्रकाश के कण को फोटॉन (Photon) बोला जाता है।  इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रकाश पर गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational force) का महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। इसी धारणा पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मिशेल ने 1783 के अपने शोध पत्र में लिखा, जिसमें उन्होंने इस ओर ध्यान आकर्षित किया कि ऐसे तारे, जो पर्याप्त रूप से सघन (Highly dense) हों, उनका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र इतना प्रबल होगा कि यह प्रकाश की किरण को बाहर नही निकलने देगा। तारे के पृष्ठ तल से उत्सर्जित कोई भी प्रकाश बहुत दूर जाने से पहले ही तारे के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा वापस खींच लिया जाएगा। यही वे पिंड है, जिन्हें अब हम कृष्ण विवर या ब्लैक होल के नाम से जानते हैं। ब्लैक होल एक अत्यधिक घनत्व वाला पिंड (यानी बहुत ही कम आयतन में बहुत ज्यादा द्रव्यमान) हैं, जिसका गुरुत्वाकर्षण बल इतना प्रबल होता है कि जिसके प्रभाव के कारण प्रकाश किरणों का बच पाना भी संभव नही होता है। भारतीय वैज्ञानिक चंद्रशेखर ने यह गणना की कि हमारे सूर्य से लगभग डेढ़ गुना अधिक द्रव्यमान का कोई अतप्त तारा (Cold Star) अपने ही गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध स्वयं को नही संभाल सकेगा फलस्वरूप संकुचित होकर ब्लैक होल बन जायेगा। विज्ञान में इसे अब "चंद्रशेखर सीमा" (Chandrashekhar Limit) के नाम से जाना जाता है। जैसा कि हम जानते हैं कि न्यूटन ने बताया था कि ब्रह्मांड के सभी पिंड एक दूसरे से गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा आकर्षित होते हैं। फिर बाद में 1915 में आइंस्टीन ने अपने साधारण सापेक्षता के सिद्धांत (General Theory of Relativity) में बताया कि भारी पिंड अपने आस पास के चार आयाम (लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई और समय) जिसे स्पेस टाइम के नाम से जाना जाता है, को विकृत करते हैं यह विकृति हमें गुरुत्वाकर्षण के रूप में महसूस होती है। उदाहरण के लिए जैसे एक भारी लोहे की गेंद को चादर पर रखें तो वह चादर को विकृत (Deform) कर देता है और पास रखे छोटे कांच की गेंद को अपनी तरफ खींच लेता है। अपने इसी सिद्धान्त के आधार पर ब्रह्मांड की विस्तृत व्याख्या करते हुए आइंस्टीन ने ब्लैकहोल के होने का पूर्वानुमान लगाया था जिसे अब हम जान चुके हैं।
 इसके बाद वैज्ञानिक जॉन व्हीलर ने सन 1960 के दशक में इसपर काम किया था। उन्होंने ही इसको ब्लैकहोल नाम भी दिया। 90 के दशक में MIT के एक शोध छात्र के रूप में शेफर्ड डॉयलमैन (Shepherd Doeleman) ने यह कल्पना की थी कि क्या ब्लैकहोल की तस्वीर खींचीं जा सकती है? उस समय यह एक असंभव सी चीज थी। अब तक ब्लैकहोल का जिक्र सिर्फ किताबों और सिद्धान्त में ही होता आया था। आगे चलकर इन्हीं डॉयलमैन ने 20 देशों के रिसर्च संस्थाओं और वैज्ञानिकों की एक टीम तैयार की और इसके लिए 40 मिलियन डॉलर भी जुटाए। इन सबके प्रयास से ही यह उपलब्धि हासिल हो सकी। ब्लैकहोल को देखने का एक ही तरीका यह हो सकता था कि उसकी छाया को कैप्चर किया जाय। इसके लिए सीधे फोटो लेने की बजाय ब्लैकहोल के अदृश्य कंटूर्स से निकलने वाले वैद्युत चुम्बकीय सिग्नल्स को कैप्चर किया गया। इन सिग्नल्स के डेटा को इमेज बनाने वाले अल्गोरिथम से गुजारने के बाद हमें यह आभासी फोटो (Virtual image) प्राप्त हुई। 

