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17 March 2019

न्यूजीलैंड में हुआ आतंकवादी हमला एक गम्भीर खतरे की ओर इशारा करता है।

नितेश शुक्ला
दो दिन पहले न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर में दो मस्जिदों में हुए आतंकवादी हमले में 49 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 20 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। हमला करने वाला शख्स 28 साल का ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ब्रेंतों हैरिसन है। उसके पास से पुलिस को 87 पृष्ठों का प्रवासी विरोधी और मुस्लिम विरोधी घोषणापत्र मिला है। हाल ही में अमेरिका में भी ऐसे हमले देखने में आये हैं जिनमें प्रवासियों या मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे हमलों की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि पूरी दुनिया मे छाया आर्थिक संकट ही इसका जिम्मेदार है। उपर्युक्त हमला प्रवासियों और मुस्लिमों को टारगेट करके किया गया है, और ऐसे हमले इस समय कई देशों में प्रवासियों जिसमें भारतीय व हिन्दू भी शामिल हैं हो रहे हैं। इसका कारण क्या है? मोठे तौरे पर कहें तो इसका कारण वही है जो महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हुए हमले के लिए जिम्मेदार था। यानी आर्थिक संकट के कारण रोजगार का कम हो जाना, छोटे उद्योगों का बर्बाद होना, और जनता को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती, जनता की बदहाली। इसके बाद जब जनता में असंतोष पैदा होता है तो उस असंतोष को भुनाने के लिए कुछ समाज विरोधी फासीवादी राजनीतिक ताकतें आगे आती हैं। जो इस असंतोष और बर्बादी का कारण किसी एक अल्पसंख्यक वर्ग को ठहराकर जनता का गुस्सा उस वर्ग की तरफ मोड़ने का काम करती हैं। इसके लिए फेक प्रोपगंडा, हेट स्पीच, नफरत फैलाने वाले साहित्य आदि का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसी राजनीति के उभार हमेशा ऐसे समय पर होते हैं जब आर्थिक मंदी व्यवस्था पर हावी रहती है और लोगों में जबरजस्त असन्तोष पैदा हो जाता है। इसके कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं- 
1930 की महामंदी का समय था। हिटलर ने कहा कि जर्मनों की बर्बादी के लिए यहूदी नस्ल जिम्मेदार है, हमको इनको खत्म करके जर्मनी को फिर से महान बनाना है। फिर 60 लाख यहूदी कत्ल कर दिए गए। उनकी फासीवादी राजनीति का विरोध करने वाले हजारों कम्युनिस्ट कत्ल कर दिए गए। दुनिया ने द्वितीय विश्वयुद्ध के भीषण मंजर देखा।
   इसके बाद यह फासीवादी राजनीति दुनिया मे अलग अलग शक्लों में सामने आई। कभी नस्लीय श्रेष्ठता के रूप में, कभी साम्प्रदायिकता के रूप में, कभी क्षेत्रवाद के रूप में तो कभी विदेशी प्रवासियों के विरूद्ध।
    भारत में किसी ने कहा कि हर समस्या की जड़ मुसलमान हैं, इनको पाकिस्तान भेजो, मारो, खत्म करो। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाकर इसका पुराना गौरव फिर से स्थापित करो। भारत को विश्व गुरु बनाना है। इसका परिणाम आज जगह जगह दंगों और हत्याओं के रूप में देखने को मिल ही रहा है।
    महाराष्ट्र में किसी ने कहा कि हमारे मराठी लोगों की नौकरियां भइया (यूपी-बिहार वाले) ले जा रहे, हमको महाराष्ट्र और "मराठी मानुष" के गर्व को फिर से स्थापित करना है। "जय महाराष्ट्र" का नारा दिया गया। फिर उत्तर भारतीय प्रवासियों पर हमले शुरू हुए। 
    अमेरिका में  जनता की आर्थिक दशा पिछले दशकों में काफी खराब हुई है और ऊपर के 1% अमीरों के हाथों में नीचे की 50% आबादी से भी ज्यादा संपत्ति इक्कट्ठा हो गयी है। ऐसे में ट्रम्प आते हैं जो प्रवासियों के खिलाफ आग उगलते हैं कि अमेरिका के लोगों की हालत के जिम्मेदार प्रवासी हैं, हम वीजा नियमों को खूब कड़ा कर देंगे, "अमेरिका फर्स्ट", "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" जैसे नारे उठाये गए। परिणाम यह है कि अमेरिका में भी प्रवासियों पर हमले शुरू हो चुके हैं। मैक्सिको बॉर्डर वॉल इसी राजनीति का एक हिस्सा है। 
    न्यूजीलैंड की घटना इसी दक्षिणपंथी फासीवादी राजनीति के उभार की कड़ी है जो पूरी दुनिया में आर्थिक संकट के कारण आम जनता में पैदा हुए असंतोष को किसी अल्पसंख्यक वर्ग की तरफ मोड़ने के लिए पैदा हो रही है। जिस आदमी ने न्यूजीलैंड में हमला किया है उसके पास से प्रवासी विरोधी और मुस्लिम विरोधी साहित्य भी पाया गया है। इस तरह की सारी राजनीतिक उभार की घटनाओं में तीन चीजें कॉमन होती हैं- 

