15 August 2020

स्वतंत्रता दिवस : यह ठहरने का नहीं संघर्ष करने का वक़्त है।

 


✍️ टीम इंक़लाब 

आज से 73 साल पहले भारत को अंग्रेजी गुलामी से आज के दिन ही आज़ादी मिली थी। अंग्रेजी दासता के खिलाफ लड़ने वाले लाखों लोगों ने जेल की सजाएँ काटी, कालापानी की अमानवीय यातनाएँ झेलीं और कितने माताओं के बेटों ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को चूम लिया। महात्मा गाँधी के समझौता-दबाव और अहिंसा के आंदोलनों ने बड़े पैमाने पर लोगों को जागृत और एकताबद्ध जरूर किया पर केवल उसके कारण अंग्रेजी हुक़ूमत कभी भारत नहीं छोड़ती।  1857 के विद्रोह की पहली चिंगारी फूटने के बाद भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ कई विद्रोह हुए। चटगाँव विद्रोह, गदरी आंदोलन, भगतसिंह और उनके साथियों का विद्रोह, नौसेना विद्रोह, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज की कार्यवाही, सीपीआई की मज़दूर यूनियनों के नेतृत्व में देशव्यापी आम हड़तालें, तालाबंदी आदि तमाम संघर्षों की बदौलत अंग्रेजों को लग गया कि उनका भारत में टिके रहना मुश्किल है। इस अंदेशे से उन्होंने किसी बड़े विद्रोह के द्वारा उखाड़ फेके जाने की बजाय समझौतापूर्वक भारत के जमींदारों, पूंजीपतियों और उनकी नुमाइंदगी करने वाली कांग्रेस को सत्ता सौपकर जाना बेहतर समझा। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज तो चले गए पर हम पूरी तरीके से आज़ाद नहीं हो पाए। भगतसिंह ने 1930 में ही कहा था कि गाँधी और कांग्रेस के रास्ते जो आज़ादी आएगी उसमें बस इतना होगा कि सत्ता गोरे अंग्रेजों के हाथ से निकलकर भूरे अंग्रेजों के हाथ में आ जायेगी। आज़ादी का फल मुठ्ठीभर ताकतवर और अमीर हिंदुस्तानियों की तिजोरी में समाकर रह जायेगा। साथ ही आने वाले समय में जाति-धर्म के झगड़ों की भीषण आग में देश झुलसता रहेगा। 

   भगतसिंह की कही बात आज पूरी तरह से खरी साबित हुई है। पिछले 73 सालों में कांग्रेस, जनता पार्टी, बीजेपी और तमाम क्षेत्रीय दलों की सरकारें बनी और सबने देश की आम जनता के साथ धोखा ही किया। सबने मुठ्ठीभर अमीर और ताकतवर पूंजीपतियों की ही सेवा की। जनता के टैक्स के पैसों से इन पूंजीपतियों की जेबें भरी गयीं। कर्ज़ लेकर डुबोने वाले, कर्ज़ लेकर भागने वाले धन्नासेठों के कर्ज माफ किये गए। जनता के खून-पसीने से खड़े किए गए राजकीय उद्योग औने पौने दाम पर पूंजीपतियों को बेच दिए गए। नए-नए करों का बोझ जनता पे लादा जाता रहा। दूसरी तरफ अंग्रेजों की बांटों और राज करो कि नीति का अनुसरण करते हुए लोगों को जाति-धर्म के नाम पर लड़ाया भी गया। आज हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि अर्थव्यवस्था डूबने के कगार पर है, बेरोजगारी चरम पर पहुँच चुकी है, महंगाई आसमान छू रही है। जबकि साम्प्रदायिकता का उन्माद अपने चरम पर है। वर्तमान बीजेपी सरकार भी पिछली सरकारों की तरह ही अम्बानी, अडानी, मित्तल, बिरला जैसे पूंजीपतियों की सेव्ष्टआ में लगी हुई है। BPCL, एयर इंडिया, LIC, शिपिंग कारपोरेशन आदि सरकारी उद्यम या तो बिक चुके हैं या बिकने के कगार पर हैं। हाल ही में 23 पीएसयू बिकने की खबर आई। रेलवे के स्टेशन और रूट तो बेचने शुरू हो चुके हैं। कोरोना से पूरे देश की हालत खराब है, 47 हज़ार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं तो दूसरी तरफ चीन, पाकिस्तान और राम मंदिर को मुख्य मुद्दा बनाकर जनता को भटकाने की कोशिशें जारी हैं। स्पष्ट है कि ऐसा भारत बनाने के लिए हमारे शहीदों ने अपनी जानें नहीं दी थीं। यह जिम्मेदारी अब हम नौजवानों को अपने कंधों पर उठानी होगी। भारत में पूंजीपतियों की सेवा करने वाली सभी राजनीतिक पार्टियों को सत्ता से बेदखल करके न्याय और समानता पर आधारित एक नयी व्यवस्था का निर्माण ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। इसके लिए देश के कोने-कोने में लोगों को इस क्रांतिकारी बदलाव के लिए जागृत और संगठित करना ही आज का सबसे प्रमुख कार्यभार है। अगर हम एक बेहतर भारत और बेहतर विश्व का निर्माण कर पाए तो यही उन शहीदों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