ब्लैक होल की सरंचना

जैसा कि बताया जा चुका है ब्लैकहोल का घनत्व बहुत ही अधिक होता है। ब्लैकहोल के अंदर सारा द्रव्यमान एक छोटे क्षेत्र में सीमित होता है जिसे केंद्रीय सिंगुलैरिटी (Central Singularity) कहते हैं। ब्लैकहोल का बाहरी गोलीय आवरण जो सिंगुलैरिटी के पास होता है और जिसे पार करने के बाद प्रकाश और ऊर्जा ब्लैकहोल के गुरुत्वाकर्षण से बच नही सकते है उसे घटना क्षितिज (Event Horizon) कहा जाता है। ब्लैक होल के निकट उष्ण प्लाज्मा से उत्सर्जित फोटॉन जो गुरुत्वाकर्षण के कारण मुड़ कर एक बलय बनाते है इसे फोटॉन गोला (Photon Sphere) कहा जाता है। ब्लैकहोल का गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक होता है कि अपने आस पास किसी भी पिंड को अपने अंदर खींचने लगता है। जब ब्लैकहोल किसी तारे या अन्य पिंड को अपने अंदर खींचता है तो परमाण्विक कणों और विकिरण की एक तेज़ धारा चलती है जिसे रेलटिविस्टिक जेट कहा जाता है। विज्ञान यह जानने में सक्षम हुआ है कि हमारा ब्रह्माण्ड ब्लैकहोलों से भरा हुआ है। ब्लैक होल हमारे ब्रह्मांड को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आने वाले समय में ब्लैकहोल पर हुए रिसर्च हमें ब्रह्माण्ड के बारे में और अधिक रोचक जानकारी प्रदान करेंगे।

10 अप्रैल 2019 का ऐतिहासिक दिन

हम भले ही ब्लैकहोल के बारे दशकों से जानते हों, लेकिन  इसकी वास्तविक तस्वीर हमने अभी तक नहीं देखी थी। जो तस्वीर हमारे सामने पेश किए जाते रहे हैं वो कंप्यूटर ग्राफ़िक्स द्वारा बनाये गए काल्पनिक चित्र होते थे। 10 अप्रैल 2019 को अंतरीक्ष वैज्ञानिकों ने ब्लैकहोल की पहली तस्वीर जारी की। यह ब्लैकहोल आकाशगंगा एम 87 के केंद्र में है जो हमसे 53.5 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है। अंतरीक्ष वैज्ञानिकों ने जिस टेलिस्कोप की सहायता से ब्लैकहोल की तस्वीर जारी की है  उसका नाम इवेंट होरिज़ॉन (Event Horizon) टेलिस्कोप है और इस प्रोजेक्ट का भी नाम यही था। मूल रूप से अंतरीक्ष वैज्ञानिक हमारी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैकहोल सेजेटेरियस A (A*) का वास्तविक चित्र भी जारी करने वाले थे लेकिन तकनीकी कारणों से नही कर पाए।
इवेंट होरिज़ॉन टेलिस्कोप (EHT) एक अकेला टेलिस्कोप नही है बल्कि यह आठ अलग अलग रेडियो दूरदर्शियों का नेटवर्क है जो वेरी लांग बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री (Very Long Baseline Interferometry, VLBI) तकनीकी पर काम करता है। इसके कार्य को सटीक और एक साथ करने के लिए परमाणु घड़ियों का प्रयोग किया गया है। यह आठ रेडियो दूरदर्शियों का नेटवर्क संयुक्त रूप से हमारी पृथ्वी से भी बड़े दूरदर्शी (Telescope) का निर्माण करते हैं। इन आठ दूरबीनों से प्राप्त आंकड़ो को एक ही स्थान पर मिलाया जाता है, इन आंकड़ो की साइज पेटाबाइट (Petabyte) में होती है जिसे इंटरनेट से भेजा नही जा सकता इसलिए इन आंकड़ो को हार्डडिस्क में लोड कर के हवाई जहाज से भेजा जाता है। जब सभी आंकड़ो को एक स्थान पर प्राप्त कर लिया गया तो उसके बाद सुपर कंप्यूटर की सहायता से इमेज प्रोसेसिंग तकनीकी का प्रयोग करके ब्लैकहोल का तस्वीर प्राप्त किया गया। इस तस्वीर को पाने में वैज्ञानिकों को लगभग दो साल का समय लगा।
आकाशगंगा एम 87 के केंद्र में हमने जिस ब्लैकहोल की तस्वीर देखी है दरअसल वो उस ब्लैकहोल के इवेंट होरिज़ॉन और फोटॉन गोला की तस्वीर है। इस ब्लैकहोल का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 6.5 अरब गुना और इसका व्यास 38 अरब किलोमीटर है।