1. स्वर्णिम भूतकाल की कल्पना (कभी हम महान थे) 
2. टारगेट अल्पसंख्यक (इन्होंने हमें बर्बाद कर दिया)
3. स्वर्णिम भूतकाल की पुनर्स्थापना (हमें फिर से महान बनना है) 

ऐसा करते हुए फासीवादी राजनीति  दरअसल जनता की बर्बादी के असली कारण यानी पूँजीवाद को बचाने का काम करती है। पूँजीवाद कभी भी आर्थिक संकट (Economic Crisis) की बीमारी से मुक्त नहीं  हो सकता, हर उछाल के बाद चक्रीय क्रम में संकट आना ही है। ऐसे में अगर जनता का असंतोष इस व्यवस्था के खिलाफ जाकर पूंजीवादी व्यवस्था को ही खत्म कर दे और उसके स्थान पर एक मानवकेन्द्रित समाजवादी व्यवस्था कायम कर दे है तो इससे पूँजीवाद और इसके सत्ताधारी वर्ग (वो 1% लोग जो पूरी संपत्ति पर कब्ज़ा करके बैठे हैं) की सत्ता चली जायेगी। इसीलिए समय-समय पर ऐसी फासीवादी ताकतों को खड़ा करना या होना इनकी लूट और सत्ता की सुरक्षा के लिए संजीवनी का काम करता है। इसलिए विश्वभर में इस समय हो रहे फासीवादी उभार को विश्वभर में फैले आर्थिक संकट से जोड़कर ही आसानी से समझा जा सकता है। अगर इस मसले को सुलझाया नहीं जाता तो पूरी दुनिया को एक बर्बर परिणाम झेलना पड़ सकता है जैसा कि हिटलर और मुसोलिनी के फासीवादी उभार के दौरान हुआ था।

भारत में रोजगार का सबसे बड़ा "अकाल" : 82% पुरुष और 92% महिलायें 10,000 से भी कम वेतन पर काम कर रहे


 