इंक़लाब

ज़िंदाबाद

17 May 2020

पालघर लींचिंग : बारूद की ढेरी बनता हमारा समाज


✍️ राघवेंद्र तिवारी

आज कल पालघर एक जघन्य घटना से चर्चा में बना हुआ है।  मुम्बई से लगभग 120 किलोमीटर दूर स्थित पालघर नगरपालिका में आने वाले गढ़चिंचले गाँव में 16 अप्रैल को एक उन्मादी भीड़ ने तीन संतो को पीट-पीट कर मार दिया। जिन तीन संतो को पीट-पीट कर मार दिया गया उनकी पहचान कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी और नीलेश के रूप में हुई। ये तीनों संत मुम्बई से सूरत अपने किसी परिचित के अंतिम संस्कार के शामिल होने जा रहे थे। ये लोग मुम्बई से सूरत मेन हाइवे से जाने को थे लेकिन बार्डर पूरी तरह से सील होने के कारण पुलिस ने इन्हें जाने से रोक दिया। संतो ने मुम्बई से सूरत जाने के लिए गाँवो से होकर जाने वाले रास्ते का सहारा लिया। गाँव के रास्ते से होकर जा रहे संत जब पालघर जिले की कासा पुलिस थाने के गढ़चिंचले गाँव के पास वन विभाग के नाके पर पहुँचे तो वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा इन्हें रोका गया। नाके पर पूछ ताछ के दौरान वहाँ ग्रामीण भी इकट्ठा होने लगे। ग्रामीणों और संतो में कुछ तूतू-मैं मैं हुई और  ग्रामीणों की उस भीड़ ने संतो पर हमला कर दिया। ग्रामीणों को संदेह हुआ कि ये लोग बच्चा चोर गिरोह से हैं। इसके बाद भीड़ उन तीनों लोगों पर टूट पड़ी। लोग लात-घूसों, लाठी, डंडों से लगातार प्रहार करने लगे। इस घटना के दौरान वहाँ पुलिस भी पहुँची पर लोगों ने पुलिस पर भी हमला कर दिया तथा पुलिस की गाड़ी पलट दी। फिर पुलिस ने भी उनको बचाने की कोशिश लगभग छोड़ ही दी। नतीजतन पुलिस के सामने ही तीनों को भीड़ मारती रही और तीनों की मौत हो गयी। इस भीड़ द्वारा की गई मॉब लिंचिंग का वीडियो वायरल हो गया। वह वीडियो आपको विचलित कर सकती है कि जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ कैसे लोग हैं। इंसानियत को शर्मसार करती इस घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया। पालघर में जो भी हुआ वो एक समाज में बढ़ रही हत्यारी भीड़ की मानसिकता  दिखाने के लिए पर्याप्त है।