मानव इतिहास में पहली बार वैज्ञानिकों ने ब्लैकहोल की वास्तविक तस्वीर जारी की है और इस तरह 10 अप्रैल विज्ञान जगत में एक ऐतिहासिक दिन बन गया। इस चित्र से ब्रह्माण्ड के सबसे रहस्यमय पिंड ब्लैकहोल के बारे और जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी और इसके साथ ही आकाशगंगाओ की उत्पत्ति और ब्रह्माण्ड के बारे भी कई रोचक जानकारी मिलेगी।

16 April 2019

आप राजनीति में रुचि रखें या न रखें राजनीति आपमें जरूर रुचि रखती है।

Credit : www.cartoonmovement.com
(विश्व में हमारा सम्मान केवल हमारे प्रधानमंत्री को देखकर या हमारी जीडीपी को देखकर नहीं हो सकता। देश केवल नेताओं और पूंजीपतियों से नहीं बनता, देश यहाँ की करोड़ों किसानों, मज़दूरों, कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं से बनता है। देश के विकास में अगर इनकी गिनती न हो तो वह विकास धोखा है। अगर देश के बहुसंख्यक आम जनता आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, बेघरी और महंगाई की चक्की तले पिस रही है तो हमें मानना होगा कि विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के कोई मतलब नहीं है। जब हमें यह पता चलता है कि विश्व भूख सूचकांक में लगातार हमारी रैंकिंग खराब हो रही है और भुखमरी से होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं तो क्या विश्व मे हमारा नाम "ऊँचा" करने के लिए हम अपने सरकारों की पीठ थापथपाएँगे?)

✍🏼 चंद्रसेन सिंह

 बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि हमको राजनीति से क्या लेना-देना, हमें तो अपना काम करना चाहिए। सारे नेता या "प्रबुद्धजन" छात्रों को राजनीति से दूर रहने की भी हिदायत देते हैं। दरअसल यह राजनीति ही है जो हमारे जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। राजनीति का लोगो के साथ किस प्रकार का संबंध है? तथा वह लोगो को किस प्रकार प्रभावित करती है? कई बार लोग ऐसे क्यों सोचने लगते हैं जैसा कि राजनीति  के ठेकेदार उनसे सोचवाना चाहते हैं? क्यों राजनीति में आज कल लोग अंधभक्त बनते जा रहे? ऐसे कई सवाल राजनीति से ही जुड़े हुए हैं। 