Kalpana


कुछ समय पहले CMIE द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2018 में 1.1 करोड़ लोगों की नौकरियाँ चली गईं। NSSO के पीरियाडिक सर्वे का रोजगार के ऊपर डेटा सरकार जारी ही नहीं करना चाहती थी, पर बिज़नेस स्टैण्डर्ड को ये रिपोर्ट मिल गयी। NSSO की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है। इन दो रिपोर्टों के बाद एक तीसरी रिपोर्ट आई है जो रोजगार की उसी भयानक कहानी को दुहराती है। 
   हाल ही में जारी State of Working India 2018  के मुताबिक हमारे देश की बेरोजगारी दर बीते 20 सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच चुकी है। यह रिपोर्ट Centre for Sustainable Employment ,Azim Premji University ने जारी किए हैं। इसके नतीजे हमारी सरकारों के झूठे दावों की पोल खोलकर रख देते हैं। शायद यही कारण है कि वर्तमान मोदी सरकार ने रोजगार पर किसी भी तरह के सरकारी आंकड़े निकालना बंद कर दिया है। इसके साथ ही बीजेपी ऐसे मुद्दे उछाल रही जिससे बेरोजगारी की इस भयानक तस्वीर को छुपाकर असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटा रहे, खासकर युवाओं का, जो किसी भी सरकार को बनाने या गिराने की ताकत रखते हैं। हर साल करीब 2 करोड़ युवा हमारे देश में मतदान करने योग्य बन जाते हैं, इस साल 2019 के चुनाव के लिए भी करीब 2.5 करोड़ नए मतदाता कतार में लग चुके हैं,  जितने नए मतदाता हर साल मतदान के योग्य बन जाते हैं हमारी सरकार 5 साल के अपने कार्यकाल में भी उतने रोजगार निर्मित नही कर पा रही है। बीते 5 साल में हर युवा बेरोजगारी की इस दास्तान को भलीभांति जानता है और उसे किसी अकड़े की भी दरकार नही है। साल में 20-20 फॉर्म भरने और भर्ती परीक्षा देने के बावजूद जिसको कोई रोजगार नहीं मिल पा रहा है उसके लिए बेरोजगारी एक क्रूर पर जीवित सच्चाई है। 
इसी रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश के  GDP का एक तरफ ग्राफ ऊपर गया है वहीं दूसरी तरफ रोजगार का आंकड़ा गिरते हुए नज़र आ रहा है। 1970-80 मे जीडीपी दर 3-4 % थी और रोजगार 2% की सालाना की दर से पैदा हो रहा था । 1990 की उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के बाद 1990-2000 में देश की जीडीपी 7% की दर से बढ़ती तो दिखी परंतु रोजगार पैदा होने की दर 1 % या उसे भी कम रही थी। निजीकरण के इस दौर में रोजगार की दर गिरते गिरते कब बेरोजगार की दर बन गयी पता ही नहीं चला। अब ऐसी स्थिति बन गयी है कि जितने नए रोजगार पैदा हो रहे उससे काफी ज्यादा पुराने रोजगार खत्म हो रहे हैं। 1990-91में उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को लागू करने के दौरान जो सपने दिखाए गए थे वो छलावा साबित हुए हैं। तबसे अबतक देश मे बहुत विकास हुआ है पर वो रोजगार विहीन विकास रहा है, वो विकास चंद अमीर घरानों की तिजोरियों में समा कर रह गया है। 


 इस रिपोर्ट में एक और बेहद चौकानें वाली बात सामने आयी है कि भारत में काम करने वाले लगभग 82% पुरुष और 92% महिलायें 10,000 से भी कम वेतन पर काम करते हैं। 7वें वेतन आयोग के अनुसार किसी व्यक्ति को आम तरीके से जीवन गुज़र बसर करने के लिए कम से कम आय 18,000 होनी चाहिए। फिर भारत की बहुसंख्यक काम करने वाली आबादी कैसे गुजर बसर करती होगी ये सोचने वाली बात है। यह स्थिति काफी भयावह है पर यही सच्चाई है कि उदारीकरण और निजीकरण के बाद जिस ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया गया उसका यही परिणाम होना था। देश में 90% से ज्यादा काम करने वाली आबादी ठेके पर ही काम करती है जहाँ 10-12 घंटे हाड़तोड़ काम के बावजूद जो वेतन मिलता है वो उनको किसी तरह बस जिंदा रहने और फिर मालिक के लिए खटने जितना ही होता है। यही कारण है कि पीएचडी से लेकर बीटेक-एमबीए किये हुए लोग चपरासी और कलर्क जैसी सरकारी नौकरियों के लिए बड़ी मात्रा में आवेदन कर रहे हैं। हालाँकि ठेका प्रथा की यह बीमारी अब सरकारी विभागों को भी लग चुकी है। 