आखिर यह घटना कैसे हुई?
पालघर जिले के गढ़चिंचले गांव में और उसके आसपास के गाँवो में पिछले कई दिनों से बच्चा चोरी की अफवाह फैली हुई थी इसके बाद गांव के लोग आपसी समूह बनाकर गांव की निगरानी करना शुरू कर दिए थे। गांव के लोग बच्चा चोरी गिरोह के फैले अफवाह से डरे हुए थे। इस घटना से पहले पास के गांव में आदिवासियों की मदद करने जा रहे एक डॉक्टर के ऊपर भी हमला हुआ था यह हमला भी बच्चा चोरी गिरोह की निगरानी करने वाले समूह ने किया था। डॉक्टर को बचाने गई पुलिस पर भी इस समूह ने हमला कर दिया था, जिसमें पुलिस वाले भी जख्मी हो गए थे। 16 अप्रैल के इस घटना की मुख्य वजह बच्चा चोरी गिरोह की फैली अफवाह ही थी।  बच्चा चोर गिरोह की झूठी अफवाह कई सालों से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई है। झूठी अफवाह से ना जाने कितनों को पीट-पीटकर मार दिया गया जो खबर भी नहीं बन पाईं। पालघर घटना को ही देख लीजिए, 16 अप्रैल की घटना 19,20 अप्रैल तक मुख्य मीडिया में नहीं आई। अगर अखाड़ों और संत समाज का दबाव और सत्ता पक्ष की राजनीतिक दिलचस्पी ना होती तो यह घटना अन्य तमाम मॉब लीनचिंग की तरह एक आँकड़ा बनकर रह जाती। यदि संतो की जगह कोई और आम नागरिक होता तो शायद इस घटना पर मीडिया और सत्ताधारी पार्टी को इतना मसाला नहीं मिलता।
   संतो के साथ जो हुआ वो बेहद शर्मनाक है लेकिन इस तरह के अफ़वाहों को समाज मे जगह कैसे मिलती है ये भी सोचना होगा। यूपी के पूर्वांचल में अभी कुछ महीनों पहले इसी अफवाह के चलते कितने राह चलते लोगों पर हमले हुए। एक घटना तो मुझे भी याद है जब एक व्यक्ति अपने ही लड़के को लेकर जा रहा था और लड़का किसी कारणवश रोने लगा बच्चे की आवाज सुनते ही वहाँ कुछ लोग आ गए और उस व्यक्ति पर हाथ उठा दिए। बहुत मुश्किल से वह व्यक्ति उस भीड़ को यह समझा पाया कि यह दो साल का बच्चा उसका खुद का ही बच्चा है। उस दिन वह व्यक्ति इस तरह की बच्चा चोरी की फैली अफवाह का शिकार होने से बाल-बाल बच गया। लेकिन अक्सर देखा गया है कि झूठी अफवाहें समाज मे बहुत तेजी से पैर पसारती हैं और इस तरह की अफवाहें एक जगह से दूसरी जगह पहुँचते-पहुँचते बढ़ती जाती हैं लोगों को सच सी लगने लगती हैं। ग्रामीण क्षेत्रो में लोग डर और खौफ में जीने लगते हैं। सवाल यह है कि जब इस तरह की अफवाहें समाज में फैलती हैं तो प्रशासन इस पर क्या करती है? क्या इस तरह की अफवाहों की जानकारी पुलिस प्रशासन को नहीं होती? प्रशासन समाज मे फैली झूठी अफवाहों को सार्वजनिक रूप से खंडित क्यों नहीं करते?  सरकारें जनता के बीच सुरक्षा की भावना स्थापित क्यों नहीं कर पाती? आम नागरिक इन अफवाहों को बिना सत्यापित किये सच क्यों मान लेते हैं? अगर किसी को ऐसी किसी भी घटना के बारे में जानकारी मिलती है तो वो पुलिस से सम्पर्क क्यों नहीं करता? अगर किसी को संदेह मात्र होने पर पकड़ भी लिया तो पुलिस के हवाले करने के बजाय खुद फैसला कैसे ले लेते हैं?  अगर सामने वाला गुनहगार भी हो तो इसका फैसला कोर्ट करेगी या एक उन्मादी और हताश भीड़? इस तरह की भीड़ आज कैसे तैयार हो रही है जो कभी गाय काटने की अफवाह तो कभी बच्चा चोरी की अफवाह के नाम पर लोगों की हत्या कर देती है? ऐसे बहुत से सवाल एक न्यायप्रिय इंसान के जेहन में आयेंगे।
इस भीड़ ने ना जाने कितनों का जीवन निगल लिया, कितने बेगुनाहों को उनके अपनों से हमेशा के लिए दूर कर दिया। समाज मे भीड़ के न्याय को जायज ठहराने वाले भी उतने ही गुनहगार होते हैं जितना कि करने वाले। मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर समाज मुख्य तीन धाराओ में बंटा दिखता हैं।
1. पहले वह लोग जो किसी भी घटना पर सवाल उठाते हैं और उस घटना के जांच की मांग करते हैं। दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हैं, गुनाहगार चाहे किसी भी धर्म-जाति से का हो।
2. दूसरे वह लोग होते हैं जो इन सभी घटनाओं पर कुछ भी नहीं बोलते और कहीं ना कहीं अपनी चुप्पी से गुनहगारों के पक्ष में ही हो जाते हैं, क्योंकि गलत के खिलाफ ना बोलना भी गुनाह को बढ़ावा देना होता है।
3. तीसरे वह लोग होते हैं जो किसी भी घटना को अपने राजनीतिक फायदे और नुकसान को देखकर उठाते हैं।  किसी भी घटना को सांप्रदायिक बनाने का खेल यहीं से शुरू होता है पालघर घटना को भी सांप्रदायिक बनाने का भरपूर प्रयास किया गया। बड़े-बड़े न्यूज़ एंकर और हिंदुत्ववादियो ने उस घटना का कुछ सेकंड का वीडियो वायरल करके मुस्लिम समुदाय को टारगेट किया। उस कुछ सेकंड के वीडियो में दावा किया गया कि हमला कर रहे लोगों में से कोई व्यक्ति यह कह रहा है कि "मार शोएब मार" इस वीडियो के साथ यही मैसेज दो-तीन दिनों में पूरे भारत में फैल गया। सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया के कुछ एंकरों ने भी यही दावा कर दिया कि वीडियो में कोई "मार  शोएब मार" कह रहा है। इस घटना से पूरे देश का माहौल खराब किया जा रहा था और मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत भरा जा रहा था। इसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता था लेकिन आल्ट न्यूज़ (altnews.in) ने अपनी पड़ताल के बाद साफ कर दिया कि लोग "बस ओये बस" चिल्ला रहे थे। पिछले कुछ सालों से मुस्लिमों के खिलाफ मीडिया ने एक ऐसा नैरेटिव बना दिया गया है कि किसी भी घटना में हिंदू मुस्लिम ढूंढ लेते हैं। वर्तमान सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग इस प्रयास में लगे हुए हैं कि देश का बहुसंख्यक मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हो जाये। इसके लिए उनसे बताया जाता है कि मुस्लिमों से हिन्दू अस्मिता को खतरा है। इस खतरे के डर  के आगे उसे बेरोजगारी, भुखमरी, महंगाई और भ्रष्टाचार कुछ भी नहीं दिखता। बहुसंख्यक आबादी का बड़ा हिस्सा सत्ता के साथ इस तरह के मुस्लिम विरोध में शामिल है।

भीड़ द्वारा लिंचिंग की कुछ घटनाएं-
1. जुलाई 2018 में रकबर खान को गाय तस्करी करने के शक में गौरक्षकों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। राजस्थान के अलवर का रहने वाला रकबर खान अपने एक मित्र के साथ एक रात को पालने के लिए जब गाय लेकर जा रहा था तब एक भीड़ ने उसपर हमला कर दिया और उसे मार दिया। हमले के तार विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता से भी जुड़े लेकिन पुलिस ने उसे आरोपी बनाया ही नहीं।

2. पहलू खान दूध का व्यापार करता था। अप्रैल 2017 में उसे गौकशी के शक में लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला। उसकी हत्या के लिए जिन 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया और केस चला उनमें 6 को क्लीन चिट मिल चुकी है व बाकी 3 नाबालिक हैं यानी किसी को भी सज़ा नहीं मिली। उसके घर वालों के लिए यह भुला पाना आज तक सम्भव ना हो सका।
3. अखलाक को भी उसके ही गांव के लोगों ने उसपर बीफ रखने का आरोप लगाते हुए पीट-पीटकर मार डाला। गाँव के कुछ लोगों ने वाट्सएप्प ग्रुप बनाया था जिसमें यह चर्चा थी कि मुस्लिम बीफ खा रहे हैं। अखलाक का परिवार उस गांव में अकेला मुस्लिम परिवार था। अखलाक की मौत के बाद पूरा परिवार आज तक डरा हुआ है।
4. इंस्पेक्टर सुबोध को कौन भूल सकता है जिसने गौ हत्या के शक में बुलंदशहर में हुए हिंसक प्रदर्शन को रोकने के लिए अपनी जान गवाई। इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या का मुख्य आरोपी बजरंग दल का कार्यकर्ता बताया गया था।
5. झारखंड में 6 लोगों को भीड़ ने बच्चा चोरी की अफवाह में पीट पीटकर मार दिया। पुलिस ने जाँच में पाया कि कुछ समय से वाट्सएप्प ग्रुप बनाकर आसपास के गाँवों में बच्चा चोर गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह फैलाई जा रही थी।