वास्तव में हमारी प्लेट में हम क्या खाएंगे, हमको दाल नसीब होगी कि नहीं, हम गैस भरवा पाएंगे कि नहीं, हम पम्पिंग सेट में डीजल भरकर अपने खेत की सिंचाई कर पाएंगे या नहीं, हमारा बेटा अच्छे कॉलेज में पढ़ पायेगा या नहीं, हमको रोजगार मिल पायेगा या नहीं, हमको सही इलाज मिल पायेगा कि नहीं यह सबकुछ राजनीति से तय होता है। हम राजनीति  से भाग नहीं सकते। हम राजनीति में रुचि लें या न लें राजनीति हममें जरूर रुचि लेती है। 
राजनेता और प्रसिद्ध विद्वान सी.  राजगोपालाचारी कहा करते थे कि राजनीति किसी देश का चरित्र होता है जो पूरी  दुनिया में उसके निवासियों का सम्मान निर्धारित करता है ।
लेकिन भारत में आजकल इतने निचले स्तर की राजनीति की जा रही है कि लोगो का राजनीति पर से विश्वास उठना स्वभाविक है। पर राजनीति से नाक-भौं सिकोड़ना क्या आम जनता के हित में है? अगर राजनीति बुरे लोगों का अखाड़ा बन चुकी है तो राजनीति के इस बिगड़ते स्वरूप को कैसे ठीक किया जा सकता है इसके बारे में हम लोग क्यो नही सोचते हैं?
विश्व में हमारा सम्मान केवल हमारे प्रधानमंत्री को देखकर या हमारी जीडीपी को देखकर नहीं हो सकता। देश केवल नेताओं और पूंजीपतियों से नहीं बनता, देश यहाँ की करोड़ों किसानों, मज़दूरों, कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं से बनता है। देश के विकास में अगर इनकी गिनती न हो तो वह विकास धोखा है। अगर देश के बहुसंख्यक आम जनता आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, बेघरी और महंगाई की चक्की तले पिस रही है तो हमें मानना होगा कि विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के कोई मतलब नहीं है। जब हमें यह पता चलता है कि विश्व भूख सूचकांक में लगातार हमारी रैंकिंग खराब हो रही है और भुखमरी से होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं तो क्या विश्व मे हमारा नाम "ऊँचा" करने के लिए हम अपने सरकारों की पीठ थापथपाएँगे? हम जब सुनते हैं भारत भ्रष्टाचार के मामले में एशिया का सबसे भ्रष्ट देश बन चुका है तो क्या यह भी हमारे देश का सम्मान ऊँचा करता है? जब हम सुनते हैं कि विश्व प्रसन्नता सूचकांक में भारत का स्थान (156 देशों में 133वां)  हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी खराब है तो हमें कैसा लगता है? दुनिया मे भारतीय मीडिया की साख लगातार गिर रही है, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 2018 में 156 देशों में 138वां हो चुका है। 
विश्व भूख सूचकांक में भारत का स्थान
2014 में 99वां
2015 में 93वां
2016 में 97वां
2017 में 100वां
2018 में 103वां
 भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का स्थान  
168 देशो की सूची में 
 2015 में 76 वां 
 2016 में 79 वां
 2017 में 81वां
 2018 में 78 वां है। 
इसी प्रकार 
मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 
188 देशो की सूची में
2015 में 130 वां
2016 में 131 वां
2017 में 130 वां
2018 में 130 वां
 इस प्रकार की रैंकिंग को देखकर हम अपने आप को कितना सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करते होंगे? जिससे हमारा और हमारे देश की जनता का भविष्य तय होना है उस रैंकिंग में हम इतना पीछे कैसे रह गये? क्या इसके लिए हमारा राजनीति से दूर रहना जिम्मेदार नहीं है? क्या अपने जनप्रतिनिधियों से हमनें इन मुद्दों को उठाया? 
2014 के लोक सभा चुनाव में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, काला धन, बेघरी जैसे मुद्दों को लेकर काफी चर्चा हुई थी ,तथा भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे , बेरोजगारी खत्म करेंगे, कालाधन वापस लायेंगे,   खुशहाली आयेगी जैसे वादे किए गए थे । पर न तो बेरोजगारी गई (उल्टा बढ़ गयी) , न ही भ्रष्टाचार खत्म हुआ, न काला धन आया और न ही ख़ुशहाली आई।  ऊपर के सारे सूचकांकों को देखे तो पता चलेगा कि पांच वर्ष पहले जैसा भारत था आज भी लगभग वैसा ही है या उसने खराब हालत में ही गया है। इसके बावजूद आज सवाल पूछने वालों से ज्यादा सरकार की भक्ति करने वालों की संख्या है। सरकार की भक्ति, चाहे वो कोई भी सरकार हो, लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। सवाल उठाना ही जनतंत्र को मजबूत करना है, सवाल उठाना ही तानाशाही पर वार करना है।
आज हमारी राजनीतिक उदासीनता ने भारत की राजनीति को कहा ला खड़ा किया है, इसकी कुछ बानगियाँ देखते हैं- 
 