  एकतरह से हमारा देश रोजगार के एक बड़े अकाल से गुजर रहा है। इसको कोई 20 सालों का सबसे बड़ा अकाल बोल रहा है तो कोई पिछले 45 सालों का सबसे बड़ा अकाल बोल रहा है। खेती की अकाल से किसान मरता है और रोजगार का अकाल आज नौजवानों को निगल रहा है। NCRB के अनुसार मध्यप्रदेश में बेरोजगारी की वजह से होने वाली आत्महत्याओं में 2005 से 2015 के बीच 2000% की बढ़ोतरी हुई है। दूसरी तरफ "बेरोजगार और हताश लोगों की भीड़ का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल" के जिस खतरे की तरफ हरिशंकर परसाई जी अपने लेख "आवारा भीड़ के खतरे" में करते हैं उसकी भी प्रबल संभावना बन रही है। क्या हम भारत के विकास की कल्पना उस देश के नौजवानों को पक्के रोजगार और उस देश के मज़दूरों-किसानों को उनकी मेहनत का सही हक़ दिलाए बिना कर  सकते हैं? अभी तक के विकास में इन दोनों ही क्षेत्रो में अनिश्चतकालीन सूखा नज़र आ रहा है जो बहुत ही खतरनाक संकट की ओर इशारा कर रहा है।  आने वाले समय में यह स्थिति और भयावह हो सकती है अगर वक़्त रहते इस संकट की जड़ को समझ कर उसका कोई इलाज न किया गया तो।

14 March 2019

14 मार्च आइंस्टीन के जन्म दिवस पर: एक वैज्ञानिक होने का असली मतलब



✍🏼 विकास गुप्ता


“दुनिया से वादा किया गया था कि आवश्यकताओं के बंधन से मुक्ति मिलेगी लेकिन दुनिया का बड़ा हिस्सा भुखमरी का सामना कर रहा है जबकि दूसरे प्रचुरता का जीवन जी रहे हैं।”

-आइंस्टीन

एक वैज्ञानिक दुनिया और मानव समाज को वैज्ञानिक ढंग से देखता है। विज्ञान के नियम सिर्फ फॉर्मूले और गणितीय प्रक्रियाओं तक सीमित नही होते हैं, जबकि विज्ञान समाज को एक विश्वदर्शन देता है, विश्व को समझने का एक आधार देता है, अपने समाज को भी समझने की तर्कणा देता है, जिस पर मानव सभ्यता आगे बढ़ती है। विज्ञान तर्क करना सिखाता है तथा रुढियों और अंधविश्वास पर चोट करता है। ये बात जरूर है कि विज्ञान कभी भी अंतिम सत्य की बात नही करता है, क्योंकि विज्ञान जैसे ही एक रहस्य से पर्दा उठता है वैसे ही दूसरा रहस्य सामने आ जाता है और इस प्रक्रिया में विज्ञान ज्ञान की गहराइयों तक बढ़ता जाता है। एक सिद्धान्त के बाद दूसरे सिद्धांत विज्ञान में आते रहते हैं जो पहले सिद्धान्त के तुलना में ज्यादा सटीक और विषयवस्तु को अधिक गहराई से समझाते हैं और इस प्रकार विज्ञान अपने आप को हमेशा परिवर्तनशील और तार्किक रखता है। यही बात समाज पर भी लागू होती है, विज्ञान के विकास के साथ हमारा सामाजिक और आर्थिक जीवन भी बदलता है, विज्ञान के प्रकाश में अपनी बुराइयों  और अवरोधों को हटाते हुए मानव समाज भी आगे बढ़ता है। इसीलिए एक वैज्ञानिक केवल एक प्रयोगशाला का प्राणी न होकर इस समाज का एक महत्वपूर्ण अंग होता है जिसे अपने ज्ञान का इस्तेमाल पूरी मानवजाति और विश्व की बेहतरी के लिए लगाना होता है। 
   आइंस्टीन सच्चे मायने में एक वैज्ञानिक थे। आइंस्टीन ने अपने को विज्ञान के फार्मूले और गणितीय संक्रियाओं तक सीमित नही रखा जबकि समाज के बारे में भी अपना तार्किक पक्ष रखा था। समाज में फैली गरीबी-अमीरी की खाई, भुखमरी, विश्वयुद्ध, मुनाफे के लिए पर्यावरण की बर्बादी पर लगातार अपना पक्ष रखा। 