6. झारखंड के तबरेज अंसारी को जून 2019 में एक भीड़ ने पोल से बांधकर पीट पीटकर मार दिया। दिसंबर 2019 में कोर्ट ने 13 में से 6 आरोपियों को इसलिए जमानत दे दिया क्योंकि वीडियो से यह पता नहीं चल रहा था कि आखिर किसके वार से तबरेज की मौत हुई है।
हमारे देश मे ऐसी बहुत सी घटनाएं हुई जो 21वीं शताब्दी में हमारे समाज में बढ़ रही बर्बरता की प्रतिनिधि उदाहरण थीं। ज्यादातर घटनाओं में यह देखने में आया कि इनके पीछे सोशल मीडिया  पर अफवाह फैलाकर लोगों के रक्षा दल बनाना, निगरानी करना और संदिग्ध व्यक्तियों पर हमले करना था। के जगह ऐसे लोग पुलिस के साथ भी कोआर्डिनेट करते थे व ऐसे लोगों को राजनीतिक समर्थन भी हासिल था।  पूर्व में हुई घटनाओं पर अगर  निष्पक्ष जांच हुई होती तो पालघर जैसी घटनाएं नहीं होती।

पालघर मॉब लिंचिंग सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों के दोगलेपन की एक झलक है। पिछले 6 सालों में जितनी लिंचिंग हुई उन पर हत्यारों के मजहबी नारे ने न्याय, मानवता, कानून, संविधान सब को ताक पर रख दिया। सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर किसी धर्म विशेष के लोगों के साथ हुई घटनाओं पर राजनेताओं का हत्यारों के पक्ष में बोलना, उनके जेल से निकलने पर स्वागत करना, उनके लिए तिरंगा यात्रा निकालना, भारत माता और वंदे भारत के उद्घोष  के साथ हत्यारों को हीरो बनाकर पेश करना आज की होने वाली मॉब लिंचिंग का आधार है! आज जब पालघर जैसी घटनाएं हमारे सामने हो रही हैं तो एक बार पीछे मुड़कर उन घटनाओं पर भी नजर डालना चाहिए जो पिछले कुछ सालों से हो रही हैं। उन घटनाओं पर अगर पहल किया गया होता तो आज जगह-जगह ऐसी घटना सुनने और देखने को नहीं मिलती जिनसे इंसानियत भी शर्मसार हो जाए। जरा सोचिए गौरी लंकेश की हत्या पर उसे कुत्तिया किसने बोला और उसका बचाव किसने किया? तबरेज अंसारी को जिसने मारा उसके साथ सत्ता पक्ष के केंद्रीय मंत्री फोटो खिंचा रहे थे! अफराजुल को मारकर पेट्रोल छिड़ककर जला दिया गया और उसके हत्यारों के पक्ष में हजारों लोगों द्वारा उच्च न्यायालय के छत पर भगवा झंडा लगा दिया गया।
आज सोशल मीडिया और मुख्य धारा मीडिया जिस तरीके से लोगों में नफरत भर रहे हैं यह नफ़रत जो लोगों के मन में एक ज़हर की तरह एकत्रित हो रही है वो भीड़ के रूप में इसी तरह सड़कों पर अपना रूप दिखाएगी। मीडिया और सत्ताधारी पार्टी की साम्प्रदायिक प्रचार मशीनरी ने समाज को एक बारूद की ढेरी में तब्दील कर दिया है जिसमें अफवाह की एक छोटी चिंगारी विध्वंसक परिणाम देती है।

कलबुर्गी, पानसरे, दाभोलकर व अन्य ऐसे कितने नाम है जो इसी सभ्य समाज की बेहतरी के लिए काम करते-करते मारे गए। इन सभी घटनाओं पर हमारी चुप्पी का परिणाम आज हमारे सामने हैं।

हरिशंकर परसाई के शब्दों में अगर कहा जाय तो दिशाहीन बेकार हताश व विध्वंसकारी युवाओं की भीड़ सत्ता ने खड़ी कर रखी है। इसका प्रयोग जरूरत अनुसार सत्ता धारी करते रहते हैं। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन या सत्ता के साथ चल देती है जो धार्मिक उन्माद या तनाव पैदा कर सकते हैं। यही भीड़ फासिस्टों का हथियार होती है। भारत में यह भीड़ बढ़ रही है और यह भीड़ हमारे आपके घरों तक भी पहुँचे इससे पहले हमें जागना पड़ेगा।

10 March 2020

गुलामी के आठ लक्षण: क्या हम मानसिक गुलाम बन चुके हैं?