(1) राजनीति का व्यवसायिकरण
 यदि हम भारत की राजनीति को थोड़ा गहराई से देखें और समझें तो हमें पता चलेगा कि राजनीति पूर्णतः व्यवसाय बन चुकी है। प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने कहा था कि राजनीति दो प्रकार से की जाती है - कोई राजनीति के लिए जीता है या राजनीति पर जीता है। आज राजनीति पर जीने वालों की संख्या राजनीति के लिए जीने वालो की संख्या से काफी अधिक है , राजनीति के लिए जीने वाले लोगो की संख्या नाममात्र की रह गई है ।
 भारत मे अजादी के बाद मुठ्ठीभर अमीर लोगों की सेवा ही राजनीति का मुख्य पहलू बन गया। पार्टियों की फंडिंग बड़े बड़े पूंजीपति, धन्नासेठ करने लगे और सरकार की नीतियाँ इनके मुनाफे को ध्यान में रखकर बनने लगीं। राजनीति एक व्यवसायिक निवेश बन चुका है, बड़े बड़े पूंजीपति तमाम दलों में से एक को चुनते हैं, उनका मीडिया जोर-शोर से उस दल का प्रचार करते हैं और फिर चुनाव जीतने के बाद इन पूंजीपतियों को कहीं मुफ्त में ज़मीन तो कहीं कर्ज़ माफी तो कहीं सरकारी ठेकों से नवाजा जाता है। 
आज के समय मे राजनीति का व्यवसायिकरण इस हद तक बढ़ गया है कि छोटे से छोटे गांव के प्रधान के चुनाव में भी लोग 5 से 10 लाख रुपये खर्च कर दे रहे हैं। अब 10 लाख रुपये जो खर्च किये है वह तो उनका मूलधन है। वह जब तक  50 लाख रुपये व्याज सहित मिश्रधन नही निकाल लेंगे तब तक उन्हें गांव में कोई काम नजर नही आएगा। यदि उच्च स्तर के चुनाव की बात करें तो आप को टिकट पाने के लिए पहले करोड़पति होना पड़ेगा। तभी तो आप चुनाव में करोड़ो रूपये लगाएंगे और बाद में ब्याज सहित अरबो रुपये निकालेंगे। 

(2) राजनीति में अपराधियों का बढ़ता ज़ोर
तमाम पार्टियों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की भरमार बढ़ती जा रही है। इसके कई कारण है, पहला तो यह है कि इसके लिए हमारे देश मे अभी तक कोई ठोस कानून नही बन पाया है ,और इसकी उम्मीद भी कम है क्योंकि हमारे देश मे जो कानून निर्माता है उन्हीं में से 35% से अधिक के ऊपर हत्या, बलात्कार, दंगा भड़काने, घोटाले जैसे गंभीर अपराधों के आरोप लगे हैं। वह ऐसा कानून बनाने के बारे में कैसे सोचेंगे जिससे खुद उनका पूरा अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा? 
2018 में देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था की यदि किसी व्यक्ति के ऊपर आरोप निर्धारित हो चुके हैं लेकिन अभी सजा नही हुई, ऐसा व्यक्ति लोकसभा व विधानसभा का चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने का क़ानून सुप्रीम कोर्ट नही अपितु पार्लियामेंट बना सकती है और कोर्ट ने देश की संसद को इस बारे में कानून बनाने को भी कहा। जबकि इसपर कानून कुछ और ही बना। कानून यह बना की कोई व्यक्ति कितने भी अपराध क्यों न किया हो जब तक उसका अपराध साबित नही हो जाता तब तक वह चुनाव लड़ सकता है और यदि अपराध साबित भी हो जाता है और उसे 2 वर्ष की सजा हो जाती है तो वह अगले 6 वर्ष तक चुनाव नही लड़ सकता है। 6 वर्ष बाद वह फिर चुनाव लड़ सकता है। शायद वह अपराधी व्यक्ति 6 वर्ष बाद संत बनकर लौटेगा।