ऐसे महान वैज्ञानिक को हमारा नमन!

स्वच्छ भारत अभियान” की कहानी झाड़ू की जुबानी

 
✍🏼 राघवेन्द्र तिवारी

आज से चार साल पहले केन्द्र सरकार ने बड़े तामझाम से एक आयोजन किया था, नाम दिया गया – “स्वच्छ भारत अभियान”। सबने झाड़ू उठा लिया – नेता, अभिनेता, अफ़सर कोई नहीं बचा, सबने सफ़ाई करते हुए अपनी फोटुवे खिंचवाई और सोशल मीडिया पर डालीं, तब जाके झाड़ू को भी अपनी वैल्यू का अहसास हुआ। इतने बड़े-बड़े लोगों के हाथों में ख़ुद को देखकर वह फूली नहीं समा रही थी।

सफ़ाई को प्राथमिकता देने की यह शुरुआत उसे बहुत अच्छी लग रही थी, इसे देख सफ़ाईकर्मियों को भी गर्व महसूस हुआ कि जो लोग अभी तक हमें हीन भावना से देखते थे, कम-से-कम अब उस काम का महत्व तो समझे। लेकिन किसे मालूम था कि ये सब बस कुछ पल के लिए एक झोंके की तरह आया है और चला जायेगा, किसे मालूम था कि सफ़ाई का ये उत्सव राष्ट्रीय नौटंकी साबित होगा। लोगों को ज़्यादा इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। अभियान की शुरुआत में ही जो लोगों को दिखा उसने इस सफ़ाई अभियान की पोल खोल दी। हुआ यूँ कि साफ़ जगह पे पहले कूड़े का आॅर्डर देके कूड़ा फैलाया जाता और फिर लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों से आते और उन साफ़ जगहों पर फैलाई गयी गन्दगी को झाड़ू लगाते और ये सब कैमरे के सामने किया गया, ताकि इसे सालों तक दिखाया जा सके। शुरू-शुरू में झाड़ू को बहुत ख़ुशी हो रही थी, यही तो वो चाहती थी कि सफ़ाई का काम समाज के एक तबक़े तक सीमित न रखा जाये, सभी लोग इसे अपना काम समझें। पर झाड़ू की ख़ुशी टिक नहीं पायी, दूसरे दिन उसे अन्धेरे कमरों में क़ैद कर दिया गया, समाज के उसी तबक़े के हाथों में वापस थमा दिया गया, जिसकी पीढि़याँ सफ़ाई करने के लिए ही अभिशप्त थी। सब कुछ बदल गया था, कल जो लोग उसको बड़े प्यार से हाथों में लिए खड़े थे, आज उसे देखना भी नहीं चाह रहे थे, कल जो लोग उसके साथ फ़ोटो खिंचवा रहे थे, आज उससे दूर भाग रहे थे। सफ़ाईकर्मियों को फिर जहालत और अकेलेपन के अन्धेरे में धकेल दिया गया।

उसके बाद से हर 2 अक्टूबर को यही कहानी पिछले कई सालों से चली आ रही है, अब तो ये फि़क्स डिपोजिट की तरह हो गया है, जो एक नियमित समय पर रिनियुल किया जाता है। हर 2 अक्टूबर को अब भी झाड़ू को अन्धेरे कमरों से बाहर निकाला जाता है, पर अब वो उत्साहित नहीं होती, उसे पता है कि उसकी जगह किन हाथों में है।