✍🏼 नितेश शुक्ला

आज के दौर में मानसिक गुलामी समाज के विकास में एक बड़ा रोड़ा साबित हो रही है। दिमागी गुलामी इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि मानसिक रूप से गुलाम व्यक्तियों का इस्तेमाल धर्मगुरुओं से लेकर राजनेताओं, विज्ञापन कंपनियों, उत्पाद विक्रेताओं द्वारा आसानी से किया जा सकता है। ऐसे लोगों से फिर अपने मन मुताबिक कार्य करवाया जा सकता है। साथ ही मानसिक रूप से गुलाम व्यक्ति सामाजिक बदलाव के पहिए को पीछे की ओर मोड़ने की कोशिश करने लगते हैं। वे अपनी मानसिक जड़ता से ही चिपक जाते हैं और सामाजिक परिवर्तन के ख़याल मात्र से घबरा जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि यह कोई नई चीज है। हमारे कई पूर्वजों जैसे महात्मा बुद्ध, राधा मोहन गोकुल,  शहीद भगतसिंह, पेरियार, डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर, महापंडित राहुल सांकृत्यायन आदि ने लोगों की मानसिक जड़ता और गुलामी पर लिखा और उसको दूर करने की दिशा में काम किया। उन्होंने भारत के लोगों से  मानसिक बेड़ियों को तोड़कर फेंक देने का भी आह्वान किया। उनके विचारों का अगर संक्षिप्त में सार निकाला जाए तो निम्नलिखित बातें सामने आती हैं जो किसी व्यक्ति के मानसिक गुलाम होने का संकेत देती हैं- 

गुलामी के आठ लक्षण:

1. किसी की कही गयी बात को परखे बिना उसपर आँख मूंद कर भरोसा कर लेना दिमागी गुलामी है।

2. ज्ञान का आधार तर्क को न समझना बल्कि किसी बात को बस इसलिए सही मान लेना क्योंकि उसे किसी बड़े व्यक्ति, पूर्वज, नेता या किताब ने कहा है, ये उससे भी बड़ी गुलामी है। 

3. अपने प्रिय नेता/अभिनेता/पार्टी के गलत कामों पर भी सफाई देते रहना, उसका पक्ष लेते रहना, ये तीसरी सबसे बड़ी गुलामी है।

4. कुरीतियों या परम्पराओं का बस इसलिए पालन करते रहना क्योंकि हमारे पूर्वज भी ऐसा करते थे, ये चौथी सबसे बड़ी गुलामी है। 

5. जीवन में पूरे समाज के कल्याण की दिशा में काम करने की बजाय भौतिक वस्तुओं की लालसा में ज़िंदगी गुजार देना पाँचवीं सबसे बड़ी गुलामी है।

6. खुद को अन्य जाति/धर्म/समुदाय के लोगों से श्रेष्ठ समझना और दूसरों को नीचा समझना, ये छठवीं तरह की गुलामी है।

7.  किसी समुदाय के एक व्यक्ति के गलती करने पर उस पूरे समुदाय को गलत ठहरा देना, उससे नफरत करने लगना, ये सातवें तरह की दिमागी गुलामी है। 

8. बहस में तर्क से हारने पर कुतर्क पर उतर आना और अपनी बात पर अड़ जाना आठवीं सबसे बड़ी गुलामी है।

कहा भी गया है- अपने समाज, परिवेश और दुनिया से अनजान व्यक्ति मूर्ख है, पर ऐसा व्यक्ति जो अपनी मूर्खता से भी अनजान है वो महामूर्ख है। इसलिए आइये हम- 
●तर्क को ज्ञान का अस्त्र बनाएं
●वैज्ञानिक सोच अपनाएँ
●संवेदनशील और न्यायप्रिय बनें।

31 October 2019

सावरकर: क्रांतिवीर या माफीवीर?


✍🏼 नितेश शुक्ला

विनायक दामोदर सावरकर को भारतरत्न देने की बीजेपी की सिफारिश के बाद आजकल एक बहस चल पड़ी है कि सावरकर एक स्वतंत्रता वीर थे या अंग्रेजों से माफी मांगने वाले कायर। महाराष्ट्र चुनाव के पहले बीजेपी के लिए यह बहस काफी फायदेमंद भी साबित हुई है। सावरकर आरएसएस-बीजेपी की हिंदुत्व की विचारधारा को सैद्धांतिक आधार देने वाले व्यक्ति थे इसीलिए आरएसएस और बीजेपी लगातार उनको स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्य नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते रहते हैं। इसका कारण ये भी है कि 1925 में बने और अपने को देशभक्त और राष्ट्रवादी कहने वाले आरएसएस के पास एक भी स्वतंत्रता सेनानी नहीं है जिसे ये अपना कह सकें। इसलिए हिन्दू महासभा के नेता सावरकर को ही स्वतंत्रता आंदोलन के एक मुख्य चेहरे के रूप में दिखाने की कोशिश लगातार की जाती रही है। कुछ समय पहले जब राजस्थान में बीजेपी की सरकार थी तब इतिहास की किताबों में बदलाव करके सावरकर को ही आज़ादी की लड़ाई का मुख्य नेता दिखाने की कोशिश की गई थी। हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने रातों रात भगतसिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ सावरकर की त्रिमूर्ति लगा दी। काफी विरोध के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेश पर वो मूर्तियां हटा दी गईं। वास्तव में यह बस अभी शुरुआत है, आरएसएस आगे काफी ज़ोर-शोर से अपने नेताओं को भारतीय जनमानस और इतिहास में स्थापित करने की कोशिश करने वाला है। फिलहाल हम तथ्यों की पड़ताल करते हुए यह जानने की कोशिश करते हैं कि सावरकर का आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान था या नहीं।
सावरकर की राजनीति को ठीक से समझने के लिए उनके जीवन को दो हिस्सों में देखने की जरूरत है। पहला, 1911 में कालापानी जेल जाने से पहले के सावरकर और दूसरा, 1911 में जेल से अंग्रेजों को पहला माफीनामा लिखने के बाद वाले सावरकर। इन दोनों हिस्सों पर प्रकाश डालते हुए हम कुछ तथ्य रखेंगे जिससे पाठक यह खुद तय कर पाएंगे कि सावरकर का आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान था।