लोकतांत्रिक संस्थाओ में अपराधियों की भरमार बढ़ने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है पार्टीवाद की राजनीति। पार्टीवाद की राजनीति से मतलब है कि यदि हम कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा इत्यादि पार्टियों के समर्थक है तो हम उनका या उनके स्थानीय नेता का विरोध नही करते हैं, चाहे वे लाख गलतिया क्यों न करें, हम पार्टी का चेहरा देखकर या उसका नेतृत्व देखकर उससे चिपके रहते हैं। इसी कारण पार्टियां अपराधियों, बलात्कारियों, दंगाइयों या राजनीति से बिल्कुल मतलब न रखने वाले फ़िल्म कलाकारों, क्रिकेटरों को भी चुनाव मैदान में उतार देती है। उन्हें पता है कि इंडिया के लोग अंधभक्ति में डूबे हुए है ,वे पार्टी के उम्मीदवार को कम पार्टी को ज्यादा ध्यान में रखते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि भक्ति किसी की भी न कि जाय, सवाल सबसे पूछे जाएँ, अगर हमारी पार्टी कोई गलत उम्मीदवार खड़ा करती है तो हम खुद इसके विरोध में खड़े हों। पार्टीयों से यह मांग की जाय कि कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाकर उम्मीदवार का निर्णय लिया जाय, न कि बंद कमरों की मीटिंगों में। और वादा किया हुआ काम न होने पर हमने जिसको वोट दिया है उससे हमे प्रश्न करने चाहिए हमे उसके ऊपर जनदबाव बनाना चाहिए और अगर इसपर भी अगर चयनित नेता हमारी बात नहीं सुनता है तो अगले चुनावों में उस नेता का बहिष्कार करना चाहिए। 

इसी तरह केवल उम्मीदवार की जाति देखकर वोट देना भी उतना ही ख़तरनाक है। इसी जातिवादी मानसिकता को ध्यान में रखते हुए सभी पार्टियां अपने उम्मीदवार खड़े करती हैं। जीतता कोई भी है पर न तो जनता को कुछ मिलता है ना ही उस नेता के जाति वालों को। एक प्रसिद्ध कथन इस संदर्भ में काफी प्रासंगिक है- जंगल मे पेड़ खत्म हो रहे थे और सारे पेड़ कुल्हाड़ी को वोट कर रहे थे क्योंकि कुल्हाड़ी में लगी लकड़ी उनकी जाति की थी।
आज इसबात की बेहद जरूरत है कि पार्टीवाद और जातिवाद के नाम पर वोट न किया जाय।

(3) ध्रुवीकरण की राजनीति
आज कल के राजनीतिक परिणामों को देखकर ऐसा लगता है कि राजनैतिक परिणाम जनता के मुद्दे और सरकार के कामों पर कम निर्भर करते है बल्कि जुमले और ध्रुवीकरण की राजनीति पर सबसे अधिक निर्भर करते हैं। जो जितना अधिक ध्रुवीकरण कर लेगा जो जितना अधिक जुमलेबाजी कर लेगा उनका परिणाम भी उतना ही अच्छा होगा। मौजूदा भाजपा सरकार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 
जातिवादी राजनीति हो या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति 
या राष्ट्रवाद के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति, बहुमत के समुदाय के बीच एक असुरक्षा का वातावरण पैदा कर बीजेपी काफी चालाकी से अपनी चुनावी नैया पार कराने में सफल होती रही है। हिंदुओं का अस्तित्व मिट जाएगा, हिन्दू संस्कृति खतरे में है, 2050 तक भारत इस्लामिक हो जाएगा, पाकिस्तान, आतंकवाद आदि मुद्दे उभाड़कर लोगों की भावना का दोहन करने में बीजेपी-आरएसएस ने काफी सफलता पाई है।  पर जैसा कि ध्रुवीकरण की राजनीति के साथ होता है, उसका उस सम्प्रदाय की रक्षा या संस्कृति रक्षा से कुछ लेना देना नहीं होता है, इसका असली उद्देश्य बांटों और राज करो कि अंग्रेजों की नीति का अनुसरण करके सत्ता हासिल करना ही होता है। इसलिए आज साम्प्रदायिक-जातिगत ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद से भी बचने की जरूरत है। भावना की जगह तर्क को सबसे ऊपर रखने की जरूरत है। भगतसिंह ने कहा था कि साम्प्रदायिक दंगों का इलाज लोगों की आर्थिक दशा में सुधार है इसलिए आज हमें अपने वास्तविक मुद्दों जैसे बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, महँगाई, बेघरी, कम उम्र में मौतें आदि मुद्दों को सबसे पहले उठाने की जरूरत है और वोट मांग रहे नेताजी से यह पूछने की जरूरत है कि जाति-धर्म रक्षा तो सब ठीक है पर आप इन मुद्दों पर क्या करने वाले हैं?