झाड़ू सोचती है कि ये धोखे का खेल है जिसकी शिकार केवल वह ख़ुद नहीं है, बल्कि पूरी जनता है जिसके सामने ये नौटंकी परोसी जाती है, हर वो सफ़ाईकर्मी भी है जिसकी तकलीफ़ें इस महानौटंकी के शोर के पीछे दब जाती हैं। झाड़ू ने अपने पूर्वजों से सुन रखा है कि स्वच्छता दिखावा मात्र नहीं होना चाहिए, स्वच्छता हमारा स्वभाव होना चाहिए, क्योंकि दिखावा वो लोग करते हैं जिनका मन ही साफ़ नहीं है। झाड़ू उन सफ़ाईकर्मियों को देखती है, उनकी तकलीफ़ों को समझती है। वो ये भी जानती है कि पूरे समाज की सफ़ाई का दारोमदार इन्हीं के कन्धे पे है, पर उनको ना तो ये समाज बराबर का सम्मान देता है, ना आधुनिक मशीनें और ना ही समय से तनख्वाह। झाड़ू याद करती है कि 2015 में बनवारी लाल की मौत सिर्फ़ अपनी 4 महीने की सैलरी पाने के लिए अफ़सरों के चक्कर काट-काट के हो गयी, जबकि उसके मरने के बाद भी 4 महीने की सैलरी उसको नहीं मिली। वो सोचती है कि कम-से-कम स्वच्छता के नाम पर जो अभियान चल रहा है उसी के द्वारा उनको ये सब सुविधाएँ दिला दी जातीं, तो इस तरह वे बेमौत नहीं मरते। असल में जो होना चाहिए, वो किया नहीं जाता और जो हो रहा है उससे तो कुछ बदलता नहीं, चाहे गंगा की सफ़ाई हो या खुले में शौच हो या शहरो में कूड़े और नालों की सफ़ाई हो। स्वच्छता के नाम पे साफ़-सुथरी जगह पे झाड़ू चला लेने से इन्हें वोट मिल जाते हैं और सफ़ाई के इस आयोजन के शोर में सीवर की सफ़ाई के दौरान होने वाली मौतों की चीख़ें दब जाती हैं। पिछले 5 सालों में (25 मार्च 2013 से 25 मार्च 2018 तक) 877 सफ़ाईकर्मियों की मौत हुई, जिसकी गवाह झाड़ू रही है। उसने तो सैकड़ों और मौतें देखी हैं, जिनका कभी हिसाब ही नहीं किया गया, क्योंकि मेन होल की सफ़ाई के लिए ठेके पे ही कर्मचारी रखे जाते हैं जिनका नगर निगम के पास कोई आँकड़ा नहीं होता है, उनकी मौत तो गिनती में बहुत कम आ पाती है। सीवर में हाइड्रोजन सल्फ़ाइड गैस पायी जाती है जो अगर अधिक मात्रा में हो तो एक बार साँस लेने में ही मौत हो जाती है और जब इस तरह की मौत होती है तो एक साथ ग्रुप में होती है, क्योंकि जब अन्दर एक की मौत हो जाती है और वो बाहर नहीं आता तो दूसरा जाता है उसे देखने, वो भी नहीं आता तो तीसरा जाता है और इस प्रकार एक साथ कई लोग मर जाते हैं।

एक रिपोर्ट 9 मार्च 2016 की है, जिसके हिसाब से 22000 लोगो की मौत हर साल हमारे देश में हो जाती है। जिन मौतों को रोकना इस समाज की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, उसके बजाय कुछ और ही किया जाता है। 80% सफ़ाईकर्मियों की मौत रिटायरमेण्ट के पहले होना सफ़ाई अभियान का जो झुनझुना बजाया जा रहा है, उसकी पोल खोलती है, जिस देश में करोड़ों रुपये सफ़ाई के प्रचार में, घण्टों टीवी डिबेट में और बैनर-पोस्टर में बर्बाद किये जाते हों, जहाँ नेता-अभिनेता सभी इसकी अगुवाई करते हो, वहाँ ये मौतें झाड़ू को ये सोचने पे मजबूर करती है कि यह समाज कहाँ जा रहा है।