1911 के पहले के सावरकर
सावरकर का जन्म 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ। उन्होंने पहले फर्गुसन कॉलेज पुणे और आगे लंदन के ग्रे इन लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। राजनीतिक जीवन की शुरुआत स्कूली जीवन से ही हो गयी थी। पुणे में रहने के दौरान अपने भाई के साथ अभिनव भारत की स्थापना की। अभिनव भारत सोसाइटी भारत में सशस्त्र क्रांति करके इसे आज़ाद कराना चाहती थी। लंदन में रहते हुए 1909 में उन्होंने 1857 के विद्रोह पर एक किताब "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" लिखी जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले कई लोगों को प्रभावित किया। इस किताब में उन्होंने एक ऐसे भारत की ही कल्पना की थी जिसमें हर जाति-धर्म के लोग बराबरी और चैन से रह सकें। अंग्रेजों ने इस किताब को बैन कर दिया। सन् 1909 में इंग्लैंड में सावरकर के एक अनुयायी और मित्र मदन लाल ढींगरा ने एक जनसभा के दौरान एक ब्रिटिश अधिकारी विलियम हट कर्जन विली की हत्या कर दी। सावरकर ने इसका समर्थन किया व ढींगरा के समर्थन में लेख लिखा। लंदन में रहने के दौरान ही 1910 में क्रांतिकारी समूह 'इंडिया हाउस' की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल रहने के लिए उनको गिरफ्तार किया गया और भारत भेजा गया। भारत आते समय उन्होंने जहाज से भागकर फ़्रांस में शरण लेने का प्रयास भी किया पर फ्रांसीसी अधिकारियों ने उन्हें पकड़कर ब्रिटिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। आगे चलकर उनपर दो मामलों में सुनवाई चली, पहला नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए उकसाने और दूसरा राज्य के खिलाफ साजिश रचने की। दोनों मामलों में कोर्ट ने सज़ा सुनाते हुए उनको दोहरे उम्रकैद यानी 50 साल के कैद की सज़ा दी।


1911 के बाद के सावरकर
यह स्पष्ट है कि सावरकर कालापानी की सज़ा के पहले तक स्वतंत्रता के लिए एक क्रांतिकारी के रूप में काम कर रहे थे पर 1911 में कालापानी सेलुलर जेल जाने के बाद और वहां की  अमानवीय प्रताड़ना के बाद उनमें काफी बदलाव आया। जेल में जाने के डेढ़ महीने बाद ही अगस्त 1911 में अपना पहला माफीनामा लिखा। इसके बाद उनके माफिनामों का सिलसिला शुरू हुआ। सावरकर सज़ा से बचने के लिए अंग्रेजों को माफीनामे पर माफीनामे लिखते रहे। अपने माफिनामों मे एक जगह वो लिखते हैं-
"भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है। अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था।
इसलिए अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है।
....अगर हमें रिहा कर दिया जाता है, तो लोग ख़ुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में, जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे।
इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे। मैं भारत सरकार जैसा चाहे, उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं,.... मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फ़ायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले होने वाले फ़ायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है।
जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है। आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे।"

मई 1921 में सावरकर का माफीनामा अंग्रेज सरकार ने स्वीकार कर लिया और उन्हें रत्नागिरी जेल में भेज दिया गया। अन्ततः जनवरी 1924 में सावरकर को जेल से इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वो अगले पांच साल रत्नागिरी जिले से बाहर नहीं जाएंगे और किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे। हालांकि ये प्रतिबंध 1937 में ही हटाया गया।
      कुछ लोग कहते हैं कि माफीनामा लिखना जिंदा रहने और देश सेवा करने की एक रणनीति थी, पर सावरकर ने 2 मई 1921 में अंडमान जेल से आने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया, उनकी राजनीति हिंदूवादी हो चुकी थी। अमरावती जेल में रहते हुए ही उन्होंने हिंदुत्ववादी राजनीति को वैचारिक आधार देने वाली किताब 'हिंदुत्व' लिखी। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब वॉयसराय ने भारत को भी युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी तब इसके विरोध में कांग्रेस के नेताओं ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया उस समय सावरकर की अध्यक्षता में हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाई। साथ ही उन्होंने अंग्रेजों की सेना में हिंदुओं की भर्ती के लिए खुद कैम्प लगवाए, नारा दिया गया- "राजनीति का ही हिन्दुकरण करो और हिंदुओं का सशस्त्रिकरण करो"। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध भी सावरकर और हिन्दू महासभा द्वारा किया गया। इस प्रकार देखा जा सकता है कि रिहाई के बाद एक शब्द या एक कार्य से भी सावरकर अंग्रेजों के खिलाफ नहीं गए। अपने माफीनामे के मुताबिक ब्रिटिश सरकार के सेवक बने रहे और आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर करते रहे।


देश के बँटवारे की सबसे पहली परिकल्पना सावरकर ने दी थी
सावरकर खुद एक नास्तिक व्यक्ति थे, वे हिन्दू को एक धर्म की बजाय एक संस्कृति की तरह देखते थे। अपनी किताब "हिंदुत्व" में उन्होंने हिंदुत्व शब्द को गढ़ा और परिभाषित किया है। उनके अनुसार हिंदुत्व तीन बातों से तय होता है-
1.) इस भारतीय भूभाग (सिन्धुस्थान या हिंदुस्थान) से खून का रिश्ता होना। इस देश के पूर्वजों का रक्त उनमें बह रहा हो यानि वो एक ही जाति के हों।
2.) वे भारत को अपनी पितृभूमि के रूप में मान्यता देते हों।
3.) वो भारत की संस्कृति जो कि हिंदुत्व है उसको अपनी संस्कृति मानते हों।
दूसरे शब्दों में "एक राष्ट्र, एक जाति, एक संस्कृति।"
हिंदुत्व की संस्कृति के लक्षण सावरकर बताते हैं- "वही व्यक्ति हिन्दू है जो सिन्धुस्थान (हिन्दुस्थान) को केवल पितृभूमि ही नहीं पुण्यभूमि भी मानता हो।" इस लक्षण के आधार पर सावरकर कहते हैं कि मुस्लिम कभी भी हिंदुत्व के दायरे में नहीं आ सकते, क्योंकि उनकी पुण्यभूमि हिंदुस्थान में न होकर मक्का में है। इसके अतिरिक्त बाकी जितने भी समुदायों के लोग हैं चाहें वो वैदिक, आस्तिक, नास्तिक, एकेश्वरवादी (सिक्ख, जैन, बौद्ध इत्यादि) हों चूंकि उनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही सिन्धुस्थान है इसलिए वो हिन्दू हैं। इसप्रकार सावरकर मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत जैसे ही एक सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं।
सावरकर की इस किताब में हिन्दू धर्म का काफी महिमामंडन देखने को मिलता है। सावरकर ज्यादातर पुराणों, वेदों और मध्यकालीन काव्य रचनाओं को इतिहास के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तथ्यपूर्ण व यथार्थवादी ऐतिहासिक संदर्भो का लगभग अभाव ही है। बीच-बीच में कपोल कल्पनाओं का काफी सहारा लिया गया है।