मज़दूर बिगुल से साभार

11 March 2019

प्रदूषण अब प्रेमी की यादों जैसा है जिसका एहसास हर साँस को है।



✍🏼 राघवेंद्र तिवारी

स्वच्छ हवा हमारे स्वास्थ्य की सबसे मूलभूत आवश्यकता है फिर भी हमने कभी भी इस बात को ज्यादा तवज्जो नही दी कि क्या हमें शुद्ध हवा मिल रही है? हमनें कभी अपने जन प्रतिनिधि या नेता से भी इसपर कोई सवाल नहीं उठाया। यही कारण है कि आज भारत की स्थिति बहुत दयनीय हो चुकी है। हाल ही में आईक्यू एयर विजुअल संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के 15 शहर आते हैं। गुरुग्राम ने इस मामले में "विश्वगुरु" बनने का खिताब हासिल कर लिया है जो कि दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। यहाँ पर हवा में PM 2.5 की मात्रा 2018 में 135.8 यूनिट पाई गई। गौरतलब है कि यह WHO द्वारा स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हवा के लिए जारी मानक (10 यूनिट) से 13 गुना ज्यादा है। दिल्ली को भी दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी कहा गया है। यह रिपोर्ट पिछले 5 सालों से स्वच्छ भारत अभियान और उसके पहले के निर्मल भारत अभियान पर गम्भीर सवाल खड़े करती है।  बचपन से यह हमारे दिमाग में डाला जाता है की मनुष्य पर्यावरण को बर्बाद कर रहा है, पर ये कौन "मनुष्य" है, हर मनुष्य तो पर्यावरण को एकसमान बर्बाद नहीं कर रहा। सबसे ज्यादा बर्बाद कौन कर रहा है? आखिर लगातार इस बढ़ते प्रदूषण का जिम्मेदार कौन है? 
 ◆ कोयले का अत्यधिक उपयोग 
◆ निजी वाहनों में बेतहाशा वृद्धि
◆ पर्यावरण के नियमों का बेरोकटोक उलंघन 
आदि मुख्य कारण गिनाए जा सकते हैं। 

2014 से भारत ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है पर इस आधार पर अगर हम यह मान लें कि हमारी सरकारें पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत प्रयासरत हैं तो यह किताब के एक पन्ने को पढ़कर पूरी किताब के बारे में राय बनाने जैसा होगा। दरअसल, भारत मे कोयला ऊर्जा का मुख्य स्रोत है और बीजेपी सरकार के औद्योगिक निर्माण को गति देने का मुख्य औजार भी। कोयला विभिन्न प्रकार के जीवाश्म ईंधनों में सबसे ज्यादा प्रदूषणकारी है और जलवायु परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक भी ।
जब हम कोयले की बात करते है तो भारत अपने पड़ोसी देश चीन से भी खराब स्थिति में होता है। जहाँ चीन में कोयले का इस्तेमाल तेजी से घट रहा है वही भारत मे तेजी से बढ़ रहा है। चीन में कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन भी घट रहा है जबकि भारत मे बढ़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संस्था के अनुसार भारत मे 2035 तक कोयले का इस्तेमाल दोगुना हो जाएगा। इस तरह से कोयले के इस्तेमाल में  हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है 2020 तक भारत कोयले का सबसे बड़ा निर्यातक बन जायेगा।
वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टिट्यूट के अनुसार दुनिया भर में प्रस्तावित 1200 MW कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में आधे भारत में हैं। भारत की पांचवी सबसे बड़ी कंपनी कोल इंडिया दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कंपनी है।

पर्यावरण पर काम कर रही कई संस्थाएँ इसके लिए सरकार पर दबाव बनाती हैं कि वो पर्यावरण संरक्षण नियमों की अनदेखी करने वाली कंपनियों पर कार्यवाही करे। पर वास्तव में कोई उचित और कठोर कार्यवाही कभी की ही नहीं जाती है। कई बार छोटी मोटी कार्यवाही मसलन,  नोटिस भेजना, कंपनी पर आर्थिक दंड लगाना किया जाता है लेकिन कंपनियां बेखौफ अपना काम जारी रखती हैं और फिर सरकार इन आर्थिक दण्डों को माफ कर देती है। उल्टा कई बार पर्यावरण संरक्षण की संस्थाओ पर ही हमला करके अपने चहेते पूँजीपतियों की सेवा की जाती  है। तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वेदांता कंपनी के स्टरलाइट प्लांट द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण और गैस रिसाव से स्थानीय लोग मरते रहते हैं। इसके विरोध में उतरने वाले 20 हजार लोगों के समूह पर SLR राइफल से निशाना लगाकर गोलियां दागी जाती हैं, 33 आम नागरिक मारे जाते हैं, जिसमें एक 17 साल का छात्र भी है। लोग तो शायद कीड़े-मकोड़े होते हैं वोट मिलने के बाद उनके जान की कीमत ही क्या है। इस हत्याकांड के बाद वेदांता के इस प्लांट को सील कर दिया गया।  फिलहाल वेदांता का कहना है कि प्लांट खुलने की कानूनी प्रक्रिया चल रही है। शायद जल्दी ही प्लांट दुबारा ज़हर उगलने लगे और उसके काले धुएँ और तेज सायरन के पीछे उन 33 लोगों की चीखें गुम हो जाएं। 
  2015 में बीजेपी सरकार ने अडानी की कंपनी पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के लिए लगाए गए 200 करोड़ के आर्थिक दण्ड को माफ कर दिया। गुजरात के मुंद्रा में अपने पोर्ट के आसपास के पूरे इकोसिस्टम को बर्बाद करने के लिए अडानी पर यह फाइन लगाया गया था। पूंजीपति अडानी प्रधानमंत्री मोदी के काफी करीबी माने जाते हैं। 
 2014 में बीजेपी सरकार के बनने के बाद 2015 में 9000 हजार गैर सरकारी संस्थानों(NGO) का पंजीकरण रदद् कर दिया था। इसमें मुख्य रूप से सरकार के निशाने पर  ग्रीन पीस नाम की एक पर्यावरण संरक्षण संस्था भी रही थी।

ग्रीन पीस और एयर विजुयल ने ही मिल कर 2018 वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट नाम से वायु प्रदूषण पर यह रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में यह सामने आया है कि दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 15 शहर भारत के है। इस रिपोर्ट में शामिल 3000 शहरों में से भारत का गरुग्राम(गुड़गांव), गाजियाबाद सबसे प्रदूषित शहर है। फरीदाबाद, भिवाड़ी और नोएडा दुनिया के छः सबसे प्रदूषित शहरों में है। जबकि देश की राजधानी दिल्ली दुनिया का 11वाँ सबसे प्रदूषित शहरों है।

प्रदूषण की हालत को जानने के लिए आज किसी मापक यंत्र की जरूरत नहीं है, यह हमारी प्रेमिका की यादों जैसे है जिसका एहसास आज हर साँस को है। प्रदूषण को रोकने की मंशा और "प्रयासों" पर हम ऊपर बात कर चुके हैं। शुद्ध हवा हमारा संवैधानिक अधिकार है। यह याद रखने की जरूरत है कि प्रदूषण हर साल हमारे देश के 25 लाख से ज्यादा नागरिकों की ज़िंदगी लील जाता है। फेफड़ों की बीमारी हमारे देश में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। इस बार के लोक सभा चुनाव में जब अडानी के हेलीकॉप्टर से उतर कर विशाल मँच पर चढ़कर हमारे नेताजी जब हमसे वोट माँगेंगे तो हम शायद साँसों की इस घुटन को जरूर याद रख पाएंगे।