इसप्रकार देखा जा सकता है कि सावरकर के जीवन के दो हिस्से रहे हैं एक में वो क्रांतिकारी की भूमिका में दिखते हैं तो दूसरे में इसके उलट अंग्रेजों के सामने शीश नवाते हिंदूवादी नेता की भूमिका में। उल्लेखनीय है कि सावरकर के समय गदर आंदोलन के कितने नेता कालापानी की सजा काट रहे थे, वो वहीं मर-खप गए पर माफी नहीं माँगी। एक तरफ भगतसिंह ये कह रहे थे कि "यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। मेरी कुर्बानी सैकड़ों नौजवानों को देश पर मर मिटने के लिए प्रेरित करेगी।"  दूसरी तरफ सावरकर अपने माफीनामे में कह रहे थे-"मेरी रिहाई मेरे अनुयायियों को खुशी से भर देगी और वे ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादार बनेंगे।" भगतसिंह को भी अंग्रेज सरकार कालापानी की सज़ा दे सकते थे और इसके पर्याप्त कारण भी थे, पूरे देश में भगतसिंह की फाँसी के खिलाफ गुस्सा था, जनता की तरफ से कांग्रेस पर भी यह दबाव था कि गाँधीजी लार्ड इरविन पैक्ट पर तबतक हस्ताक्षर न करें जबतक भगतसिंह की फाँसी की सज़ा को उम्रकैद में न बदल दिया जाय। पर अंग्रेजी हुकूमत इस बात को अच्छी तरह समझती थी कि उनके लिए भगतसिंह का ज़िन्दा रहना कितना घातक हो सकता था। कांग्रेस जैसी समझौता-दबाव वाली रणनीति अपनाने वाली धारा की जगह अगर अंग्रेजों की सत्ता का समूल उखाड़ फेंकने की बात करने वाली क्रांतिकारी धारा अगर जीवित रह जाती है तो यह उनके लिए कितनी ख़तरनाक हो सकती है। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने सावरकर, जो खुद को बचाने के लिए माफिनामों की फेहरिस्त जारी कर रहे थे, उनके माफीनामे स्वीकार कर अंग्रेजी सरकार ने उनको छोड़ दिया। उनको बाद में अंग्रेजों की तरफ से पेंशन भी दिया गया। यह सच भी है सावरकर ने अपने माफिनामों में अंग्रेजी सरकार से किया गया अपना वादा निभाया। बाहर आने के बाद 1947 तक अंग्रेजों के खिलाफ कभी किसी आंदोलन स्तर पर या लेखन स्तर पर वो शामिल रहे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती। उनके लिए अब अंग्रेजी गुलामी समस्या रह ही नहीं गयी थी, वो अब हिंदुत्व की राजनीति की राह पर निकल पड़े थे। इसीलिए आगे न तो अंग्रेजों ने कभी उनको गिरफ्तार किया ना कोई वार्निंग तक दी। एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अंग्रेजों ने सावरकर की पहली किताब "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" पर पाबंदी लगा दी थी, पर उनको जेल के अंदर "हिंदुत्व" किताब लिखने दिया गया और उसपर पाबंदी भी नहीं लगाई गई। ऐसा क्यों? ब्रिटिश सरकार यह समझती थी कि आजादी के लिए उभरते संघर्ष के बीच हिन्दू-राष्ट्र का नारा एक वरदान साबित होने वाला था। एक प्रकार से सावरकर उनकी टीम से ही खेल रहे थे। अंग्रेजों की बांटों और राज करो की रणनीति अब सावरकर खुद ही चला रहे थे। यही कारण था कि अंग्रेज आगे उनपर लगे सारे प्रतिबंध हटाते गए।
महात्मा गाँधी की हत्या के बाद एक अभियुक्त की गवाही के बावजूद सावरकर को स्वतंत्र गवाह या सबूत न होने के कारण छोड़ दिया गया, पर आगे जस्टिस कपूर आयोग ने अपनी जाँच में सावरकर को भी गाँधीजी की हत्या में दोषी माना था।
एक सेनानी का जीवन कीमती होता है जैसे भगतसिंह का था जिसको बचाने के लिए पूरे देश की जनता सड़कों पर उतर रही थी। पर अगर सेनानी खुद ही अपनी जान बचाने के लिए शत्रु से दया की याचना करने लगे तो उसे अवसरवादी कहा जा सकता है पर वीर नहीं। सोचिए अगर सारे क्रांतिकारी बलिदान देने की बजाय जिंदा रहने और देश सेवा करने की सोचते तो भारत कभी आज़ाद हो पाता? युध्द में हर सैनिक सोचने लगे कि अभी भागकर कहीं छुप जाता हूँ, ज़िन्दा रहूँगा तभी तो देश सेवा करूंगा तो क्या हम कभी कोई युध्द जीत पाएंगे??
इसीलिए आज हमारे आदर्श भगतसिंह जैसे बहादुर हो सकते हैं सावरकर जैसे अवसरवादी सेवक नहीं।

पाठक मंच: स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार, नहीं हमें इनकी दरकार



✍️हरिओम शुक्ला   

एक सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वो अपनी जनता को यथासंभव, स्वास्थ्य, शिक्षा, और रोजगार की व्यवस्था उपलब्ध करा सके। इस काम को करने के लिए सरकार जनता के ऊपर टैक्स लगाती और वसूलती है। किन्तु वर्तमान समय में सरकार इन सबसे किनारा करते हुए युवा वर्ग को सम्प्रदायिकता , जातिवाद, हिन्दू-मुस्लिम एवं मंदिर-मस्जिद में उलझाकर दिग्भ्रमित करने का काम कर रही है। आज की युवा पीढ़ी भी धुंआधार प्रचार के इस जलसे में इस कदर मशगूल है की उसे कुछ भी यथार्थ दिखाई ही नहीं दे रहा है। धर्म एवं संप्रदाय का नशा उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो चुका है जिसका लाभ नेता एवं वर्तमान राजनीतिक पार्टियां बखूबी उठा रही हैं।
      क्या हम कभी सोचते हैं या यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे और आपके चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने हमारे लिए कितने स्कूल-कालेज और कितने अस्पताल-चिकित्सालय खोले हैं? ज्यादातर आपको उतर मिलेगा- कभी नहीं। आपका अगला सवाल होगा- आखिर क्यों? सीधा सा उतर है कि यदि सरकारी कालेज और अस्पताल खुलेगा और इनमें शिक्षा और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था भी हो जाए तो जनता का तो भला होगा पर आपके नेता या विधायक जी का कल्याण होगा  क्या? जब उन्हें जाति-धर्म की आग लगाकर, जय श्री राम का नारा लगाकर ही वोट मिल जा रहे हैं तो फिर वो इन मुद्दों पर क्यों सोचेंगे? 
      आपके सांसद या विधायक जी यह सब सुविधाएं आपको देना भी नहीं चाहेंगे, उनके स्वयं के निजी कालेज और चिकित्सालय चल रहे हैं जिनमें आपके नेता जी स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर आपको खूब लूट रहे हैं। आपके नेताजी धीरे-धीरे स्वयं लखपति से करोड़पति और करोड़पति से अरबपति बनते जाएंगे। उनका तो एक ही नारा है- हम राज करें तुम राम भजो। वैसे भी आजकल आप प्राइवेट स्कूल कालेज और अस्पताल की स्थिति देख ही रहे हैं अगर इन्हे पूरी छूट मिल जाए तो यह स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर आपके शरीर से रक्त की एक-एक बूंद तक निचोड़ लेंगे।
     रही बात रोजगार की तो जिस तरह हर एक सरकारी विभागों का निजीकरण किया जा रहा है तो सरकारी नौकरी की उम्मीद तो युवाओं को त्याग ही देना चाहिए।
        वैसे भी सम्प्रदायिक आग लगने वाले और स्कूल-अस्पताल की जगह मंदिर-मस्जिद बनाने वाले नेता जी के साथ सुकून के दो पल वाली सेल्फी लेता युवा आज का पोस्टर बॉय है। ऐसे बेरोजगार युवाओं के लिए सरकार ने पकौड़ा रोजगार की समुचित व्यवस्था कर ही दी है, उन्हें रोजगार की अब आवश्यकता ही कहां है। मीडिया ने आज लोगों को अंधा बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया है। पर एकबार अगर हम अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी पर एक निगाह डालें और खुद से पूछें कि क्या सबकुछ ठीक चल रहा है? आज ज्यादातर आबादी अपनी जिंदगी की समस्याओं से जूझ रही है। किसी को रोजगार नहीं मिल रहा, किसी के घर कोई बीमार है पर इलाज कराने के पैसे नहीं हैं, किसी के घर ऋण चुकाने के पैसे नहीं हैं, किसी के घर अच्छा खाना तक नसीब नहीं हो रहा है, किसी को सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करने के बाद भी गुजारा करने भर का पैसा नहीं मिलता तो किसी की नौकरी छूट गयी है। क्या इन समस्याओं का सरकार से कोई संबंध है? जी हाँ, इसका सीधा संबंध सरकार की नीतियों से है। देश में लोगों को अच्छी शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराना, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, सड़क-बिजली-पानी का समुचित इंतज़ाम करना हर सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होता है। आज़ादी के बाद हर सरकारों ने हमारे देश की आम जनता के साथ दगाबाजी ही कि है, पर अगर हम खुद अपने मूलभूत मुद्दों को भूलकर धार्मिक उन्माद पागल हो जायेंगे तो आखिर कौन हमारे लिए संघर्ष करेगा? आज भारत के युवा वर्ग के सामने यह प्रश्न बार बार टिक-टिक कर रहा है, चेतावनी दे रहा है। अगर हमारी राष्ट्र की परिभाषा में राष्ट्र में रहने वाली जनता का दुख-दर्द नहीं है तो ऐसा राष्ट्रवाद निश्चित रूप से देश को गड्ढे में लेकर जाएगा। 
 अभी भी समय है, देश के भावी भविष्य! तुम अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाओ, अपनी जीवन को और समाज को बेहतर बनाने की लड़ाई लड़ो। अन्यथा भविष्य में शायद युवा कहने लगे कि-  
स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार नहीं हमें इनकी दरकार,
हमें तो चाहिए मंदिर-मस्जिद और दे दो एक तलवार।